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ممبئی صرف فلموں اور بلند عمارتوں کا شہر نہیں بلکہ ذائقوں، ثقافت اور تاریخ کا حسین امتزاج بھی ہے۔ اس ویڈیو میں جانیے ممبئی کے مشہور فوڈ کلچر کے بارے میں، جہاں محمد علی روڈ، گھاٹ کوپر کھاؤ گلی اور بانڈرا کے کھانے لوگوں کو اپنی جانب متوجہ کرتے ہیں۔

ممبئی کے مشہور وڈا پاؤ، پاو بھاجی، بریانی اور کباب جیسے روایتی کھانے شہر کی گلیوں اور بازاروں کی خاص پہچان ہیں۔ بالخصوص رمضان المبارک میں محمد علی روڈ اور دیگر فوڈ اسٹریٹس کی رونق دیکھنے سے تعلق رکھتی ہے۔

ویڈیو میں ممبئی کے تاریخی ورثے کے دو اہم مراکز چھترپتی شیواجی مہاراج ٹرمینس (CSMT) اور گیٹ وے آف انڈیا کا بھی ذکر ہے۔ یہ تاریخی عمارات ممبئی کی شناخت، فنِ تعمیر اور ثقافتی ورثے کی نمایاں علامتیں ہیں۔

اگر آپ کو ممبئی کی سیر، بھارتی ثقافت، تاریخی مقامات اور منفرد کھانوں میں دلچسپی ہے تو ویڈیو کو لائک، شیئر اور Apna TV New York کو سبسکرائب ضرور کریں۔
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00:10आज हम एक ऐसी दिल्चस्प वजाहत या एक ऐसे एकस्प्लेइनर का आगास कर रहे हैं जो सीधा मुंबई की तारीख
00:16के दिल में उतर जाता है
00:17ये सिर्फ कुछ पुराने पत्थरों और महराबों की कहानी नहीं है बलकि ये पूरे एहद की और शेहर की तारीखी
00:23दाखली रास्तों की हैरत अंगेस तबदीलियों की मुकमल अकासी है
00:26तो चलिए बगएर किसी ताखिर के सफर पर निकलते हैं और देखते हैं कि कैसी इन अजीम उशान इमारतों ने
00:31वक्त के साथ अपनी शनाखत को बदला
00:34जरा तसवर करें कोई नौबादियाती शहर जब पहली बार अपने सबसे बड़े शाही हुकमरान की आमद की तैयारी कर रहा
00:41हो तो वो ये काम आखर कैसे करेगा
00:43जाहिर सी बात है कि ये एक ऐसा मौका होता है जहां ताकत, शानो शौकत और दौलत का शानदार मुझाहरा
00:50सबसे ज्यादा जरूरी समझा जाता है
00:51लेकिन हैरत की बात ये है कि 1911 में जब शाह जौच पंजम पहली बार हिंदुस्तान आए
00:59तो बरतानवी सल्तनत की बेपना दौलत और वसाइल की बावजूद उनका इस्तकबाल गेटवी ऑफ इंडिया के एक आरजी गत्ते यानि
01:07कार्डबोर्ड के मॉडल से किया गया था
01:08जी हाँ असली इमारत उस वक तक तामीर ही नहीं हुई थी और बादशा सलामत को महज एक गत्ते के
01:14धांचे से खोशामदीद कहना पड़ा
01:16तो आईए इस सफर का पहला हिस्सा देखते हैं एक सल्तनत का टर्मिनस और मुंबई का अजीम उश्चान रिल्वे दर्वाजा
01:24इस अजीम सफर की शुरुआत होती है बोरी बंदर की एक छोटी से लखडी की स्टेशन से जहां 1853 में
01:31पहली ट्रेन चली
01:32फिर 1877 में इस पुरानी स्टेशन को गिरागर एक नया और अजीम मनसूबा शुरू किया गया
01:38और पूरे दस साल की मसलसल मेहनत के बाद 1888 में शांदार विक्टोरिया टर्मिनस मुकमल हुआ
01:45और इस इमारत की खुबसूर्ती तो देखिए
01:48सर जमशेट जी जी जी भोई स्कूल ओफ आर्ट के तालिब इल्मों ने कमाल का हुनर दिखाया
01:52उन्होंने विक्टोरियन इताल्वी गौथिक तर्जे तामीर को रिवायती हिंदुस्तानी महलात के डिजाइन के साथ इस तरह मिलाया कि एक शाहकार
02:01वजूद में आ गया
02:01खास्तार पर इसके दाखली दर्वाजों पर ध्यान दें जहां बरतानिया की नुमाइंद की करता हुआ एक शेर और हिंदुस्तान की
02:08नुमाइंद की करता हुआ एक चीता आज भी पहरा देते नजर आते हैं
02:11लेकिन जो चीज सबसे ज़्यादा मुतासर करती है वो है इसकी बेपनाह वुस्त एक 150 मीटर लंबा प्लाटफॉर्म जो सीधा
02:21500 मीटर लंबे ट्रेन शेट से बगएर किसी रुकावट के जा मिलता है
02:25और वो भी इस तोर में जब इतना बड़ा गुमबद और शेट किसी रवायती सहारे या सिंट्रिंग के बगएर तामीर
02:31किया गया था
02:31यह वाकिए एंजिनियरिंग का एक नामुम्किन नजर आने वाला कारणामा था
02:35चलिए बागे बढ़ते हैं दूसरे हिस्से की तरफ समंदर के रास्ते दाखली दर्वाजा यानि एक रस्मी बहरी इस्तक्बाल
02:42यहां दिल्चस्प बात यह हैं कि इस गत्ते के फर्जी मॉडल की जगा आखिर कार 1924 में जॉज विटेट के
02:49बनाए गए एक बहतरीन डिजाइन ने ले ली
02:51पीले बसॉल्ट पथर से तयार करदा इस इमारत को इंडो सारसनिक तर्ज पर बनाए गया
02:56और इस मनसूबे पर उस जमाने के हिसाब से 21 अशारिया एक तीन लाख रुपे की भारी लागत आई थे
03:02अब ये इंडो सारसनिक तर्ज तामीर आखिर है क्या
03:05असल में ये कोई इप्तफाक नहीं था बलकि एक बहुती सोची समझी कोशिश थी
03:10जिसमें मकामी हिंदुस्तानी जमालियाद को शाही इमारतों के साथ हमाहं किया गया
03:15जॉर्ज विटेट ने खास नौर पर 16 सदी की गुजराती मस्जिदों के बैरूनी हिस्सों की बारीकियों को इस यादगार में
03:21शामिल किया
03:22ताकि ये मकामी सकाफत की सही अकासी कर सके
03:25अगर इन दोनों अजीम दर्वाजों को एक साथ रखकर देखा जाए
03:28तो उस दोर का तामिराधी इर्तका बिलकुल साफ नजर आता है
03:32एक तरफ विक्टोरिया टर्मिनस की शांदार हाई विक्टोरियन गौथे के मारत है
03:36जिसमें मगरबी असर नुमाया है
03:37और दूसी तरफ गेटवे आफ इंडिया है
03:39जहां इंडो सार्सेनिक और गुजराती अंदास का एक बहतरीन और खुबसूरत मकामी मिलाप मिलता है
03:45यहां से हम तीसरे हिस्से में दाखिल होते हैं
03:47आजादी और बदलती शनाखतें यानी अलामतों की वापसी
03:52तारीख का इससे बड़ा तंस भला क्या होगा
03:54जो गेटवे आफ इंडिया एक शेहनशा के शानदार इस्तक्बाल के लिए बनाया गया था
03:58वो ही बरतानवी राज के इखताम की आखरी निशानी बन गया
04:0228 फरवरी 1948 को समरसेट लाइट इंफिंट्री का आखरी बरतानवी दस्ता
04:0721 तोपों की सलामी के साथ इसी दर्वाजे से हमीशा के लिए रुखसत हुआ
04:11और बिल्कुल यही सकाफ्ती वापसी रेलवे टर्मिनिस पर भी देखने को मिलती है
04:171888 में जो इमारत मलका विक्टोरिया की नाम पर रखी गई थी
04:20उसे 1996 में मराथा सल्तनत के पहले इशेंचा के एजाज में चत्रपती शिवाजी टर्मिनिस का नाम दिया गया
04:26और फिर 2016 में उसमें महराज का लवज चामिल करके उसे मजीद बावकार बना दिया गया
04:32समंदर की किनारे भी ये शनाफ्त मुकमल तोर पर बदल रहे थी
04:351961 में बिलकुल उसी जगा से जहां शाज जोर्ज पंजम का कासी का मुझस्मा नस्थ था
04:40उसे हटा कर एक तिन की शेड में रख दिया किया
04:59प्यान एक इंतहाई गमगीन रिश्टा भी है
05:012008 के मुंबई हमलों के दौरान इन दोनों ही तारीखी मारतों को देहशत कर दी का निशाना बनाया गया
05:07लेकिन इन दर्दनाक वाकियात के बाद इन जगों ने शेहर की उस हिम्मत और लचक को भी साबित किया चुक
05:12कभी तूट नहीं सकती
05:14आज कल देखा जाए तो गेटवी ऑफ इंडिया सिर्फ एक तारीखी यादगार नहीं
05:18बलकि रोजमर्रा की जिन्दगी का एक एहम हिस्सा है
05:20यहां पांच मुख्तलिफ जेटियां जहां से एलेफेंटा गारों के लिकिष्टियां चलती है
05:25और दिल्चस्प बात यह है कि 2003 से हर साल यहूदी तहवार हनुका के मौके पर यहां मैनोरा भी रोशन
05:31किया जाता है
05:32यह अब एक जदीद सकाफती मरकज बन चुका है
05:35दूसरी जानेब यह तारीखी रेलवे टर्मिनस आज भी शहर के एक बहुत बड़ी शर्यान की तरह काम कर रहा है
05:40इसके 18 अलग-अलग प्लैटफॉर्म्स जिन में 7 लोकल और 11 तवील फासले की ट्रेनों के लिए है
05:46हर रोज मुसाफरों के एक लाम उतनाही सेलाब को उनकी मंजिलों तक पहुंचाते है
05:50तो इस वजाहत के आखिर में एक बहुत एहम सवाल जहन में उभरता है
05:54यह शानदार इमारतें जो कभी किसी गेर मुल्की ताकत और सल्तनत की अलामत थी
05:58अब मुंबई की रोज मरा जिंदगी का धड़कता हुआ दिल बन चुकी है
06:02तामीराती विर्सा तो हमेशा बदलता रहता है
06:04तो क्या अगली सदी में आने वाली नसले इन इमारतों को इसी नजर से देखेंगी
06:09इनकी अगली मंजिल क्या होगी
06:11ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब सिर्फ और सिर्फ आने वाला वक्त ही देगा
06:16मुंबई एक ऐसा शहर जो कभी नहीं सोता
06:18और सच कहा जाए तो इसका पेट भी कभी नहीं भड़ता
06:21इस चाइजे में हम मुंबई की उन पुरौनक और मुतहरिक गल्यों का रुख करने वाले हैं
06:25जहां कि खानों की दुनिया को मुख्तलिफ तारीखी कम्यूनिटीज ने दहाईयों की महनत से मिलकर बनाया है
06:30ये एक ऐसा सफर है जो जाइकों और तारीख से पूरी तरह भरा हुआ है
06:35दरसल इस जाइकेदार सफर पर निकलने से पहले एक जबरदस मश्वरे पर गोर कर लेना चाहिए
06:39अपनी बेल्टी धीली कर लें और इरादे मजबूत कर लें
06:43ये एक ऐसा जुमला है जो मुँ में पानी ले आने वाले इस फूड मैरेथान के लिए बिलकुल सही महौल
06:48बनाता है
06:49क्योंकि मुंबई का खाना सिर्फ खाया नहीं जाता इसे तो जिया जाता है
06:53सबसे पहले चलते हैं इस शहर की असल पहचान की तरफ
06:57यानि इसका स्ट्रीट फूड कल्चर जो उसे बजात और पर स्ट्रीट फूड का दारोल हुकूमत बनाता है
07:02यहां एक मकामी लव्ज बार बार सुनने को मिलता है
07:05खाव गली जिसका सीधा सा मतलब है खाने की गली
07:09तरहसल ये गलियां मुंबई के हर महले की फूड सीन का धड़कता हुआ दिल है
07:13ये वो जगे हैं जहां रात कहे तक अलग-अलग सकाफ़तों के खानों की स्टॉल्स सजे रहते हैं
07:18बस यूं समझा जा सकता है कि ये जाइकों का एक पिगलता हुआ बरतन है
07:22एक लाजवाब रौनक मेला
07:24घाट कोपर की खाव गली को ही देख लेते हैं
07:27ये इस बात की बहतरीन मिसाल है कि कैसे एक ही सड़क पर जाइकों का एक ना खत्म होने वाला
07:31सिलसला मिल सकता है
07:32ज़रा तसवर किया जाए
07:34एक ही जगा साथ से ज़्यादा फूड स्टॉल्स
07:36मक्षन में तेरतीवी लेजनरी पाव भाजी
07:39मुंबई की जान क्लासिक वड़ा पाव
07:41खालिस साथ इंडिन स्नैक्स
07:43और तो और अजीब हो खरीब लेकिन इंतहाई मज़ेदार चाइनीज और इंडिन फूजन डिशिस
07:47यहां की रातें बस इन खानों की गहमा गहमी से ही जिन्दा रहती है
07:51अब इस सारी शोरो गोल और वराइटी में कुछ ऐसी जगें और खाने हैं जो वाकरी लाजमी है
07:56सरदार रिफ्रेश्मिंट्स की मक्खन वाली पाव भाजी जो 1960 की दहाई से लोगों के दिल जीत रही है
08:02या फिर अशोक का क्लासिक वड़ा पाव जो महज 20 रुपे में मिलने वाला मुंबई का अपना गेर सरकारी फास्ट
08:08फूड है
08:08और हाजी अली सरकल पर हाजी अली जूस सेंटर का फालूदा
08:11और ब्रिटैनिया इन कोका वो मशूर बेरी पुलाओ जो खास एरान से मंगवाई गई बेरी से बनता है
08:17ये फहरिस्त हर उस शक्स के लिए एक खास्दाना है जो मुंबई की असल जाइके चखना चाता है
08:22और बात तारीख की हो तो 60 साल
08:26जी हां, 60 से जाइद बरसों की नुमाइंदगी करती है ये जगा
08:29इतने अरसे से तारीखी हाजी अली जूस सेंटर प्यासे लोगों को अपने ताजा भलों के जूस और शांदार फालूदे पिला
08:36रहा है
08:37इतनी दहाईयों से एक ही जाइका, एक ही मायार बरकरार रखना वाकी कमाल की बात है
08:43स्ट्रीट फूड के स्टॉल से निकल कर अब सरा शेहर की सकाफती और कॉस्मोपॉलिटन तारीख की तरफ चलते है
08:48जो यहां के सदियों पुराने एरानी कैफी में बसती है
08:52किसी भी पुराने एरानी कैफे में कदम रखना पिलकुल ऐसा है जैसे कोई टाइम कैपसियूल के जरिये सीधा माजी में
08:59पहुँच किया हूँ
08:59पुराना विंटिज फरनिचर पार्सी और एरानी पक्वान और हवा में रची हुई ताजा बन मसका और गरम चाई की वो
09:06मानूस सी खुश्बो
09:07ये जगें हिजरत की पुरिसरार कहानिया सुनाती हैं और उन तरकीबों को आज भी जिन्दा रखे हुएं जिन्होंने नसल दर
09:14नसल लोगों को अपना दीवाना बनाई रखा है
09:16इन मकामात की तारीख देखी जाए तो पता चलता है कि वक्त उनका वाकि कुछ नहीं बिगार सका
09:221871 में खुलने वाला लियोपोल्ड कैफे जिसका जिकर मशूर नौवल शांतराम में भी मिलता है
09:27फिर 1887 से हाथ से आईसक्रीम बनाने वाली ताज आईसक्रीम्स
09:311923 में ब्रिटानिया इनको का रिवायती पार्सी खानों का आगास
09:35और 1940 से कैफे मदरास की वो मशूर फिल्टर कॉफी
09:39ये टाइम लाइन साफ बताती है कि लाजवाब खाना और कम्यूनिटी का एहसास कभी पुराना नहीं होता
09:44ये वक्त की कैट से मुकमल आजाद है
10:01ही अलग सकुन है
10:02और दूसरी तरफ 1923 की शान ब्रिटानिया इनको
10:05जिसे आन जहानी बोमन कोहिनों ने मशूर किया
10:08जहां इंपोर्टेड इरानी बेरीज वाला भारी और खुश्बूदार बेरी पुलाओ मिलता है
10:12यानी सादगी से लेकर शाही दावत तक
10:14इस कल्चर में हर तरह के रंग मौजूद है
10:17अब जाइकों का रुख थोड़ा सा बदलते हैं
10:20और मुंबई के अंदर मौजूद एक और शानदार दुनिया का रुख करते हैं
10:24यानी साउथ इंडियन नाश्टे का सफर
10:26माठंगा और किंग सकल की अलाके दरसल मुंबई के अंदर एक छोटे साउथ इंडिया का किरदार अदा करते हैं
10:32अगर किसी को जुनूबी रियास्तों से बाहर एन शेहर की बीचों बीच
10:36खालिस रिवायती साउथ इंडियन थाली या नाश्टे की तलबो
10:39तो ये जगहें उसके लिए किसी जन्नत से कम नहीं
10:42इस जोग राफियाई मरकज की एहमियत को समझना बहुत जरूरी है
10:46और जब साउथ इंडियन नाश्टे का जिकर आए
10:48तो कैफे मदरास का नाम सबसे नुमाया है
10:501940 में काइम होने वाला ये इदारा आज भी उतनी इज़त और मकबूलियत रखता है
10:55कि वीकेंड की सुभा यहां लगने वाली लंबी खतारे एक तरह की रस्म समझी जाती है
10:59और सच तो ये है कि जब वो क्रिस्पी डोसा, पेहत, नर्मो मुलाइम, इडली
11:04और वो मशूर जागदार फिल्टर कॉफी सामने आती है, तो इंतजार की सारी कोफ दूर हो जाती है
11:10और मेहनत बिलकुल वसूल महसूस होती है
11:13नाश्ते और चाय के बाद, अब चलते हैं इस जाइजे के सबसे पुर्जोश और धमाकेदार हिस्से की तरफ
11:19मौहमद अली रोड की जियाफते
11:21खास तोर पर रमजान के महीने में जब सूरज गुरूब होता है तो ये इलाका एक अलगी रूप धार लेता
11:26है
11:27जरा इस मंजर का तसवर किया जाए
11:29हवा में तबों की चंचना हट गुंज रही है
11:31बड़ी-बड़ी कड़ाईयों में सालन उबल रहे हैं
11:34और धुआदार कबाबों की महक चारों तरफ पहली भी है
11:37भूके हुजूम का एक सैलाब गलियों में उमड आता है
11:40और खाने का एक आम सा शोर एक अजीम और शान जशन और मेले में तबदील हो जाता है
11:45जाहिर है इतनी बड़ी वराइटी देख कर कोई भी चगरा सकता है
11:48तो खानों के इस हुजूम में गोता लगाने के लिए एक बाकाइदा प्लैन की जरूरत पढ़ती है
11:53ताकि नमकीन और मीठे का बेहतरीन तवाजन रखा जा सके
11:56शुरुआत सूर्ती बारा हांडी के लजीज गोश्ट के सालन से की जा सकती है
12:00फिर बीच में ताज आइसक्रीम्स पर रुक कर बोहरी थाल की रिवायत के मताबिक थोड़ा मीठा चख लिया जाए
12:05उसके बाद नूर महमदी के इंतहाई नरम कबाब खाई जाए
12:08फिर हुजूम के साथ मिलकर शालीमार रेस्टरॉंट की शानदार बिर्यानी का मज़ा लिया जाए
12:12और आखिर में बुरहानपूर जलीबी सेंटर की गरम और मीठी मावा जलीबियों से इस शानदार दावत का इक्तिताम किया जाए
12:19मुकमल पफेक्शन
12:21अभी हमने सूर्ती बारा हांडी का जिकर किया
12:24नाम से जाहर है बारा यानि वो बारा देख्चे जो खरीदारों के सामने मुसलसल उबल रहे होते हैं
12:30हर एक देख्चे को घंटों तक बड़ी तवज़ और महुबत से पकाया जाता है
12:34तब जाकर लैम नहारी जैसी ग्रेवीज का वो गहरा और जादूई जाइका निकल कराता है
12:39और फिर जो ताज आइसक्रीम पर रुखने की बात हुई
12:42वो दरहसल एक खास मकामी बहरी रिवायत का हिस्सा है
12:45यानि मसालेदार और भारी गोश्ट खाने के बाद फलों वाली गाड़ ही आइसक्रीम खाना
12:50ताज आइसक्रीम्स 1887 से बंबई में हाथ से आइसक्रीम बनाने वाले आखरी मकामात में से एक है
13:03नूर महमदी के चिकन शामी कबाबों के हैरत अंगेज नर्मी के पीछे बाकाइदा एक इंतहाई दिल्चस मकामी कहानी मशूर है
13:10कहते हैं कि ये कबाब दरसल एक ऐसे नवाबसाद के लिए जाद किये गए ते जिनके दाहत नहीं थे
13:14जी हाँ सच में इन्हें इतना बारीक पीसा जाता है कि उन्हें चबानी की जरूरत ही नहीं पड़ती बस जबान
13:20पर रखते ही ये खुद बखुद घुल जाते हैं
13:22रमजान की इस अजीमु शान दावत का क्लाइमाक्स बड़ा दिल्चस्प और मुतज़ाद है
13:27एक तरफ शालिमार की भारी भरकम और मशूर बिर्यानी है जो इफ्तार की वक्त सबको एक साथ दस्तरखोन पर इखटा
13:34करती है
13:34और दूसरी तरफ बुर्हानपूर का वो जबरदस्ट मीठा इखतताम जहां खालिस दूद के मावे की पतली और गोल जलेबियां सीधे
13:41खौलते हुए गरम तेल में उतारी जाती हैं और सुनहरी होने तक तली जाती है
13:45यानी नमकीन बिर्यानी की इश्टिहा और गरम तेल से निकलने वाली मीठी जलेबियों का एक लाजवाब मवाजना
13:51मुंबई की इन साइकेदार गलियों का ये जाइजा अब अपने एक्तिताम को पहुँचता है
13:57सदियों पुराने इरानी कैफेस की महिक से लेकर साउथ इंडियन डोसों और मुहमद अली रोड के गरम तवों तक
14:04अब सबसे बड़ा और मुश्किल सवाल बस यही बाकी बचता है कि इस अजीम उश्शान दावत की शुरुआत आखिर किस
14:10जगा से की जाए
14:11तो सोचनी की बात यह है कि अगला पड़ाओ कौन सा होना चाहिए

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