00:10आज हम एक ऐसी दिल्चस्प वजाहत या एक ऐसे एकस्प्लेइनर का आगास कर रहे हैं जो सीधा मुंबई की तारीख
00:16के दिल में उतर जाता है
00:17ये सिर्फ कुछ पुराने पत्थरों और महराबों की कहानी नहीं है बलकि ये पूरे एहद की और शेहर की तारीखी
00:23दाखली रास्तों की हैरत अंगेस तबदीलियों की मुकमल अकासी है
00:26तो चलिए बगएर किसी ताखिर के सफर पर निकलते हैं और देखते हैं कि कैसी इन अजीम उशान इमारतों ने
00:31वक्त के साथ अपनी शनाखत को बदला
00:34जरा तसवर करें कोई नौबादियाती शहर जब पहली बार अपने सबसे बड़े शाही हुकमरान की आमद की तैयारी कर रहा
00:41हो तो वो ये काम आखर कैसे करेगा
00:43जाहिर सी बात है कि ये एक ऐसा मौका होता है जहां ताकत, शानो शौकत और दौलत का शानदार मुझाहरा
00:50सबसे ज्यादा जरूरी समझा जाता है
00:51लेकिन हैरत की बात ये है कि 1911 में जब शाह जौच पंजम पहली बार हिंदुस्तान आए
00:59तो बरतानवी सल्तनत की बेपना दौलत और वसाइल की बावजूद उनका इस्तकबाल गेटवी ऑफ इंडिया के एक आरजी गत्ते यानि
01:07कार्डबोर्ड के मॉडल से किया गया था
01:08जी हाँ असली इमारत उस वक तक तामीर ही नहीं हुई थी और बादशा सलामत को महज एक गत्ते के
01:14धांचे से खोशामदीद कहना पड़ा
01:16तो आईए इस सफर का पहला हिस्सा देखते हैं एक सल्तनत का टर्मिनस और मुंबई का अजीम उश्चान रिल्वे दर्वाजा
01:24इस अजीम सफर की शुरुआत होती है बोरी बंदर की एक छोटी से लखडी की स्टेशन से जहां 1853 में
01:31पहली ट्रेन चली
01:32फिर 1877 में इस पुरानी स्टेशन को गिरागर एक नया और अजीम मनसूबा शुरू किया गया
01:38और पूरे दस साल की मसलसल मेहनत के बाद 1888 में शांदार विक्टोरिया टर्मिनस मुकमल हुआ
01:45और इस इमारत की खुबसूर्ती तो देखिए
01:48सर जमशेट जी जी जी भोई स्कूल ओफ आर्ट के तालिब इल्मों ने कमाल का हुनर दिखाया
01:52उन्होंने विक्टोरियन इताल्वी गौथिक तर्जे तामीर को रिवायती हिंदुस्तानी महलात के डिजाइन के साथ इस तरह मिलाया कि एक शाहकार
02:01वजूद में आ गया
02:01खास्तार पर इसके दाखली दर्वाजों पर ध्यान दें जहां बरतानिया की नुमाइंद की करता हुआ एक शेर और हिंदुस्तान की
02:08नुमाइंद की करता हुआ एक चीता आज भी पहरा देते नजर आते हैं
02:11लेकिन जो चीज सबसे ज़्यादा मुतासर करती है वो है इसकी बेपनाह वुस्त एक 150 मीटर लंबा प्लाटफॉर्म जो सीधा
02:21500 मीटर लंबे ट्रेन शेट से बगएर किसी रुकावट के जा मिलता है
02:25और वो भी इस तोर में जब इतना बड़ा गुमबद और शेट किसी रवायती सहारे या सिंट्रिंग के बगएर तामीर
02:31किया गया था
02:31यह वाकिए एंजिनियरिंग का एक नामुम्किन नजर आने वाला कारणामा था
02:35चलिए बागे बढ़ते हैं दूसरे हिस्से की तरफ समंदर के रास्ते दाखली दर्वाजा यानि एक रस्मी बहरी इस्तक्बाल
02:42यहां दिल्चस्प बात यह हैं कि इस गत्ते के फर्जी मॉडल की जगा आखिर कार 1924 में जॉज विटेट के
02:49बनाए गए एक बहतरीन डिजाइन ने ले ली
02:51पीले बसॉल्ट पथर से तयार करदा इस इमारत को इंडो सारसनिक तर्ज पर बनाए गया
02:56और इस मनसूबे पर उस जमाने के हिसाब से 21 अशारिया एक तीन लाख रुपे की भारी लागत आई थे
03:02अब ये इंडो सारसनिक तर्ज तामीर आखिर है क्या
03:05असल में ये कोई इप्तफाक नहीं था बलकि एक बहुती सोची समझी कोशिश थी
03:10जिसमें मकामी हिंदुस्तानी जमालियाद को शाही इमारतों के साथ हमाहं किया गया
03:15जॉर्ज विटेट ने खास नौर पर 16 सदी की गुजराती मस्जिदों के बैरूनी हिस्सों की बारीकियों को इस यादगार में
03:21शामिल किया
03:22ताकि ये मकामी सकाफत की सही अकासी कर सके
03:25अगर इन दोनों अजीम दर्वाजों को एक साथ रखकर देखा जाए
03:28तो उस दोर का तामिराधी इर्तका बिलकुल साफ नजर आता है
03:32एक तरफ विक्टोरिया टर्मिनस की शांदार हाई विक्टोरियन गौथे के मारत है
03:36जिसमें मगरबी असर नुमाया है
03:37और दूसी तरफ गेटवे आफ इंडिया है
03:39जहां इंडो सार्सेनिक और गुजराती अंदास का एक बहतरीन और खुबसूरत मकामी मिलाप मिलता है
03:45यहां से हम तीसरे हिस्से में दाखिल होते हैं
03:47आजादी और बदलती शनाखतें यानी अलामतों की वापसी
03:52तारीख का इससे बड़ा तंस भला क्या होगा
03:54जो गेटवे आफ इंडिया एक शेहनशा के शानदार इस्तक्बाल के लिए बनाया गया था
03:58वो ही बरतानवी राज के इखताम की आखरी निशानी बन गया
04:0228 फरवरी 1948 को समरसेट लाइट इंफिंट्री का आखरी बरतानवी दस्ता
04:0721 तोपों की सलामी के साथ इसी दर्वाजे से हमीशा के लिए रुखसत हुआ
04:11और बिल्कुल यही सकाफ्ती वापसी रेलवे टर्मिनिस पर भी देखने को मिलती है
04:171888 में जो इमारत मलका विक्टोरिया की नाम पर रखी गई थी
04:20उसे 1996 में मराथा सल्तनत के पहले इशेंचा के एजाज में चत्रपती शिवाजी टर्मिनिस का नाम दिया गया
04:26और फिर 2016 में उसमें महराज का लवज चामिल करके उसे मजीद बावकार बना दिया गया
04:32समंदर की किनारे भी ये शनाफ्त मुकमल तोर पर बदल रहे थी
04:351961 में बिलकुल उसी जगा से जहां शाज जोर्ज पंजम का कासी का मुझस्मा नस्थ था
04:40उसे हटा कर एक तिन की शेड में रख दिया किया
04:59प्यान एक इंतहाई गमगीन रिश्टा भी है
05:012008 के मुंबई हमलों के दौरान इन दोनों ही तारीखी मारतों को देहशत कर दी का निशाना बनाया गया
05:07लेकिन इन दर्दनाक वाकियात के बाद इन जगों ने शेहर की उस हिम्मत और लचक को भी साबित किया चुक
05:12कभी तूट नहीं सकती
05:14आज कल देखा जाए तो गेटवी ऑफ इंडिया सिर्फ एक तारीखी यादगार नहीं
05:18बलकि रोजमर्रा की जिन्दगी का एक एहम हिस्सा है
05:20यहां पांच मुख्तलिफ जेटियां जहां से एलेफेंटा गारों के लिकिष्टियां चलती है
05:25और दिल्चस्प बात यह है कि 2003 से हर साल यहूदी तहवार हनुका के मौके पर यहां मैनोरा भी रोशन
05:31किया जाता है
05:32यह अब एक जदीद सकाफती मरकज बन चुका है
05:35दूसरी जानेब यह तारीखी रेलवे टर्मिनस आज भी शहर के एक बहुत बड़ी शर्यान की तरह काम कर रहा है
05:40इसके 18 अलग-अलग प्लैटफॉर्म्स जिन में 7 लोकल और 11 तवील फासले की ट्रेनों के लिए है
05:46हर रोज मुसाफरों के एक लाम उतनाही सेलाब को उनकी मंजिलों तक पहुंचाते है
05:50तो इस वजाहत के आखिर में एक बहुत एहम सवाल जहन में उभरता है
05:54यह शानदार इमारतें जो कभी किसी गेर मुल्की ताकत और सल्तनत की अलामत थी
05:58अब मुंबई की रोज मरा जिंदगी का धड़कता हुआ दिल बन चुकी है
06:02तामीराती विर्सा तो हमेशा बदलता रहता है
06:04तो क्या अगली सदी में आने वाली नसले इन इमारतों को इसी नजर से देखेंगी
06:09इनकी अगली मंजिल क्या होगी
06:11ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब सिर्फ और सिर्फ आने वाला वक्त ही देगा
06:16मुंबई एक ऐसा शहर जो कभी नहीं सोता
06:18और सच कहा जाए तो इसका पेट भी कभी नहीं भड़ता
06:21इस चाइजे में हम मुंबई की उन पुरौनक और मुतहरिक गल्यों का रुख करने वाले हैं
06:25जहां कि खानों की दुनिया को मुख्तलिफ तारीखी कम्यूनिटीज ने दहाईयों की महनत से मिलकर बनाया है
06:30ये एक ऐसा सफर है जो जाइकों और तारीख से पूरी तरह भरा हुआ है
06:35दरसल इस जाइकेदार सफर पर निकलने से पहले एक जबरदस मश्वरे पर गोर कर लेना चाहिए
06:39अपनी बेल्टी धीली कर लें और इरादे मजबूत कर लें
06:43ये एक ऐसा जुमला है जो मुँ में पानी ले आने वाले इस फूड मैरेथान के लिए बिलकुल सही महौल
06:48बनाता है
06:49क्योंकि मुंबई का खाना सिर्फ खाया नहीं जाता इसे तो जिया जाता है
06:53सबसे पहले चलते हैं इस शहर की असल पहचान की तरफ
06:57यानि इसका स्ट्रीट फूड कल्चर जो उसे बजात और पर स्ट्रीट फूड का दारोल हुकूमत बनाता है
07:02यहां एक मकामी लव्ज बार बार सुनने को मिलता है
07:05खाव गली जिसका सीधा सा मतलब है खाने की गली
07:09तरहसल ये गलियां मुंबई के हर महले की फूड सीन का धड़कता हुआ दिल है
07:13ये वो जगे हैं जहां रात कहे तक अलग-अलग सकाफ़तों के खानों की स्टॉल्स सजे रहते हैं
07:18बस यूं समझा जा सकता है कि ये जाइकों का एक पिगलता हुआ बरतन है
07:22एक लाजवाब रौनक मेला
07:24घाट कोपर की खाव गली को ही देख लेते हैं
07:27ये इस बात की बहतरीन मिसाल है कि कैसे एक ही सड़क पर जाइकों का एक ना खत्म होने वाला
07:31सिलसला मिल सकता है
07:32ज़रा तसवर किया जाए
07:34एक ही जगा साथ से ज़्यादा फूड स्टॉल्स
07:36मक्षन में तेरतीवी लेजनरी पाव भाजी
07:39मुंबई की जान क्लासिक वड़ा पाव
07:41खालिस साथ इंडिन स्नैक्स
07:43और तो और अजीब हो खरीब लेकिन इंतहाई मज़ेदार चाइनीज और इंडिन फूजन डिशिस
07:47यहां की रातें बस इन खानों की गहमा गहमी से ही जिन्दा रहती है
07:51अब इस सारी शोरो गोल और वराइटी में कुछ ऐसी जगें और खाने हैं जो वाकरी लाजमी है
07:56सरदार रिफ्रेश्मिंट्स की मक्खन वाली पाव भाजी जो 1960 की दहाई से लोगों के दिल जीत रही है
08:02या फिर अशोक का क्लासिक वड़ा पाव जो महज 20 रुपे में मिलने वाला मुंबई का अपना गेर सरकारी फास्ट
08:08फूड है
08:08और हाजी अली सरकल पर हाजी अली जूस सेंटर का फालूदा
08:11और ब्रिटैनिया इन कोका वो मशूर बेरी पुलाओ जो खास एरान से मंगवाई गई बेरी से बनता है
08:17ये फहरिस्त हर उस शक्स के लिए एक खास्दाना है जो मुंबई की असल जाइके चखना चाता है
08:22और बात तारीख की हो तो 60 साल
08:26जी हां, 60 से जाइद बरसों की नुमाइंदगी करती है ये जगा
08:29इतने अरसे से तारीखी हाजी अली जूस सेंटर प्यासे लोगों को अपने ताजा भलों के जूस और शांदार फालूदे पिला
08:36रहा है
08:37इतनी दहाईयों से एक ही जाइका, एक ही मायार बरकरार रखना वाकी कमाल की बात है
08:43स्ट्रीट फूड के स्टॉल से निकल कर अब सरा शेहर की सकाफती और कॉस्मोपॉलिटन तारीख की तरफ चलते है
08:48जो यहां के सदियों पुराने एरानी कैफी में बसती है
08:52किसी भी पुराने एरानी कैफे में कदम रखना पिलकुल ऐसा है जैसे कोई टाइम कैपसियूल के जरिये सीधा माजी में
08:59पहुँच किया हूँ
08:59पुराना विंटिज फरनिचर पार्सी और एरानी पक्वान और हवा में रची हुई ताजा बन मसका और गरम चाई की वो
09:06मानूस सी खुश्बो
09:07ये जगें हिजरत की पुरिसरार कहानिया सुनाती हैं और उन तरकीबों को आज भी जिन्दा रखे हुएं जिन्होंने नसल दर
09:14नसल लोगों को अपना दीवाना बनाई रखा है
09:16इन मकामात की तारीख देखी जाए तो पता चलता है कि वक्त उनका वाकि कुछ नहीं बिगार सका
09:221871 में खुलने वाला लियोपोल्ड कैफे जिसका जिकर मशूर नौवल शांतराम में भी मिलता है
09:27फिर 1887 से हाथ से आईसक्रीम बनाने वाली ताज आईसक्रीम्स
09:311923 में ब्रिटानिया इनको का रिवायती पार्सी खानों का आगास
09:35और 1940 से कैफे मदरास की वो मशूर फिल्टर कॉफी
09:39ये टाइम लाइन साफ बताती है कि लाजवाब खाना और कम्यूनिटी का एहसास कभी पुराना नहीं होता
09:44ये वक्त की कैट से मुकमल आजाद है
10:01ही अलग सकुन है
10:02और दूसरी तरफ 1923 की शान ब्रिटानिया इनको
10:05जिसे आन जहानी बोमन कोहिनों ने मशूर किया
10:08जहां इंपोर्टेड इरानी बेरीज वाला भारी और खुश्बूदार बेरी पुलाओ मिलता है
10:12यानी सादगी से लेकर शाही दावत तक
10:14इस कल्चर में हर तरह के रंग मौजूद है
10:17अब जाइकों का रुख थोड़ा सा बदलते हैं
10:20और मुंबई के अंदर मौजूद एक और शानदार दुनिया का रुख करते हैं
10:24यानी साउथ इंडियन नाश्टे का सफर
10:26माठंगा और किंग सकल की अलाके दरसल मुंबई के अंदर एक छोटे साउथ इंडिया का किरदार अदा करते हैं
10:32अगर किसी को जुनूबी रियास्तों से बाहर एन शेहर की बीचों बीच
10:36खालिस रिवायती साउथ इंडियन थाली या नाश्टे की तलबो
10:39तो ये जगहें उसके लिए किसी जन्नत से कम नहीं
10:42इस जोग राफियाई मरकज की एहमियत को समझना बहुत जरूरी है
10:46और जब साउथ इंडियन नाश्टे का जिकर आए
10:48तो कैफे मदरास का नाम सबसे नुमाया है
10:501940 में काइम होने वाला ये इदारा आज भी उतनी इज़त और मकबूलियत रखता है
10:55कि वीकेंड की सुभा यहां लगने वाली लंबी खतारे एक तरह की रस्म समझी जाती है
10:59और सच तो ये है कि जब वो क्रिस्पी डोसा, पेहत, नर्मो मुलाइम, इडली
11:04और वो मशूर जागदार फिल्टर कॉफी सामने आती है, तो इंतजार की सारी कोफ दूर हो जाती है
11:10और मेहनत बिलकुल वसूल महसूस होती है
11:13नाश्ते और चाय के बाद, अब चलते हैं इस जाइजे के सबसे पुर्जोश और धमाकेदार हिस्से की तरफ
11:19मौहमद अली रोड की जियाफते
11:21खास तोर पर रमजान के महीने में जब सूरज गुरूब होता है तो ये इलाका एक अलगी रूप धार लेता
11:26है
11:27जरा इस मंजर का तसवर किया जाए
11:29हवा में तबों की चंचना हट गुंज रही है
11:31बड़ी-बड़ी कड़ाईयों में सालन उबल रहे हैं
11:34और धुआदार कबाबों की महक चारों तरफ पहली भी है
11:37भूके हुजूम का एक सैलाब गलियों में उमड आता है
11:40और खाने का एक आम सा शोर एक अजीम और शान जशन और मेले में तबदील हो जाता है
11:45जाहिर है इतनी बड़ी वराइटी देख कर कोई भी चगरा सकता है
11:48तो खानों के इस हुजूम में गोता लगाने के लिए एक बाकाइदा प्लैन की जरूरत पढ़ती है
11:53ताकि नमकीन और मीठे का बेहतरीन तवाजन रखा जा सके
11:56शुरुआत सूर्ती बारा हांडी के लजीज गोश्ट के सालन से की जा सकती है
12:00फिर बीच में ताज आइसक्रीम्स पर रुक कर बोहरी थाल की रिवायत के मताबिक थोड़ा मीठा चख लिया जाए
12:05उसके बाद नूर महमदी के इंतहाई नरम कबाब खाई जाए
12:08फिर हुजूम के साथ मिलकर शालीमार रेस्टरॉंट की शानदार बिर्यानी का मज़ा लिया जाए
12:12और आखिर में बुरहानपूर जलीबी सेंटर की गरम और मीठी मावा जलीबियों से इस शानदार दावत का इक्तिताम किया जाए
12:19मुकमल पफेक्शन
12:21अभी हमने सूर्ती बारा हांडी का जिकर किया
12:24नाम से जाहर है बारा यानि वो बारा देख्चे जो खरीदारों के सामने मुसलसल उबल रहे होते हैं
12:30हर एक देख्चे को घंटों तक बड़ी तवज़ और महुबत से पकाया जाता है
12:34तब जाकर लैम नहारी जैसी ग्रेवीज का वो गहरा और जादूई जाइका निकल कराता है
12:39और फिर जो ताज आइसक्रीम पर रुखने की बात हुई
12:42वो दरहसल एक खास मकामी बहरी रिवायत का हिस्सा है
12:45यानि मसालेदार और भारी गोश्ट खाने के बाद फलों वाली गाड़ ही आइसक्रीम खाना
12:50ताज आइसक्रीम्स 1887 से बंबई में हाथ से आइसक्रीम बनाने वाले आखरी मकामात में से एक है
13:03नूर महमदी के चिकन शामी कबाबों के हैरत अंगेज नर्मी के पीछे बाकाइदा एक इंतहाई दिल्चस मकामी कहानी मशूर है
13:10कहते हैं कि ये कबाब दरसल एक ऐसे नवाबसाद के लिए जाद किये गए ते जिनके दाहत नहीं थे
13:14जी हाँ सच में इन्हें इतना बारीक पीसा जाता है कि उन्हें चबानी की जरूरत ही नहीं पड़ती बस जबान
13:20पर रखते ही ये खुद बखुद घुल जाते हैं
13:22रमजान की इस अजीमु शान दावत का क्लाइमाक्स बड़ा दिल्चस्प और मुतज़ाद है
13:27एक तरफ शालिमार की भारी भरकम और मशूर बिर्यानी है जो इफ्तार की वक्त सबको एक साथ दस्तरखोन पर इखटा
13:34करती है
13:34और दूसरी तरफ बुर्हानपूर का वो जबरदस्ट मीठा इखतताम जहां खालिस दूद के मावे की पतली और गोल जलेबियां सीधे
13:41खौलते हुए गरम तेल में उतारी जाती हैं और सुनहरी होने तक तली जाती है
13:45यानी नमकीन बिर्यानी की इश्टिहा और गरम तेल से निकलने वाली मीठी जलेबियों का एक लाजवाब मवाजना
13:51मुंबई की इन साइकेदार गलियों का ये जाइजा अब अपने एक्तिताम को पहुँचता है
13:57सदियों पुराने इरानी कैफेस की महिक से लेकर साउथ इंडियन डोसों और मुहमद अली रोड के गरम तवों तक
14:04अब सबसे बड़ा और मुश्किल सवाल बस यही बाकी बचता है कि इस अजीम उश्शान दावत की शुरुआत आखिर किस
14:10जगा से की जाए
14:11तो सोचनी की बात यह है कि अगला पड़ाओ कौन सा होना चाहिए