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  • 4 years ago
आसमान से उतरती फागुनी शाम जब रंगों की पुरखुश सौगात समेट लाई तो मन का मौसम भी खिल उठा। रवीन्द्र भवन के खुले मंच पर 'होरी हो बजराज' ने ऐसा ही समा बाधा मुरली की तान उठी, दोलक, मृदंग और ढप पर ताल छिडी. होरी के गीत गूंजे और नृत्य की अलमस्ती मे हुरियारों के पांव थिरके। रंगपंचमी की

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