00:00एजिंडा लेकर मत जाओ
00:01कि आज मैं इससे गहरी बात करके आऊंगा
00:04तुम सहज बात करो, बात बात में बात हो जाएगी
00:09और ऐसे हो जाएगी कि
00:11आपको भी पता नहीं चलेगा कि बात बन गई
00:16हस्ती काफी होती है
00:18सिध्धान्त नहीं बोलते हस्ती बोलती है
00:23सीधे रहो सहज रहो
00:27तो आपको देखा है न क्या करते थे
00:31ऐसे ही चलते चलते
00:34कभी कुआ दिख गया
00:36कभी पक्षी दिख गया
00:39कभी पता दिख गया
00:42कभी पाथर दिख गया
00:45वो उसी पे जो बात थी हो कह देते थे
00:47दिखा न कहां
00:50इतना बड़ा उनका वांगमय है
00:53मुझे दिखाओ उन्होंने एकाद दो बार भी अहम प्रहमाज मी बोला हो तो
00:57बोला है?
00:59बोला है क्या?
01:01आप नीचे नहीं उतरते महावाक्य से
01:04चटनी मंगानी है तो वो भी ऐसी शुरू होता है
01:10परमात्मा ब्रहम के आदेशा नुसर
01:13समाधिकी अकांख्षा रखने वाले
01:15इस साधक है तो
01:21लाई जाये नहीं हाजिर की जाये
01:24और जब उन्होंने ब्रहम कहा भी तो क्या है?
01:27जाते हमारी गोत्र हमारा ऐसे
01:33सीधी बात, जमीनी बात, साज बात
01:35रटी रटाई कृत्रिम बात नहीं
01:38कोई डर नहीं कि अगर हम
01:40बंधे बंधाए शब्दों से
01:44विचलित हो गए, डिवियेट कर गए
01:46जरा बहग गए, तो अपराद हो जाएगा
01:49कोई अपराद नहीं हो जाएगा
01:51उन्होंने तो भाशा को भी
01:53बिल्कुल अपने हिसाब से गूथ दिया
01:57ये होता है सच्चाई में ऐसे बैठे होना कि
02:00कोई डर ही नहीं है कि कहीं मैं कुछ सिधानतों
02:04से जरा भी बहग न जाऊं
02:06उन्होंने का हम तो बहगने को तयार खड़े हैं
02:08और बहग हम
02:11सकते नहीं
02:13फिर उस विश्वास में कहा जाता है
02:15कि पाचे पाचे हरी फिरें कहत कबीर कबीर
02:26माला फिरू न जब करूं मुख से कहूं न राम
02:29क्योंकि बहग हम सकते नहीं
02:32हमें अब मुख से राम बोलने की जरूरत नहीं है
02:35राम हमारे हिदय से बोलते हैं
02:38से क्या बोलेंगे अब भीतर वही वही है बात करने वाला कोई बचा ही नहीं
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