00:00एक कविता सुनेंगे, लाओ भी कविता दो, तब सुबह सुबह सत्र होते थे, आठ बजे, और मैं सोया ही था,
00:12छे बजे शायद, तो आकर मुझे जगा दिया,
00:16छे बजे भी सोया था, तो मुझे पता था, आडवे जगा तो दिये ही जाओंगे, तो शायद सोते सोते ही
00:22रचरा था, तो उठा और जाकर बैठने से पहले कविता लिख डाली, वही है यह, शीर्शक्था सोने का हक, मन
00:34शांत, सबके सोने पर मेरा एकांत,
00:39एक बार फिर वही आदिम नींद पलकों पर आए, एक बार फिर वही इच्छा मन पर चाए, कि सोऊं ऐसे
00:49कि जागूं न जगाए, पर मेरा नीरव चैन जागरती की भेट चड़ जाना है,
00:58तुमने सदा सूरज और सुबह को सत्य माना है, तुम नींद खत्म होने का जश्न मनाओगे, जब मेरा सन्नाटा गहरा
01:12और गहरा रहा होगा, ठीक तब तुम मुझे आ जगाओगे,
01:19मैं पूछूँगा, किसलिए मन, क्या बचा है चेतना के जगत में जो पाना शेश है,
01:30या तुम्हें भी यही लगता है कि रात्रे से दिन विशेश है,
01:37क्यों निर्मल मौन भंग करते हो, क्यों सत्य को शब्द से दूशित करते हो,
01:46आज सोते रहो निद्रा सर्वता चिरंतन, मिटे दृष्य जगत मिटे, मिटे समस्तिस्पंदन,
01:58ये सारी ज्यान की बात कर ली, संकल्ब भी मांध लिया,
02:06आज सोते रहो निद्रा सर्वता चिरंतन, मिटे दृष्य जगत मिटे, मिटे समस्तिस्पंदन,
02:15और उसके बाद आप लोग आ गए
02:19तो फिर आखरी बात
02:22पर किसी मुस्कुराते मूर्ख की भाते
02:25जग मैं जाऊंगा क्योंकि अभी
02:27एक प्रश्न रह गया है बाकी
02:31कि तुम्हारे आने पर
02:33नींद से न जागने का विकल्प
02:36मेरे पास है भी या नहीं
02:39पस यही
02:44जैसे देह
02:47रहते अहंकार बाकी रह जाता है न
02:50वैसे ही मेरे लिए यह प्रश्न है
02:53जो बाकी रह जा रहा है बार बार