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  • 1 year ago

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00:00पुल से नीचे फेक रहे थे वो तो है ये एक बहुत कुरूप बात लेकिन जिनको वक्रतुंड महाकाय बोला जाता है उनके एप्स दिखा रखी थी
00:08गणपती के रूप के वर्णन में ही ये निहित है कि उनका पेट निकला हुआ है लेकिन भत ने अपनी छवी उनके उपर लाद दी उसको तुमने बिलकुल अपने जैसा बना दिया है
00:18मेरा कद 6 फिटका है तो मेरे पूज्य का 12 फिटका होना चाहिए मेरे दो हाथ हैं उसके 4 होने चाहिए मेरी दो आखें उसके 8 होनी चाहिए
00:27तो ये तो पूरा खेला समाजिक हो गया सोशल फिटका होना नॉट स्प्रिचूल प्रेम मार्ग भहुत हुचा है अगर कोई मुझसे कहे कि प्रेम मार्ग ग्यान मार्ग से भी हुचा है मैं हागर दूँगा लेकिन उसमें शर्त लगी हुई है
00:39वक्ति शब्त के मूल में ही भज है
00:56वो उसका अर्थ होता है
01:02बटना
01:09या दूरी
01:10भक्ति का दर्शन है
01:17कि मैं आंकार हूँ
01:24मैं निक्रश्ट हूँ
01:27दोश सारे मुझे में है
01:32और जो इश्ट है
01:38आराध्य है मेरा
01:40वो मुझे से
01:46इतना उपर है
01:51इतना अलग है
01:53कि मुझे ये कहने कभी
01:57अधिकार नहीं
02:01कि मुझे में और उसमें
02:16थोड़ी भी सा मानता है
02:18तो एक
02:26दूरी फिर कही जाती है
02:31भक्त कहता है ये मैं हूँ
02:36और मुझे से अलग
02:41मुझे से विभाजित
02:42मुझे से विभक्त
02:44मुझे से दूर
02:46मेरा पूज्य है
02:49मेरा भगवान है
02:51और उसको
02:56भक्त
02:57बहुत
02:59इमानदारी बड़ी सत्यनिष्ठा के साथ
03:03कहता है कि हाँ दूर तो तुम हो ही
03:05मुझे मानना पड़ेगा
03:10कि अभी तो तुम
03:12मुझे से बाहर ही स्थापित हो
03:14क्योंकि हम में अंतर इतना है
03:20कि मैं कैसे कह दूँ कि तुम मेरे भीतर हो
03:25कि मेरे निकट हो
03:26कि मैं तुम्हें इस परिश कर सकता हूँ
03:31ये सब मैं कह नहीं सकता
03:33तो मैं विभक्त हूँ
03:36मैं वियुक्त हूँ
03:37इसलिए वियोग शब्द सदा भक्ते के साथ चलता है
03:43हम अलग हैं
03:48और ये कहने में बड़ी विनम्रता है
03:51मैं आपका स्थान भी जानता हूँ
03:55मैं अपना स्थान भी जानता हूँ
03:56और मैं जानता हूँ कि हमारे स्थानों में आकाश पाताल का अंतर है
04:00आप अलग हो मैं अलग हूँ
04:03इस विनम्र अंतर को देखने से शुरुआत होती है भक्ती की
04:12मुझे में ऐसा कुछ भी नहीं जो आप में हो
04:18और आप में ऐसा कुछ भी नहीं जो मुझे में हो
04:21तभी तो आपके आगे सर जुकाता हूँ न
04:23अगर हम दोनों में कुछ साजा ही हो
04:27अगर हम दोनों कुछ एक से ही हो
04:32तो फिर सर भी कहां जुक पाएगा
04:36और जुकाने की कोई जरूरत भी नहीं रह जाएगी
04:38आप वहां हम यहां
04:43और ये मैं कभी भूलना नहीं चाहता
04:46कि सब उत्कृष्टताएं सब विभूताएं आप में नहीत है
04:55और मैं क्या हूँ
04:58धूल
05:00चुद्रता की मूर्ते
05:06भक्ति शुरू होती है
05:13तो शुरूवात में ही ये बात है कि
05:17आराध्य में
05:20आराधक जैसा कुछ नहीं होना चाहिए
05:26दोनों में कुछ भी साजा नहीं हो सकता क्योंकि
05:29मामला विभक्ति का है
05:32मामला वियुक्ति का है
05:34मामला भक्ति का है
05:36और भक्ति की शुरुवात मतलग तुम वहां हम यहां हमको तुमको बस एक प्रेम की डोर जोड सकती है गुणों की डोर नहीं जोड सकती मेरे गुण तुम्हारे गुण नहीं हो सकते
05:51या प्रेम हो सकता है मुझे तुमसे
05:55और वो प्रेम भी वैसा साधारन प्रेम नहीं हो सकता
06:00जैसा एक गुणी दूसरे गुणी से करता है
06:05गुणी माने जीव
06:07हम गुणों के पुतले हैं ना प्रक्रति के
06:11जैसा प्रेम एक देही एक शरीरी दूसरे से करता है
06:19वैसा उससे नहीं हो सकता क्योंकि
06:21गुण तो सारे मेरे पास है
06:24और तुम बिल्कुल मेरे जैसे नहीं हो
06:27तो मेरे गुण तुम में तो हो नहीं सकते
06:30तो तुम से मेरे प्रेम भी विशिष्ट किस्म का होगा
06:34और मेरे तुम्हारा रिष्टा मात्र प्रेम का हो सकता है
06:49ये बात बहुत जोर देने की है, बहुत इस्मरण रखने की है, मुझे में तुम में कुछ भी साजा नहीं हो सकता, हम में अगर कोई रिष्टा है, तो बस एक बड़े गहरे प्रेम का है, और नहीं कोई साजापन है,
07:06दिखिए साधारन मानवी ये प्रेम में, जो कुछ हम में और दूसरे व्यक्तियों में एक सा होता है, उसी के आधार पर बनता है रिष्टा, भावनाई एक से हैं रिष्टा बन जाएगा, विचार एक से हैं रिष्टा बन जाएगा, शरीर एक सा हैं रिष्टा बन जाएगा,
07:36कोई ढूंढ रहा हूं कोई हमारे जैसे विचार रखता हो तो बात बनें आप एकत तो ढूंढते हो
07:44भक्ति में प्रेम बिल्कुल अलग है वहां प्रेम है ही इसलिए क्योंकि तुम मेरे जैसे बिल्कुल भी नहीं हो
07:56तुमसे प्रेम इसलिए नहीं है कि तुम होते हो तो हमारी सत्ता को हमारी हस्ती को वैधता मिलती है यही होता है आम प्रेम में
08:10आप कुछ सोचते हैं, आपका कोई मित्र है, वो आ जाता है, वो कहता है, हाँ तुम ठीकी सोच रहे हो, तो आपकी जो हस्ती है, वो सत्यापित हो जाती है, है ना,
08:26आप माँ हैं बच्चा है बच्चा जब होता है तो आप और ज्यादा माँ बन जाती है
08:35दूसरे के होने से आपकी हस्ति और गाड़ी हो जाती है
08:41आप पुरुष है आप को इस्तरी से प्रेम है इस्तरी होती है आप और ज्यादा पुरुष बन जाते है
08:50दूसरे के होने से आपका होना और वजनी और गाढ़ा हो जाता है ये साधारन प्रेम होता है
09:08यहां जिस प्रेम की बात हो रही है वो वो प्रेम है जहां दूसरे के होने से आपका होना मिट जाता है गाढ़ा नहीं हो जाता है बढ़नी जाता है
09:20तुम ही हो जिसमें सारी सत्यता है और तुम यदे सामने हो तो मैं पूरी तरह असत्य हो गया
09:31गजब का प्रेम है ये सारी सत्यता तुम में है तो फिर तुम्हारे सामने मैं क्या हो गया मैं असत्य हो गया और असत्य माने जो फिर ही नहीं नकली मिथ्या
09:44इसलिए फिर कहा जाता है भक्ति करे कोई सूर्मा क्योंकि साधारण प्रेम तो आपको और बढ़ा देता है आपको मने अहंकार को
09:59साधारण प्रेम में या मित्रता में या रिष्टों में
10:05तो हंकार और बढ़ जाता है
10:06और भक्ति का अर्थ होता है कह देना कि सच्चा सिर्फ तू है
10:13अब मैं हूँ बिल्कुल नकली
10:17तो भक्ति मतलब मिटना इसलिए भक्ति करे कोई सूर्मा
10:23मिटने को कौन तयार होगा
10:25मिटने को कौन तयार होगा
10:30इसलिए है कि ये तो घर है प्रेम का
10:37और सी सुतारे भूई धरे तब बैठे घर माही
10:42खाला का घर नाही
10:45हम भी सोचते होंगे इतना क्यों मुश्किल है भई खाला मने
10:49अपनी ही है उनके हाँ जाना
10:53सर कटाना ये तो कोई तुक नहीं हुआ
10:57हाँ आपकी बुआ मौसी
11:01ताई फूफी ये लोग बोला करते है क्या
11:05कि हमारे आए हो तो बेटा सर कटाओ पहले फिर बैठो घर में
11:10ऐसा तो नहीं होता
11:10सर कटाना असली प्रेम में होता है नकली प्रेम में तो नकली सर और बचा रह
11:21जाता है असली प्रेम का मतलब जो कुछ भी मेरा है मुझसे सम्मंधित है
11:28जिससे मेरा रिष्टा हो सकता है वो सब मैंने कह दिया कि मिथ्या तो सर कट गया सर्माने हंकार सर्माने विचार सर्माने सिध्धानत और धारणाएं वो सब कट गए
11:43भक्तिमाने दूरी विभाजन और एक ऐसी दूरी जिसमें एक उधर एक इधर है और सारी सच्चाई उधर है और सारी सच्चाई अगर उधर है
12:06तो मैं क्या हो गया
12:07मैं पूरे तरीके से
12:09मिथ्या हो गया
12:11तो अपने बारे में तो बस यही कह जाता है
12:14कि मोसम कौन कुटिल खलकामी
12:16सारे जितने
12:18दोश हो सकते हैं वो इधर है
12:19और सारी जो अच्छाईयां
12:22हो सकते हैं वो इधर है
12:23ठीक है और मुझमें और तुम में साजा कुछ भी नहीं है बस एक बड़े गहरे प्रेम की डोर है जो हमें जोड सकती है वरना साजा हमें तुम में कुछ नहीं है जैसे धर्ती और आकाश में क्या साजा होता है
12:39कुछ भी नहीं तो बहुत महीन चीज होती है प्रेम हम यहां पर पराप्रेम परम प्रेम की बात कर रहे हैं साधारण भौतिक प्रेम की नहीं वह बहुत महीन चीज होती है उसकी शर्त यह होती है कि अपने जैसा कुछ भी उसके ऊपर आरोपित मत कर देना थोप मत देना
13:08शर्त याद रखियेगा, विभाजन है मैं इधर हूँ, तुम उधर हो और मुझ में और तुम में कुछ भी साजा नहीं हो सकता,
13:19क्योंकि मुझ में और तुम में अगर कुछ समानता ही निकल आई, तो फिर सर जुकाने के क्या ज़रूरत है,
13:25आईने के सामने कोई सर जुकाता है क्या
13:28जो कुछ अपने ही जैसा है उसके आगे सर जुकाने से क्या होना है
13:33कुछ नहीं
13:35तो सर तो तभी जुकेगा ना जब तुम बिलकुल
13:37मुझसे एक अलग आयाम के हो तभी सर जुकेगा
13:41तो इसलिए भक्ते एक बहुत कड़ी शर्त रखती है
13:45आपका आराध्य बिलकुल भी आपके जैसा नहीं होना चाहिए
13:54अगर वो आपके ही जैसा है तो फिर उसके सामने सर जुकाना
13:58माने अपने ही अहंकार के सामने सर जुकाना
14:00वो बिलकुल भी वैसा नहीं होना चाहिए जैसे तुम हो
14:12तुम अगर उसको कोई रूप भी दै रहे हो तो रूप बिलकुल वैसा नहीं हो सकता ऐसा तुम्हारा है कोई समानता मत छोड़ देना
14:18तुम जिस भी तरीके से उसको देख रहे हो
14:23ये नहीं होना चाहिए कि तुमने अपने आपको ही सुसज्जे दलंकरित करके उसका रूप रच दिया
14:33नहीं तो भक्ति की शुरुवात ही फिर दूशित हो गई ना
14:41भक्ति की पहली शर्थ का ये उलंगहन हो गया
14:44भक्ति की पहली शर्थ क्या है फिर से पताईए भक्त और भगवान में कोई समानता नहीं हो सकती
14:53तो कि समानता ही है तो फिर भगवान कैसे फिर सर क्यों चुकाना जो अपने ही जैसा है उसे कौन प्रणाम करता है
15:05तो कुछ उसमें अपने जैसा मत रखना
15:14पर अहंकार प्रेम को भक्ते को ली ले जाता है वो चुप चाप एक साजिश कर देता है वो कहता है अगर सर जुका नहीं है तो जिसके सामने सर जुका रहे हैं क्यों न वो अपना रिष्टेदार हो बढ़िया लगेगा न जिसके
15:41सामने सर जुका रहे हैं अगर वो हमारा ही हमशक्ल हो तो सर जुक भी जाएगा और सर कटाने की नौबद भी नहीं आएगी
15:48क्योंकि जो हमसे बिल्कुल ही भिन्न है इस हद तक कि हमारी सोच से भी आगे का है
16:03उसके आगे सर जुक गया तो हम पूरे तरीके से मिथ्या साबित हो गए हो गए न वो अगर सत्य है और सत्य के आगे तो जुका रहे हो सर वो अगर सत्य है तो हम क्या हो गए
16:21असत्य तो वास्तविक नमन का अर्थ तो फिर गमन हो जाता है कि अगर जुके तो मिटे तो हंकार एक सस्ता रास्ता खोज निकालता है
16:40वो कहता है हाँ जुकेंगे भक्त कहलाएंगे पर क्यों न किसी ऐसे के आगे जुकें जो हमारे जैसा हो सम गुणी हो
16:54जो गुण हम में है वो गुण उसमें भी हो जो कहानी हमारी है वही कहानी उसकी भी हो जो शकल हमारी है वही शकल उसकी भी हो
17:01तो सर भी जुक जाएगा और किस के आगे सर जुका
17:05अपने ही एक ज्यादा विस्त्रत रूप के आगे सर जुका
17:12तो सर जुक भी गया भक्त भी कहला गये और सर कटाने की नौबत भी नहीं आई
17:17इसलिए कह रहे हैं संद्शिरोमणी थोड़ी भक्ते बहुत अहंकारा ऐसे भक्ता मिले अपारा
17:29तुम्हारी भक्ते सिर्फ तुम्हारे अहंकार का विस्तार है
17:33क्योंकि तुम जिसको पूज रहे हो जिसको भगवान कह रहे हो
17:40उसको तुमने अपनी ही छवे और अपनी ही कहानी में गढ़ दिया है
17:44उसको तुमने बिल्कुल अपने जैसा बना दिया है
17:49तो यह तुम सर जुका रहे हो यह तुम किसी और के आगे नहीं अपनी आगे जुका रहे हो
17:54अगर तुम्हारा भगवान तुम्हारी अहंकार का विस्तार है तो बताओ
18:04सर जुका करके अहंकार का निस्तार हुआ या विस्तार हुआ
18:12विस्तार ही हुआ ना
18:13थोड़ा ये हंकार गड़बड चीज होती है
18:18और तुमने एक छवी बना ली जिसमें बहुत बड़ा हो गया तुम्हारा हंकार
18:23दसगुनाव कर दिया
18:24उसके आगे सर जुकाया तो हंकार शून्ने होने की जगा और प्रचंड हो जाएगा
18:31थोड़ी भक्ति बहुत अहंकारा
18:33ऐसे भक्ता मिले अपारा
18:37और यही चला है भक्ति के नाम पर
18:39हमारे सब देवाले हमारे ही घरों और बाजारों का विस्तार होते है
18:54हमारे सब आराध देवी देवता
19:00हमारी ही कहानियों के पात्र होते है
19:05और इसलिए ही फिर ऐसी भक्ति से कुछ अलाव नहीं होता
19:21भक्ति में आप जो कहानियां कह रहे हैं या सुन रहे हैं
19:24अगर वो कहानी घर-घर की है
19:26तो फिर ये भक्ति है या टीवी का मनुरंचन
19:32कहिए और इसलिए आप देखिए
19:39कि विल्कुल विडंबना की बात है
19:45लेकिन एकदम तारकिक
19:48कि हमारे आराध्यों की कहानियां टीवी पर बहुत आसानी से मनुरंचन बन जाती है
19:59बन जाती है न क्योंकि उन कहानियों में हमारा ही तो एहंकार जलक रहा है हम नहीं ऐसे उनको रचा है कि हमें बदलना न पड़े
20:15आप जो कुछ करते हो आप परिफिक्षन पूर्णता की अपनी परिभाषा बना लो कि मैं जो कुछ करता हूं उसको ही 100 गुना कर दिया जाए तो ये कहलाएगा परिफिक्षन
20:35तो ये परिफिक्षन है या क्या है
20:37वेकिन आहम की महनता भी यही रहिए
20:45किसी के सौ में से पचास नंबर आएं
20:49और आप उससे पूछो पूर्णता क्या होती है
20:52तो कहेगा वो जो मुझसे दो गुनी है
20:55सौ में से पचास नंबर आए
20:59आप उससे पूछे पूर्णता की परिभाशा बता
21:01वो कहेगा वो जो मुझसे दो गुना है
21:04तो इसी तरह से फिर हमने अपने इश्की छवीर अचली वो जो हमसे दो गुनी है या बीस गुनी है दो हजार गुनी है
21:12हमने खुद को मिटाया नहीं हमने खुद को और बढ़ा दिया थोड़ी भगते बहुत अहंकारा
21:19मेरा कद छे फिटका है तो मेरे पूज्य का बारा फिटका होना चाहिए
21:29मेरे दो हाथ हैं उसके चार होने चाहिए
21:35मेरी दो आखें उसके आठ होनी चाहिए
21:38खुद को ही बढ़ा दिया थोड़ी भगते बहुत अहंकारा
21:49खुद को बढ़ा करके जो पूजेगा वो कैसे मिटेगा
21:56लेकिन सांसारी का नभाव तो यही रहता है ना
22:03जो है उससे कुछ गुना मिल जाए तो आप संतुष्ट हो जाओगे आप यही सोचते हो
22:09एक करोड़ रुपया है मेरे पास कोई पूछे हाँ भाई कब तुरुपते मिलेगी
22:17तो बोलोगे सो करोड़ हो गया तो उसके बाद कुछ नहीं मागेंगे
22:20एक करोड़ है सो करोड़ हो गया उसके बिलकुल कुछ नहीं मागेंगे
22:25तो त्रिप्ति का संतुष्टि का पूर्णता का हमने अर्थ क्या निकाला
22:35हंड्रेड एक्स सौ गुना ये परिभाशा बन गई
22:41मैं जो हूँ उससे जो सौ गुना है मैं कहूंगा वो पूर्ण कहलाता है
22:49तो यही फिर दुनिया भर में अराध्यों के साथ हुआ है आप जो हो उसको ही सौ गुना कर देते हो और उसको पूझना शुरू कर देते हो
22:57जाना उपर को था और विस्तार यहीं धर्ती पर कर लेते हो
23:13धर्ती पर अगर एक फिटका आपका आकार था तो उसको ही सौ फिटका करके सोचते हो यही भगवान है
23:24निशाना ही आकाश की और नहीं है और यह सब कहां से हो रहा है यह इंद्रिये का तनभव से हो रहा है क्योंकि दुनिया में तो हमाएं संतुष्टी की यही परिभाशा मिलती रही है ना
23:43एक बच्चा है एक बच्चा और ऑ जाए तो घर पूरा हो जाएगा यही सुन्ते हो ना तो पूरा करने का क्या मतलब
23:54में दो गुना कर दो पूरे हो गये एक था दो कर लिया तो पूरा हो जाएगा
23:59देड़ घंटे की पिक्चर देखी देड़ की भी नहीं देखी तो पिक्चर पूरी कैसे और गी
24:14डेठ में डेठ जोड़ दो दूना कर दो तो पूरा संसार में तो अनुभाव यही रहा है न कि जितना है उसको दूना कर दो तो पूरा हो जाता है दूना कर दो चौगुना कर दो सौगुना कर दो तो पूरा हो जाता है तो फिर हम इसी तरीके से छविया रचलेते हैं कहानिय
24:44अपनी और से हम उसमें एक सावधानी जरूर रखते हैं कि जैसे व्यक्ति स्वयम में कुछ गुण कुछ दोश देखता है न तो जब हमें अपने आराध्य की प्रतिमा बनानी होती है मानसिक
24:59तो अपने देखे अपनी नजर से अपने मूल्यों के हिसाब से हम अपने दोशों को एक तरफ रख देते हैं अपने गुणों को जिसने हम सद गुण बोलेंगे हम अपने गुणों को उठा लेंगे और उन गुणों को ही व्रहदाकार करके अपने आराध्य का निर्मान करें�
25:29हटा दिये और अपने सारे सदगुणों से मैंने अपने इश्च की प्रतिमार अची है ये साउधानी हमने संदेह रखते हैं बिलकुल लेकिन ये तो बता दो कि कौन सा गुण अवगुण है और कौन सा सदगुण है इसका फैसला भी किस ने किया
25:50हंकार ने तो हंकार ने तैकरा कि प्रक्रति के गुणों में कौन सा गुण रखने लायक है तो अठारा गुण उसकी दृष्टी में आये
26:01अठारा में से उसने आठ शाट लिए ये बढ़ियाँ वाले
26:05दस को उसने बोल दिया कि ये गड़बड़ वाले हैं
26:09और उन आठ को लेकर के उसने सौ गुना बढ़ा दिया
26:13और कहा कि अभी ये मेरा आराध्य है
26:15यही है न पर जिस कसौटी पर अहंकार ने कहा
26:25कि 10 अवगुण है और 8 सदुगुण है वो कसौटी भी उसे कहां से मिलिये
26:31शरीर से और समाज से
26:36भाई एक संस्कृति में कोई चीज़ अवगुण मानी जाएगी
26:42दूसर में वही सदुगुण मानी जाती एए
26:45एक जगह कोई चीज कुरूपता मानी जाएगी
26:48दूसरी जगह वही सौंदर मान ली जाती है
26:50एक जगह एक प्रकार का व्यवहार
26:52अमान्ने होता है
26:53दूसरी और वही सामान्ने होता है
26:55होता है की नहीं
27:00और ये सब कैसे होता है
27:02शरीर और समाज के प्रभाव से
27:04जैसी जहां परंपरा चल रही थी
27:06तो ले देकर सद्गुणों का निर्धारण भी किस ने करा आंकार में शरीर और समाज के प्रभाव में तो इस तरीके से तो फिर जो आराध्य है उसकी रचना हुई तो फिर वो शारिरिक होता और समाजिक होता है अध्यात्मिक थोड़ी हुआ
27:25अगर आपके आराध्य की रचना शारिरिक और समाजिक प्रभावों के गत हुई है तो फिर वो आध्यात्मिक है या शारिरिक और समाजिक है कहिए ना
27:41जिस प्रकार के वस्त्र समाज में चलते होंगे आप यदि किसी इस्त्री आराध्य को रचेंगे तो उससे बहुत भिन्न वस्त्र उसको नहीं पहनाएंगे
28:02यही होगा न बहुत भिन्न वस्त्र पहना देंगे तो उनकी भक्ते करने में समस्य आ जाएगी
28:11तो उच्चतम का निर्धारण भी भी कौन कर रहा है समाज
28:20तो यह तो पूरा खेला समाजिक हो गया
28:24सोशल फेनॉमेना नोट स्प्रिचुल
28:30और साथ ही जैविक, दैहिक, बायलोजिकल
28:38अगेन नोट स्प्रिचुल
28:40सबसे मूल बात तो यह कि
28:45दुनिया भर में ज्यादा तर लोगों ने
28:56अपने गौड को अपने परमेश्वर को
29:00इनसान जैसा ही दिखाया है
29:02कितनी बड़ी बायोलोजिकल शर्ट बना दी देख रहे हूं
29:10आप अपने शरीर की पूजा करने लग गए ना और यह शरीर क्या है कुछ नहीं प्रक्रति की विकास यात्रा से आया है और आपने कह दिया कि यही शरीर जो है
29:24परमेश्वर है क्योंकि परमेश्वर को भी आपने यही शरीर तो पहना दिया है बिलकुल ऐसा ही
29:29और इमांदारी इतनी भी नहीं है कि सुईकार करो कि अपने परमेश्वर को आपने यह शरीर पहना दिया
29:37आप कहते हो नहीं परमिश्वर तो वैसा शरीर पहले से रखे हुए है
29:42उसने हमें ये शरीर पहना दिया
29:44उसने आपको आपका शरीर पहनाया है या आपने उसको उसका शरीर पहनाया है
29:49और ये बड़ी शारिरिक्ता की बात है
29:55कि जैसा मेरा शरीर है वैसा ही मेरे आराध्य का होगा
30:00और जैसे मेरे वस्त्र है वैसे ही मेरे आराध्य के होंगे
30:05और जो कुछ मुझे सद्गुन जैसा लगता है
30:08वो सौ गुना मैं अपने आराध्य में स्थापित कर दूँगा
30:11थोड़ी भक्ति बहुत एहमकारा
30:14इसी लिए अडशन हो जाती है कोई कहानी अगर हजार साल पहले की होगी धार में कहानी
30:25और सब धर्मगरंथ कहानियों से ही तो भरे हुए है
30:37बाइबल से लेके हदीश से लेके पुरान तक मामला कहानियों का ही चल रहा है
30:42अब वो कहानिया है पुरानी
30:45और समाजिक मूले इन हजार सालों में बदल गए
30:52तो उम्में बहुत सारी बातें ऐसी हैं जो तब मान्य थी जब कहानी रची गई थी
31:01और आज समाज में वो बातें अमान्य अच्छी नहीं मानी जाती बड़ी दिक्कत आ जाती है
31:06आपने अपने गौड को बहुत सारे ऐसे काम करता दिखा दिया अपने ग्रंथ में
31:14जो काम आज अच्छे नहीं माने जाते अब क्या करोगे
31:18तो फिर हम कहानियों के उन हिस्सों को दबाने की कोशिश करते हैं
31:23क्योंते हैं नहीं ऐसा तो हुआ ही नहीं
31:25क्योंकि मामला तो समाज एक है ना समाज में कभी कुछ अच्छा माना जाता है
31:31कभी कुछ अच्छा माना जाता है
31:33जब कहानी रची गई थी तब समाज में कुछ बातें अच्छी मानी जाती थी
31:37वो सारी बातें गौड में और ईश्वर में डाल दी गई
31:41अब समाज बदल गया वो बातें अच्छी नहीं मानी आती
31:44आप उन बातों का क्या करें आप फस गई ही गले में
31:46अब क्या करें तुम जहते हैं नहीं नहीं है या फिर इसका दूसरा आर्थ करो यह हुआ ही नहीं
31:55इसका दूसरा आर्थ करो इसका यह मतलब नहीं है
31:58उदारन के लिए आप बाइबल को अगर लेंगे तो जो
32:05Old Testament
32:07मने यहुदियों का जो God है
32:08और New Testament
32:10मने इसाईयों का जो God है
32:12बड़ा अलग-अलग है
32:13God का ही वेवहार बदल गया
32:16एक ही गरंथ के अंदर
32:18एक ही गरंथ के दो खंड
32:20और उसमें God का वेवहार बड़ा अलग-अलग है
32:22आपने फिल्मों में देखा होगा
32:28या अगर आपने इसाईयत का कुछ अधियन करा हो
32:30तो आपको पता होगा
32:32आम धारणा रहती है न
32:34God the merciful
32:37यही रहता है न
32:39अब इतना ही जाके वहाँ आप देखते हो
32:45कि कोई बोलता है
32:46ओ Father forgive me
32:47और आम तोर पे होता है कि हाँ
32:49forgiveness मिल गई
32:51because God is merciful
32:53Old Testament का God merciful नहीं है
32:56वो God the ferocious है
32:58God the merciful नहीं है
33:00वो मार देता है
33:02और बहुत गुसे में रहता है
33:06Old Testament के समय की बात
33:12उस समय यही जरूरी था
33:15कि जो मारता हो उसको
33:17God माना जाए
33:17अब वक्त बीत गया
33:21इसा आए
33:23उन्होंने का यह तो बात
33:25गलबड नहीं गलबड लग रही है
33:26तो उन्होंने फिर कहा
33:29कि नहीं मेरा जो God होगा
33:31वो तो merciful होगा
33:33असल में जो New Testament है
33:36वास्तव में वो
33:37बहुत तरीकों से Old का
33:39खंडन करता है
33:40बहुत तरीकों से और इसी लिए तो फिर
33:44जीजस को फासी दे दी गई थी
33:46तो कि वो जो बात
33:49बोल रहे थे
33:50वो उस समय की प्रचलित धारणा के बिलकुल खिलाफ जाती थी
33:54उन्होंने का कि ये सब जो commandments है
34:00मैं नहीं कि इनको फॉलो करता
34:02एक बहतर God हो सकता है
34:07आपने जैसा God रचा है
34:09और आपने जैसा धर्म रचा है उससे बहतर हो सकता है
34:11वो उनका हम तो नहीं मानते कुछ लोगोंने मानना शुरू किया जिन्होंने मानना शुरू किया मुठी भरी थे
34:18वो नहीं बचा पाए जीजस को उनको टांग दिया
34:22तो फ्यारी बत थोड़ी भक्ते बहुत हैंकारा
34:31और सब जो भक्त होते हैं ऐसे ही होते हैं ऐसे भक्ता मिले अपारा वास्तविक भक्त तो कोई बिरला होता है
34:43भक्ति करे कोई सूर्मा जाति बरनकुल खोए जाति बरनकुल इन तीनों का संबंध किस्से है अतीत इतिहास परंपरा शरीर जाति कहां से आती है शरीर से आती है कुल शरीर है
35:02जो शरीर को और समय को लांगने को तयार हो बस वही कर सकता है भक्ति जो अपने मन के अनुसार धारणाय कल्पनाय बनाता हो और उन्हीं कल्पनाओं पर नाचने लगता हो वो भक्ति का अधिकारी नहीं है
35:32प्रेम मार्ग बहुत उंचा है
35:49लेकिन उनके लिए है जो अपनी ही छाया से प्रेम ना करने लग जाएं
36:02अगर कोई मुझसे कहे कि प्रेम मार्ग ग्यान मार्ग से भी उंचा है मैं हागर दूँगा
36:09लेकिन उसमें शर्त लगी हुई है एक
36:13कि इतनी सा तर्कता रखना कि प्रेम कर किस से रहे हो फिर वहाँ ग्यान आ जाता है
36:22प्रेम तो कर रहे हो पर किस से कर रहे हो
36:27अब किस से कर रहे हो ये जानना ही ग्यान कहलाता है
36:30तो इसलिए ये दोनों आपस में गुथे हुए है
36:34ये बात बिलकुल नादानी की है कि ये दो अलग-अलग मारग है
36:40कूप कहा जाता है यह अलग-अलग मार अलग क्या मारग है प्रेम चलो तुम प्रेम मारगी हो किस से प्रेम कर रहे हो यह पता नहीं नहीं पता तो कहे का प्रेम
36:48अपने सपने से प्यार कर रहे हो गए सपनों बहुतों को प्यार हो जाता है
36:55प्रेम भी करना है तो ग्यान चाहिए
37:00और ग्यान मने आत्म ग्यान तब तक नहीं आएगा
37:06जब तक मुक्ति से प्रेम नहों तो ये दोनों मारग अलग कैसे कर दें
37:12ग्यान आ नहीं सकता बिना प्रेम के और प्रेम बिलकुल दूशित हो जाएगा बिना ग्यान के
37:18ज्यादा तर जो लोग अपने आपको प्रेमी बोलते हैं
37:29अध्यात्मिक अर्थ में या भक्त बोलते हैं
37:36वो अपनी ही छाया से अपनी ही छवी से प्यार कर रहे होते हैं
37:40कि जैसे कोई आप शीशे के दरपड़ के सामने खड़े हो जाईए
37:45तो हाथ में हल्दी ले लीजिए चावल ले लीजिए
37:49और सामने जो कुछ दिखाई दे रहा है उसको खूब सजाईए
37:54कर सकते हैं कि नहीं कर सकते हैं
37:57करिए बढ़िया हैं करके उसके रिकॉर्डिंग भी कर लीजिए
38:00थोड़ी भक्ति बहुत हंकारा
38:05सोची यह खड़े हुए हैं दर्प्ण के सामने और जो दिख रहा है उसके टिकली बिंदी जूमार उमर सब चिपका दिया है और फिर क्या कह रहे हैं
38:17यह बन जाती है भक्ति दुर्भाग्य से
38:26तुमने खुद को ही तो अलंक्रित कर दिया ना तुम और किसको पूझ रहे हो
38:32तुम यह भी अगर कहो कि नहीं
38:39उनमें सारे सदगुण है तुम्हें कैसे पता कि उनहीं गुणों को सदगुण बोलना है
38:45और दूसरी बात गुण तो सब गुण होते हैं तुम किसको अवगुण बोल रहे हो किसको सदगुण बोल रहे हो
38:51इसकी रेखा तो तुम नहीं खीची है
38:54अन्यथा गुण तो सब गुण है समूची प्रकृति एक है
38:59कुछ अच्छा कुछ बुरा यह तो अहंकार की धारणा होती है
39:03अगर तुमको वो सबकुछ ही छोड़ना है घटाना है
39:12जो बंधन का कारण है तुम कहते हो वो सबकुछ मैं नहीं रखूंगा अपने आराध्य में
39:19तो तुम फिर यह नहीं कर सकते कि कुछ गुण हटा दिये अवगुण बोलके और बाकी गुण आराध्य में इस्थापित कर दिये सदगुण बोलके यह नहीं कर सकते
39:28फिर क्या करना पड़ेगा
39:30फिर अराध्य में सारे ही गुण हटाने पड़ेंगे
39:34तो कि गुण तो सब एक से हैं
39:36कोई सद गुण नहीं है
39:37और फिर कोई अवगुण भी नहीं है
39:39और वो जितने गुण हैं उसा पहले ही तुम में
39:43तो अगर अराध्य को सचमुच अपने से
39:46अलग इस्थापित करना है तो उसमें फिर कोई गुण नहीं होना चाहिए
39:49और ये होती है संतों की
39:54जैसे यहां संत कबीर है इनकी
39:56निर्गुणी भगते
39:57जैसे सिखपंथ है पूरा निर्गुणी भगते का
40:03निर्गुणी भक्ते
40:04बहुत समझदारी की बात है
40:07कहिए जिसके आगे सर जुका रहे हैं
40:10उसमें गुण इस्थापित करने का अधिकार हमें किसने दे दिया
40:13और उसमें अगर हमने गुण डाल दिये
40:16तो गुण तो हमें भी हैं
40:19फिर हम्में उसमें क्या अंतर रह गया
40:21तुम्सु यारी भक्त
40:26निर्गुणी भक्ते
40:30और सच पूछो तो
40:35बड़ा मुश्किल हो जाएगा
40:38कि आप कहें कि भक्ती साफ है
40:41सुच्छ है
40:43पर निर्गुणी नहीं है
40:45गुण ही तो दोश होता है न
40:49जिसको एक तरफ से
40:52कहो देखते हो तो गुण है
40:53दूसरी तरफ से उसी को देखते हो तो दोश है
40:55तो अगर
40:57भक्ते निर्गुणी नहीं है
41:00तो निर्दोश भी नहीं हो सकते फिर
41:03उसमें दोश होंगे
41:15पर जब भक्ति वैसी हो जाती है जैसी प्रचलित है दुनिया भर में भारत में तो भक्ति बहुत प्रचलित हो जाती है
41:31पूरी दुनिया में धर्म का मतलब ही भक्ति है 99.9 प्रतिशत कोई अगर बोले कि और लीजी ऐसे तो संभावना यही है कि कहेगा मैं डिवोटी हूँ
41:46डिवोटी और अगर कोई कहे कि वो भक्त है तो संभावना यही है कि वो अपनी ही किसी छवी को पूजरा होगा
42:01और फिर इसलिए दुनिया भर में धर्म के नाम पर जबरदस्त लडाईया होती है क्योंकि आप पूजरे वो अपनी छवी को और वो पूजरा है अपनी छवी को और आप दोनों की छवी एक जैसी है नहीं और आपके नुसार आपकी छवी ही सर्वुत्तम है और उसके हिसा�
42:31जैसे कि इसलाम में कि हम जिसको पूज रहे हैं उसका कोई रूप रंगाकार नहीं हो सकता
42:38अल्ला का
42:43वो भी इतनी सतर्कता नहीं रख पाए कि अगर रूप रंगाकार नहीं है तो फिर कहानी भी तो नहीं होनी चाहिए
42:52क्योंकि सगुण आप सिर्फ रूप रंग से नहीं हो जाते सगुण आप तब भी होगा अगर आप से संबंधित कोई कहानी बता दी गई या आपका कोई कृत्ते बता दिया गया
43:06जो प्रक्रति से अतीत है बने निर्गुण है वो तो साक्षी होता है वो तो कुछ करी नहीं सकता अगर वो रचाईता हो गया तो वो सगुण हो गया भले आप उसको नाम शक्ल आकार देने से इंकार कर दें फिर भी आपने उसको सगुण बना दिया क्योंकि आपने उसके स
43:36कह दिया कि इनसाफ और फैसले भी वही करता है आपने यह भी कह दिया कि प्रत्वी पर हवा भी नहीं चलती जब तक वह नहीं चाहे
43:44अगर आपने इस सब कह दिया
43:47तो आपने उसे सगुण ही बना दिया
43:49भले ही आपने उसको शकल नहीं दिया
43:50पर फिर भी आपने उसको सगुण तो बना ही दिया
43:52तो सगुण बनाने के प्रलोभन से
43:58कोई भी नहीं बचपाया है
44:00दुनिया भर में कोई नहीं बच पाया है और इसी लिए धर्म का क्षेत्र इतना दूशित हुआ
44:06क्योंकि उसको गुण देना माने उसको अपने जैसा बना देना
44:14हम तो थे ही पहले से ही फनने खां और उसको सौ गुना फनने खां बना दिया
44:24अब लड़ाई नहीं होगी दुख नहीं फैलेगा तो और क्या होगा
44:36वो उस दिशा में मिलता है ज्यादा उसने ये कहा ये उसका संदेश है ये सब बातें भी उसे क्या बना देंगी सगुण
44:49अब फिर फसोगे ठीक है तुमने उसको नाम शकल नहीं दी पर उसके साथ एक दिशा जोड़ दी अब कोई और लोग होंगे जो कोई और दिशा जोड़ देंगे
44:59अब दोनों में लड़ाई होगी उस दिशा उकएगा उस दिशा पर ही लड़ाई हो जाएगी
45:04खूब खूण बहेगा
45:07दिशाएं सब किसके लिए होती है हमारे लिए
45:15तो हमारी दिशाओं का परमसत्ता से क्या संबंध क्या परमसत्ता भी प्राक्रतिक है
45:26सब दिशाएं प्रक्रतिक अंतरगत होती है न क्या परमसत्ता भी प्राक्रतिक है कि उसका रिष्टा आप दिशाओं से जोड़ रहे हो
45:35और अगर परमसत्ता भी प्राक्रतेक है तो फिर हमें कोई परमसत्ता चाहिए ही नहीं क्योंगी प्राक्रतेक तो हम पहले से खुद ही है
45:43फिर तो जुख जुख के अपनी पाउंच हुआ करो स्ट्रेचिंग भी हो जाएगी
45:49कि बढ़ियां रहेगा कुछ तो फायदा मिलेगा कि किसी और को नमन करने से अच्छा इमांदारी की बात यह कि अपनी पाउंच हुआ सुच भक्तिकार्थिया ही होना चाहिए सब भक्त खड़े हैं कतार में ऐसे जुख जुख के अपनी पाउंच हुँ रहे हैं
46:09बढ़ियां पीठ खुल जाएगी टांगे खुल जाएगी कुछ लाब होगा
46:22नासमझी में भक्तों ने भक्त जैसी उची बात को बिलकुल अपने ही तल पर उतार लिया
46:29अंकार ने कहा होगा आसमान मैं फंदा डाल के उसको जमीन पर उतार लूँगा और अपने देखे उसने उतार भी लिया है
46:48अभी गणेश चतुर्थी
46:50देख रहा था कि कैसे गणेश पतिमाओं का विसरजन होता है
46:57उसमें एक बड़ी भारी मैंने देखी प्रतिमाओं उसका विसरजन कैसे किया जा रहा था उसको पुल से नीचे फेंक रहे थे
47:05पुल से नीचे फेंक रहे थे वो तो है ये एक बहुत कुरूप बात
47:11लेकिन जिनको वक्रतुन्ड महा काय बोला जाता है उनके एप्स दिखा रखी थी
47:20गणपति के रूप के वर्णन में ही ये निहित है
47:34कि उनका पेट निकला हुआ है
47:44लेकिन भत्त ने अपनी छवी उनके उपर लाद दी
47:47आजकल तो एब्स होना मांगता
47:53तो गणपति के एब्स और ये एक भक्त ने नहीं किया होगा
47:59इतनी लोग आये होंगे पृत्यमा का दर्शन करने
48:03प्रणाम करा होगा नमंर करा होगा किसी ने भी आपत्य नहीं करी
48:06कि वक्रतुन्ड महा काय कि एब्स कहां से आगी
48:10क्योंकि मामला बहुत सीधा है हम जैसे होते हैं वैसा ही हम अपने भगवान को भी रच देते हैं
48:20अपनी पसंद ना पसंद के अनुसार जैसे आप किसी रेस्टरों में जाओ और अपने स्वादा अनुसार
48:26कहो कि ये ले आओ ये ले आओ और सम्मिला मलू के कहो ये आज का मेरा पसंदीदा भोजन
48:33या जैसे जब कोई रेसिपी होती है तो उसमें अन्त में लिखा होता है न नमक स्वादा नुसार
48:40सब कुछ बता देंगे नमक स्वादा नुसार
48:42वैसे हमारा रहता है नमन स्वादा नुसार
48:44जहां स्वादा आया वहां नमन कर लिया
49:03ज्यान और भक्ति अलग-अलग नहीं है
49:10भक्ति को आँखें देता है ज्यान भक्ति को शुद्धता देता है ज्यान
49:14और ज्यान को हृदय देती है भक्ति
49:20और भक्ति और कुछ नहीं है विशुद्ध प्रेम के अलावा
49:29ऐसा प्रेम जिसमें स्वयम को बचाने की कोई शर्ट है ही नहीं
49:42ऐसा प्रेम जिसमें जो बिलवेड है वही सब कुछ है
49:52अपनी और से मिठने की पूरी तयारी है
49:55प्रेमी कहता है प्रियतम मैं नहीं तू
50:03तो इसलिए जैसे ग्यान मारग में मैं बड़ा केंद्रिय शब्द होता है
50:10कि मैं को पकड़ो और मैं को शुद्ध करो
50:13और मैं को शुद्ध करके हम कहते हैं आत्मा
50:16कहते हैं मैं जब बिलकुल हट जाएगा तो जो बचेगा वो है आत्मा वैसे ही भक्ति में बिलकुल उसी बात को ऐसे कहा जाता है मैं जब बिलकुल हट जाएगा तो बचेगा तू अभी जो तू है ये ग्यान में नहीं सुनना ही पड़ता पर भक्ति का तू और ग्यान का आत
50:46मैं मिटा तू बचा यह भक्ति की भाशा है बस भाशा का अंतर है भक्ति कहती है मैं मिटा तू बचा और ग्यान कहता है मैं मिटा सत्य बचा और जो सत्य है वो मैं ही हूँ आत्म ग्यान कहता है मैं मिटा आत्म बचा भक्ति कहती है मैं मिटा तू बचा भक्ति तू की भाशा म
51:16है वो तो एक ही है मैं मिटा जो मैं को मिटाने को तयार नहीं है उसके लिए कुछ नहीं
51:29अब मैं को मिटा दिया है उसके बाद चाहे तू बचा बोलो चाहे आत्मा बची ये बोलो कोई अंतर ही नहीं पड़ता क्योंकि बोलने को है
51:37कौन मैं ही था जो बोलता था बग बग बग जब मैं मिट गया तो अब ये भी कौन बोलेगा कि तू बचा और ये भी कौन बोलेगा कि आत्मा बची तो सारी बात ये बोलने की नहीं है कि तू बचा कि ये बचा कि वो बचा सारी बात मिटने की है मिट जाओ मिटने के बाद ज
52:07इसका नहीं है कि अंत में क्या है
52:09अध्यात्म का सारा ख américेल यह है
52:11कि वर्तमान में मैं है
52:13और यह बड़ा गड़ बड़ है इसको मिटाओ
52:14उसको मिटाने के बाद क्या बचेएगा
52:18इस बाद पर कहें के लिए लड़ाई कर रहे हो
52:19कि तूब चेगा
52:22या विशुद्ध मैं बचेगा ज्यानी कहता है विशुद्ध मैं बचेगा उसका नाम आत्मा है भक्त से पुछोगे तो कहेगा मैं मिट जाएगा फिर विशुद्ध तू बचेगा
52:32मैं मिट गया फिर कुछ नहीं बचेगा
52:35उसको तू बोलो कि मू बोलो कि जू बोलो कि कू बोलो कोई फर्क नहीं पड़ता
52:41मैं का मिटना ही किंद्री ये बात है
52:55ग्यान में अहंकार कैसे प्रवेश करता है
52:58ग्यान मार्ग में अहं का सबसे बड़ा लक्षन हम क्या देखते हैं
53:03हम कहते हैं अहं अपने आपको आत्मा मानता है
53:07ठीक है ना हम कहता है मैं ही सत्य हूँ मैं ही आत्मा हूँ
53:11इसी तरीके से भक्ति में अंकार कैसे प्रदूशन करता है
53:16अपनी छवी को भगवान बना देता है
53:21डोनों हे में गाम वो एक ही कर रहा है
53:24ग््वान की दुրश्टी से लेखो तो वो कहता है
53:27मैं ही आत्मा हूँ
53:28अंकार अपने आपको आत्मा बोलेगा
53:29और भक्ति की दुरश्टी से देखो तो जो भक्त है
53:32वो अपने आपको भगवान बना रहा है
53:35और मान भी नहीं रहा कि उसने ऐसा करा उसे बोलो कि तु खुद कोई तु भगवान बना रहा है
53:40तो बोले का नरायन, नरायन, कैसा ये पाप वचन कह दिया
53:45बड़े अधर्मी हो
53:48मैं अपने आपको कभी भगवान बोल सकता हूँ
53:51पर तुम कर तो यही रहे हो, देखो न अपने, करमों को देखो
53:54वचनों की बात नहीं है, करमों को देखो अपने
53:56जो मैं बोरा तोरा मतोरा, लोग मरम का जाने मोरा
54:13जो मैं बोरा तोरा मतोरा, लोग मरम का जाने मोरा
54:33मैं बोरी मेरे राम बरतार, ता कारण रची कर शंगार
54:47मैं बोरी मेरे राम बरतार, ता कारण रची कर शंगार
54:57जो मैं बोरा तो राम तोरा
55:01लोग मरम का जाने मौरा
55:06माला तिलक पहरी मन माना
55:15लोगन राम खिलाना जाना
55:20माला तिलक पहरी मन माना
55:24लोग निराम किलाना जाना जो मैं बौरा तो राम तोरा लोग मरम का जाने मौरा
55:39थोड़ी भगती बहुत है हैंकारा ऐसे भगता मिले अपारा
55:49जो मैं बौरा तो राम तोरा लोग मरम का जाने मौरा
56:09लोग कहें कबीर बौराना कबीर का मरम राम जाना
56:28जो मैं बौरा तो राम तोरा लोग मरम का जाने मौरा
56:38जो मैं बौरा तो राम तोरा लोग मरम का जाने मौरा
56:47जो मैं वोरा तो राम तोरा लोग मरम का जाने मोरा

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