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विष्णु पुराण के इस अध्याय में जानिए कैसे भगवान विष्णु हर द्वापर युग में वेद व्यास के रूप में अवतरित होकर एक वेद को चार भागों में विभाजित करते हैं। देखिए महर्षि वेदव्यास, उनके शिष्यों, महर्षि याज्ञवल्क्य और वैशंपायन के बीच का दिव्य विवाद, तितिर पक्षी बनकर यजुर्वेद ग्रहण करने की कथा, और सूर्य देव से शुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेय संहिता) प्राप्त करने की अद्भुत गाथा! #VishnuPurana #VedaVyasa #Yajnavalkya #ShuklaYajurveda #Vedas #HinduMythology
Transcript
00:00मनवंतरों के गहन और रहस्यमई कालचक्र को सुनने के बाद शिष्य मैत्रे के मन में समस्त वेदों के सनरक्षन को
00:07लेकर एक नया प्रश्न प्रजवलित हुआ।
00:10मैत्रे ने विनमर्ता से पूछा कि युगों के बीतने के साथ जब मनुश्यों की बुद्धी और आयुक्षीन होती है तब
00:18वेदों का शाश्वत ज्यान कैसे सुरक्षित रहता है।
00:23महर्शी पराशर के तपोनिष्ट आश्रम में बहती मंद पवन के बीच गुरु और शिश्य का यह समबाद संपून स्रिष्टी के
00:30कल्यान का मार्ग प्रशस्त कर रहा था।
00:34पराशर जी ने मंद मुस्कान के साथ मैत्रे के प्रशन की सराहना करते हुए कहा कि कालचक्र का प्रभाव समस्थ
00:41द्रिष्य और अद्रिष्य जगत पर पड़ता है।
00:45सत्ययुग में समस्त मानव पूर्णत धर्मनिष्ट, दीरगायू और प्रखर मेधा वाले थे, जहां समपून वेद ज्यान एक ही स्वरूप में
00:54उनके मानस में समाहित रहता था।
00:57त्रेतायुग के आगमन के साथ ही मनुष्यों की मानसिक शमता में कमी आने लगी और वेदों के गूड अर्थों को
01:04समझने के लिए बड़े यग्यों की आवश्यक्ता पड़ी।
01:09द्वापर युग में प्रवेश करते ही मानव चेतना और अधिक संकुचित हो गई जिसके कारण संपूर्ण वेद का एक साथ
01:16अध्ययन करना जनसाधारन के लिए असंभव होने लगा।
01:21पराशर जी ने सचेत किया कि आने वाले कल्युग में अध्यान और अधर्म का अंधकार इतना घना होगा कि मनुष्य
01:29वेद ज्यान से पूरी तरह वंचित हो जाएगा।
01:32मैत्रे ने चिंतित होकर विचार किया कि यदी परम ज्यान ही नश्ट हो गया तो पतित जीव भवसागर से पार
01:39पाने का मार कैसे खोज पाएंगे।
01:43महर्शी पराशर ने रहस्य उजागर करते हुए बताया कि जगत के पालनहार भगवान श्री हरी स्वयन समयस्मय पर अवतरित होकर
01:51धर्म की रक्षा करते हैं।
01:54शीर सागर में अनंत शेशनाग की शया पर विराजमान श्री विश्नु अपनी योग निद्रा से ही स्रिष्टी के संतुलन और
02:02वेद ज्यान को दिशा प्रदान करते हैं।
02:06पराशर जी ने घोशनाकी की प्रत्येक द्वापर्युक के अन्तिम चरण में श्री हरी स्वयन व्यास के रूप में प्रकट होकर
02:13विशाल वेद ज्यान का विभाजन करते हैं।
02:17इस व्यवस्वत मनवंतर में अब तक 28 बार अलग-अलग महर्शियों ने व्यास पद को सुशोभित करके वेदों का पुनरगठन
02:25और संपादन किया है।
02:28पराशर जी ने अपने पुत्र कृष्ण द्वैपायन वेद व्यास के अलोकिक स्वरूप और उनके तपस्वी जीवन की महिमा का भावपूर्ण
02:36वर्णन किया।
02:38सरस्वती नदी के पवित्र तट पर ध्यानमगन भगवान वेद व्यास ने अपनी दिव्यद रिष्टी से कलिव में होने वाले मानव
02:45बुद्धी के पतन को स्पष्ट देख लिया।
02:49जनसाधारन की सीमित स्मरण शक्ती पर दया करके व्यास जी ने एक अखंड और अपार वेदराशी को चार सुगम भागों
02:57में वर्गी कृत करने का निश्चय किया।
03:00उन्होंने ब्रह्मा जी की प्रेयना से दिव्यध्वनिसमूह को रिगवेद, यजुरवेद, सामवेद और अथर्ववेद के रूप में चार व्यवस्थित वेदों में
03:09विभाजित कर दिया।
03:11वेदव्यास जी ने अपने चार महान शिश्यों, पैल, वैशंपायन, जैमिनी और सुमन्तु को इन चारों वेदों का ज्यान प्रदान करके
03:19गुरुशिष्य परंपरा का शुभारंब किया।
03:23महर्शी पराशर ने स्पष्ट किया कि विश्णु भगवान का यह व्यास रूपी अवतार ही युभ्युग तक अज्यानता के अंधकार में
03:31ज्यान का दीप जलाए रखता है।
03:34गुरु पराशर के मुख से वेद सनरक्षन की इस अद्भुत गाथा को सुनकर मैत्रे का हृदय परम प्रभु की असीम
03:41कृपा और भक्ती से गदगद हो उठा।
03:45महर्शी पराशर ने मैत्रे को बताया कि वर्तमान वैवस्वत मनवंतर के प्रत्येक द्वापर युग में भगवान विश्नु वेद व्यास के
03:53रूप में अवतरित होकर एक वेद को चार भागों में विभाजित करते हैं।
03:59इस क्रम में सबसे प्रथम द्वापर युग में स्वयन ब्रहमा यानी स्वयंभू ने प्रथम वेद व्यास बनकर वेदों का संगठन
04:06और रक्षन किया था।
04:09द्वितिय द्वापर युग में प्रजाप्ती मनु ने व्यास का पद संभाल कर संसार के कल्यान हेतु ज्ञान की निर्मलधारा प्रवाहित
04:17की।
04:18तीसरे द्वापर में समस्त शास्त्रों के ग्याता और दैत्य गुरु उष्णा यानी शुक्राचार्य ने वेदों का पुनह संपादन कर स्रिष्टी
04:26का मार्ग दर्शन किया।
04:29चतुर्थ द्वापर युग में देवगुरु ब्रहस्पती ने व्यास पीठ को अलंकृत करते हुए दिव्य वैदिक रिचाओं का व्यवस्थित विभाजन किया।
04:38पांचवे द्वापर में भगवान सविता यानी सूर्य देव ने वेदों की उर्जा को सन्यमित कर ज्ञान की जोती को चतुर्दिक
04:46फैलाया।
04:47छटे द्वापर युग में मृत्युदेव यानी यमराज ने स्वयन व्यास का दायत्व निभाकर वेदों की पवित्रता और मर्यादा स्थापित की
04:57साथवे द्वापर युग में देवराज इंद्र ने व्यास रूप धारन करके ज्ञान की निरंतर्ता बनाय रखी और यगिय नियमों को
05:05सुद्रिड किया
05:06आठवे द्वापर युग में ब्रहमर्शी वशिष्ठ ने महा ज्ञान के संपादन का महान कार्य संपन्न कर मानव सभेता को आलोकित
05:15किया
05:16नौवे द्वापर में माता सरस्वती के पुत्र सारस्वत मुनी ने भीशन अकाल के समय भी वेदों के ज्ञान को जीवित
05:23रखा और उनका पुनरगठन किया
05:27दसवे द्वापर युग में महर्शी तृधामन ने व्यास पद पर आसीन होकर ज्ञान की इस दिव्यपरमपरा को आगे बढ़ाया
05:35ग्यारहवे द्वापर में महर्शी त्रिवरिष ने अपनी कठोर तपस्या और अंतरद्रिष्टी से वेदों के गूड अर्थों को संरचित किया
05:44बारवे द्वापर यूग में परम ज्ञानी महर्शी भरद्वाज ने वेदों का विस्त्रित वर्गी करन कर वैदिक संस्कृती को नया जीवन
05:52प्रदान किया
05:54तेरहवे द्वापर में महर्शी अंतरिक्ष और चौधवे द्वापर में स्वयन धर्मदेव ने इस पावन पद को सुशोभित कर ज्ञान की
06:02रक्षा की
06:04ततपश्चात त्रयारुनी, धननजय, कृतनजय और रिन मुनी ने विभिन द्वापर युगों में वेदों को युगानुकूल रूप में विभाजित किया
06:13उन्नीस्वे द्वापर में महर्शी गौतम और बीस्वे में महर्शी हर्यत्मा ने वेद व्यास का पद ग्रहन कर दिव्यरिचाओं का संपादन
06:21किया
06:2221 से 24 वे द्वापर युग तक वाजश्रवा त्रिनबिंदू और महर्शी पराशर के पिता शक्ती मुनी ने इस पवित्र परंपरा
06:31का निर्वेहन किया
06:33पराशर मुनी ने विन्मर्ता से मैत्रे को बताया कि 25 वे द्वापर युग में उन्होंने स्वय व्यास का पद संभाला
06:40था
07:04महर्शी पराशर मैत्रे को बताते हैं कि कल्यक के निकट आने पर जब मनुश्यों की बुध्धी और आयुक्षीन होगा
07:11होने लगती है तब वेदों को सरल बनाने के लिए वेदव्यास का अवतरन अनिवार्य हो जाता है
07:18यमुना नदी के पवित्रद्वीप पर महर्शी पराशर और सत्यवती के अतिदिव्य सन्योग से भगवान विश्णु के आवेशावतार कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास
07:28का प्राकट्य हुआ
07:30जन्म लेते ही अपने योगबल से तुरंट एक पूर्ण वयस्क तपस्वी का रूप धारण कर बालक व्यास ने अपनी माता
07:37सत्यवती के चर्णों में श्रधा पूर्वक प्रणाम किया
07:41माता सत्यवती को यह वचन देते हुए कि संकट के समय केवल स्मरण करने मात्र से वे तुरंट उपस्थित हो
07:49जाएंगे, महर्शी व्यास ने उनसे आग्याली
07:53ततपश्चात तपस्या और वेदों का गेहन चिंतन करने के लिए भगवान वेदव्यास बदरिकाश्रम के दुर्गम और परम पवित्र हिमाली वनों
08:01की ओर प्रस्थान कर गए
08:04द्वापर युग के संध्याकाल में संसार के ढलते नैतिक मूलियों और मानवों के घट्ते जीवनकाल को देखकर महर्शी व्यास का
08:12हृदय जनकल्यान की चिंता से भर उठा
08:16उन्होंने अनुभव किया कि अनादी काल से चला आ रहा विशाल एक निष्ठ वेद कल्यप के मंद बुद्धी मनुश्यों के
08:23लिए समझना अत्यंत कठिन सिध्ध होगा
08:27हिमालय की एक गुफा में ध्यानमगन होकर वेदव्यास ने भगवान विश्णू की परम चेतना से जुड़कर वेदों के पुनरगठन का
08:34दिव्य संकल्क लिया
08:37उंकार की अनाहत ध्वनी को आधार बनाकर व्यास जी ने ज्यान के उस अनन्त महासागर को चार मुख्य भागों में
08:44क्रमबध करना प्रारंभ किया
08:47उन्होंने विभिन्न मंत्रों के स्वभाव, लैख और यग्य उप्योगिता के अनुसार उन्हें रिट, यजुअ, साम और अथर्व नामक चार संहिताओं
08:56में विभाजित कर दिया
08:57देवी देवताओं की स्थुतियों और प्रार्थनाओं से परिपूर्ण रिचाओं के विशाल संग्रह को महर्शी ने रिग्वेद संहिता के रूप में
09:06संकलित किया
09:07यगीय विधानों, कर्मकांडिय गध्यमंत्रों और आहुतियों के विधिवत संचालन हेतु उन्होंने यजुर्वेद संहिता का सुव्यवस्थित धाचा तयार किया
09:18वेद मंत्रों के मधुर, संगीत बद्ध और सामगान में प्रयुक्त होने वाले काव्यात्मक छंदों को सन्योजित करके सामवेद संहिता की
09:27रचना की गई
09:29जनसाधारण के व्याभारिक जीवन, औश्धी, राज्यशास्त्र और विविध आध्यात्मिक विद्याओं के मंत्रों को मिलाकर अथर्वेद संहिता को पूर्ण किया गया
09:39इन चारों वेदों के ज्ञान को अटूट बनाये रखने और भावी पीढियों तक पहुचाने के लिए व्यास जी ने अपने
09:47चार प्रमुक सुलोग्य शिश्यों को चुना
09:51महर्शी व्यास ने देवताओं की स्तुतियों से सम्रिध रिगवेद संहिता का संपूर्ण ज्यान अपने परम ज्यानी शिश्य पैल को सौंप
09:59दिया
10:00यज्यानुष्ठानों और कर्मकांड के गूड यजुर्वेद का महान उत्तर दायत्व उन्होंने अपने अत्यंत प्रखर शिश्य वैशंपायन को प्रदान किया
10:10संगीत और भक्तिमय चंदों से उत्प्रोत सामवेद के प्रचार और संरक्षन का दायत्व विद्वान शिश्य जैमिनी को सौपा गया
10:19तंत्र, ओश्धी और विविध व्याभारिक विद्याओं वाले अथर्ववेद का ग्यान महर्शी व्यास ने अपने निश्ठावान शिश्य सुमन्तु को प्रदान किया
10:28इस प्रकार वेदों का चार भागों में युगान्त कारी विभाजन कर भगवान वेदव्यास ने आने वाले कल्यक के अंधकार से
10:37मानव जाती की रक्षा का मार्ग प्रशस्त किया
10:41इन चार मुख्य रिशियों ने वेदग्यान की अविरल धारा को आगे बढ़ाते हुए अपने अपने शिश्यों को इन महान ग्रंथों
10:49का गूड अध्ययन कराना प्रारंभ किया
10:52महर्शी पैल ने रिगवेद की व्यापक संहिता को दो भागों में विभाजित कर अपने मेधावी शिश्य इंद्रप्रम्ती और बाशकल को
11:00सौंक दिया
11:02बाशकल ने रिगवेद के उस दिव्यग्यान को चार अन्य शाखाओं में बाठकर बोध्य, अग्निमाठर और पराशर जैसे योग्य रिशियों में
11:10संचारित किया
11:12वहीं दूसरी और इंद्रप्रम्ती ने अपने पुत्र मांडू के एको रिगवेद का निशनात विद्वान बनाकर इस पवित्र मौखिक परंपरा को
11:20अटूट बनाया
11:23यजुर्वेद के रक्षक महर्शी वैशंपायन ने अपने 27 प्रतिभावान शिश्यों के साथ मिलकर इस वेद की 27 शाखाओं की नीव
11:31रखी
11:33पवित्र यज्यकुंडों के सामने बैठे इन रिशियों के मुख से निकलते यजुर्वेद के मंत्र संपून वातावर्ण को अलौकिक उर्जा से
11:41भर देते थे
11:43यज्यकी प्रजवलित अगनी से उठती दिव्य लप्टे मानो यजुर्वेद के ज्यान को ब्रहमांड के हर कोने तक पहुचाने का संदेश
11:51दे रही थी
11:53सामवेद के आचार्य महर्शी जैमिनी ने अपने पुत्र सुमन्तू और शिश्य सुकर्मा को संगीत मैं रिचाओं की गूड विधा का
12:01पूल्न ज्यान प्रदान किया
12:04विध्वान सुकर्मा ने सामवेद के अपार संगीत को सहसरों सामगायन शाखाओं में विभाजित करके इसे और भी सुगम बना दिया
12:13सुकर्मा के प्रिय शिश्य हिरणयनाब और पौशिन जी ने इन संगीत मैं सामचंदों को भारतवर्ष के विशाल भूभाग में प्रचारित
12:21किया
12:23सामवेद की सुमधूर ध्वनियों से वनों के पशुपक्षी, नदिया और यहां तक की देवगण भी मंत्रमुग्ध होकर जूम उठते थे
12:32अथर्ववेद के महान मर्मग्य सुमंतु ने अपने शिश्य कबंध को इस वेद की समस्त औश्धी और व्याभारिक विद्याय हस्तांतरित की
12:42कबंधा ने आगे चलकर अथर्ववेद को दो प्रमुख शाखाओं में विभाजत किया और अपने शिश्य देवदर्ष और पत्य को इसका
12:50भार सौपा
12:51इन शिश्यों ने आईुरवेद, जडीबूटियों के प्रयोग और सुरक्षात्मक मंत्रों से मानव जाती के दुहकों का निवारन प्रारंभ किया
13:00इस प्रकार वेदव्यास जी के चार मुख्य शिश्यों से उपजी अंगिनत शाखाए विशाल वटवरिक्ष की भाती पूरे भारतवर्ष में पैल
13:09गई
13:11गंगा के पावन तटों से लेकर विंध्याचल के घने जंगलों तक हर गुरुकुल में केवल वेदों का सस्वर पाठ ही
13:18गुंजता था
13:20महर्शी पराशर ने मैत्रे को बताया कि इस शाखावी भाजन के कारण ही कलेट के प्रभाव के बावजूद वेदग्यान अक्षुन
13:28बना रहा
13:30बद्रिकाश्रम के शांत वातावर्ण में बैठे भगवान वेदव्यास ज्यान के इस असीन विस्तार को देख कर परम संतोष से भर
13:38गए
13:39भगवान विश्णू की दिव्यचेतना ने इन सभी रिशियों के हृदय में निवास कर ज्यान की इस पवित्र जोती को प्रजवलित
13:46रखा
13:48मैत्रे रिशी अपने गुरु पराशर के श्रीचर्णों में नत्मस तक होकर यजुर्वेद के अगले महान अध्याय को सुनने के लिए
13:56उच्छुखो उठे
13:58महर्शी पराशर ने मैत्रे को आगे बताते हुए कहा कि वेदव्यास जी के प्रिय शिश्य महर्शी वैशमपायन को यजुर्वेद के
14:06संरक्षन और प्रसार का महान दायत्व सौपा गया था
14:11महर्शी वैशमपायन ने ज्ञान के इस महान यग्य को आगे बढ़ाने के लिए अपने तपोवन आश्रम में एक विशाल धर्मस्धा
14:19का आयोजन किया
14:21गुरु वैशमपायन ने अपने सभी शिश्यों को संबोधित करते हुए एक विशेश अनुष्ठान और व्रत का पालन करने का कठोर
14:29आदेश दिया
14:31उन सभी मेधावी शिश्यों के बीच युवा याग्यवलक्य अपने असाधारन तेज, अदमे बुद्धी और दिव्यकांती के कारण अलग ही चमक
14:40रहे थे
14:40जब गुरु वैशंपायन ने पारंपरिक कर्मकांडिय नियमों को समझाया, तब युवा याग्यवलक्य ने अत्यंत विनमर्ता किन्तु द्रिडता से प्रश्न उठाया
14:52याग्यवलक्य का तर्क था कि केवल बाह्य आडंबर और यांतरिक अनुष्ठान बिना मोक्ष की सच्ची भावना के पूर्णता नहीं प्रदान
15:00कर सकते
15:02सभा में उपस्थित अन्य सभी शिष्य अपने गुरु के समक्ष एक युवा छात्र के इस दुस्साहस और निर्भीक तर्क को
15:09देखकर हत प्रभ रह गए
15:12महर्शी वैशंपायन ने याग्यवलके के इन शब्दों को गुरु प्रमपरा का अनादर और आध्यात्मिक अहंकार का संकेत माना
15:21क्रोधित होकर गुरु वैशमपायन ने याग्यवलके से कहा कि जो शिश्य गुरु की सत्ता और विधान पर संदेह करे वह
15:29उनका शिश्य रहने योग्य नहीं है
15:33याग्यवलके ने अत्यंत नमर होकर उत्तर दिया कि वे केवल सत्य की खोज में हैं और अज्यानता का अंधानुकरण नहीं
15:41कर सकते
15:43आमकार के इस आघात से अत्यंत रुष्ट होकर महर्शी वैशमपायन ने याग्यवलके को आश्रम छोड़ कर जाने का कठोर दंड
15:51सुना दिया
15:53इतना ही नहीं कृद्ध गुरु ने आदेश दिया कि याग्यवलके ने उनसे जो भी यजुरवेद का ज्यान प्राप्त किया है
16:00उसे तुरंट त्याग दें
16:03गुरु की आज्या का पालन करते हुए याग्यवलके ने बिना किसी विरोध के अपनी प्राप्त विद्या को लोटाने का द्रिध
16:10निश्चय किया
16:12अपनी योगशक्ती और तपस्या के बल पर याग्यवलके ने सीखे गए समस्त यजुरवेट के मंत्रों को एक स्थूल रूप में
16:20बाहर निकाल दिया
16:23याग्यवलके के मुख से प्रकट हुई वह वेद्विद्या अत्यंत तेजोमे और अलोकिक उर्जा के रूप में भूमी पर बिखर गई
16:31उस पवित्र किन्तु त्यागी गई वेद्विद्या को नश्ठ होने से बचाने के लिए गुरु वैशंपायन ने अपने अन्य शिश्यों को
16:38एक मार्ग सुझाया
16:41गुरु के आदेश पर वे सभी शिश्य तुरंत तितिर पक्षियों का रूप धारण कर उस बिखरी हुई दिव्य उर्जा और
16:48ज्ञान को चुगने लगे
16:50तितिर पक्षियों द्वारा ग्रहेन की गई वही त्यागी हुई वेदशाखा आगे चलकर तैत्तिरिय संहिता और कृष्ण यजुर्वेद के नाम से
16:59प्रसिद्ध हुई
17:00ज्यान से सर्वथा रहित होकर भी युवा याग्यवलक्य का मनोबल नहीं तूटा और वे अडिक संकल्प के साथ आश्रम से
17:08बाहर निकल गए
17:10ज्यान शुन्य हुए याग्यवलक्य ने प्रत्यक्ष सूर्य देव की कठोर तपस्या कर उनसे सीधा और नवीन यजुर्वेद प्राप्त करने का
17:18महान संकल्प लिया
17:21निश्प्राण और सर्वथा ज्यान शुन्य होने के उपरांत भी महर्शी याग्यवलक्य ने अटूट श्रद्धा के साथ पवित्र नदी के तट
17:29पर सूर्य देव की आराधना प्रारंभ की
17:32एक पैर पर खड़े होकर युवा याग्यवलक्य ने अपने नेत्र सीधे प्रखर दिवाकर पर टिका दिये और निराहार रहकर घोर
17:41तपस्या में लीन हो गए
17:43निरंतर चलती उग्र तपस्या से याग्यवलक्य के शरीर से एक आलोकिक तेजो में उर्जा उत्पन्न होने लगी जिसने पूरे वातावर्ण
17:52को दिव्य उश्मा से भर दिया
17:55भीशन ग्रीश्म की तपती धूप और मूसलाधार वर्शा भी उनके अटल संकल्प और ध्यान को एक शन के लिए भी
18:02डिगा न सकी
18:04उनके इस घोर और अभूत पूर्व तपोबल की ज्वाला स्वर्ग लोग तक पहुँच गई जिससे समस्त देवता और मुनिगन आश्चर
18:12यचकित हो उठे
18:15याग्यवलक्य की निश्चल भक्ती और अदमय इच्छा शक्ती से अत्यंत प्रसन्न होकर भगवान सूर्यदेव स्वयम प्रकट होने के लिए उद्यत
18:23हुए
18:24साथ अलोकिक श्वेत घोडो वाले स्वर्णिम रत पर सवार होकर भानुदेव गगनमंदल को चीरते हुए प्रित्वी की ओर उतरने लगे
18:34प्रकर करोडो सूर्यों के समान तेजस्वी रूप धारन किये भगवान सूर्यदेव ने याग्यवलक्य के समक्ष अपना दिव्य और दीप्तिमान स्वरूप
18:43प्रकट किया
18:45सूर्यदेव ने अपनी मेग गंभीर वाणी में याग्यवलक्य के अतुलनिय तपोबल की प्रशंसा करते हुए उन्हें मनोवाचित वर मांगने का
18:53आदेश दिया
18:55नमरता से सिर जुका कर याग्यवलक्य ने प्रार्थना की की उन्हें वेदों का ऐसा सर्वता नवीन और शुद्ध ज्यान प्राप्थ
19:03हो जो इस संसार में किसी अन्य के पास न हो
19:08याग्यवलक्य की प्रार्थना स्विकार कर सूर्यदेव ने शीघर ज्यान प्रदान करने के लिए एक अलोकिक स्वर्णिम अश्वा का रूप धारन
19:16किया
19:17उस दिव्य अश्वरूपी सूर्य देव के मुख से निकली प्रदीप्त ज्यानके ने सीधे याग्यवलक्य के मस्तिश्क और हरिदय में समाने
19:25लगी
19:26पलक जपकते ही याग्यवलक्य की चेतना में वेदमंत्रों का संपूर्ण ज्यान सूर्य की किर्णों की भाती अत्यंत निर्मल होकर जग्मगा
19:35उठा
19:36प्रत्यक्ष भगवान सूर्य से प्राप्त यह अमूल्य और परम पवित्र वेद्शाखा आगे चलकर शुकल यजुर्वेद नाम से जगत में विख्यात
19:45हुई
19:46सूर्य देव के वाजी रूप द्वारा प्रकट किये जाने के कारण इस महान संहिता को वाजसनेई संहिता भी कहा गया
19:55संपूर्ण यजुर्वेद का नवीन और विशुद्ध ज्यान पाकर याग्यवलक्य ने अश्रुपूरित नेत्रों से सूर्य देव के चर्णों में बारमबार प्रणाम
20:03किया
20:04सूर्य देव ने याग्यवलक्य को आशिरवाद दिया कि उनका यह ज्यान सदैव निश्कलंक रहेगा और मानव जाती का कल्यान करेगा
20:15सूर्य के समान अलौकिक तेज से युक्ठ होकर जब महर्शी याग्यवलक्य के पुनह ज्यानियों की सभा में पहुँचे तो सब
20:22स्थब्ध रह गए
20:24महर्शी वैशम पायन और अन्य रिशियों ने याग्यवलक्य के इस नवीन शुकले यजुरवेद की असीम पवित्रता और सपश्टता को नत्मस्तक
20:33होकर स्वीकार किया
20:36महर्शी पराशर कहते हैं कि इस प्रकार सूर्य की अनुकंपा से सत्य और घ्रिड संकल्प की विजय हुई तथा वेदों
20:43की जोती, अनंत काल के लिए प्रजवलित हो गई
20:47महर्शी पराशर मैत्रे को बताते हैं कि या ग्यवलक्य के जाने के पश्चात आश्रम की भूमी पर बिखरे उस अलौकिक
20:55वेड़तेज को देखकर महर्शी वैशंपायन अत्यंत चिन्तित हो उठे
21:00धर्टी पर पड़ा हुआ वह त्यागा गया वैदिक ज्यान किसी प्रजवलित सूर्य के समान धधक रहा था जिससे दिव्य ओम
21:08की अनहद ध्वनी गूंज रही थी
21:11महर्शी वैशंपायन ने उस अलौकिक जोति पुन्च की ओर देखा और समझा कि यदि इस सर्वशक्तिमान ज्यान को तुरंत न
21:19सहे जा गया तो यह संपूर्ण संसार को भस्म कर देगा
21:24वैशंपायन ने अपने निश्थावान शिश्यों को निकट बुलाया और गंभीर स्वर में कहा कि इस दिव्य वेदूर्जा की एक भी
21:32बूंद व्यर्थ नहीं जानी चाहिए
21:35गुरु की आग्या सुनकर सभी शिश्य अत्यंत श्रद्धा और भय के साथ उस स्वर्णिम धधकते हुए वैदिक द्रव्य को देखने
21:43लगे
21:44महर्शी वैशंपायन ने शिश्यों को आदेश दिया कि वे तुरंत तितिर यानी तीतर पक्षियों का रूप धारण करके इस पवित्र
21:52ज्यान को ग्रहन करें
21:54अपने गुरु के वचनों को शिरोधार्य करते हुए शिश्यों ने योगशक्ती का प्रयोग किया और देखते ही देखते छोटे-छोटे
22:02तीतर पक्षियों का रूप ले लिया
22:05मायावी तीतर पक्षियों का एक विशाल जुन्ड आकाश में मंदराने लगा और उस तेजस्वी तैरती हुरी दिव्यवैदिक अगनी पर नीचे
22:14उत्रा
22:16उन पक्षियों ने अपनी चोच से उस प्रजवलित वेदद्रव्य के एक एक कन को चुन-चुन कर चुनना और निगलना
22:23आरंभ कर दिया
22:25जैसे जैसे पक्षी उस अलोकिक तेज का भक्षन कर रहे थे उनके छोटे पंक स्वर्णिम और तामबे की कांती से
22:32दिव्य रूप से चमकने लगे
22:34उस संपूर्ण आश्रम का प्रांगन पक्षियों द्वारा वेद तेज ग्रहेन करने से उत्पन्न अध्भुत और आलोकिक नीलेस्वर्णिन प्रकाश से भर
22:43गया
22:44उस संपूर्ण वैदिक ज्यान को अपने भीतर समाहित करने के पश्चात वेतीतर पक्षी पुन्ह अपने महर्शी वैशंपायन के सम्मुख रिशी
22:53रूप में प्रकट हुए
22:55दिव्य ज्यान की तपन से देदी प्यमान होकर उन शिश्यों ने अपने गुरु वैशंपायन के चर्णों में प्रणाम किया और
23:03ज्यान संरक्षन का संकल्प पूर्ण किया
23:06महर्शी वैशमपायन ने गदगद होकर अपने शिष्यों को आशिरवाद दिया और तितिर पक्षियों द्वारा ग्रेहन की गई इस शाखा का
23:15नाम तैत्तिरिय संहिता रखा
23:18महर्शी पराशर समझाते हैं कि तितिर पक्षियों द्वारा संरक्षित यह अमूल्य ज्यान ही कृष्ण यजुर्वेद की प्रसिद्ध तैत्तिरिय शाखा के
23:27नाम से अमर हुआ
23:29प्राचीन काल के अनेक रिशियों और विद्वानों ने इस तैत्तिरिय संहिता के अत्यंत गूड मंत्रों और यग्ये विधियों का निश्था
23:37पूर्वक अध्ययन करना प्रारंभ किया
23:39इस प्रकार यजुर्वेद दो महान और दिव्यधाराओं सूर्यदेव द्वारा प्रकट शुकल यजुर्वेद और तितिर शिश्यों द्वारा रक्षित कृष्ण यजुर्वेद में
23:49विभक्त होकर प्रजवलित हुआ
23:52पराशर जी कहते हैं कि सत्य, समर्पन और गुरु भक्ती के इस संतुलन ने वेदों की अमर्ता को युगो युगो
23:59के लिए सुरक्षित कर दिया
24:02देवराज, इंद्र और आकाश में स्थित समस्त देवगणों ने इस पवित्र वेजसन रक्षन पर प्रसन्न होकर आश्रम पर पारिजात पुष्पों
24:10की वर्षा की
24:12महर्शी पराशर ने इस कथा का समापन करते हुए कहा कि वेदों का यह अलोकिक विभाजन मानव जाती के कल्यान
24:20और धर्म की रक्षा का अनंत स्तंभ है
24:24गुरु आश्रम छोड़ने के पश्चात महर्शी याग्यवलक्य के हृदय में नवग्यान प्राप्ट करने की एक प्रचंड और अटूट ज्वाला प्रजवलित
24:33हो उठी
24:34अपने गुरु के त्याग से मिले अपमान और वेद्विहिंता के भाव को पीछे छोड़ वे एक शांत और निर्जन परवत
24:42शिखर की ओर बढ़ चले
24:44याग्यवलक्य ने एक ऐसी पवित्र भूमी का चयन किया जहां प्रत्यक्ष देवता सूर्य की किरने बिना किसी बाधा के संपून
24:52प्रकरता से गिरती थी
24:55उन्होंने निर्णय लिया कि वे किसी मरंशील गुरु के स्थान पर जगत के एक मात्र नयन और प्रत्यक्ष देव भगवान
25:03सूर्य की शरण लेंगे
25:05एक पाव पर खड़े होकर बिना जल और अन्न ग्रहन किये उन्होंने सूर्य देव की अत्यंत कठोर तपस्या का प्रारंभ
25:13किया
25:15महीने बीटते गए परंतु महर्शी की द्रिष्टी निरंतर प्रचंड सूर्य मंडल पर टिकी रही और उनका मन केवल वैश्वानर ध्यान
25:23में लीन रहा
25:25उनकी तपस्या की अगनी इतनी प्रचंड हो गई कि उनके क्रिशकाई शरीर से एक स्वर्ण में अलोकिक तपोतेज निकलने लगा
25:34उनके इस शांत और उग्रत अपोबल के प्रभाव से वनके भयानक हिंसक जीव भी अपनी हिंसा भूलकर उनके चर्णों में
25:42शांत बैठ गए
25:44स्वर्गलोक से देवगन और सिध्धरिशी इस अध्वितिय तपस्वी के अचल संकल्प को देखकर चकित और स्तंभित रह गए
25:53देवराज इंद्र ने सोचा की कहीं यह कठोर तपस्या स्वर्ग के सिनहासन या ब्रहमांड के शक्तिसंतुलन को न जग जोर
26:01दे
26:02परंतु याग्यवल्क्य की कोई सांसारिक इच्छा न थी, वे केवल उन वेदों के ज्ञान के लिए तडप रहे थे, जो
26:09कभी किसी मानव मुख से न निकले हो
26:13सातों घोडो के रत पर सवार भगवान सूर्य देव ने याग्यवल्क्य के निश्कलंक और अत्यंत निस्वार्थ प्रेम तथा तपोबल को
26:21देखा
26:23सूर्य देव का करुणामय हृदय पिघल गया और उन्होंने इस अनन्य भक्त को वह ज्यान देने का संकल्प किया जो
26:30अब तक गुप्ट था
26:32आश्विन मास के तेजस्वी दिन संपूर्ण नभमंदल को चीर्ती हुई सूर्य देव की एक प्रचंड और देदी प्यमान प्रकाश पुंच
26:41प्रित्वी की ओर उत्री
26:43भगवान सूर्य देव अपने अती दिव्य और तेजोमय स्वरूप में साक्षात महर्शी याग्यवल्क्य के समक्ष प्रकट हुए
26:51उस अप्रतिन दिव्य प्रकाश से सम्मोहित होकर महर्शी याग्यवल्क्य ने अपने नयन मुंद कर सूर्य देव के चर्णों में साश्टान
27:00प्रणाम किया
27:02सूर्य देव ने अपने उजस्वी स्वर में कहा कि है धीर पुरुष तुम्हारे जैसा कठिन तप और सत्य की खोज
27:10आज तक किसी मर्थ्य ने नहीं की है
27:14याग्यवल्क्य ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की है प्रभु
27:17मुझे वेवेद प्रदान कीजिये जो किसी अन्य गुरु द्वारा कभी उच्चारित न किये गए हूँ
27:25सूर्य देव ने महर्शी की इच्छा स्वीकार की और उन्हें एक नए सर्वता शुध तथा अलौकिक यजुर्वेद के उद्घाटन का
27:33वर्दान दिया
27:35इसके उपरांत सूर्य देव ने अश्व का रूप धारन किया और याग्यवलक्य के अंतरमन में उन अच्छूते वेदमंत्रों को सीधा
27:43स्थापित कर दिया
27:45उस दिव्यवन में सूर्य देव के अश्व रूप से निकलने वाली सुनहरी किरने महर्शी याग्यवलक्य के चारों और एक अलोकिक
27:53सुरक्षा कवच की तरह फैलने लगी
27:56गेहन समाधी में लीन याग्यवलक्य ने अपने अंतहकरण में उन नवीन, शुद्ध और अंचुए वेदमंत्रों के दिव्य स्पंदन को स्पष्ट
28:05रूप से महसूस किया
28:07जैसे ही उस दिव्य अश्व ने अपने चमकीले खुरों से भूमी पर आघात किया, आकाश मार्ग से दैविय संस्कृत के
28:15अक्षर प्रकाश पुंच बनकर बरसने लगे
28:19सूर्य देव के अश्वरूप के श्वासों से बहती हुई तप्त सौर उर्जा ने याग्यवलक्य को चारों ओर से घेर लिया
28:26और उनके अज्ञान के अंतिम अंश को भी भस्म कर दिया
28:31याग्यवलक्य के मस्तिश्क के भीतर छिपे अंधकार मैकों ने इस नवीन और तेजस्वी ज्ञान के आलोक से पूरी तरह से
28:38आलोकित हो उठे
28:40इस महान ब्रहमांडिय ज्ञान के अवतरण को देख कर आश्रम के वरिक्ष, नदिया और समस्त प्रकृती एक क्षण के लिए
28:48निश्चल और ध्यानमग्न हो गई
28:50उस दिव्य अश्वने गर्जना जैसी गंभीर और मधुर ध्वनी में वाजसनेई संहिता के गुप्त और अच्छूते रिचाओं का उच्चारन सीधे
28:59रिशी के हरिदय में स्थापित कर दिया
29:02हवा में तैरते हुए पवित्र ओम और अन्य वेदमंत्र साक्षात सोने के अक्षरों में ढलकर याज्यवल्क्य के चारों और एक
29:10दैविय चक्र बनाने लगे
29:13धीरे धीरे याज्यवल्क्य का संपूर्ण नश्वर शरीर भी उस दिव्य अश्व के समान ही चमकीले और प्रखर सौर तेज से
29:20दीप्तमान होने लगा
29:23स्वर्ग के देवता और गंधर्व बादलों के बीच प्रकट होकर इस दुरलब ज्यान पीट के उद्धाटन पर दिव्य दुन्दुभिया और
29:31वीना बजाने लगे
29:32उस सुनहरे अश्वने प्रेमपूर्वक अपने प्रकाशमान माथे से याग्यवलकय के मस्तख का स्पर्ष किया जिससे समस्त शुक्ल यजुरवेद उनके मन
29:42में सदैव के लिए स्थापित हो गया
29:45जब याग्यवल्क्य ने अपनी आखें खोली तो उनकी आखों में हजारों सूरियों की दिव्य चमक थी जो शुकल यजुर्वेद के
29:53पूर्ण ज्यान को दर्शा रही थी
29:56वह अलोकिक सुनहरा अश्व धीरे धीरे अपनी मूल गरिमा में लोटने लगा और पुनह बहुभुज प्रकाश्मान सूर्य देव के साक्षात
30:05रूप में परिवर्तित हो गया
30:08अपने पूर्ण दिव्य स्वरूप में सूर्य देव आकाश में खड़े होकर अपने परम भक्त और योग्य शिष्य को आशिरवात की
30:16मुद्रा में देखने लगे
30:18महर्शी याग्यवल्क्य ने अपनी अश्रुपूर्ण आखों के साथ सूर्य देव के चर्णों में साष्टान प्रणाम किया और प्रित्वी को अपनी
30:26भक्ती से पावन कर दिया
30:29सूर्य देव ने मंद मुस्कान के साथ घोषणा की की उनका यह नया वेद वाजसनेई संहिता कहलाएगा क्योंकि इसे उन्होंने
30:38अश्वरूप में प्रदान किया है
30:40इस दिव्य घोषणा के पूर्ण होते ही स्वर्ग से देवताओं ने सुनहरे पारिजात पुषपों की वर्षा कर शुकल यजुर्वेद के
30:48अवतरण का स्वागत किया
30:51याग्यवल के अपने हाथों में साक्षात दिव्य प्रकाश के रूप में शुकल यजुर्वेद की संहिताओं को धारण कर संसार के
30:58कल्यान के लिए खड़े हुए
31:01इस पावन ज्यान के प्रिथवी पर आते ही संपून स्रिष्टी में एक नई आध्यात्मिक उर्जा और पवित्रता का संचार हो
31:09गया जिससे अंधकार का नाश हुआ
31:12इस प्रकार शुकल यजुर्वेद की पवित्र ज्यान परमपरा की स्थापना हुई जो आने वाली अनन्त पीधियों के लिए सत्य और
31:20मोक्ष का मार्ग प्रशस्ट करेगी
31:23हे मैत्रे इस प्रकार महातेजस्वी या ग्यवलक्य ने सूर्य देव से शुकल यजुर्वेद का ज्यान प्राप्त किया किन्तु तुम्हें यह
31:31समझना होगा कि समस्त वेदों की मूल उत्पत्ती साक्षात भगवान विश्णु ही है
31:38स्रिष्टी के आदी में जो अनाहत नाद गूंजा था वह कोई साधारन ध्वनी नहीं अपितु श्री हरी का ही शब्द
31:46ब्रहम स्वरूप था जो संपूर्ण ब्रहमांड में व्याप्त हुआ
31:50परमेश्वर विश्णु स्वयन को शब्द ब्रहम के रूप में प्रकट करते हैं और उनकी प्रत्येक श्वासी वेदों के रूप में
31:57इस स्विष्टी में प्रवाहित होती है
32:01रिगवेद, यजुरवेद, सामवेद और अथर्ववेद ये चारों महान ज्ञानपुंज नारायन के दिव्यस्वरूप से ही उत्पन्न होकर संसार को ज्ञान का
32:10प्रकाश देते हैं
32:13महर्शी पराशर के इन परम कल्यानकारी और रहस्यमई वचनों को सुनकर मैत्रे का मन परम आनंद और अगाध भक्ती से
32:21भर गया
32:23पराशर जी ने आगे कहा कि न केवल वेद, अपितु समस्त पुराण, इतिहास, स्मृती और धर्म शास्त्र भी उसी आधिपुरुष
32:31की दिव्यवानी के पावन अंश हैं
32:35वर्णमाला का प्रत्येक पवित्र अक्षर और प्रत्येक दिव्यमंत्र भगवान विश्नु के ही विराट और अविनाशी शरीर का एक-एक अंग
32:43माना जाता है
32:45जब भी इस नश्वर प्रित्वी पर कोई पवित्र मंत्र बोला जाता है, तो साक्षात नारायन ही उस ध्वनी के माध्यम
32:53से संसार का कल्यान करते हैं
32:56यग्य की प्रजवलित अगनी में जो आहुती दी जाती है, वह मंत्रों की दिव्य तरंगों के रूप में सीधे शब्द
33:03ब्रहम विश्णु में विलीन हो जाती है
33:07इसलिए है वत्स मैत्रे हमारे शास्त्रों और पवित्र ग्रंथों का आदर करना साक्षात परमेश्वर की प्रत्यक्ष पूजा और उपासना के
33:16समान है
33:18स्वयं ज्यान और बुद्धी की अधिश्ठात्री देवी सरस्वती भी नारायन के इसी शब्द ब्रहम स्वरूप की वंदना कर अपनी वीना
33:26पर वेदों का आलाप करती है
33:30ध्वनी ही इस संपूर्ण स्रिष्टी में चेतना का वाहक है और जब यह ध्वनी विश्णु नाम लेती है तो आत्मा
33:37का परमात्मा से मिलन हो जाता है
33:40आने वाले घोर कलियुग में जब सर्वत्र अंधकार होगा तब यह वेदवानी ही भटके हुए मनुश्यों के लिए मोक्ष का
33:48एक मात्र मार्ग प्रशस्ट करेगी
33:51इस सक्थ्य को समझो की इंद्र, अगनी, वरुन्प और सूर्य आदी सभी शक्तिशाली देवता भी इसी शब्द ब्रह्म के विभिन
33:59अक्षरों की उर्जा से संचालित होते हैं
34:03भगवान के पावन नाम और उनके दिव्य विग्रह में रत्ती भर्भी भेद नहीं है, विश्नु शब्द का उच्चारण ही स्वयन
34:11नारायन की साक्षात उपस्थती है
34:15जो मनुष्य इस गूड ज्यान को धारण कर लेता है, वह संसार के सभी संसारिक बंधनों और माया से मुक्त
34:22होकर परमपत को प्राप्त करता है
34:25के मैत्रे, इस प्रकार मैंने तुम्हें वेदों के विभाजन, या ग्यवलके की कठिन साधना और शुकल यजुर्वेद के प्राकट्य का
34:34संपूर्ण रहस्य समझाया
34:36गुरु पराशर के मुख से इस परम ज्यान को सुनकर मैत्रे के नेत्रों से अश्रु बहने लगे और उन्होंने श्रधा
34:44पूर्वक उनके चर्णों में साष्टांग दंडवत किया
34:48इस पावन संबाद की पूर्णता पर स्वर्ग लोक में देवों ने दुन्दुभी बजाई और गंधरवों ने इस दिव्य ज्यान के
34:55सम्मान में पुष्प वर्शा की
34:57और अंतह शीर सागर में विराजमान भगवान नारायन अपनी मंद मुस्कान से संपूर्ण ब्रहमांड को अपने असीम प्रेम और मोक्ष
35:07का वर्दान दे रहे हैं
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