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विष्णु पुराण के ५२वें अध्याय में देखिए चंद्रवंश की आगे की रोमांचक गाथा! राजा पुरूरवा के बाद उनके पुत्र आयु और पौत्र नहुष का शासनकाल। जब देवराज इंद्र ब्रह्महत्या के पाप से छिप जाते हैं, तब नहुष को स्वर्ग का राजा बनाया जाता है। परंतु अनियंत्रित अहंकार और शची (इंद्राणी) को पाने की वासना नहुष के विनाश का कारण बनती है। महर्षि अगस्त्य का भीषण श्राप और नहुष का एक विशाल सर्प बनकर पृथ्वी पर पतन! तत्पश्चात नहुष के धर्मात्मा पुत्र ययाति का राज्याभिषेक। पूरी कथा जानने के लिए वीडियो को अंत तक देखें!
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00:00समराट पुरूर्वा ने अपने जेश्ट धर्मनिष्ट पुत्र आयू के मस्तक पर चंद्रवंश का राजमुकुट सुशोभित करते हुए सामराट जिका उत्तरदायत्व
00:09सौपा।
00:10रिशियों और राजपुरोहितों के समक्ष राजा आयू ने धर्म पूर्वक प्रजा का पालन करने और चंद्रवंश की कीर्ती को समस्त
00:18दिशाओं में फैलाने की प्रतिग्याली।
00:21पवित्र सरस्वती नदी के तटपर राजा आयू ने भगवान विश्णू की कठिन आराधना कर दिव्यद्रिष्टी और सर्वव्यापी शक्ती की याचना
00:30की।
00:31महर्शियों के परामर्ष से राजा आयू ने एक कुशल प्रशासनिक नीती का निर्मान किया, जिसने सामराज्य की नीम्व को अत्यंत
00:40सुद्रिड बना दिया।
00:41अपनी विशाल चतुरंगिनी सेना के साथ राजा आयू ने आर्यावर्थ के भूभाग पर चंद्रवंश की सीमाओं का अभूतपूर्व विस्तार किया।
00:51पडोसी राज्यों के साथ न्यायपूर्ण संधिया बनाकर राजा आयू ने संपूर्ण भारतवर्ष में शांती और अखंडता की स्थापना की।
01:01सीमांत क्षेत्रों में उपदरव करने वाले असुरों और उग्र योध्धाओं को परास्ट कर राजा आयू ने अपने पराक्रम का लोहा
01:09मनवाया।
01:11सामराज्य की संप्रभुता को स्थापित करने के लिए राजा आयू ने महायग्य का आयोजन किया, जिसमें संपूर्ण पृत्वी के राजा
01:19सम्मिलित हुए।
01:21पवित्र अग्नी में आहुतियों के अर्पित होते ही देवराज, इंद्र और अन्य देवताओं ने चंद्रवंश के उपर अपने दिव्य आशिरवाद
01:29की वर्षा की।
01:31सामराज्य में स्थाई शांती हेतु राजा आयू का विवाह दान्वराज स्वर्भानु की रूपवती एवं गुनवती पुत्री प्रभा से संपन हुआ।
01:40दिव्य एवन धर्मनिष्ट संतान की प्राप्ती के लिए राजा आयू और महारानी प्रभाने कैलाश परवत पर देवाधिदेव महादेव की तपस्या
01:50की।
01:50प्रसन होकर महादेव शिव ने प्रकट होकर राजा आयू को परम पराक्रमी और भावी स्वर्गप्ती पुत्र का वर्दान प्रदान किया।
02:00नहुष के जन्म लेते ही संपूण चंद्रवंश आनन्दित हो उठा और आकाश से गंधर्वों ने मंगल गान करते हुए पुषपवर्शा
02:09की।
02:10राजा आयू ने स्वयम बालक नहुष को वेदों के ज्यान, राजनीती के गूड सिधानतों और अस्त्रशस्त्र की शिक्षा दी।
02:18अलपायू में ही राजकुमार नहुष ने दिव्यधनुर विद्या और अस्त्रशस्त्राचार में अपनी अद्भुत प्रतिभासे सब को विस्मय में डाल दिया।
02:28राजा आयू के समरिध शासनकाल में चंद्रवंश की राजधानी स्वर्ण मंदिर और भव्य अट्टालिकाओं से सुसज्जित होकर जग्मगा उठी।
02:37धर्म अर्थ और काम का संतुलन बनाकर राजा आयू ने चंद्रवंश को वैभव और आध्यात मिक्ता के सर्वोच शिखर पर
02:46पहुँचाया।
02:47देवर्शी नारद ने राजसभा में पधार कर राजा आयू को उनके पुत्र नहुष के होने वाले अलोकिक एवन चुनोती पूर्ण
02:56भविश्य का बोध कराया।
02:57अपने जीवन के महान कर्तवियों को पूर्ण मानकर राजा आयू ने वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश कर तपस्या करने का संकलत
03:06लिया।
03:06राजा आयू ने अपने महाप्राक्रमी पुत्र नहुष का राज्याभिशेक कर चंद्रवंश का भव्य भविश्य उसके सुद्रिड कंधों पर सौंक दिया
03:17इधर प्रित्वी पर नए युग का सूत्रपात हो रहा था तो दूसरी और दानवों के पुना संगठित होकर स्वर्गलोक पर
03:25भीशन आक्रमन करने से संपूर्ण देवलोक में हाहाकार मच गया
03:30असुरों के छलावायुक्त बानो और अपार मायावी शक्तियों के सम्मुख देवराज इंद्र और देवता पराजित होकर स्वर्ग के सिनहासन से
03:38वंचित हो गए
03:41निराशा के भंवर में फंसे देवराज इंद्र ने जब समाधान हेतु ब्रहमाजी से गुहार लगाई तो उन्हें ग्यात हुआ की
03:48चंद्रवंश के वीर योध्धा राजारजी की अगुवाई में ही देवसेना विजय प्राप्त कर सकती है
03:55राजा आयू के अत्यंत साहसी और नीतियों में निपुन भ्राता राजारजी की असीम शूर वीर्ता की ख्याती संपून ब्रहमाण में
04:04फैली हुई थी
04:05स्वर्ग की रक्षा हे तु देवराज इंद्रस्वयं पृत्वी पर पधारे और चंद्रवंशी वीर राजारजी के दर्बार में उपस्थित होकर उनसे
04:14देवसेना का नेत्रित्व संभालने की प्रार्थना की
04:19राजारजी ने इंद्र का प्रस्ताव स्वीकारते हुए यह शर्ट रखी की युद्ध विजय के उपरांत उन्हें देवताओं का स्वामी अर्थात
04:27इंद्रपद स्वीकार करना होगा
04:30असुरों के त्रास को समाप्त करने के लिए विवश होकर देवराज इंद्र ने राजारजी की शर्ट सहर्ष स्वीकार की और
04:38उन्हें दिव्य अस्तरादी प्रदान किये
04:41राजा रजी ने स्वर्णन कवच और दिव्य अस्त्रशस्त्रधारण कर देवताओं के सेनापती के रूप में दिव्य रत पर सवार होकर
04:49युद्ध भूमी की ओर प्रस्थान किया
04:52युद्ध के मैदान में एक मर्तलोग के मानव को देवसेना का नेत्रित्व करते देख असुरों की सेना ने अहंकारवश अटहास
05:00किया और भीशन प्रहार आरंभ कर दिया
05:03किन्तु राजारजी ने बिना विचलित हुए अपने धनुष की प्रत्यंचा खीची और पलक जपकते ही सहसरों ज्वालामुख बाणों की बौचार
05:12से दानव सेना में भगड़ मचा दी
05:16असुरों के बड़े-बड़े महारथी अपनी मायावी शक्तियों और विशाल गदाओं के साथ राजारजी पर तूट पड़े परंतु राजा का
05:24पराक्रम अभेद्य रहा
05:25अपने मूख बाणों और अमोग अस्त्रों के संधान से राजारजी ने असुरों के छलावे का छेदन कर उनके मायावी अंधकार
05:34को पूर्नतः छिन्भिन कर दिया
05:37असुर सेनाप्ती ने क्रोधित होकर राजारजी पर महाविनाशकारी दिव्यास्त्र से वार किया, किन्तु राजारजी के अचूप प्रतिघात ने उसे स्तब्ध
05:47कर दिया
05:48राजा रजी ने एंद्र अस्त्र का संधान कर असुर सेनाप्ती का शीष धड़ से अलग कर दिया जिससे संपूर्ण संग्राम
05:56छेत्र में उनका जैगोश गूँज उठा
06:00सेनाप्ती के धराशाई होते ही बची खुची दानव सेना प्राण बचाकर पाताल की ओर भाग खड़ी हुई और स्वर्ग पर
06:07पुन्ह धर्म का ध्वज लहराने लगा
06:11समस्त देवगणों और रिशियों ने राजारजी के इस अलोकिक पराक्रम की सराहना करते हुए उन पर नंदनवन से पारिजात पुश्पों
06:19की वर्शा की
06:21वचन के अनुसार देवराज इंद्र ने राजारजी के समक्ष नत्मस्तक होकर उन्हें अपना जेश्ठ माना और स्वर्ग के इंद्रपद पर
06:29उनका अभिशेक किया
06:32राजारजी ने अपने महान स्वभाव का परिचय देते हुए स्वर्ग का सीधा संचालन पुनह इंद्र को सौपा और स्वयं केवल
06:40सर्वोच्च सनरक्षक का सम्मान ग्रहें किया
06:44विजी होकर जब राजारजी प्रित्वी लोक लोटे तो चंद्रवंश का गौरव ब्रहमांड के कोने-कोने में अमर हो गया
06:52राजारजी की इस अमर गाथा ने चंद्रवंश के भावी समराथ और उनके भतीजे राजा नहुश के स्वर्णेम एवं महान भविश्य
07:00का मार प्रशस्ट कर दिया
07:02जब देवराज इंद्र ने महर्शी दधीची की अस्थियों से निर्मित वजर से असुर वृत्रासुर का बद किया तो संपूर्ण त्रिलोक
07:11देहल उठा
07:12किन्तू वृत्रासुर के ढहते ही उसके शरीर से ब्रहमहत्या का भयानक काल रूपी पाप एक विक्राल काली छाया बनकर प्रकट
07:20हुआ
07:22वह संहारक ब्रहमहत्या रूपी महापाप देवराज इंद्र का पीछा करने लगा जिससे स्वर्गलोक के नरेश का हृदय भय से काम
07:30उठा
07:32अपने ही किये कर्म के पश्चाताप और पाप के भय से व्याकुल होकर इंद्र ने अपना देवराज पद और अमरावती
07:39का त्याग कर दिया
07:41पलायन करते हुए इंद्र मानसरोवर के पवित्र जल की ओर बढ़े जहां खिलते हुए दिव्य कमलों का विशाल विस्तार था
07:50ब्रह महत्या के प्रकोप से बचने के लिए देवराज इंद्र ने सुक्ष्म रूप धारन किया और एक कमल के तंतु
07:57के भीतर प्रवेश कर गए
08:00इस प्रकार देवेंद्र जल के भीतर छिपे उस कमल नाल में योग निद्रा में लीन होकर साधना करने लगे ताकि
08:07पाप निश्फल हो सके
08:09राजा के अचानक गायब हो जाने से स्वर्गलोग की आभा लुप्थ हो गई और अमरावती पर घोर सन्नाटा पसर गया
08:18पती के अचानक लोप हो जाने पर देवी शची सूने राजसिनहासन के समीप बैठकर अत्यंत करुन स्वर में विलाप करने
08:26लगी
08:27समस्त देवता और नंदनवन की अपसराएं अत्यंत चिंतित होकर ब्रहमांड के कोने-कोने में अपने स्वामी की खोच करने लगे
08:37उधर पाताल लोक में असुरों को जब यह ज्यात हुआ कि स्वर्गलोक बिना राजा के नेत्रित वहीन हो गया है
08:43तो उनकी कुटिल महत्वा कांक्षा जाग उठी
08:47भयानक हथियारों से लैस असुर सेना ने बिना किसी विलंब के अराजक पड़े स्वर्गलोक पर चारों तरफ से धावा बोल
08:55दिया
08:56बिना किसी रक्षक के देवलोक में असुरों ने भारी तबाही मचाई और अमरावती पर अपना अधिकार जमा लिया
09:05पराजित और असहाय होकर देवतागन स्वर्ग से भागने पर मजबूर हो गए और सुरक्षा की गुहार लगाने महर्शियों की शरण
09:13में पहुँचे
09:15देवगुरु ब्रहस्पती के नेतरित्व में समस्थ देवगन और सब्तर्शी ब्रहमाजी की सभा में उपस्थित होकर इस घोर संकट का समाधान
09:24मांगने लगे
09:26पितामा ब्रहमा ने प्रकट किया कि इंद्र ब्रहम हत्या के पाप के कारण अद्रिश्य अवस्था में घोर तपस्या में लीन
09:33है
09:35ब्रहमा जी ने सचेट किया कि बिना राजा के स्वर्ग लोग पर असुरों का पूर्ण आधिपत्य हो जाएगा इसलिए शीघ्र
09:42ही किसी योग्य शासक को सिन्हासन सौपना होगा
09:47देवताओं ने निर्णय लिया कि जब तक इंद्र लौट नहीं आते तब तक पृत्वी के किसी महाप्रतापी एवन धर्मात्मा राजा
09:55को स्वर्ग का कार्यभार सौपा जाए
09:58महर्शी अगस्त्य और अन्य रिशियों ने विचार विमर्ष करके पृत्वी पर ऐसे राजा की तलाश शुरू की जो स्वर्ग के
10:05नियमों को संभाल सके
10:08अंतह सर्वसम्मती से चंद्रवंश के पराक्रमी और निश्कलंग समराथ राजा नहुष को स्वर्ग के नए राजा के रूप में चुनने
10:16का मार्ग प्रशस्थ हुआ
10:19देवर्शिगन और प्रमुख देव प्रित्वी लोग की ओर प्रस्थान करते हैं ताकि राजा नहुष को स्वर्ग का भार संभालने का
10:26प्रस्ताव दे सके
10:29महर्शी अगस्त्य के नेत्रित्व में देवताओं का यह पावन दल राजा नहुष के भव्य और अलौकिक राजदर्बार में उतरता है
10:47महर्शी अगस्त्य राजा नहुष को स्वर्ग की वर्तमान दुर्गशा और देवराज इंद्र के गुप्ट स्थान पर चले जाने की सूचना
10:55देते हैं
10:57देवराज इंद्र की अनुपस्थिती में ब्रह्मान्डिय संतुलन बनाये रखने के लिए देवगण नहुष को स्वर्ग के सिनहासन पर बैठने का
11:06निवेदन करते हैं
11:08राजा नहुष अत्यंत संकोच के साथ देवताओं से कहते हैं कि वे एक साधारण मनुष्य होकर इंद्र के दिव्यपत को
11:16कैसे संभाल सकते हैं
11:19रिशियों ने नहुष को उनके महान पूर्वजों के पुनियों और उनकी अपनी धार्मिक निष्ठा का स्मरण कराकर उनका आत्म विश्वास
11:27बढ़ाया
11:29अंतर धर्म की रक्षा और ब्रहमांडिय व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए राजा नहुष्ट देवताओं का यह गुरुतर दायत्व स्विकार
11:37कर लेते हैं
11:39राजा नहुष्ट देवताओं के साथ एक अत्यंत दिव्य और अलौकिक रत पर सवार होकर प्रित्वी से स्वर्गलोग की ओर प्रस्थान
11:48करते हैं
11:50स्वर्ग के मुख्य द्वार पर अमरावती के निवासी, गंधर्व और अपसराय राजा नहुष्ट का स्वागत करने के लिए पुष्पवर्शा करते
11:58हैं
12:00देवसभा सुधर्मा में राजा नहुष के राज्याभिशेक की भव्यत यारिया वैदिक मंत्रो चार के बीच अत्यंत हर्शो लास से शुरू
12:08होती हैं
12:10सब्तरिशी पवित्र नदियों के पावन जल से भरे स्वर्ण कल्षों द्वारा नहुष का मंगलकारी जलाभिशेक संपन्न करते हैं
12:20महर्शी अगस्त्य अपने दिव्य हाथों से देवराज, इंद्र का तेजस्वी और अलोकिक मुकुट राजा नहुष के मस्तक पर सुशोभित करते
12:28हैं
12:29देवताओं द्वारा राजा नहुष को स्वर्ग की सुरक्षा सुनिष्चित करने के लिए परम शक्तिशाली और चमकीले अस्त्रशस्त्र सौंपे जाते हैं
12:40नहुष अब पूर्णत है देवराज के रूप में सुधर्मा सभा के मुख्य इंद्र सिनहासन पर विराजमान होकर अपनी दिव्य आभा
12:48बिखेरते हैं
12:50अपसराय अत्यंत मनमोहक नृत्य प्रस्तुत करती हैं और गंधर्व राज नहुष के सम्मान में दिव्य वाध्ययंत्रों से मधुर संगीत बजाते
12:59हैं
13:01सिनहासन पर बैठते ही राजा नहुष तीनों लोकों की रक्षा और धर्म की मर्यादा को अक्षुन रखने का द्रिड संकल्प
13:08लेते हैं
13:11वैकुंठ धाम में शेशनाग पर विराजमान भगवान विश्नु अपनी योग निद्रा से जाग कर इस दिव्य परिवर्तन को अत्यंत मंद
13:19मुस्कान से देखते हैं
13:22राजा नहुष के कुशल और न्यायप्रिय शासन की शुरुवात होते ही स्वर्गलोक में पुनह सुख, शांती और समरिध्धी का वास
13:29हो जाता है
13:32परंतु असीमित दिव्य शक्तियों और सर्वोच पद को पाकर राजा नहुष के मन में धीरे-धीरे अहंकार का सुक्ष्म अंकुर
13:39फूटने लगता है
13:42स्वर्गलोक के अपार वैभव और सुर्भित मदिरा के प्रभाव में आकर राजा नहुष का मन धीरे-धीरे धर्म के मार्ग
13:49से भटकने लगा
13:52देवेंद्र के सर्वोच सिनहासन पर विराज मान होकर नहुष नियाय और प्रजापालक दायत्वों को भूल कर दिनरात केवल अपने व्यक्तिगत
14:00सुख भोग में लीन रहने लगे
14:03असीमित दिव्य शक्तियों के मद में चूर होकर नहुष स्वर के सभी देवताओं को अपने समक्ष तुछ और दास्समान समझने
14:11की भूल कर बैठे
14:13राजा नहुष की बढ़ती हुई निरंकुष्टा और अधर्म को देखकर देवगुरु ब्रहस्पती ने उन्हें मर्यादा और कर्तव्य का पालन करने
14:22की विनमर चेतावनी दी
14:25अंकार के विशैले प्रभाव में आचुके नहुष ने देवगुरु ब्रहस्पती के कल्यानकारी परामर्ष को अस्विकार करते हुए भरी सभा में
14:33उनका कटु अपमान कर दिया
14:36देवगुरु का ऐसा अभूत पूर्व अनादर देखकर संपूर्ण देवसभास तब्ध रह गई और सभी देवताओं के हृदय गहरे भय तथा
14:45चिन्ता से भर गए
14:47काम और अहमकार के अंधकार में डूबे नहुष की कुद्रिष्टी अब देवराज इंद्र की परम पतिवर्ता और सुन्दर पत्नी देवी
14:55शची पर जाटी की
14:57नहुष ने बिना किसी संकोच के अपने दूटों को आदेश दिया कि वे देवी शची को तुरंत उनके महल में
15:04उपस्थित करें
15:06जब दूटों ने नहुष का यह अधर्मी और अनैतिक संदेश देवी शची तक पहुँचाया तो वे अत्यंत भयभीट और क्रोधित
15:14हो उठी
15:16अपने सतीत्व और सम्मान की रक्षा हेतु देवी शची व्याकुल होकर ततकाल देव गुरु ब्रहस्पती के आश्रम में शरण लेने
15:24पहुची
15:26देव गुरु ब्रहस्पती ने देवी शची को धीरस बंधाया और उन्हें अभयदान देते हुए नहुष के पाप से बचाने की
15:33प्रतिग्याली
15:35देवी शची द्वारा अपने प्रस्ताव को ठुकराये जाने और गुरु की शरण में जाने की सूचना मिलते ही नहुष क्रोध
15:43से तिल्मिला उठे
15:45आमकार से अंधे नहुष ने कुतर्प दिया कि चूंकी वे अब स्वर के राजा हैं इसलिए इंद्र की समस्थ संपदा
15:52और पत्नी पर केवल उनका अधिकार है
15:57देवताओं ने नहुष को समझाने का भर्सक प्रयास किया कि पराईस्त्री पर अधिकार जमाना घोर अधर्म और विनाशकारी पाप है
16:06परंतु नहुष ने देवताओं की एक न सुनी और चेतावनी दी की यदी शची उनके पास नहीं आई तो वे
16:13संपूर्ण देव लोग को नश्ट कर देंगे
16:17देव गुरु ग्रिहस्पती के मार्ग दर्शन में देवी शची ने राजा नहुष के अहमकार का पतन करने हेतु एक गूड
16:24और चतुर रणनीती तयार की
16:27शची ने नहुष के पास संदेश भिजवाया कि वे उनके पास आने को तयार हैं किन्तु उन्हें एक ऐसी अभूत
16:35पूर्व सवारी पर आना होगा जो आज तक किसी ने न देखी हो
16:40देवी शची ने शर्त रखी की राजा नहुष की पालकी को स्वयम परम पवित्र सप्तरिशी अपने पावन कंधों पर उठा
16:47कर लाएंगे
16:49अपनी महानता के जूठे घमंड में डूबे नहुष ने बिना परिणाम सोचे इस घोर पाप्पून और अनर्थकारी शर्त को तुरंत
16:57स्विकार कर लिया
16:59विवेक्षून्य हो चुके नहुष ने परम पूज सप्तरिशियों को बुलवा कर उन्हें अपनी पालकी उठाने का अधर्मी आदेश दिया जो
17:07उनके सर्वनाश का कारण बनने वाला था
17:11सप्तरिशियों ने अत्यंत भारी मन से उस अधर्मी नहुष की पालकी को अपने पावन कंधो पर उठाया जबकी नहुष अहंकार
17:19में चूर होकर उसमें बैठ गया
17:23अपनी कामुक्ता में अंधा हो चुका नहुष पालकी के भीतर से बार-बार इंद्रानी शची के महल की ओर देख
17:29रहा था जहां देवी शची भयभीट अवस्था में छिपी हुई थी
17:35सब्तरिशियों की सहज और शांत गती से चलते देख नहुष का धैर्य समाप्थ होने लगा और वह अत्यंत क्रोधित होकर
17:43चिल्लाने लगा
17:45देवी शची को पाने की तीवर और अनुचित लालसा ने नहुष के विवेक को पूरी तरहे से नश्ट कर दिया
17:51था जिससे उसका मुख भयानक दिखने लगा था
17:55अपनी गती बढ़ाने के लिए नहुष ने महाग्यानी रिशियों का अपमान करना शुरू कर दिया जो संपूर्ण ब्रह्मांड के पूजनिय
18:04मार्ग दर्शक थे
18:06सब्तरिशियों में सबसे छोटे कद के तेजस्वी रिशी अगस्त्य अपनी स्वाभाविक गती से चल रहे थे जिससे अहंकारी राजा का
18:14क्रोध भड़क उठा
18:16अधीर्ता की चरम सीमा पर पहुँच कर मदमस्त नहुष ने अत्यंत घेनित कार्य करते हुए पूजय रिशी अगस्त्य के सिर
18:24पर अपने पैर से प्रहार किया
18:27रिशी अगस्त्य को लात मार कर नहुष ने चिलाते हुए कहा सर्प
18:32सर्प जिसका अर्थ था शीघ्र चलो, किन्तु यही शब्द उसका भाग्य तै करने वाले थे
18:39इस महापाप और घोर अपमान से अत्यंत क्रोधित होकर रिशी अगस्त्य की आखों से प्रल्यंकारी अग्नी प्रजवलित हो उठी
18:48रिशी अगस्त्य ने गरस्ते हुए नहुष को शाप दिया कि वह उसी क्षण देवलोग से गिरकर प्रिथवी पर एक विशाल
18:56सर्प बन जाए
18:58शाप के प्रभाव से नहुष का दिव्य शरीर तुरंत बदलने लगा और उसके पैर एक विशाल अजगर की पूँच में
19:05परिवर्तित होने लगे
19:08नहुष की चीखों को सुनकर और उसके भयानक रूप को देखकर सब्तरिशियों ने तुरंत उस पापी की पालकी को नीचे
19:15गिरा दिया
19:17स्वर्ग के सिनहासन से चुथ होकर वह घमंडी राजा नहुष एक तुछ सर्प के रूप में बादलों को चीरता हुआ
19:24प्रित्वी की ओर गिरने लगा
19:27स्वर्ग के देवताओं ने जब इस पापी अत्याचारी का अंत देखा तो उनके चहरों पर राहत और संतोष की लहर
19:35दोड़ गई
19:36गुरू ग्रिहसपती के आश्रम में बैठी देवी शची को जब नहुष के पतन का समाचार मिला तो उनकी आखों से
19:44प्रसन्ता के आसुबह निकले
19:47संकट के इस कठिन समय में अपनी रक्षा करने और सही मार्ग गर्षन देने के लिए देवी शची ने देवगुरू
19:54ब्रिहसपती के चर्णों में शीष जुकाया
19:57नहुष के पतन के साथ ही स्वर्ग के असली स्वामी देवराज इंद्र अपनी लंबी तपस्या और गुप्तवास समात कर पुनह
20:05प्रकट हुए
20:07देवराज इंद्र और इंद्राणी शची अमर्वती के मुख्य द्वार पर मिले और एक दूसरे को देखकर उनके हृदय हर्ष से
20:15गदगद हो गए
20:17परम पूज सप्तरिशियों ने पुनह स्थापित हुए इंद्र और शची को अपने पावन आशिर्वाद से अभिसिंचित किया जिससे स्वर्ग का
20:25वैभव लोट आया
20:27इस प्रकार राजा नहुष का अहंकार और कामवासना ही उसके घोर पतन का कारण बनी जो सदा के लिए एक
20:35चेतावनी बन गई
20:37देवराज इंद्र के पुनह राज्या रोहन के साथ नहुष स्वर्ग के सिनहासन से एक पतित तारे की भांती गिरा
20:44उसका अहंकार चूर-चूर हो चुका था और घेनित कामवासना ने उसे गहरे पश्चाताप के अंधकार में धकेल दिया था
20:53स्वर्ग के देवतागन दूर से नहुष के पतन का अवलोकन कर रहे थे उनके चहरों पर राहत और सतर्पता का
21:01मिलाजुला भाव था क्योंकि वे जानते थे कि एक पराजित शत्रु भी अप्रत्याशित हो सकता है
21:09इंद्रानी शची अब अपने पती के पुनह सिनहासन पर विराजमान होने से सुरक्षित महसूस कर रही थी
21:15परंतु नहुषके घमंड और उसकी अधूरी इच्छाओं से उत्पन्ध खत्रे को पूरी तरह समाप्त करने के लिए एक निरनायक कदम
21:23उठाने का संकल्प लिया
21:26अपने मन में एक जटिल रननीती गड़ती हुई शची ने अपने महल के पवित्र परामर्श कक्ष में प्रवेश किया जहां
21:34देवगुरु ब्रहस्पती की दिव्य उपस्थिती सदैव मार्क दर्शक प्रकाश के समान होती थी
21:40देवगुरु ब्रहस्पती अपनी गहरी अंतरग्रिष्टी और अपार ज्यान के साथ अपनी पवित्र आसन पर विराजमान थे उनके मुखमंडल पर शांत
21:50गंभीरता और गहन विचार शीलता स्पष्ट जलक रही थी जैसे वे ब्रहमांड के रहस्यों पर मनन कर रही हु�
22:02और उसके अधम स्वभाव के बारे में बताया जिस पर देवगुरु ने अपनी अनुगवी आखों से गहनता से देखते हुए
22:09नहुष के अंदर छिपी अहंकार की जड़ को पहचाना
22:14ब्रिहस्पती ने एक क्षण मौन रहकर गहन विचार किया फिर उन्होंने अपनी दिव्यद रिष्टी से शची को एक ऐसी चतुर
22:21योजना का सुझाव दिया जिससे नहुष का अहंकार चकनाचूर हो जाएगा और वह सदा के लिए उपहास का पात्र बन
22:29जाएगा
22:30गुरू ने प्रस्ताव रखा कि शची यह शर्ट रखें कि नहुष उनसे तभी विवाह कर पाएगा जब वह सब्तरिशियों को
22:38अपनी पालकी का वाहक बनाएगा और स्वय उस पर बैठ कर उनके महल तक आएगा
22:44यह शर्ट सुनकर शची पहले तो चकित रह गई पर शीघर ही उनके मुख पर एक चतुर मुस्कान फैल गई
22:52क्योंकि उन्हें इस योजना की गहरी प्रतीकात्मक शक्ती और नहुष के अपमान की कलपना हो चुकी थी
23:00ब्रिहस्पती ने शची को समझाया कि यह शर्ट न केवल नहुष को अत्यंत अपमानित करेगी बल्कि यह उसके उस मिथ्या
23:07अभिमान को भी नश्ट कर देगी जो उसे स्वयंको देवताओं से श्रेष्ट समझने पर विवश करता है
23:15इस गेहन अर्थ को समझकर शची ने पूर्ण हृदय से इस योजना को स्विकार कर लिया उनकी आखों में प्रतिशोध
23:23की एक नई चमक थी और मन में नहुष के पतन का सपष्ट चित्र उभराया
23:29शची ने तुरंट एक विश्वसनिय गंधर्व दूद को गुलाया जिसे अत्यंत सावधानी और गोपनियता के साथ यह चुनोती भरा संदेश
23:38नहुष तक पहुचाने का कार्य सौपा गया ताकि स्वर्ग में किसी को भी संदेह न हो
23:44वह गंधर्व दूद अपनी तीवरगती से स्वर्ग के राजसी मारगों से होते हुए नहुष के अब विनमर और साधारन निवास
23:52की ओर बढ़ा जो इंद्रलोग के भव्य महलों के विप्रीत एक शांत कोने में स्थित था
23:59नहुष अपने छोटे से कक्ष में अभी भी इंद्र बनने के दिवासवपनों में खोया हुआ था जब गंधर्व दूद ने
24:06शची का संदेश सुनाया जिससे उसके हरिदय में आशा और क्रोध दोनों की लहरें उठने लगी
24:14शची की शर्थ सुनकर नहुष का अहंकारी मन पहले तो भयंकर क्रोध से भर गया उसकी आखों में ज्वालासी धधक
24:21उठी पर शीघर ही उसने अपनी वासना और सत्ता की लालसा से प्रेरित होकर एक चालबाजी भरी मुस्कान बिखेरी
24:30अपने मन में नहुष ने इस अपमानजनक शर्थ को शची तक पहुँचने और पुनह इंद्र का सिनहासन हथियाने के एक
24:38गुप्ट मार्ग के रूप में देखा उसकी आखों में एक नई कप्टी आशा चमक उठी
24:45वासना और अहंकार से अंधा होकर नहुष ने इस घोर अपमान को स्विकार कर लिया यह विश्वास करते हुए कि
24:52वह इस शर्थ को पूरा करके न केवल शची को प्राप्त करेगा बल्कि अपनी खोई हुई सत्ता को भी वापस
24:59पालेगा
25:00यह असाधारन समाचार शीघ्र ही सब्तरिशियों तक पहुँचा जिन्होंने अपनी तपस्या और ज्यान के बलपर ब्रहमांड के सभी नियमों और
25:10कर्मों को गहराई से समझा था
25:13अपनी गहन अंतरग्रिश्की से सब्तरिशियों ने इस अजीबोगरीब अनुरोध के पीछे छिपी ब्रहमांडिय न्याय और नहुष के अहंकार का परिणाम
25:22समझ लिया
25:23और वे अपनी पवित्र गरिमा बनाए रखते हुए इस कार्य को करने के लिए सहमत हो गए
25:30स्वर्ग में एक भव्य परंतु प्रतीकात्मक रूप से भारी पाल की तैयार की गई जो नहुष के अभिमानी मन के
25:37बोज और उसके आगामी पतन का संकेत दे रही थी
25:41फिर अपने अदमय अहंकार और शची को प्राप्त करने की लालसा से प्रेरित होकर नहुष ने उस भव्य पाल की
25:49में कदम रखा
25:50जबकि सब्तरिशी अपने दिव्य कर्तव्य के लिए तैयार उसे उठाने के लिए एकत्रित हो चुके थे
25:58सब्तरिशी अपनी पवित्र गरिमा बनाये रखते हुए नहुष की भारी स्वर्णिम पाल की को अपने दिव्य कंधों पर उठा कर
26:05स्वर्ग के उज्रवल मार्ग पर बढ़ने लगे
26:08पाल की के भीतर बैठा नहुष कामवासना और तीवर अहंकार की अगनी में जल रहा था जिससे शची के महल
26:16पहुँचने के लिए उसका धैर्य समाप्थ होता जा रहा था
26:20छोटे कदवाले परम ज्यानी महर्शी अगस्त्य शांत भाव से अपने मंत्रों का जाप करते हुए नपेतुले और धीमे कदमों से
26:28आगे बढ़ रहे थे
26:31पालकी की धीमी गती को देखकर नहुष का क्रोध भड़क उठा और उसका विवेक उसकी अत्यधिक वासना के कारण पूरी
26:38तरह से नश्ट हो गया
26:41आमकार के मद में चूर नहुष ने पालकी के भीतर से चीखते हुए पवित्र रिशियों को अधिक तेजी से कदम
26:47बढ़ाने का कठोर आदेश दिया
26:51रिशियों ने नहुष के इस अनुचित और घमंडी व्यवहार को सहन करते हुए शान्ती से भगवान विश्नु का ध्यान किया
26:58और अपनी गती बनाये रखी
27:01आमकार के चरम सीमा पर पहुँच कर विवेखीन नहुष ने अपना पैर बाहर निकाला और महर्शी अगस्त्य की पीठ पर
27:09एक जोरदार लात मार दी
27:12लात मारते हुए नहुष ने अत्यंत अपमान जनक स्वर में चिल्ला कर कहा सर्प
27:17सर्प जिसका अर्थ था कि शीघ्र चलो एक सांप की तरह तेजी से रेंगते हुए आगे बढ़ो
27:25महर्शी अगस्त्य तुरंत रुप गए और उनके भीतर एक भीशन ब्रहमांडिय क्रोध की ज्वाला भड़क उठी जिससे संपून स्वर्गलो काम
27:34उठा
27:36सप्तरिशियों ने तुरंत उस स्वर्णिम पालकी को स्वर्ग के संगमर्मर के धरातल पर नीचे रख दिया और भैभीत होकर पीछे
27:43हट गए
27:45महर्शी अगस्त्य पूर्णत ह क्रोधित होकर नहुष की ओर मुड़े और उनकी आखों से भयंकर दिव्यागनी की लप्टे निकलने लगी
27:54महर्शी अगस्त्य ने अपने कमंडलू से जल की कुछ बून्दे उठाई और ब्रहमान्ड को कम्पा देने वाली स्वरधवनी में अपना
28:02भयानक श्राप व्यक्त किया
28:05महर्शी अगस्त्य ने श्राप दिया है अधर्मी राजा
28:09तूने रिशियों को सर्प कहकर अपमानित किया है
28:13इसलिए तु तुरंट स्वर्ग से गिरकर प्रिथवी पर एक विशालकाय अजगर सर्प बन जा
28:19श्राप मिलते ही नहुष का संचित पुन्य और उसका दिव्य इंद्रतेज एक ही क्षण में वाश्प बनकर नश्ठ हो गया
28:27काले दिव्य प्रकाश के एक भीशन धमाके के साथ नहुष का सुन्दर और विशाल राजा का शरीर एक विशाल भयानक
28:35सर्प में बदलने लगा
28:48नीचे गिरते समय नहुष का सारा घमंड चकनाचूर हो गया और वह अत्यंत कातर स्वर में महर्शी अगस्थ्य से क्षमा
28:56की भीख मांगने लगा
28:58नहुष के सच्चे पश्चाता आपको देखकर गयालू महर्शी अगस्थ्य ने श्राप की सीमा निर्धारित की की द्वापर युग में धर्मात्मा
29:06युधिष्ठिर द्वारा ही उसका उध्धार होगा
29:10देवराज इंद्र के पद की गरिमा पुनह बहाल होने पर स्वर्गलोक में देवताओं और शची ने राहत की सांसली और
29:18धर्म की जैजैकार की
29:20इधर प्रित्वी के घने जंगलों में वह विशाल का अए सर्प गिर पड़ा और वही स्वर्ग में नहुष के धर्म
29:27प्रायन पुत्र ययाती के नए युग का उदे हुआ
29:31दिव्य आभाक होते ही राजा नहुष विशाल अजगर के रूप में बदलते हुए स्वर्ग के सुनहरे मेगों को चीर कर
29:38प्रचंड वेग से नीचे गिरने लगा
29:41घमंड के चूरचूर होने के बाद नहुष का भारी नाग शरीर आंतरिक्ष के तूफानी बादलों और जलती उलकाओं के बीच
29:49तड़प रहा था
29:51देवलोग की सीमाओं को पार करते हुए वह अभिशप्त राजा अपनी पूर्व महानता को याद कर पश्चाताप के गहरे अंधकार
29:59में डूगने लगा
30:01जैसे जैसे वह पृत्वी के निकट आ रहा था उसकी सर्पिल काया कंकड पत्थरों और घने वायुमंडल के दबाव से
30:09चीतकार कर उठी
30:11अंतर राजा नहुष एक अत्यंत विशालकाय और भयानक सर्प के रूप में पृत्वी के अती प्राचीन और घने वन की
30:18कठोर भूमी पर आगिरा
30:21पृत्वी की मिट्टी पर गिरते ही उसकी सुनहरी आभा पूरी तरह समाप्थ हो गई और वह केवल एक विशाल असहाय
30:28अजगर बनकर रह गया
30:31अपनी इस दैनिय और कश्टकारी अवस्था को देख कर नहुष की आत्मा गहरे शोक और अपनी भूल के बोध से
30:39थर्थर कामपने लगी
30:41घने जंगलों की कांटों भरी जाडियों में रेंगते हुए उसे अपनी अहमकारपूर्ण जीवनशैली और रिशियों के अपमान का कड़वा फल
30:49समझा गया
30:52अत्यंत दुख और गलानी में डूब कर विशाल सर्क बने नहुष ने महर्शी अगस्त्य का ध्यान करते हुए एक शमा
30:58की भीख मांगनी शुरू की
31:00उसकी अश्रुपून और कातर पुकार सुनकर महर्शी अगस्त्य की दिव्यवानी आकाश्वानी बनकर उस सघन वन में गूंधुठी
31:10महर्शी अगस्त्य ने अपनी करुणा से नहुष को आश्वस्त किया कि उसका यह दंड अनंतकाल तक के लिए नहीं, बलकि
31:18एक निश्चित समय के लिए ही है
31:22रिशी की ओजस्वी वानी ने बताया कि द्वापर युग में जब धर्मराज युधिश्थिर का आगमन होगा, तब उनके सत्यवादी प्रशनों
31:30का उत्तर देकर ही उसकी मुक्ती होगी
31:33मुक्ती का यह पावन आश्वासन पाकर नहुष का अभिशप्त नागहरिदय शान्त हुआ और वह अपनी नियती को स्वीकार कर प्रतीक्षा
31:42करने लगा
31:43इधर स्वर्गलोक में देवराज इंद्र के पुनह अपने दिव्य सिनहासन पर आसीन होते ही समस्थ देवराज्यों में खुशियों की लहर
31:52दोड़ गई
31:53शची देवी और समस्थ देवताओं ने परमपिता ब्रह्मा और भगवान विश्नु की आरती उतार कर धर्म की विजय का शंकनाद
32:01किया
32:03प्रित्वी पर नहुश के धर्म प्रायन और महान पुत्र राजा ययाती ने अपने अतुलनिय न्याय और भक्ती से एक नए
32:10स्वर्णिम युग की शुरुवात की
32:13राजा ययाती ने अपने पिता के पतन से सीख लेते हुए सदैव रिशियों और गुरुओं के चर्णों में शीष जुका
32:20कर प्रजा का पालन किया
32:23ययाती के सत्य और न्यायनिष्ट शासन से दसों दिशाएं आलोकित हो उठीन और चंद्रवंश की प्रतिष्ठा पुनह संपूर्ण संसार में
32:31स्थापित हो गई
32:33इस प्रकार अहंकार का दुख़द अंत और नम्र धर्म का अमर उत्थान देखकर तीनों लोकों में भगवान विश्णो की महिमा
32:41का गुनगान होने लगा
32:43श्री हरी विष्णु के चरण कमलों में ध्यान लगाते हुए यह कथा हमें यह अमर सीख देती है कि धर्म
32:51ही जीवन की एक मात्र सच्ची विजय है
32:55पवित्र मंत्रों के उच्चारण के बीच महर्शियों और वेद पाठियों ने समराट ययाती के महाभिशेक के लिए सुवन वेदी को
33:02पवित्र नदियों के जल से अभिमंतरित किया
33:06राजकुमार ययाती ने पूर्ण नमर्ता और श्रद्धा के साथ गंगा और यमुना के पवित्र जल से स्नान करके राजसी संसकारों
33:14का प्रारंभ किया
33:17अगनेकुंड की प्रजवलित ज्वालाओं के समक्ष ययाती ने अपने कुल के देवताओं और पित्रों का स्मरण करते हुए राज्य की
33:24सुरक्षा का संकल्प लिया
33:27महर्शी वशिष्ठ और अन्यमहान रिशियों ने वेद मंत्रों के गूंचते स्वर के साथ ययाती का मस्तक चंदन और रोली से
33:35सुशोगित किया
33:37संपूल्न चंद्रवंश की मर्यादा का प्रतीक वह अलौकिक सुवर्ण मुकुट जैसे ही ययाती के शीश पर रखा गया
33:56की वर्षा होने लगी प्रजाजनों ने अपने नए धर्मनिष्ठ समराट के दर्शन कर चंद्रवंश के नए स्वर्णिन युग की घोशना
34:05का स्वागत सहर्श किया
34:07स्वर्ण लोक से देवगण भी नहुष के पतन के बाद ययाती के इस धर्ममय उत्थान को देखकर अत्यंत प्रसन्न और
34:15आश्वस्थ हुए
34:17न्याय और सत्य की रक्षा की प्रतिग्या लेते हुए समराट ययाती ने अपनी चम्चमाती राजसी खडग को अगनिदेव की साक्षी
34:25में धारण किया
34:27साक्षात देवी लक्षमी की क्रिपासे प्रतिष्थानपूर का पूरा राज्य अकूत धंधान्य, शान्ती और समरिध्धी से प्रदीथो उठा
34:36उसी क्षण गगन मंडल में श्री हरी विश्णू की चतुर्भुज अलोकिक आकृती प्रकट हुई, जिन्होंने समराट ययाती को अपना अक्षय
34:45आशिर्वात प्रदान किया
34:48नील कमल वर्ण वाले भगवान विश्णू के दर्शन पाकर सम्पूर्ण राज सभा भक्ती के परम आनंद में डूब कर नत्मस्तक
34:56हो गई
34:57समराट ययाती ने चंद्रवंश के सर्वोच सिंह सिंहासन पर विराजमान होकर सम्पूर्ण प्रित्वी पर सत्य और न्याय की स्थापना का
35:06श्रीगनेश किया
35:08राजा ययाती के शासन में सम्पूर्ण धर्ती पर न कोई दरिद्र रहा और नहीं कोई अधर्म का शिकार हर और
35:15केवल धर्म का ही बोलबाला था
35:18राज़ प्रसाद के उचे शिकरों पर फहराता चंद्रवंश का दिव्यधवज सत्य और नारायन भक्ती की अमर विजय का संदेश दे
35:26रहा था
35:28रिशियों और मुनियों ने समराट ययाती को दीरघायू और प्रजापालक होने का वर्दान देकर यग्य की पूर्णाहुती संपन्न की
35:37ययाती के इस महान वंश में आगे चलकर यदू और पुरू जैसे प्रतापी पुत्रों का जन्म होना नियत था जो
35:45भारतवर्ष के इतिहास को नई दिशा देने वाले थे
35:49समस्थ चंद्रवंश की मर्यादा पुनह स्थापित हो चुकी थी और नहुष के अहंकार का अंधकार मिटकर ययाती के धर्म का
35:57सूर्य पूर्ण प्रभा से चमकने लगा था
36:00यह पावन गाथा हमें सिखाती है कि पद और शक्ती अस्थाई हैं किन्तु धर्म और हरी भक्ती ही मनुष्य को
36:08अमर्ता प्रदान करती है
36:11आईए हम सब अत्यंत श्रद्धाभाव से श्री हरी विश्नु के श्री चर्णों में प्रणाम करें जिनकी क्रिपासे संसार में सदैव
36:19सत्य की विजय होती है
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