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विष्णु पुराण के इस अद्भुत एपिसोड में, हम चंद्रवंश के महान राजा पुरूरवा और स्वर्ग की अनुपम अप्सरा उर्वशी की अलौकिक प्रेम कहानी में डूब जाएंगे। राजा पुरूरवा, जिन्होंने अपने ज्ञान और पराक्रम से पृथ्वी पर न्याय का शासन स्थापित किया, उनका मिलन कैसे हुआ इंद्रलोक की सबसे सुंदर अप्सरा उर्वशी से? उनकी प्रेमगाथा में क्या थी वो अद्भुत शर्तें, और कैसे एक छोटी सी भूल ने उन्हें अनंत वियोग की ओर धकेला? जानिए उनके विरह और मिलन की पूरी कहानी, जिसमें प्रेम, त्याग और दिव्य हस्तक्षेप के कई पड़ाव हैं। यह कहानी न केवल एक प्रेम गाथा है, बल्कि यह मानवीय भावनाओं और ईश्वरीय विधानों के गहरे संबंध को भी दर्शाती है। देखें कैसे पुरूरवा ने अपने अथक प्रयास से अपने प्रेम को पुनः प्राप्त किया और चंद्रवंश की महिमा को आगे बढ़ाया। #VishnuPurana #PururavaUrvashi #Chandravamsha #LunarDynasty #MythologicalLoveStory #HinduMythology #EpicTales #VishnuPuran #PauranicKathayen #DivineLove #IndianMythology #AncientIndia #Urvashi #Pururava #HistoryOfIndia #SpiritualJourney #HindiStories #Puranas #VishnuSeries #SanatanDharma
Transcript
00:00सूर्य वंश की अलोकिक महिमा के पश्चात महर्शी अत्री के पवित्र अंश और चंदरदेव के दिव्यकुल से चंदरवंश का पावन
00:08प्राकट्य हुआ
00:09इसी महान वंश में समराट बुध और देवी इलाके पुत्र के रूप में तेजस्वी महाराजा पुरूर्वा का जन्म हुआ जो
00:17अतुल्यकांती और शौर्य से संपन्न थे
00:21महर्शियों और देवगुरु ब्रिहस्पती के दिव्य आशिरवाद से पुरूर्वा का भूलोक के चक्रवर्ती समराट के रूप में भव्य राज्याभिशेक संपन्न
00:30हुआ
00:31गंदा और यमुना के पवित्र संगम पर समराट पुरूर्वा ने अपनी समरिध राजधानी प्रतिष्ठानपूर की स्थापना की जो सौंदर्य और
00:40न्याय का केंद्र बनी
00:43अपनी राजधानी से पुरूर्वा ने धर्म और सत्य पर आधारित ऐसा न्यायप्रिय शासन स्थापित किया, जिससे सम्पून प्रित्वी पर शांती
00:52और सम्रिध्धी छा गई
00:54धर्म की रक्षा के लिए सम्राथ पुरूर्वा ने महान वैदिक यग्यों का अनुष्ठान किया, जिनकी पवित्र अगनी से देवगण भी
01:02अत्यंत त्रिप्थ हुए
01:04उनकी राजसभाग्यान, धर्म और शौर्य का अनुठा संगम थी, जहां महान रिशिमुनी और पराक्रमी योध्धा सम्राथ का मार्गदर्शन करते थे
01:14जब भी रिशियों के आश्रमों पर असुरों का संकट आता, पराक्रमी पुरूर्वा अपने दिव्यरत पर सवार होकर दुष्टों का सहार
01:23कर देते थे
01:25सम्राथ के शौर्य और तेज के भैसे दनुज और दानव प्रतिष्ठानपूर की सीमाओं की ओर देखने का साहस भी नहीं
01:32कर पाते थे
01:34पुरूर्वा के न्यायपूर्ण युग में प्रजाव्याधी, अकाल और कष्टों से मुक्थ होकर आनंद पूर्वक जीवन व्यतीत कर रही थी
01:43रिशिमुनि समराट पुरूर्वा के तपोबल और भक्ती भाव से प्रसन्न होकर उन्हें अजेता और अमर कीर्ती का बर्दान देते थे
01:53स्वर्गलोक में देवराज इंद्र भी समराट पुरूर्वा के धर्म प्रायन चरित्र और अतुल्निय रनकोशल की सराहना करते थे
02:02देवर्शी नारद ने इंद्र की सभा में पुरूर्वा के दिव्य स्वरूप महान उदारता और प्रित्वी पर उनके बढ़ते प्रभाव का
02:10गान किया
02:11समराट पुरूर्वा न केवल एक महान योद्धा थे बलकि भगवान श्री हरी विश्नु के अनन्य भक्त भी थे
02:20भगवान नारायन की असीम क्रिपा से पुरूर्वा का चंद्रवंश पृत्वी का सबसे प्रभावशाली और तेजस्वी राजकुल बन गया
02:29पुरूर्वा प्रतिदिन शस्त्रविद्या का अभियास करते जिससे उनकी धनुर्विद्या की प्रत्यंचा की टंकार से दिशाएं काम्प उठती थी
02:39प्रतिष्ठानपुर के विशाल महल, स्वर्ण के कलश और जग्मगाती गलिया चंद्रवंश के उदित होते वैभव की गाथा कह रहे थे
02:48प्रित्वी पर फैले उनके यश की चर्चा सुनकर स्वर्ग की अपसराय भी इस महान चक्रवर्ती राजा के दर्शन की अभिलाशा
02:56करने लगी
02:58चंद्रवंश का यह भव्य आरंभ भविश में होने वाले महान समराटो और महा भारत के धर्मयुद्ध की नीम रख रहा
03:05था
03:06परंतु नियती ने पुरूर्वा के लिए एक ऐसी अलौकिक प्रेमगाथा लिखी थी जो स्वर्ग और प्रित्वी के बीच अमर होने
03:14वाली थी
03:16स्वर्गलोग के दिव्य वैभव के मध्य देवराज इंद्र की सभा में अपसराओं की शिरोमनी उर्वशी अपने अनुपम सौंदर्य और अलौकिक
03:24आभा के साथ विराजमान थी
03:28उर्वशी का प्रत्येक निर्ट्य कदम स्वर्ग के देवताओं को मंत्रमुग्ध कर देता था और उनकी थिरकन से पूरे इंद्रलोक में
03:36आनंद की वर्शा होती थी
03:37सभा के उचे सिनहासन पर विराजमान देवराज इंद्रस्वया उर्वशी की कला और लालित्य को देखकर अत्यंत प्रसन्न और विस्मित थे
03:48किन्तु इस अनन्त वैभव और अमर्ता के बीच भी उर्वशी के भीतर प्रित्वी लोग के नश्वर और गेहन मानविय अनुभवों
03:56को जानने की एक गुप्ट अभिलाशा जागरित हो रही थी
04:01तभी एक दिव्य विधान के अनुसार उर्वशी को कुछ समय के लिए स्वर्गलोग का त्याग कर प्रित्वी लोग पर जाने
04:08का आदेश प्राप्थ हुआ
04:10इस नेती को स्विकार करते हुए उर्वशी ने भारी मन से किंटू उच्षुप्ता के साथ स्वर्ग की सीमाओं को पार
04:18किया
04:19बादलों के सघनपर्तों को चीरती हुई वह अनुपम सुन्दरी धीरे-धीरे मृत्यु लोग की ओर बढ़ने लगी जहां उसका जीवन
04:27सदा के लिए बदलने वाला था
04:30जैसे ही उर्वशी के चरण प्रित्वी के पावन धरातल पर पड़े वहां की प्रकृती हर्शित हो उठी और चारों और
04:38एक अलौकिक सुगंध फैल गई
04:41स्वर्ग की सुखसुविधाओ से दूर प्रित्वी की इस थंडी और आर्द्र हवा का स्पश उर्वशी के लिए सर्वता नया और
04:49विस्मयकारी था
04:51एक शांत नदी के तटपर रुखकर जब उसने जल में अपना प्रतिबिम्द देखा तो उसे आभास हुआ कि उसकी दिव्य
04:58आभा अब मानविय रूप में समाहित हो रही थी
05:02प्रित्वी के घने जंगलों में घूमते हुए वह यहां के व्रिक्षों और वन्य जीवों के बीच एक अग्भुत शांती का
05:10अनुभव करने लगी
05:12मरत्य लोग की सीमाओ में बंधने के कारण उसे पहली बार मानविय भावनाओ जैसे की कोमलता, भय और उचसुकता की
05:20अनुभूती हुई
05:22वन के हिरन और पक्षी भी उसकी इस अलौकिक आभा से प्रभावित होकर बिना किसी भय के उसके समीप आने
05:29लगे
05:31जब उर्वशी ने अपनी दिव्य शक्तियों से एक पुष्प को विक्सित करने का प्रयास किया, तो उसने पाया कि प्रिथवी
05:38पर उसकी शक्तिया कुछ सीमित हो गई थी
05:42इस विस्मयकारी अनुभूती ने उसे यह सिखाया कि प्रिथवी पर जीवन केवल अधिकारों से नहीं, बलकि प्रेम और त्याग के
05:50नियमों से चलता है
05:52उसी वन के दूसरी ओर, चंद्रवंश के प्रतापी राजा पुरूर्वा अपने सैनिकों के साथ आखेट पर निकले हुए थे
06:01तभी राजा पुरूर्वा के कानों में एक अत्यंत मधुर और अलौकिक ध्वनी सुनाई दी, जिसने उनके मन को चंचल कर
06:09दिया
06:10जिग्यासा से वशी भूत होकर, राजा अपने रत और सेना को पीछे छोड़कर उस ध्वनी के उद्गम की ओर अकेले
06:18ही चल पड़े
06:20घने पत्तों की ओट से जब राजा ने आगे देखा, तो उन्हें वहाँ एक दैविय प्रकाश पुंच के समान खड़ी
06:27उर्वशी दिखाई दी
06:29दोनों की द्रिष्टी जैसे ही एक दूसरे से मिली, वैसे ही स्वर्ग और प्रिथवी के इस दिव्य मिलन की अमर
06:36गाथा का प्रथम अध्याय प्रारंभ हो गया
06:40अपसरा उर्वशी के अलौकिक सौंदर्य को देखकर राजा पुरूर्वा मंत्र मुग्ध होकर स्तब्ध खड़े रह गए
06:47उर्वशी की द्रिष्टी जब राजा के तेजस्वी और पराक्रमी रूप पर पड़ी तो उसके स्वर्गिक हृदय में एक अभूत पूर्व
06:55स्पंदन हुआ
06:57शांत वन में सहसा मंद सुगंधित पवन बहने लगी जिसने दोनों के चारों और दिव्य पुष्पों की वर्षा कर दी
07:05राजा पुरूर्वा ने अत्यंत विनमर्ता और श्रद्धा के साथ एक कदम आगे बढ़ाते हुए अपनी बाणी का स्पर्ष उस मौन
07:13पर अंकित किया
07:15हे देवी आप कौन है जो इस साधारन पृत्वी को अपने सौंदर्य से स्वर्ग समान आलोकित कर रही है
07:24उर्वशी के अध्रों पर एक मंद मुस्कान उभी और उसकी कोमल वानी से जैसे वीना के मधुर स्वर जहरने लगे
07:33मैं देवराज इंद्र के दर्बार की नर्त की उर्वशी हूँ परंतु आपका यह अध्भुत पराक्रम और ओज मुझे आकर्शित कर
07:41रहा है
07:43राजा ने अपने भावों को व्यक्त करते हुए कहा कि उनका संपूर्ण राज्य और जीवन इस क्षण से आपकी सेवा
07:50में समर्पित है
07:53उर्वशी ने राजा के निश्चल प्रेम की उश्मा को महसूस किया परंतु उसके मन में स्वर्ग के नियमों का स्मरण
08:00भी कौन धा
08:02जैसे ही उर्वशी ने दो पग आगे बढ़ाए उसकी पायलों की रुण्जुन से पूरा वातावर्ण संगीत मैहो उठा
08:10पुरूर्वा ने आश्वासन दिया कि जब तक उनका बाहुबल जीवित है तब तक कोई भी चिन्ता या भय उनके मार्ग
08:18में नहीं आ सकता
08:20उर्वशी ने प्रकट किया कि वह स्वर्ग के अमर सौंदर्य से परे एक सच्चे और समर्पित मानविय प्रेन का अनुभव
08:27करना चाहती है
08:30तदोपरांत उर्वशी ने अपने संग रहने के लिए कुछ गुप्त और विशेश वचन राजा के समक्ष रखे
08:37राजा पुरूर्वा ने बिना किसी संकोच के उन सभी मर्यादाओं और वचनों को सहेश स्विकार करने की प्रतिग्याली
08:46दोनों के इस पावन संकल्प पर नभ में छिपे गंधर्वों और अपसराओं ने हर्शित होकर पुश्पवरिष्टी की
08:54जब पुरूर्वा का हाथ उर्वशी के कोमल करक्मल से मिला तो स्वर्ग और पृत्वी का एक अलोकिक सेतु निर्मित हो
09:01गया
09:03संपूर्ण प्रकृती इस महामिलन का उत्सव मनाने लगी, फिरन और पक्षी निर्भय होकर उनके समीप आ गए
09:11पुर्वशी ने राजा के विशुद्ध प्रेम को स्वीकार कर उनके साथ उनकी राजधानी प्रतिष्ठानपूर चलने की सहमती प्रदान की
09:20पुरूर्वा अत्यंत हर्ष और गौरव के साथ अपनी प्रिया को अपने स्वन जडित रत की ओर ले जाने लगे
09:28इस प्रकार चंद्रवंश के इतिहास में एक ऐसा दिव्य और अमर प्रेमध्याय प्रारंब हुआ जिसकी गाथा युगो युगो तक गाई
09:37जाएगी
09:39प्रतिष्ठानपूर के भव्य राजप्रासाद की सीमा में प्रवेश करते ही प्रकृती ने अपनी संपूर्ण सुन्दर्ता से इस अलौकिक युगल का
09:47स्वागत किया
09:48स्वर्ण मंदित रत से उतर कर महाराज पुरूर्वा ने अपनी अर्धांगिनी के रूप में उर्वशी का हाथ ठाम कर राजमहल
09:56के भीतर प्रवेश किया
09:58महल के एकांत और अत्यंत सुसज्जित कक्ष में पहुँच कर दोनों का मन एक दूसरे के सानिध्य से अत्यंत हर्शित
10:06हो उठा
10:07तभी उर्वशी ने राजा की ओर गंभीर और गंभीर मुद्रा में देखा और अपने साथ रहने के लिए कुछ अनिवार्य
10:15शर्ते रखने का निश्चय किया
10:18उर्वशी ने अपनी पहली शर्त रखते हुए कहा कि देवलोक से लाए गए उसके दो प्रिय भेड के बच्चों की
10:25सदैव रक्षा की जाएगी
10:27वे दोनों में शावक उर्वशी को अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय थे जिन्हें वह अपनी संतान की भानती सनेह
10:35करती थी
10:37उर्वशी ने स्पष्ट किया कि यदि इन दोनों में शावकों को कोई हानी पहुँची तो वह ततक्षन राजा का परित्याग
10:44कर देवलोक लोट जाएगी
10:47ततपश्चात उर्वशी ने अपनी दूसरी अत्यंत महत्वपूर्ण और कठिन शर्थ राजा के सम्मुख प्रस्तुत की
10:55उसने कहा कि महाराज पुरूर्वा कभी भी किसी भी परिस्थिती में उसके सम्मुख नगन रूप में नहीं आएंगे
11:03यदि राजा ने इस मर्यादा का उलंधन किया और वह उन्हें वस्त्रहीन अवस्था में देख लेगी तो उनका यह संबंध
11:11उसी क्षन समाप्थ हो जाएगा
11:14अंत में उर्वशी ने अपनी तीसरी शर्ट रखी कि वह प्रित्वी पर रहते हुए केवल शुद्ध गाय के घी का
11:21ही आहार ग्रहन करेगी
11:23उर्वशी ने कहा कि सामान्य मानवों का अन्न उसके लिए सर्वथा वर्जित होगा और वह केवल इस दिव्य हविश्य पर
11:31ही जीवित रहेगी
11:33महाराज पुरूर्वा जो उर्वशी के प्रेम में पूरी तरह समर्पित थे ने बिना किसी संकोच के इन सभी शर्टों को
11:41सहेश स्विकार कर लिया
11:44उन्होंने अपनी प्रिया को आश्वस्त किया कि उनके रहते हुए इन शर्टों का कभी भी कोई उलंगन नहीं हो सकेगा
11:52राजा ने चंद्रदेव और अपने पूर्वजों का स्मरण कर अपने इस महान और पवित्र वचन को सदा के लिए सुद्रिड
12:00कर दिया
12:01शर्टों के स्विकार होते ही उर्वशी के मन का भय दूर हो गया और उसने पुरूर्वा के साथ अपनी नई
12:08ग्रिहस्थी का आरंभ किया
12:11दोनों में शावकों के लिए राजकक्ष के भी तरही एक अत्यंत सुन्दर और सुरक्षित स्थान का निर्मान कराया गया
12:20उर्वशी के लिए प्रतिदिन उत्तम और शुद्ध स्वर्ण कल्षों में भर कर दिव्य गाय का घी मंगाया जाने लगा
12:27इस प्रकार एक मर्त्य राजा और एक अमर्त्य अपसरा का यह दिव्य प्रेम संबंध एक अभूत पूर्व और स्वर्णिं युग
12:35की ओर बढ़ चला
12:37चंद्रवंश के इतिहास में पुरूर्वा और उर्वशी का यह प्रेम अध्यायों में सदैव के लिए अमर होने के लिए तत्पर
12:45था
12:46समय के पहियों ने एक नई धुन छेड़ दी थी, जहां पुरूर्वा और उर्वशी का प्रेम हर सुभ सूर्य की
12:53प्रथम किरंसा उज्वल होकर खिलता था, हर पल गहरा होता चला जा रहा था
12:59उनके महल के हर कोने में प्रेम की सुगंध व्याप्त थी, हर स्पर्ष में एक अद्वितिय आनंद और हर ग्रिष्टी
13:06में शाश्वत समर्पन जलकता था, मानो स्वर्ग स्वयंधर्ती पर उतर आया हो
13:13यह प्रेम एक साधारण मानविय बंधन मात्र नहीं था, अपितु यह स्वर्ग और प्रित्वी के बीच बुना गया एक दिव्य
13:20सेतु था, जो हर बाधा को पार कर शाश्वत्ता की ओर अग्रसर था
13:26उनके प्रेम की आभा से अलकापुरी की भूमे धन्य हो गई थी, जहां प्रकृती भी उनके मिलन पर पुष्प वर्षा
13:33करती थी, और हर जीव में नवीन उर्जा का संचार होता था
13:39रात्री के गहन अंधकार में, वे एकांत में एक दूसरे की आखों में अनंत ब्रहमांड को निहारते, अपने सपनों और
13:47आकांख्शाओं को साज़ा करते, मानों दो आत्माई तारों में विलीन हो रही हो
13:53पुर्वशी ने स्वर्गिक सुखों और अपसराओं के जीवन को त्याग कर, मानविये जीवन की बारीकियों को सहचता से अपनाया, अपने
14:01प्रेम के लिए हर मर्यादा को स्विकारा, एक नई पहचान गड़ती हुई
14:07पुरुर्वा भी अपनी अमर प्रिया के लिए हर दिन स्वय को और भी योग्य सिद्ध करते, उनका प्रेम उनके शासन
14:14का आधार बन गया था, जो उन्हें न्याय और धर्म के मार्ग पर अडिग रखता था
14:20वर्ष बीटते गए और उनके राज्ज में समरिधी तथा शान्ती का एक अभूत पूर्व सामराज्य स्थापित हुआ, जो उनके अटूत
14:29प्रेम और न्याय पूर्ण शासन का ही जीवन्त प्रतिबिम्ब था
14:33एक दिन दोनों के हृद्यों में एक नए जीवन को अंकुरित करने की तीवर अभिलाशा जागी, एक संतान की प्रतीक्षा
14:41ने उनके प्रेम को एक नई गहरी दिशा प्रदान की
14:46उर्वशी ने अपनी पवित्रता और निश्था के साथ अपने पती के वंश को आगे बढ़ाने की कामना करते हुए देवताओं
14:54से संतान सुख का हार्दिक वर्दान मांगा
14:57उनकी सच्ची प्रार्थनाओं से स्वर्ग भी विचलित हुआ और स्वय देवों ने उनकी निश्था से प्रसन्न होकर उन्हें शीघरही तेजस्वी
15:06संतान प्राप्ती का आश्वासन दिया
15:10शीघरही उर्वशी के गर्भ में एक नया जीवन पल्वित होने लगा जिससे उनके महल में खुशियों की लहर दोड़ गई
15:18और उत्सव का वातावर्ण छा गया
15:21पुरूर्वा का हृदय आनन्द से भर गया उन्होंने अपनी रानी और आने वाले शिशु के लिए राज्य में विशेश उत्सवों,
15:29नृत्य संगीत और भव्य दावतों का आयोजन करवाया
15:33दिव्य अपसरा उर्वशी अब एक माता के रूप में एक अलौकिक तेज से दीप्थ हो रही थी, उनकी आभा में
15:41मात्रित्व का अनुपम सौंदर्य जलक रहा था
15:45शुभ महूर्त में उर्वशी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन दिया, जिसकी आभा सूर्य के समान प्रखर थी और जो
15:53उनके प्रेम का साक्षात प्रमान बनकर चंदर्वंश को शोभाय मान कर रहा था
15:58इस नवजात शिशु का नाम आयू रखा गया, जो चंदर्वंश की अगली कड़ी का पहला चमकता सितारा बनने वाला था
16:06एक ऐसे भविश्य का अग्रदूत जिसके गौरव की गाथाएं सदियों तक गाई जानी थी
16:12समय के साथ उन्हें आयू के अलावा शृतायू, सत्ययू, राय, विजय आदीकई और तेजस्वी पुत्रों का वर्दान मिला, जिन्होंने उनके
16:22परिवार को पूर्नता प्रदान की
16:25इस प्रकार एक दिव्य अपसरा और एक मर्त्य राजा का यह परिवार स्वर्गिक सौंदर्य और मानविय शक्ती का अध्भुत संगम
16:33बन गया था, जो इतिहास में एक अनोखी मिसाल कायम कर रहा था
16:39पुरूर्वा और उर्वशी अब केवल प्रेमी नहीं, अपितु एक सुखी परिवार के अभिभावक थे, जिनके चहरों पर मात्रित्व और पित्रित्व
16:48का अनुपम तेश, उनकी जीवन यात्रा की पूर्णता को दर्शाता था
16:53उनके प्रेम और संतान के सुख ने उनके शासनकाल को एक स्वर्णिम अध्याय बना दिया था, जहाँ धर्म, समरिध्धी और
17:02आनंद का अध्भुत मिश्रण उनके सामराज्य में सर्वत्र व्याप्त था
17:07इस प्रकार चंद्रवंश का यह गौरवशाली आरंभ हुआ, जहां एक मर्त्य राजा और एक अमर अपसरा के प्रेन ने एक
17:15ऐसे वंश की नीम रखी, जिसकी गाथाए ब्रहमांड के अंतिम ख्षणों तक गूंजती रहेंगी
17:22उर्वशी के स्वर्ग में अनुपस्थिती ने गंधर्वों को बेचैन कर दिया, क्योंकि उसकी दिव्य उपस्थिती के बिना स्वर्ग का संतुलन
17:30डग्मगाने लगा था
17:32वे देख रहे थे कि कैसे उर्वशी का हरिदय मर्त्य पुरूर्वा के प्रेम में बंध चुका था और स्वर्ग लोटने
17:39की उसकी इच्छा क्षीन हो चुकी थी
17:43गंधर्वों को भय था कि यदि उर्वशी स्वर्ग से दूर रही तो उनकी दिव्य सभाओं की शोभा और स्वर्गिक अनुष्थानों
17:51का गौरव कम पड़ जाएगा
17:53अंतह उनके सबसे धूर्थ सदस्यों में से एक अपनी आखों में एक कप्टी चमक लिए उन्हें अलग करने की एक
18:01गुप्त योजना प्रस्तुत करता है
18:04उसने बताया कि पुरूर्वा की एक गुप्त कमजोरी थी, वे उर्वशी की शर्तों के प्रती अत्यंत समवेदनशील थे, जिसका लाब
18:13उठाया जा सकता था
18:15योजना का केंद्रिय बिंदू उर्वशी के प्रिय भेड के बच्चे थे, जिनके प्रती पुरूर्वा की रक्षा की भावना बहुत गहरी
18:23थी
18:24अंधेरी रात की चादर ओड़कर गंधर्व चुपचाप स्वर्ग से उतरते हैं, जिनकी दिव्य आभाभी उनके कप्टी इरादों को छिपा नहीं
18:33पा रही थी
18:35धीरे धीरे पुरूर्वा के भव्य महल पर रात की चादर बिच गई, जहां शान्ती और प्रेम का सामराज्य सर्वत्र व्याप्त
18:43था
18:44पुरूर्वा और उर्वशी अपनी संतान के साथ गहरी नींद में सो रहे थे, उनके चहरे पर एक अनुपम शान्ती और
18:52संतोष ज़लक रहा था
18:55गंधर्व अत्यंत सावधानी से महल के पिछले हिस्से में स्थित भेड के बच्चों के बाड़े के करीब पहुँचते हैं
19:03बाड़े में मौजूद भेड के बच्चे अंजानी आहट से बेचैन होकर धीमी-धीमी मेमे की आवाजे निकालने लगते हैं
19:13पलक जपकते ही गंधर्वों ने भेड के बच्चों को उठा लिया और हवा में विलीन होते हुए तेजी से वहां
19:20से भागने लगे
19:22शोर सुनकर पुरूर्वा अपनी निद्रा से जाग जाते हैं उनके मन में एक अजीब सी बेचैनी उठती है
19:31जब उन्हें एसास हुआ कि उनके प्रिय भेड के बच्चों को चुराया जा रहा है तो उनका हृदय क्रोध और
19:38चिंता से भर उठा
19:40बिना एक पल भी गवाए और वस्त्रधारन करने का समय न पाकर पुरूर्वा नगन अवस्था में ही बाड़े की ओर
19:48दौर पड़ते हैं
19:49वह अंधेरी रात में चोरों का पीछा करते हैं उनका हर कदम उनके प्रिय जनों की रक्षा की तीवर इच्छा
19:57से प्रेरित था
19:59अचानक आस्मान में बिजली कौन्ध उठती है जिसने क्षण भर के लिए पूरी रात को दिन के प्रकाश में बदल
20:06दिया
20:08उसी क्षण पुर्वशी जो शोर सुनकर बाहर आई थी बिजली की चमक में पुरूर्वा को नगन अवस्था में देख लेती
20:16है
20:17उसक्षण उसके हरिदय में एक भयानक सत्य उजागर होता है कि उसकी एक महत्वपूर्ण शर्थ जिस पर उनका मिलन टिका
20:26था तूट चुकी थी
20:28इस दुखद अलगाव की पीड़ा उसके हरिदय में जड़ जमा लेती है जिसने उनके स्वर्गिय प्रेम की अमर गाथा पर
20:36एक काली चाया डाल दी
20:38उसके नयन अश्रू से भर उठे जैसे किसी स्वर्गिय सरोवर से दुखख की धारा फूट पड़ी हो और वह अपने
20:46प्रण की मर्यादा को पुनह स्थापित करने को विवश्थी
20:50इस अटूट प्रेम बंधन की डोर तूटते ही उसके ह्रिदय में स्वर्गलोक वापसी की अप्रिहार्य नेती का भार असहनी अहो
20:58उठा
21:00अपने प्रेम और कर्तव्य के मध्य फंसकर उर्वशी ने एक अंतिम मुक विलाप किया जो अनंत ब्रहमांड में गुंध उठा
21:09बिना कोई शब्द कहे एक भारी ह्रिदय के साथ उर्वशी ने स्वर्गलोक लोटने की अपनी यात्रा की तैयारी शुरू की
21:18तभी पुरूर्वा अपनी निद्रा से जागे और उर्वशी के प्रस्थान को भामप कर उन्हें रोकने के लिए व्याकुलता से पुकारे
21:27अपने प्रिय को इस तरह दुख में देख उर्वशी का हृदय विदीर्ण हो गया पर उसकी स्वर्गिय नेती उसे रुकने
21:34नहीं दे सकती थी
21:36एक चमक्ती हुई स्वर्णिन के रण में परिवर्तित होकर उर्वशी धीरे-धीरे उपर की ओर उठने लगी स्वर्ग के अनंत
21:44विस्तार में समाती हुई
21:47उर्वशी के अद्रिश्य होते ही पुरूर्वा का संसार पल भर में उजड़ गया और वह विश्वास नहीं कर पा रहे
21:54थे कि यह सत्य है
21:57एक असहनिय चीक उनके हरिदय की गहराईयों से निकली जिसने महल की दिवारों को भी थर्रा दिया उर्वशी
22:05व्याकुलता में वह महल के हर कोने में उन्हें खोजने लगे उनकी अनुपस्थिती की भयावह सक्चाई से बचने की असफल
22:13कोशिश करते हुए
22:15उनका विलाप सुनकर पूरा नगर थर्रा उठा जब राजा पुरूर्वा सडको पर भी अपनी प्रिय को खोजने निकल पड़े
22:24उनकी प्रजा अपने प्रिय राजा को इस दैनिय दशा में देख कर स्वय भी दुहक से भर गई उनके हृदय
22:31में पीडा की एक लेहर दोड़ गई
22:34महल और नगर की हर गली में निराशा मिलने पर वह गहन वनों में भटकने लगे हर पेड़ हर पत्थर
22:41से उर्वशी का नाम पुकारते हुए
22:44प्रत्येक हवा का जोंका और हर पत्तों की सरसराहट उसे उर्वशी के मधूर स्मृतियों की याद दिलाती जिससे उसका दर्द
22:53और भी गहरा होता चला गया
22:55न दिन का पता था न राद का वह बस एक उद्देश शहीन आत्मा की तरहे वनों में भटकता रहा
23:02अपनी प्रिया की एक जलक पाने की आशा में
23:07अपने दोहक को साजा करने के लिए उसने पक्षियों से बात की हवाओं से उनके बारे में पूछा मानो प्रकृती
23:14ही उसकी एक मात्र साथ ही हो
23:17उर्वशी के वियोग में उनका शरीर और आत्मा दोनों ही मुर्जाते जा रहे थे जैसे बिना जलके कोई कमल सूख
23:25जाता है
23:27अंतह उन्होंने देवताओं से प्रार्थना की अपनी प्रिय को वापस पाने के लिए या इस असहनिय पीडा से मुक्ती पाने
23:35के लिए
23:37किन्तु केवल वनों की चुप्पी ही उनकी प्रार्थना का जवाब थी एक ऐसी चुप्पी जो उर्वशी की अनुपस्थिती की भयाभता
23:45को और बढ़ा रही थी
23:47इस अदमय पीडा में डूब कर पुरूर्वा ने एक अन्तिन प्रतिज्याली या तो वह उर्वशी को स्वर्ग से वापस लाएंगे
23:55या इसी विरह अगनी में भस्म हो जाएंगे
23:57अपनी कठोर प्रतिज्या को हरिदय में धारण कर विरह में व्याकुल महाराज पुरूर्वा भटकते हुए अंत्य कुरुक्षेत्र की अति पवित्र
24:07भूमी पर पहुँचे
24:09वहां उन्होंने खिल्टे हुए नील कमलों और निर्मल जल से सुशोभित अन्यतह प्लक्षा नामक एक अलोकिक सरोवर देखा
24:18जल की जिल मिलाती तरंगों के बीच उन्हें जलक्रीडा करती हुई स्वर्ग की अत्यंत सुन्दर अपसराओं का एक समुह दिखाई
24:26दिया
24:39पुरुर्वा अश्रुपूरित नेत्रों से सरोवर के तटकी ओर दोडे और कातर स्वर में पुकारने लगे
24:46पुर्वशी ने अपने पती की वेदना भरी पुकार सुनी और उसका हरिदय काम उठा जब उसने तट पर खड़े अपने
24:54पार्थिव स्वामी को देखा
24:56अन्य अपसराओं की क्रीडा थम गई वे इस मर्त्य राजा और स्वर्ग की अपसरा के बीच के अगाध प्रेन को
25:04देखकर स्थब्ध रह गई
25:06पुरुर्वा ने हाथ जोड कर उर्वशी से पुनह राजधानी लोटने की याचना की और कहा कि उसके बिना उनका जीवन
25:14निरर्थक है
25:16उर्वशी धीरे-धीरे तटके निकट आई उसकी अलोकिक स्वर्ण कांती से सरोवर का जल और आसपास का वातावर्ण जग्मगा उठा
25:26उर्वशी ने शांत किंतु द्रिड स्वर में राजा को स्मरण कराया कि देवराज इंद्र के विधान और उनकी शर्त के
25:33तूटने के कारण यह वियोग हुआ है
25:37उसने समझाया कि स्वर्ग की देवांगना होने के नाते वह अब सदा के लिए मानव लोक में निवास नहीं कर
25:44सकती
25:45किंतु राजा के असहिकष्ट और अपार निश्ठा को देख कर उर्वशी का कोमल हृदय अगात करुना और शाश्वत प्रेम से
25:53भर गया
25:55उसने पुरूर्वा को एक महान सत्य बताया कि उसके गर्भ में उनके पवित्र प्रेम की वन्शसंतान फलफूल रही है
26:04उर्वशी ने राजा से प्रतिग्या की कि एक वर्ष की अवधी पूर्ण होने पर वह इसी पावन सरोवर तट पर
26:11पुनह उनसे मिलेगी
26:13उसने कहा कि उस भेंट के समय वह उनकी संतान को उन्हें सौंपेगी और एक रात्री का समय उनके साथ
26:21व्यतीत करेगी
26:23पुनर्मिलन के इस दिव्यवचन को सुनकर पुरूर्वा के अंधकार में और दुखी मन में आशा की एक नई किरन प्रजवलित
26:31हो उठी
26:32उर्वशी ने राजा से आग रह किया कि वे अपनी राजधानी लोटें और धर्म पूर्वक प्रजा का पालन करते हुए
26:40उस निश्चित समय की प्रतीक्षा करें
26:43धारी किन्तु आशावान हरिदय से महाराज पुरूर्वा ने अपनी स्वामिनी के इस निर्णय को नत्मस्तक होकर स्विकार किया
26:52धीरे धीरे उर्वशी और उसकी संगिनी अपसराएं जल से उठकर स्वर्णिन मेगों की भांती आकाश में अंतरध्यान हो गई
27:01यद्यपी वियोग का दुख अभी बाकी था पुरूर्वा शाश्वत प्रेम के वादे और चंद्रवंश के भविश्य की आस लेकर अपनी
27:09राजधानी की ओर लोट चले
27:12अपनी राजधानी प्रतिष्ठान पूर लोटने के बाद भी महाराज पुरूर्वा का चित्त राजकाज में न लगकर निरंतर उर्वशी के दिव्य
27:21स्मरण में ही लीन रहा
27:23पुर्वशी के बिना समस्त सुख सुविधाओं को व्यर्थ मान कर महाराज पुरूर्वा पुनावन की शांत भूमी में जाकर गंधर्वों का
27:31आहवान करने लगे
27:34पुरूर्वा के निश्चल प्रेम और कठोर तपन से द्रवित होकर आकाश मार्ग से अलोकिक कांती बिखेरते हुए दिव्य गंधर्व प्रकट
27:42हुए
27:43गंधर्वों ने राजा के अनन्य अनुराग को देख कर उन्हें एक पवित्र अगनिपात्र प्रदान किया और उसके अलोकिक महत्व का
27:51वर्नन किया
28:02गंधर्वों का आदेश पाकर राजा पुरूर्वा उस पावन अगनी पात्र को अत्यंत सावधानी पूर्वक अपनी राजधानी की ओर ले जाने
28:11लगे
28:12मार्ग में विश्राम हेतु राजा ने जब उस पात्र को रखा तो वह अलौकिक माया से एक अगवैत अश्वत्थ और
28:20शमी व्रिक्ष में परिवर्तित हो गया
28:22इस दिव्य संकेट को पहचान कर पूरूर्वा ने उन पवित्र व्रिक्षों से काष्ट लेकर दो अर्णी मंथंदंड निर्मित किये
28:31राज्ज में लोटकर महाराज ने योग्य रिशियों के मार्क गर्शन में एक विशाल एवं भव्य यग्यशाला की स्थापना करवाई
28:40वैदिक मंत्रों का सस्वर गान करते हुए राजा पुरूर्वा ने शमी और अश्वत्त की अर्णियों को परस्पर रगड कर अग्नी
28:48का मथन आरंभ किया
28:50मथन की तीवर प्रक्रिया से एक आएक एक दिव्य और देधी प्यमान अग्नी की ज्वाला प्रजवलित हो उठी जिसने संपूर्ण
28:58यग्यशाला को आलोकित कर दिया
29:02पुरूर्वा ने उस अग्नी को त्रेताग्नी के रूप में तीन पवित्र कुंडों में स्थापित कर शास्त्रोक्त विधी से आहुतिया देना
29:09प्रारंभ किया
29:11राजा की निश्चल भक्ती से त्रिप्थ होकर स्वय अग्निदेव प्रकट हुए और उन्होंने प्रित्वी पर त्रिधाग्नी की स्थापना के लिए
29:19पुरूर्वा को आशिर्वाद दिया
29:22प्रत्येक आहुती के साथ पुरूर्वा के नश्वर बंधन समाप्थ होने लगे और उनका शरीर एक अलौकिक तेज से दीप्थ होने
29:30लगा
29:31यग्य का पावन धूम्र गगन को भेदता हुआ सीधे गंधर्व लोक तक पहुँच गया जिसने मर्त्य लोक और देव लोक
29:39को एक सूत्र में बांध दिया
29:42अग्निहोत्र यग्य के पूर्ण होते ही राजा पुरूर्वा का नश्वर मानव शरीर पूर्णत है एक दिव्य गंधर्व के रूप में
29:49परिवर्तित हो गया
29:52स्वर्णिन मुकुट और नवप्राप्ट गंधर्व तेज से सुशोगित होकर पुरूर्वा एक परम तेजस्वी अमर पुरुष बन गये
30:01स्वर्गलोग के गंधर्वों ने महाराज पुरूर्वा का अपने लोग में पुश्पवरिष्टी और अलोकिक संगीत के साथ सहर्ष स्वागत किया
30:10गंधर्व लोग पहुचते ही उर्वशी ने अत्यन्त हर्ष अश्रूओं के साथ पुरूर्वा का स्वागत किया और उनका पुनर्मिलन सिद्ध हुआ
30:19बिना किसी शर्थ या वियोग के भयके दोनों दिव्य प्रेमी सर्वदा के लिए एक हो गये और उनका यह प्रेम
30:27चंद्रवंश की अमूल्य धरोहर बन गया
30:30गंधर्वराज विश्वावसु और देवगणों के आशीश से पुरूर्वा और उर्वशी का अलोकिक प्रेम संपूर्ण ब्रहमाड में अमर्ता के प्रतीक रूप
30:39में स्थापित हुआ
30:41भगवान विश्णू और ब्रहमाजी ने इस पवित्र पुनर्मिलन पर पुश्पवरिष्टी करते हुए उनके अमिट प्रेम को संसार के लिए आदर्श
30:50घोशित किया
30:52स्वर्गलोग की पावन भूमी पर पुरूर्वा और उर्वशी ने सन्युक्त रूप से अग्निहोत्र यग्य संपन्न कर प्रिथवी पर अपने पुत्रों
31:00के कल्यान की कामना की
31:03महाराज पुरूर्वा ने अपनी तपस्याका फल और चंदरवश की अलोकिक संप्रभुता अपने जेष्ठ पुत्र आयू के हाथों में सौंप दी
31:12पुरुर्वा के जेश्ट पुत्र राजकुमार आयू ने प्रतिष्थानपूर के भव्य राजसिनहासन पर विराजमान होकर चंदरवंश की कमान संभाली
31:22महर्शी अत्री और कुलगुरु वशिष्ठ ने वैदिक मंत्रो चार के साथ राजा आयू का राज्या भिशेक कर उन्हें अखंड सामराज्य
31:30का आशिरवाद दिया
31:33राजा आयू के धर्म प्रायन और न्याय प्रिय शासन में चंदरवंश का यश संपून आर्यावर्त में सूर्य की भांती चमकने
31:41लगा
31:42पुरूर्वा के अन्य पुत्र, अमावसु, विश्वावसु, शुरुतायू, सत्यायू और धीमान ने विभिन दिशाओं में जाकर नए समरिध राज्यों की स्थापना
31:52की
31:53राजकुमार अमावसु ने कानेकुब्ज सामराज्य की नीम रखी, जो भविश्य में महर्शी विश्वामित्र जैसे महान ब्रहमर्शी की जन्म भूमी बना
32:03राजा आयू और महारानी इंदुम्ती के ग्रिहांगण में परम प्रतापी पुत्र नहुष का जन्म हुआ, जो चंद्रवंश का गौरव बने
32:12राजकुमार नहुष ने बड़े होकर सौ अश्वमेध यग्यों का संकल्प लिया और अपनी वीर्ता से देवलोग तक अपनी धाक जमाई
32:22इंद्रलोग के देवताभी पृत्वी पर फलते फूलते चंद्रवंश की मर्यादा और पराक्रम को देखकर आश्चर यचकित रह गए
32:30नहुष के पुत्र प्रतापी ययाती के आगमन की पच्चाप ने चंद्रवंश को चारों दिशाओं में फैलाने का मार प्रशस्त किया
32:38पुरूर्वा द्वारा स्थापित त्रैतागने की पवित्रज्वाला चंद्रवंश के प्रत्येक राजप्रासाद में निरंतर प्रजवलित रहने लगी
32:48देवराज इंद्र की सभा में अपसराएं और गंधर्व पुरूर्वा और उर्वशी के अमर प्रेम के गीत गाकर वातावर्ण को गुझायमान
32:57करते रहे
32:59महर्शी नारद अपनी वीना पर नारायन नारायन का जाब करते हुए इस अलोकिक प्रेमगाथा का गान तीनों लोकों में करते
33:06रहे
33:08चंद्रवंश की यह पावन धारा प्रित्वी लोग पर शांती, समरिध्धी और सत्यसनातन धर्म की धोजा फहराती रही
33:16भगवान श्री हरी विष्णू ने चंद्रवंश को अपना भावी अवतार स्थल चुनकर इस वंश को परम पवित्रता का वर्दान प्रदान
33:24किया
33:26स्वर्गलोग से पुरूरवा और उर्वशी का अमिट प्रेम चांदनी बनकर अपने वंशजों पर निरंतर अपना वादसल्य बरसाता रहा
33:35इस प्रकार पुरूरवा और उर्वशी का यह दिव्य प्रेम चंद्रवंश के आरंभ की स्वर्णिन गाथा बनकर इतिहास के पन्नों में
33:43सदा के लिए अमर हो गया
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