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एपिसोड 15 में हमने देखा कि कैसे वैष्णवी माया जन्म लेते ही आत्मा की पिछली यादें मिटा देती है। लेकिन क्या होता है उस 'नए' जीवन में? 🤔 गरुड़ के विचलित कर देने वाले प्रश्न का उत्तर देते हुए, भगवान विष्णु इस एपिसोड में मानव जीवन के सबसे भयानक सच को उजागर करते हैं। 💔 जन्म के बाद आत्मा किस 'माया जाल' में फिर से फँस जाती है? शिशु की लाचारी से लेकर युवावस्था के मोह, बुढ़ापे की पीड़ा और अंत में मृत्यु के भय तक, हर पड़ाव पर आत्मा को क्यों झेलना पड़ता है इतना कष्ट? 💀✨ जानिए कैसे कर्मों का चक्रव्यूह और अज्ञानता का परदा आत्मा को बार-बार संसार सागर में डुबो देता है। क्या है इस भयानक बंधन से निकलने का एकमात्र मार्ग? इस रहस्यमयी सफर में जुड़िए और पाइए अपने सभी सवालों के जवाब! #गरुड़पुराण #GarudaPurana #संसारचक्र #Maya #Karma #पुनर्जन्म #आध्यात्मिकता #GarudPuran
Transcript
00:00वैश्नवी माया के विस्मेकारी रहस्य को आत्म साथ करते हुए गरुर के मन में गहन जिग्यासा और एक अजीब सी
00:07बेचैनी उभराई जो उन्हें ब्रहमांड के गूढ नियमों पर विचार करने पर विवश कर रही थी.
00:14उनकी आत्मा में एक तीक्षन प्रश्न उठ रहा था, जो जन्ममृत्यू के इस अंथीन चक्र के पीछे के वास्तविक अर्थ
00:22को जानना चाहता था, विशेशकर जब पुनर जन्म स्मृति हींता के साथ आता है.
00:29गरुर ने अपने दिव्यस्वामी की ओर सिर जुका कर पूछा की क्या नए जन्म का उद्देश केवल पूर्व जन्म के
00:36कष्टों को फिर से भोगना है.
00:38उनके स्वर में गर्भवास्था के भयानक अनुभवों और वैश्नवी माया द्वारा स्मृतियों के मिटाए जाने के बाद यह निराशा की
00:47गहरी छाया थी कि आत्मा को फिर उसी दुख और मोह के दलदल में धकेल दिया जाता है.
00:54गरुर ने विस्मय से पूछा कि यदि प्रत्येक जन्म में पिछली सीख मिटा दी जाती है तो आत्मा का वास्तविक
01:01विकास और मोक्ष की ओर उसकी यात्रा कैसे संभव होगी?
01:06उन्हें यह सब एक व्यर्थ और अंथीन दुष्चक्रसा प्रतीत हो रहा था, जहां एक ही मार्ग पर बार-बार ठोकरे
01:13खाने के सिवा कुछ नहीं मिलता.
01:16प्रभु विष्णु जिनकी आखों में ब्रहमांड का असीन ज्यान समाया था, गरुर की प्रतेक शंका को बड़े धैर्य और करुना
01:24के साथ सुन रहे थे, उनके शांत मुखमंडल पर एक अलौकिक सौमयता थी.
01:31भगवान विष्णु ने अपनी दिव्यद्रिष्टी गरुर पर स्थेर की, उनकी आखों में एक ऐसा गहन प्रकाश था जो सृष्टी के
01:38हर रहस्य को उजागर करने की तयारी कर रहा था.
01:43एक क्षण की शांती के बाद, ब्रहमांड के स्वामी ने अपनी वानी खोली, जो मधु के समान, मधुर और ज्ञान
01:50के प्रकाश से उतप्रोत थी.
01:53प्रभु ने समझाया कि यह पुनरजन्म का चक्र केवल कर्म के अटूट नियमों द्वारा संचालित होता है, जहां प्रत्येक क्रिया
02:01का फल अनिवार्य रूप से भुगतना पड़ता है.
02:05उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रत्येक नया जन्म कोई यादरिच्छिक घटना नहीं है, बलकि अचेतन मन में नहित पिछले कर्मों और
02:13वासनाओं का सीधा परिणाम है.
02:16विश्नु ने समझाया कि आत्मा के भीतर गहरी इच्छाये और अधूरे कर्म संचित होते हैं, जो उसे बार-बार प्रित्वी
02:24पर वापस लाते हैं ताकि वह उन्हें पूरा कर सके.
02:29उन्होंने समझाया कि प्रत्येक जीवन केवल कष्ट नहीं है, बलकि उन पूर्व कर्मों का समाधान करने और आध्यात्मिक उन्नती प्राप्त
02:38करने का एक अन्मोल अवसर भी है.
02:42वैश्नवी माया का यह परदा, जो पुरानी स्मृतियों को मिटा देता है, कोई दंड नहीं है, बलकि आत्मा के लिए
02:49एक स्वच्छ पट्टि का है, जिस पर वह नए सिरे से लिख सके.
02:54प्रभु ने बल दिया कि आत्मा का विकास और उसकी प्रक्ति-प्रत्येक अनुभव के माध्यम से होती है, चाहे वह
03:02प्रत्यक्ष याद में न हो, फिर भी उसके सार में समा जाती है.
03:07उन्होंने स्पष्ट किया कि सीखना केवल सचेत स्मृती पर निर्भर नहीं करता, बलकि जीवन के प्रवाह में नहित गहरे अंतरग्यान
03:15और विवेक के रूप में प्रकट होता है.
03:19विष्णू ने एक भव्य दिव्य योजना की ओर संकेत किया, जहां प्रत्यक्ष आत्मा अपने अद्वितिय पत्थ पर चलकर अंतह पर्मात्मा
03:28से जुर जाती है.
03:30गरुर के चहरे पर जहां पहले भ्रम था, अब धीरे-धीरे समझ की एक नई चमक उभर रही थी, जैसे
03:38अंधेरे के बाद भोर का प्रकाश फूटता है.
03:42उनके हृदय में उठने वाली प्रत्यक्षंका, अब भगवान विश्णु के ज्यानमय वचनों से शांत हो रही थी, और उनका मन
03:50गहन चिंतन में लीन हो रहा था.
03:53इस प्रकार भगवान विश्णु ने पुनर्जन्म के गूड रहस्य और उसके पीछे छिपी दिव्य बुद्धिमत्ता को गरूर के समक्ष उजागर
04:01किया, जिससे उनके सभी भ्रम दूर हो गए.
04:05पुनर्जन्म के गूड रहस्यों को उजागर करने के बाद, भगवान विश्णु ने अब उसक्षन की ओर ग्रिष्टी डाली जब नवजात
04:13आत्मा गर्भ के अंधकार से निकल कर पृत्वी के उज्रवल किन्तु कठोर संसार में प्रवेश करती है.
04:21जैसे ही गर्भ की सुरक्षित दुनिया तूटती है, शिशु का पहला स्पर्ष हवा की तीवर शितलता और प्रकाश की चकाचौंध
04:29से होता है, जिसके कारण उसकी छोटी सी देह में असहनिय पीडा उठती है और एक चीक फूट पड़ती है.
04:38जन्म के साथ ही आत्मा एक ऐसे शरीर में कैध हो जाती है, जो तुरंत भूख और प्यास की तीवर
04:45इच्छाओं से घिर जाता है, शारिरिक आवश्चक्ताओं के इस नए चक्र में फंस जाती है.
04:52गर्मी और सुरक्षा के गर्व से बाहर आते ही नवजात को तुरंत भाहरी दुनिया की कड़कडाती ठंड का सामना करना
05:00पड़ता है, जिससे उसकी नाजुक काया कामपने लगती है और असुरक्षा की पहली लहर उठती है.
05:07इस नई देह के प्रत्येक अंग में उत्पन होने वाली हर एक असुविधा, चाहे वह गीलेपन की हो या भोख
05:15की, शिशु को पूरी तरह से बाहरी देखभाल पर निर्भर कर देती है, जिससे उसकी लाचारी की गहरी नीम पड़ती
05:22है.
05:24और इस असीम लाचारी में, शिशु को पहली बार मा का कोमल स्पर्ष मिलता है, जो उसे ततकाल सुरक्षा और
05:32प्रेम की गर्माहट प्रदान करता है, मानो वह जीवन का पहला अम्रित हो.
05:38स्तनपान के माध्यम से, न केवल उसके शरीर को पोशन मिलता है, बलकि आत्मा और मा के बीच एक गहरा,
05:46अद्रिश्य बंधन भी स्थापित होता है, जो भविश्य के अंगिनत कर्मबंधों की पहली कड़ी बनता है.
05:53मा की स्नेहपूर्ण द्रिश्टी का सामना करते हुए, शिशु की आत्मा पहली बार बाहरी विश्व में अपनी पहचान खोजती है,
06:01और उसकी आखों में प्रेम तथा सुरक्षा की एक नई समझ झलकती है.
06:07जैसे ही शिशु मा की उंगली को कसकर पकड़ता है या उसके चहरे पर पहली अंगड मुस्कान खिलती है, ये
06:14छोटे-छोटे इशारे प्रेम और स्वीकृती के पहले सामाजिक बंधन को मजबूत करते हैं.
06:21शिशु की नींद जो उसे क्षणिक शांती प्रदान करती है, हमेशा अल्पकालिक होती है, क्योंकि शरीर की मूलभूत आवश्शक्ताएं उसे
06:30बार-बार जागरित कर देती हैं, और वह अपनी लाचारी को फिर से अनुभव करता है.
06:37और फिर से अपनी जरूरतों को व्यक्त करने का एक मात्र साधन उसका रुदन बन जाता है, एक तीवर पुकार
06:45जो उसके अस्तित्व की हर इच्छा को व्यक्त करती है.
06:49हर बार जब कोई देखभाल करने वाला उसकी पुकार पर प्रतिक्रिया करता है और उसकी जरूरते पूरी करता है, तो
06:57यह निर्भरता का चक्र और गहरा होता जाता है, जिससे बाहरी दुनिया के साथ उसका लगाव बढ़ता है.
07:06धीरे-धीरे, शिशु के अवचेतन मन में परिचित चहरों और आवाजों की एक धुन्धली पहचान उभरने लगती है, जो बाहरी
07:14दुनिया से उसके पहले बोधगमे संबंध का निर्मान करती है.
07:19यह नवजात शरीर अपनी निरंतर मांगो के साथ एक शाश्वत चक्र में फंस जाता है, भूख, नींद, आराम और प्रत्येक
07:28पूर्ती इस मायावी संसार में उसके बंधन को और भी मजबूत करती है.
07:34इस प्रकार बिना किसी सचेत जानकारी के आत्मा धीरे-धीरे अपनी पहचान को अपने मातापिता और आसपास के लोगों के
07:42साथ जोड लेती है, जिससे अद्रिश कर्मिक सूत्र बुने जाते हैं.
07:48और इस अज्ञानता में ही शिशु की आत्मा अपने शरीर को, अपने मातापिता को और अपने नए परिवेश को मेरा
07:56मान लेती है, जो अहंकार और स्वामित्व की पहली सीधी है.
08:02प्रत्येक्स पर्ष, प्रत्येक्शब्द और प्रत्येक्स नहपूर्ण देखभाल इस मेरे के भ्रम को और गहरा करती है, जिससे आत्मा इस भौतिक
08:11संसार के बंधनों में और कस्ती चली जाती है.
08:15इस प्रकार, जन्म के तुरंत बाद ही, शरीर की सरल आवशक्ताओं और मानवियस नह के माध्यम से, आत्मा अपने लिए
08:23इस संसारिक बंधन की पहली और सबसे मजबूत नीम रख देती है.
08:30भगवान विश्णों के इन गहन वचनों को सुनकर, गरुड के मन में इस नए जन्म के चक्र की अनिवार्यता और
08:37उसके पीछे छिपी माया की जटिलता पर गहरा चिंतन उमड पड़ा.
08:41यह क्षन नवजात आत्मा के जीवन के उस प्रारंभिक अध्याय को दर्शाता है, जहां भौतिक संसार की सुक्ष्म बेडिया अंजाने
08:50में ही कसने लगती हैं, और आत्मा कालचक्र के भयानक बंधन में फिर से फंस जाती है.
08:57जन्म लेते ही, नवजात आत्मा का पहला संपर्क मीठे दूध के स्वाद और मा के कोमल स्पर्श से होता है,
09:05जो उसे भौतिक सुक्ष की पहली अनुभूती कराता है.
09:10धीरे धीरे वह अपनी मा और परिवार के सदस्यों की आवाजों और चेहरों को पहचानने लगता है, जिस सिसने और
09:18जुडाव के प्राथमिक धागे बुनने लगते हैं.
09:22जैसे जैसे शरीर बढ़ता है, खेल के माध्यम से आत्मा दुनिया का अनुवेशन करती है, खिलोनों को छुकर, प्रंगों को
09:30देखकर और नई ध्वनिया सुनकर.
09:33फिर आता है वहक्षन जब कोई खिलोना मेरा बन जाता है, और यही से मैं और मेरा की भावना अहंकार
09:41की पहली चिंगारी को जन्न देती है.
09:44कोई छोटी सी उपलब्धी हासिल करने के बाद, बच्चा बड़ों की मुस्कान और प्रशंसा पाने के लिए उच्छ सुपता से
09:52देखता है, बाहरी स्वीकृती की इच्छा जगाता है.
09:57माता-पिता और बड़ों की नकल करते हुए, आत्मा धीरे-धीरे सामाजिक व्यवहार और जीवन के प्रतिमानों को सीखती है,
10:05जिससे उसकी पहचान और आकार लेती है.
10:09जब जीब को मिठास का अनुभव होता है, तो यह तुरंट आत्मा में उस सुख को दोहराने की प्रबल लालसा
10:16जगा देती है, जो फिर कभी शांत नहीं होती.
10:20लेकिन जब कोई इच्छा अधूरी रह जाती है, तो आत्मा निराशा और दुहक के तीवर दंश का अनुभव करती है,
10:28जो बंधन को और गहरा करता है.
10:32खेल-खेल में ही आत्मा दूसरों के साथ मित्रता के बंधन बनाती है, साजा खुशियों और अनुभवों से अपने सामाजिक
10:40तानेबाने को बुनती है.
10:43फिर भी इन मैत्री पूर्ण संबंधों में भी उत्कृष्टता प्राप्त करने और दूसरों से बहतर होने की सुक्ष्म प्रतिस्परधा अहंकार
10:52को पोशन देती है.
10:54कहानियों के माध्यम से बच्चे की कल्पना उडान भरती है, नायकों और खलनायकों की दुनिया रच्चती है, जहां इच्छाए और
11:03भै आकार लेते हैं.
11:06सही और गलत की अवधार नाय धीरे-धीरे स्थापित होती हैं, अक्सर पुरसकार या दंड से जुड़ी होती हैं, जो
11:13भविष्य के निर्णयों की दिशा तै करती हैं.
11:18बच्चा भविष्य की भूमिकाव, उपलब्धियों और संपत्ती के सपने देखना शुरू कर देता है, जो आगामी इच्छाओं के बीज बोते
11:26हैं.
11:28बढ़ते शरीर की इंद्रिय अनुभूतिया, भूख, प्यास, आराम, प्रमुक हो जाती हैं, जो निरंतर संतुष्टी की मांग करती हैं, और
11:37आत्मा को भौतिकता से बांधती हैं.
11:40प्रिय वस्तुए, उपहार और खिलोने आत्मा का ही विस्तार बन जाते हैं, और उनका खोना गहन दुहक का कारण बनता
11:48है.
11:50प्रत्येक इंद्रिय आत्मा के लिए एक वाहक बन जाती है, जो उसे भौतिक अनुभवों के जटे जाल में और गहराई
11:58तक खीचती चली जाती है.
12:01अनायास ही, असंख्य पूर्व जन्मों की अनजानी इच्छाए इस नए रूप में स्वयं को अभिव्यक्त करने लगती हैं, आत्मा को
12:09नेती के अद्रिश्य धागों से बांधती हैं.
12:13भगवान विश्णु अपने अनन्त ज्यान के साथ इस बाल लीला को शांत भाव से देख रहे हैं, जहां आत्मा की
12:21विस्मृती गहन होती जा रही है.
12:24गरुड इन सुक्ष्म बंधनों को समझ कर बालेकाल की अज्यानता में छिपे गंभीर सत्य पर विस्मय कर रहे हैं, उनके
12:32मुख पर गहन चिंतन और श्रद्धा का भाव है.
12:36इस प्रकार निर्दोश बालेकाल की हर सुखद अनुभूती और हर अनुभव आत्मा के चारों और माया के अग्रिश्य बंधनों को
12:45और कस्ता चला जाता है.
12:48जैसे ही बालेकाल का मृदुल आवर्ण हटने लगता है, एक नई प्रचंड उर्जा शरीर में हिलोरे लेने लगती है, जो
12:56आत्मा को एक अप्रिचित मार्ग पर धकेलती है.
13:00योवन का यह द्वार केवल शारिरिक परिवर्टनों का नहीं, अपितु इच्छाओं के एक भयंकर चक्रवात का भी है, जहां मन
13:08की दिशा अप्रत्याशित रूप से बदल जाती है.
13:13धीरे धीरे आत्मा बाहरी रूपरंग और भौतिक सौंदर्य की ओर आकर्शित होने लगती है, जो उसे एक नए मायावी बंधन
13:21में बांधने का प्रलोभन देती है.
13:25भगवान विश्नु अपने अनंत ज्यान के साथ इस मायावी खीच को शान्ति पूर्वक देख रहे हैं, जहां आत्मा की चेतना
13:33बाहरी संसार में विलीन होने लगती है.
13:37गरुड इस नई अवस्था के तीवर आकर्शन और उसके परिणामों पर विचार करते हुए, गेहन जिग्यासा और कुछ भई के
13:45साथ भगवान के शब्दों की प्रतीक्षा कर रहे हैं.
13:50तब मैं और मेरा का बीज अंकुरित होने लगता है, स्वार्थ और अहंकार की गहरी जड़े जमाता हुआ आत्मा को
13:57माया के दल्दल में और गहराई तक खींचता है.
14:02यह वह समय है, जब व्यक्ति बाहरी प्रशंसा और आकर्शन की तीवर चाह में खो जाता है, अपनी पहचान को
14:10दूसरों की आखों में तलाशने लगता है.
14:13प्रेन और वासना के जटिल धागे बुने जाते हैं, जो ह्रिदय को बांधते हुए तीवर भावनाओं के जवार में गोता
14:21लगाते हैं.
14:23महत्वा कामशा की अगनी धधक उठती है, व्यक्ति को सफलता और प्रसिद्धी की दौड में अंधाधुंध दौडाती है, सत्य और
14:32धर्म के पत से विचलित करती है.
14:35छोटी-छोटी विजय पर भी अहंकार का व्रिक्ष तेजी से बढ़ता है, जिसके फल माया के और भी गहरे बंधनों
14:42को मजबूत करते हैं.
14:45इंद्रियों के सुखों की अंधी दौड में, आत्मा क्षनिक आनंद के पीछे भागती है, अपनी वास्तविक शान्ती को भुला कर.
14:54आमकार और भौतिक लालसा से प्रेरित हर कर्म, चाहे वह शुब हो या अशुब, आत्मा पर कर्म का एक और
15:01सुक्ष्म आवर्ण चड़ा देता है.
15:05यह कर्म का संचय आत्मा को बार-बार जन्मम्रत्यू के चक्र में फसाता है, जिससे मुक्ती का मार्ग और भी
15:12धुन्धला हो जाता है.
15:15जीवन की इस भाग दौड में, आत्मा अपने शाश्वत स्वरूप को भूल कर स्वयं को केवल शरीर और मन तक
15:22ही सीमित कर लेती है.
15:36भगवान विश्नु समझाते हैं कि योवन की ये तीवर भावनाये और इच्छाये ही आत्मा को संसार के चक्र में बांधने
15:44वाली सबसे शक्तिशाली शक्तिया है.
15:48हर सुखद अनुभूती, हर उपलब्धी की चाहत आत्मा को एक भ्रमजाल में उलजाती जाती है, जहां वास्तवित्ता और कल्पना का
15:57भेद मिट जाता है.
16:00यह संसार की मोहक सुंदर्ता, जो आखों को भाती है, अन्ता आत्मा को उसके आध्यात्मिक मार्क से भठका कर संसारिक
16:08बंधनों में जकड देती है.
16:12जैसे एक नदी अनवरत समुद्र की ओर बहती है, वैसे ही आत्मा भी इच्छाओं और कर्मों की धारा में बहकर
16:19जन्ममर्ण के सागर में गोता लगाती रहती है
16:23इस प्रकार यवन के हर अनुभव, हर विकल्प, हर प्रबल इच्छा से आत्मा के चारों और माया के अद्रिश्य बंधनों
16:31की जन्जीरें और भी द्रिढ होती चली जाती है
16:35फिर विवाह के पवित्र बंधन में बंध कर आत्मा स्वय को एक नए गहन प्रेम और साथीत्व के धागों से
16:43बुन्ती पाती है
16:45इस ग्रिहस्थी में जब संतान का आगमन होता है तो आत्मा के भीतर एक अभूतपूर्व वातसल्य और सुरक्षा का भाव
16:53जागरित होता है जो उसे और भी गहराई से संसार से जोर देता है
17:00बच्चे के ननहे कदमों को सहारा देते हुए उसके हर सुख दुख में भागिदार बनते हुए आत्मा अपने स्वयन के
17:07अस्तित्व को उनके भविश्य से अभिन रूप से जुड़ा हुआ पाती है
17:13अपने प्रियजनों के लिए बहतर जीवन की कामना करते हुए आत्मा धन संपत्ती के संचय में लग जाती है जिससे
17:20भौतिक्ता की अद्रिश्य बेडिया और भी कस जाती है
17:25समाज में मान सम्मान और प्रतिष्ठा पाने की लालसा आत्मा को निरंतर प्रतिसपर्धा के मार्ग पर धकेलती है जहां बाहरी
17:33पहचान उसके आंतरिक शांती से अधिक महत्वपूर्ण लगने लगती है
17:39इन सभी बंधनों को आत्मा अपनी शाश्वत पहचान मान लेती है
17:44यह भूल जाती है कि संसार के सभी रिष्टे और उपलब्धिया क्षण भंगुर और परिवर्तनशील है
17:52फिर भी इन मोहक बंधनों के साथ ही प्रियजनों को खोने का डर और अरजित धन संपत्ती के नश्ट होने
17:59की चिंता आत्मा को भीतर ही भीतर विचलित करती रहती है
18:05जब बच्चे बड़े होकर अपने मार्ग पर चलते हैं तो आत्मा को बिचो का गर्द अनुभव होता है यह समझते
18:12हुए भी कि यह जीवन का स्वाभाविक चक्र है
18:16प्रेम और संबंधों से जुड़ी आशाये और अपेक्षाये जब पूरी नहीं होती तो आत्मा को निराशा और वेदना के कटू
18:24अनुभवों से गुजरना पड़ता है
18:27इन सुख़दुख आशानिराशा के हर अनुभव से आत्मा अंजाने ही नए कर्मों के बीजों को बोती रहती है जो उसके
18:36अगले जन्मों का निर्धारन करते हैं
18:39इन सांसारिक बंधनों के गहरे दलदल में फंसी आत्मा अपनी वास्तविक आध्यात्मिक प्रकृती को भूल जाती है और स्वयन को
18:48केवल शरीर और उसके रिष्टों तक सीमित मान लेती है
18:53आत्मा इन सभी परिस्थितियों पर अपना नियंत्रण मान कर अहंकार में डूब जाती है जबकि वास्तविक्ता में वह माया के
19:01ही हाथों की कठपुतली बनी रहती है
19:05भौतिक सुखों की चमक्दमक्ट शनभंगुर होती है जैसे ओसकी बूदे सूर्योदय पर अद्रिश्य हो जाती है परन्तु आत्मा उन्हें ही
19:14शाश्वत आनंद मानती रहती है
19:17एक इच्छा की पूर्ती होते ही दूसरी इच्छा का जन्म हो जाता है जिससे आत्मा कभी भी पूर्नतह संतुष्ट नहीं
19:25हो पाती और निरंतर पाने की दौड में लगी रहती है
19:30परिवार और समाज के प्रती कर्तवियों का बोज आत्मा को एक अद्रिश्य कारागार में कैद कर देता है जहां स्वतंत्रता
19:38का अर्थ केवल अपने बंधनों को निभाना रह जाता है
19:43मृत्यू का विचार आत्मा को भयभीत कर देता है क्योंकि यह उसके सभी प्रिय बंधनों और संचित वस्तों से आकस्मिक
19:51वियोग का प्रतीक है
19:54इस जन्ममृत्यू के चक्रवियों में आत्मा स्वय को बार-बार फसा हुआ पाती है पर फिर भी माया के गहन
20:01आवर्ण के कारण सत्य को पूर्णत है स्विकार नहीं कर पाती
20:06यही वह माया का अटल बंधन है गरुड जो आत्मा को अपने वास्तविक स्वरूप से दूर रखकर संसार के इस
20:13अंथीन नाटक में बांधे रखता है
20:17यह सुनकर गरुड का हृदय विस्मय और करुणा से भर गया उन्होंने समझा की कैसे प्रत्येक जीव अंजाने ही अपने
20:25ही कर्मों की जंजीरों में बंधा हुआ है
20:29इस प्रकार सांसारिक सुख दुख की अटूट दोर से बंधी आत्मा कर्मों के गहरे जाल में फसकर पुनर जन्ममर्ण के
20:37चकर में विलीन होने को ततपर रहती है
20:41पुनर जन्म के उपरांत माया के आवर्ण में लिप्टी आत्मा नए शरीर के साथ इस संसार में प्रवेश करती है
20:48आशाओं और आकांक्षाओं से परिपूर्ण किन्तु कालचक्र के अटल नियम से अनभिग्य रहती है
20:56युवावस्था के योवन और शक्ती में जीव संसार के आकर्शनों में डूब जाता है
21:01विद्या, धन और संबंधों के पीछे भागता हुआ, भविश्य के कश्टों से बेखबर रहता है
21:08किन्तु समय का सूक्षम प्रवाह धीरे-धीरे शरीर पर अपनी छाप छोड़ना आरंभ करता है
21:15केशों में श्वेत्ता, त्वचा पर जुर्या और उर्जा में कमी के रूप में
21:19फिर आता है वहक्षन, जब शरीर की पूर्व शक्ती और ग्रिड़ता धीरे-धीरे कशीन होने लगती है
21:27मांस्पेशिया शिथिल पढ़ जाती है और कदम दगमगाने लगते है
21:33द्रिष्टी मंद पढ़ने लगती है, संसार के रंग फीके पढ़ जाते है
21:38और सुनने की शक्ती भी कशीन होकर प्रिजनों की आवाजों को धुंधला कर देती है
21:45स्वाद का बोध कम हो जाता है, सुगंधों की पहचान धूमिल हो जाती है
21:50और स्पर्ष की समवेदन शीलता भी शरीर से दूर होने लगती है
21:55काल के साथ साथ अनेक व्याधिया शरीर को घेर लेती है
21:59जोडों में दर्द श्वास लेने में कठिनाई और अंगिनत पीडाएं उसे निरंतर सताती है
22:06एक समय जो शरीर शक्ती और सौन्दर्य का प्रतीक था
22:10वह अब पीडा और दुरबलता का घर बन जाता है
22:14अपनी ही इच्छाओं का दास
22:17इस शारिरिक गिरावट के साथ मानसिक लेश भी बढ़ता है
22:21अपनी अक्षमता पर क्रोध, दूसरों पर निर्भरता का अपमान और बीते हुए दिनों की कसक
22:28प्रियजन, मित्र और संबंधी एक एक करके संसार छोड जाते हैं
22:33जिससे एकाकीपन की गहरी खाई और भी चोड़ी होती जाती है
22:38एक समय की कीर्ती, पद और गौरव की गाथाए मात्र धुंधली स्मृतिया बनकर रह जाती हैं
22:45वर्तमान में उनका कोई मूल्य नहीं रह जाता
22:49यह संसार की क्षन भंगुरता का कटू सत्य है
22:52गरुर्द जहां सब कुछ समय के साथ धूल में मिल जाता है
22:56और आत्मा फिर भी मोह में लिप्त रहती है
23:01अपने ही अस्तित्व की सीमाई स्पष्ट होने लगती है
23:04शरीर की हर कमजोरी यह बोध कराती है कि मृत्यू निकट है
23:08फिर भी जीव उससे विमुख रहता है
23:12जीवन के इस अंतिम पड़ाव पर भी
23:15आत्मा संसार के क्षनिक सुखों और भौतिक पदार्थों से अपना मोह नहीं छोड़ पाती
23:22वृद्धावस्था में भी मन अतीत की महिमा और युवावस्था के सुखों की ओर लालायत रहता है
23:28वर्तमान की कटु सक्चायों से भागता हुआ
23:32शरीर की हर कोशिका में पीड़ा व्याप्त होती है
23:35फिर भी आत्मा मृत्यू के भय से कापती रहती है
23:39और इस बंधन से मुक्ती का मार्ग नहीं खोच पाती
23:43मौ की यह काली छाया जीव को इतनी जकड लेती है
23:47कि वह अपने वास्तविक स्वरूप और अमर्ता को भूल कर केवल शरीर के कश्टों से जुड़ा रहता है
23:55अज्यानता का अंधकार उसकी चेतना को घेरे रखता है
23:58जिससे वह बार-बार जन्ममर्ण के इसी भयानक चक्र में फंसने को विवश होता है
24:05यह है कालचक्र का भयानक बंधन गरुड जहां जन्म लेते ही आत्मा को फिर से इसी मायावी संसार के कश्टों
24:13और बंधनों में उलजना पड़ता है
24:17केवल ज्यान और वैराग्य से ही आत्मा इस शाश्वत बंधन से मुक्थ होकर अपने वास्तविक दिव्यस्वरूप को प्राप्त कर सकती
24:25है
24:26परंतु हे गरुड यह जानों की ज्यान और वैराग्य से परे एक ऐसा क्षण भी आता है जब आत्मा को
24:34फिर से शरीर छोड़ने की भयानक पीड़ा से गुजरना पड़ता है
24:39यह वहक्षण है जब जीवन की डोर पतली होकर तूटती है और आत्मा को मृत्यू की काली छाया घेर लेती
24:47है जिससे एक अज्यात भय मन में घर कर जाता है
24:52यद्यपी उसने पहले भी मृत्यू का अनुभव किया है परंतु अज्यानता के परदे के कारण उसे वह सब विस्मृत हो
24:59चुका है और अब यह अन्थ फिर से नया और भयावा प्रतीत होता है
25:05अंदरूनी बेचैनी उसे घेर लेती है शरीर के हर अनों में जीवन से चिपके रहने की तीवर इच्छा जागरित होती
25:13है
25:14उसके सामने जीवन की सारी यादें एक शनभंगुर स्वपन की तरह कौन्ध उठती है बच्पन के खेल से लेकर व्रिधावस्था
25:23के एकांध तक
25:25शरीर के अंग शिथिल पढ़ने लगते हैं इंद्रिया अपनी शक्तिक होने लगती हैं और संसार का रंग फीका पढ़ने लगता
25:33है
25:34शब्द सुनाई देना बंध हो जाते हैं द्रिष्टी धुंधली हो जाती है और स्पर्ष का अनुभव मिटने लगता है मानो
25:42आत्मा एक गहरे कुए में गिर रही हो
25:46वह आंतरिक रूप से एक तूफान का सामना करती है अपने अस्तित्व को बचाने की आखिरी कोशिश में संधर्ष करती
25:54हुई
25:55प्रेजनों का मोह उसे जकड लेता है उन्हें छोड़ कर जाने का विचार एक गहरी असहनिय वेदना उत्पन करता है
26:04अपनी संपत्ती अपने संचित धन को पीछे छोड़ने की चिन्ता एक बोज बन जाती है जिसे वह अंत तक धोती
26:12रहती है
26:14सांसे धीमी होती जाती है फ्रिदय की धड़कन मंद पढ़ने लगती है और जीवन की अंतिन ज्वाला टिम्टिमाते दीपक की
26:22भाती बुझने को होती है
26:25जब प्रान देह से छूटते हैं तो ऐसा लगता है जैसे एक धागा तूट गया हो और आत्मा शरीर के
26:33बंधन से मुक्थ होकर उपर उठने लगती है
26:37वह उपर उठकर अपने मृत शरीर को देखती है जो अब केवल एक निर्जीव आवर्ण मात्र है उसके सभी प्रेम
26:45और दुहक से विहीं
26:47चारों और एक अध्भुत शान्ती चा जाती है परंतु आत्मा के भीतर एक अजीब सी घबराहट और अनिश्चित्ता व्याप्थ होती
26:55है
26:57संसार के सभी शोरगुल और व्यस्तता से दूर वह स्वयां को अकेला और असहाय पाती है एक नए मार्ग पर
27:05अनायास ही अग्रसर होती हुई
27:08उसे यह ज्यान नहीं होता कि वह कहा जा रही है या उसका अगला पड़ाव क्या होगा केवल एक अन्थीन
27:15यात्रा का आभास होता है
27:18भय की गहरी जड़े उसके अंतरतम में समा जाती हैं भविश्य के अध्यात रहस्यों के प्रती एक तीवर चिंता जगाती
27:26हैं
27:28यमदूतों की छाया उसे डराने लगती है जो उसे उसके कर्मों के हिसाब से आगे के मार्ग पर ले जाने
27:35के लिए प्रतीक्षारत हैं
27:38उसके सामने जीवन भर के सभी कर्मों का लेखा जोखा एक अद्रिश्य पट पर प्रकट होता है अच्छाई और बुराई
27:46दोनों सपष्ट रूप से दिखाई देती हैं
27:49और इस तरह मृत्यू के कडवे अनुभव के बाद आत्मा को फिर से कालचक्र के अधीन होकर एक नए गर्भ
27:57में प्रवेश करने की तैयारी करनी पड़ती है
28:01हे नारायन मृत्यू के भयानक कष्ट को भोगने के बाद भी यह जीवात्मा पुनह संसार के दुखों की ओर क्यों
28:08खिंची चली जाती है गरुड ने अत्यंत विस्मय से पूछा
28:13भगवान विश्णु ने मंद मुस्कान के साथ अपने परमधाम वैकुंट से उत्तर दिया कि यह जीव का अज्यान और अधूरी
28:21वासनाओं का जाल है जो उसे बार-बार धर्ती पर खींच लाता है
28:26जब तक मनुष्य के भीतर भौतिक सुखों की सुक्ष्म इच्छाएं यानी वासनाएं जीवित रहती हैं तब तक उसका सुक्ष्म शरीर
28:35कभी शांत नहीं हो पाता
28:38मृत्यू के अंतिन ख्षणों में भी मनुष्य इश्वर का स्मरण करने के बजाए अपनी संपत्ती, परिवार और सांसारिक बंधनों में
28:46ही अपनी चेतना को उलजाए रखता है
28:49ये अंसुल जी इच्छाएं और गहरे मोह के अद्रिश्य धागे मृत आत्मा को चुम्बक की भांती फिर से उसी मर्त्य
28:57लोग की ओर खींचने लगते हैं जहां उसके कर्म अधूरे रह गए थे
29:02इस प्रकार यह काल चक्र जिसे हम संसार चक्र कहते हैं वासनाओं और कर्मों के इंधन से निरंतर और निर्दैता
29:11पूर्वक घूमता रहता है
29:14गरुर ने अत्यंत श्रद्धा और कौतुहल से भगवान हरी के इस रहस्य में ज्ञान को सुना जो जीवन और मृत्यू
29:21के शाश्वत सत्य को उजागर कर रहा था
29:25जैसे ही जीवात्मा नए जन्म के लिए आगे बढ़ती है माया देवी का सम्मोहक आवर्ण उस पर ऐसा परदा डाल
29:33देता है कि वह पिछले जन्मों के सारे कश्ट भूल जाती है
29:38अहमकार और मै की भावना एक सुनहरे किन्तु भ्रामक दर्पन की तरह प्रकट होती है जो आत्मा को यह विश्वास
29:45दिलाती है कि वह परमाक्मा से प्रिथक एक स्वतंत्र जीव है
29:51आत्मा के संचित कर्म रंग बिरंगे दहकते अंगारों की तरह उसके चारों और तैरते हैं जो उसके आने वाले जीवन
29:59के सुख और दुख का निर्धारन करते हैं
30:03ये कर्म ही एक ऐसी गुप्त उर्जा तरंग का निर्मान करते हैं, जो आत्मा को उसके अनुकूल मातापिता के गर्भ
30:11की ओर आकर्शित करती है
30:14वह अत्रिप्ट आत्मा अपने रोते हुए परिजनों को देख कर उनसे बात करने का निरर्थक प्रयास करती है, किन्तु भौतिक
30:22शरीर के बिना उसकी आवास कोई सुन नहीं पाता
30:26इंद्रियों के सुख भोगने की तीवर लालसा यानी तृष्णा आत्मा को एक नए भौतिक शरीर को धारन करने के लिए
30:33विवश कर देती है
30:36कालचकर का यह विशाल और भयंकर पहिया, जिसके आरे जन्म, वृध्धी, शय और मृत्यू से बने हैं, समस्थ सृष्टी के
30:44जीवों को निरंतर पीस्ता रहता है
30:48श्री हरी ने समझाया कि यदि कोई पुन्यात्मा स्वर्ग के सुख भी प्राप्त कर ले, तो भी पुन्य समाप्त होते
30:55ही उसे पुन्ह मृत्यू लोक में वापस आना ही पड़ता है
30:59अपने पुन्यों के क्षीन होने पर, वह जीवात्मा एक तूटते हुए तारे की भांती स्वर्ग के दिव्य लोकों से नीचे
31:07गिरती है और पुन्ह पृत्वी की ओर बढ़ती है
31:11पृत्वी पर आकर वह आत्मा वर्षा की बूंदों के माध्यम से अन्द में प्रवेश करती है जिसे भावी पिताद्वारा ग्रेहें
31:19किया जाता है
31:21और इस प्रकार अन्य के रस से निर्मित होकर वह सुक्ष्म प्राण पिता के माध्यम से माता के गर्भ में
31:28पुना प्रविष्ठ होकर एक नए जीवन की यात्रा आरंभ करता है
31:34भगवान विष्णू ने स्पष्ट किया कि केवल पूर्ण वैराग्य, निश्काम कर्म और अनन्य भक्ती ही जीवात्मा को कालचक्र के इस
31:42भयानक बंधन से मुक्ती दिला सकते हैं
31:46प्रभू के इन परम कल्यानकारी वचनों को सुनकर गरूर का हृदय भक्ती रस से भर गया और उन्होंने ब्रहमांड के
31:54इस शाश्वत विधान को नमन किया
31:57प्रभू के दिव्य उपदेशों से पूर्ण गरूर का हृदय अब गहन शांती और विस्मय से भरा था
32:03फिर भी उनके मन में एक गूर प्रशन शेश था कि क्यों आत्मा बार-बार इस बंधन में फसती है
32:11गरूर ने विनम्रता पूर्वक पूछा हे त्रिलो की नाथ यदि आत्मा अविनाशी और दिव्य है तो यह क्यों बार-बार
32:18इस भौतिक संसार के भ्रमजाल में उलज जाती है
32:23भगवान विश्णू ने गरूर की जिग्यासा पर मंद मुस्कान बिखेरी क्योंकि वे जानते थे कि अब परम सत्य का अनावरण
32:31करने का क्षणा गया है
32:34प्रभू ने अपनी दिव्यवानी में उत्तर दिया हे गरूर इस भ्रमजाल का मूल कारण अविद्या है जो एक विशालकाय मायावी
32:42परदा है जो सत्य को छिपाता है
32:46यह अविद्या ही वह शक्ती है जो आत्मा को उसकी वास्तविक, शुद्ध और आनंदमय प्रकृती को भूला देती है
32:55अविद्या के प्रभाव में आकर आत्मा अपने शाश्वत स्वरूप को भूल कर इस क्षणभंगुर शरीर और मन को ही अपना
33:03वास्तविक अस्तित्व मान लेती है
33:06यह भ्रम ही मैं और मेरा की भावना को जन्म देता है जिससे जीवात्मा स्वयं को भ्रहमान से अलग एक
33:13स्वतंत्र इकाई समझने लगती है
33:17इस अलगाव के भ्रम से ग्रस्थ होकर वह भौतिक जगत की क्षणिक सुख सुविधाव और वास्नाओं के पीछे अन्थीन दौड
33:25में लग जाती है
33:27प्रत्येक इच्छा की पूर्ती अस्थाई सुख देती है जिसके बाद शीघ्र ही नई इच्छाए उत्पन हो जाती है जो कभी
33:35न समाप्थ होने वाले चक्र को जन्म देती है
33:40यही अविध्या का माया जाल है जो आत्मा को जन्मम्रत्यु के इस भीषन भवसागर में बार-बार गोते लगाने को
33:47विवश करता है
33:50गरुर ने ध्यानपूर्वक सुना उनके मुख पर अब गेहन चिंतन और आश्चर्य के भाव स्पष्ट जलक रहे थे
33:58भगवान विश्णू ने आगे समझाया यह अज्ञानता ही कर्मों के बंधन उत्पन करती है जो जीवात्मा को नए शरीरों में
34:06प्रवेश करने पर मजबूर करते हैं
34:10प्रत्येक जन्म के साथ अविद्या की पकड और गहरी होती जाती है जिससे सत्य का बोध और भी कठिन हो
34:17जाता है
34:19किन्तु यह जानकर प्रसन्न हो कि अविद्या कोई स्थाई बंधन नहीं है बलकि एक भ्रम है जिसे ज्यान से भेदा
34:27जा सकता है
34:29सच्चा ज्यान ही वह अगनी है जो अविद्या के पर्दे को जलाकर आत्मा के वास्तविक स्वरूप को उजागर करती है
34:38गरुर के नेत्रों में आशा की एक नई किरण जगी उन्होंने प्रभु के वचनों को अपने हृदय में आत्म साथ
34:46किया
34:47प्रभु ने आगे बताया कि आत्म मंथन, गुरु की शिक्षा और अन्वरत ध्यान ही इस अविद्या के जाल को भेदने
34:54के मार्ग है
34:56जब अविद्या का पर्दा पूरी तरह हट जाता है तब जीवात्मा अपनी एकता को परमात्मा के साथ अनुभव करती है
35:06यह वहक्षन होता है जब आत्मा जन्मम्रित्यु के चक्र से मुक्ठ होकर परमानंद और मोक्ष को प्राप्ट करती है
35:15गरुर ने अपने स्वामी के इन वचनों को परम सत्य के रूप में स्विकार किया और ब्रहमांड के इस गूढ
35:22रहस्य को नमन किया
35:24विष्णु ने गरुर की श्रद्धा को देख कर एक गहन सत्य को उजागर करना प्रारंभ किया जो सभी जीवात्माओं के
35:32लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था
35:35उन्होंने समझाया कि इस अनंत ब्रहमांड में 84 लाख योनियों के चक्र में मनुष्य योनी प्राप्त करना एक अत्यंत दुलब
35:43सौभाग्य है
35:46कीट, पशु, पक्षी और व्रिक्षों के जीवन में चेतना तो होती है परन्तु आत्मज्यान की वैसी क्षम्ता नहीं होती जैसी
35:54मानव में नहित है
35:56यह केवल मनुष्य ही है जिसे विवेक, बुद्धी और प्रश्न करने की अद्वितिय शक्ती प्राप्त है ताकि वह स्वयन को
36:04और इस स्रिष्टी के रहसियों को समझ सके
36:08मानव शरीर ही वह सेतु है जिसके माध्यम से आत्मा संसार के बंधन से मुक्थ होकर परम मोक्ष की और
36:15अग्रसर हो सकती है
36:18परंतु इस बहुमूल्य अवसर को अज्ञानता और मोह में फंसकर व्यर्थ कर देना जन्मुमृत्यू के भयावः चक्र में फिर से
36:26फंसने के समान है
36:29जो आत्माए इस मानव देह के महत्व को नहीं समझती और अधर्म में लीन रहती है वे पुना निम्न योनियों
36:37में भटकने को विवश हो जाती है
36:40मुक्ती का मार्ग धर्म प्रायन जीवन में नहित है जहां प्रत्येक कर्म, विचार और वचन सत्य तथा न्याय के सिधानतों
36:48पर आधारित होता है
36:51सतकर्म, सेवाभाव और निस्वार्थ प्रेन ही वहपत है
36:55जो आत्मा को माया के भ्रम से निकाल कर परमात्मा के सानिध्य तत ले जाता है
37:01प्रत्ये प्राणी अपने कर्मों के फल्स्वरूप ही विभिनन nagyonियों में जन्म लेता है
37:07और यह मानव जीवन ही है
37:09जहां कर्मों का संचय और क्षय दोनों संभव हैं
37:14इसलिए इस नश्वर शरीर के रहते हुए ही आत्मा को जागरित कर परमार्थ की और उन्मुक होना परम आवश्चक है
37:21क्योंकि समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता
37:25गरुर ने भगवान विश्णु के इन गंभीर वचनों को हृदय से धारन किया और मानव जन्म की अलोकिक महत्ता को
37:33गहराई से समझा
37:35उन्होंने आगे कहा कि स्वयं को जानना ही सबसे बड़ा ज्यान है और यही वह ज्यान है जो जन्म और
37:42मृत्यु के चक्र को भेदने की कुंजी प्रदान करता है
37:46यह मानव जीवन भवसागर को पार करने वाली एक दुरलब नौका के समान है जिसे विवेक और धर्म की पत्वार
37:54से सही दिशा में चलाना चाहिए
37:57माया के अंगिनत प्रलोभन और संसार के आकर्षन इस नौका को भटकाने का प्रयास करते हैं परंतु द्रिड संकल्पी इसे
38:06बचा सकता है
38:08इंद्रियों के विशों में लिप्थ होना आत्मा को क्षणिक सुख तो देता है परंतु अंत्थ उसे गहरे अज्यान और बंधन
38:16की ओर धकेलता है
38:19विवेख ही वह दिव्य प्रकाश है जो सत्य और असत्य, नित्य और अनित्य के बीच का भेद स्पष्ट करता है
38:26और आत्मा को उचित मार्ग पर चलने को प्रेरित करता है
38:31अंत्थ इस जीवन का परम लक्षे जन्मम्रित्यू के इस गहन अंधकार से बाहर निकल कर शाश्वत प्रकाश और परमानंद में
38:39विलीन होना है
38:42चाहे वह भक्ती का मार्ग हो, ज्यान का पत हो या निश्काम कर्म का योग, सभी का अंतिम पड़ाव इसी
38:49परम लक्षे की प्राप्ती है
38:52भगवान विश्णू ने अपनी अमरित्मई वानी से गरूर को यह गहन शिक्षा प्रदान की और उनके नेत्रों में संपूर्ण स्रिष्टी
39:00के प्रती असीम करूना ज्हलक रही थी

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