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गरुड़ पुराण के आठवें अध्याय में प्रवेश करें, जहाँ भगवान विष्णु पक्षीराज गरुड़ को नरक के सबसे भयानक और खौफनाक द्वारों की सैर कराते हैं। जानिए कैसे यमराज के दूत महापापियों को उबलते तेल (कुंभीपाक), तलवार जैसे पत्तों वाले जंगल (असिपत्रवन) और दहकती लोहे की मूर्तियों (शल्मली) में तड़पाते हैं। क्या इन भयानक कष्टों से बचने का कोई मार्ग है? वीडियो को अंत तक देखें और कर्मों के इस अटूट विधान को समझें। #GarudaPurana #Yamalok #Narak #Spiritual #HinduMythology
Transcript
00:00यम्राज के न्याय आसन से अंतिम निर्णय मिलने के बाद पापी आत्मा को भयानक यम्दूतों द्वारा बलपूर्वक घसीटा जाता है,
00:08जिसकी रूह काम्प उठती है.
00:11यम्दूत अपनी करूर पकड मजबूत करते हुए उसका पती हुई आत्मा को निर्दैता से खीचते हैं, जिसकी आखों में अब
00:19केवल अनंत भय का वास है.
00:23निर्णय कक्ष से बाहर निकलते ही, भयावा नरक के द्वार की ओर लंबी और वीरान राह पर आत्मा को उसकी
00:30नेती की ओर घसीटा जाता है.
00:33हर कदम पर बढ़ती आतंत की अनुभूती, जैसे जैसे आत्मा को यमदूतों की कठोर पकड में आगे धकेला जाता है,
00:42उसे अनंत यातना का पूर्वाभास होने लगता है.
00:47दूरक्षितिच पर नरक के विशाल और भयानक लोहे के द्वार दिखाई पड़ते हैं, जो स्वयं पीडा की एक भयावा प्रतिमा
00:54के समान खड़े हैं.
00:57द्वार के विशाल पट्टों पर दुख से भरी आखें और पीडा में कराहते चहरे उकेरे हुए हैं, जिनसे काली चिपचिपी
01:05नमी रिस रही है, मानो स्वयं द्वार भी रो रहे हूँ.
01:10अचानक एक भीशन गर्जना के साथ सदियों से बंद नरक के विशाल द्वार धीरे-धीरे खुलने लगते हैं, एक भयानक
01:18अंथीन अंधकार को प्रकट करते हुए.
01:22जैसे ही द्वार पूरी तरह खुलते हैं, एक थंडी, सड़ी हुई गंध और हजारों कराहती आत्माओं की चीखें बाहर निकलकर
01:30आत्मा के कानों में गूंज उठती हैं.
01:34यमदूत निर्दैता से आत्मा को उस भयावध द्वार के भीतर धकेल देते हैं, जहां से अनंत पीडा का गहरा, गूंजता
01:42हुआ पाताल शुरू होता है.
01:45जैसे ही आत्मा भीतर प्रवेश करती है, नरक के प्राथमिक मंडलों का मार धलांदार, घुमावदार गलियारों में परिवर्थित हो जाता
01:54है, जो असीम अंधकार में उतरते चले जाते हैं.
01:59पाताल की विशालता और उसमें गूंजती हजारों आत्माओं की सामुहिक चीखें, उस असीम पीडा का प्रमाण है, जो इस नरक
02:07में निवास करती है.
02:10दूर क्षितिच पर, रक्त और मवाद से भरी, जलती हुई वैतर्णी नदी की भयावः जलक दिखाई पड़ती है, जिसके दहकते
02:18किनारे अनंत दुख का वादा करते हैं.
02:22यमदूत आत्मा की बढ़ती हुई पीडा पर क्रूरता से हंसते हैं, उसे उसके पिछले कर्मों और आने वाली यातनाओं की
02:30याद दिलाते हैं.
02:33यात्रा समाप्त होती है जब वे रौरव नरक के प्रवेश द्वार पर पहुँचते हैं, जहां निरंतर रोने और चीखने की
02:40आवाजे वातावर्ण को चीर रही हैं.
02:44रौरव के विशाल शेत्र में दूर दूर तक रुरु नामक भयंकर सर्पों द्वारा यातना जहलती हुई आत्माओं की भयावह तस्वीरें
02:52दिखाई देती हैं.
02:55इन भयानक द्रिश्यों को देखकर पापी आत्मा को अपनी अंतिम नेती की भयावहता का पूर्ण एहसास होता है, एक ऐसी
03:03पीड़ा जिससे कोई मुक्ती नहीं.
03:07यमदूत आत्मा को रौरव के और भी गहरे भीशन यातना क्षेत्रों की ओर घसीपते हैं, जहां हर ध्वनी चीक और
03:15पीड़ा की गूंज है.
03:17हजारों लोहे के डंडों और मुसलों की अन्थीन प्रहारों की आवाज साथ में आत्माओं की भयावह चीकें नरक के हृदय
03:25से उठती हैं.
03:28आगे और भी गहरे एक विशाल प्रज्वलित खाई में महारोरव नरक की एक जलक दिखाई पड़ती है, जो अपने नाम
03:36के अनुरूप कहीं अधिक भयानक है.
03:39आत्मा के लिए कोई भागने का मार्ग नहीं, केवल निरंतर पतन है क्योंकि इसे अन्त्ह उस विशेश नरक में धकेला
03:47जाता है, जो उसके पापों के लिए निर्धारत है.
03:52उस विशेश नरक की ओर जहां अगने की लप्टें अनंत्काल तक आत्माओं को भस्म करती है, एक और आत्मा तेजी
03:59से नीचे की ओर गिरती है.
04:03इस अकल्पनिय भयावह द्रिश को देख, गरुड के दिव्य नेत्रों में एक गहरी पीडा और चिंता जलकती है, मानो हर
04:11चीक उनके हृदय को भेद रही हो.
04:14भगवान विश्नु, शांत और गंभीर मुद्रा में, गरुड की ओर देखते हुए रौरव नरक की भयावह प्रकृती का वर्णन करना
04:22आरंभ करते हैं, जहां सत्य का अपमान करने वालों को कठोर दंड मिलता है.
04:28यह रौरव है गरुड, जहां धर्ती पर जूट बोलने वाले, मिथ्या साक्षे देने वाले और निर्दोशों को चलने वाले पापी
04:37अपनी अगनी परीच्शा से गुजरते हैं.
04:40इस नरक में रूरु नामक भयानक अगनिवर्ण सर्प निवास करते हैं, जिनके दंश में ज्वाला और असहनिय पीड़ा समाई होती
04:49हैं.
04:51ये क्रूर सर्प उन आत्माओं का पीछा करते हैं, जो पृत्वी पर अपने शब्दों से दूसरों को जलाते थे, और
04:58उन्हें अपने विशैले अगनिदंशों से निरंतर प्रताड़ित करते हैं.
05:04वे आत्माएं, जिन्होंने जीवन भर कपट, छल और असत्य का सहारा लिया, अब यहां उन्ही शब्दों की अगनी से जलती
05:12हैं, जिन्हें उन्होंने दूसरों पर बरसाया था.
05:16एक आत्मा, जो अपने जीवनकाल में एक धोखेबाज व्यापारी थी, अब रौरव की अनन्त भूल भुलिया में भयभीत होकर भाग
05:25रही है, जिसके पीछे क्रोधित रूरु सर्पों का जुंड है.
05:30जैसे ही एक सर्प उस भागती हुरी आत्मा पर जपटता है, उसके अगनिदंश से निकलने वाला विश उस आत्मा को
05:37भीतर तक जला देता है, जिससे वह असहनिय पीडा में चीख उठती है.
05:44आत्मा अपनी पूरी शक्ती से बचने का प्रयास करती है, परंतु यह नरक उसे हर दिशा से जकड लेता है,
05:51और रूरु सर्प उसे कभी अकेला नहीं छोडते.
05:55भगवान विशनु समझाते हैं कि यह दंड केवल साधारन जूट के लिए नहीं, बलकि उन कप्टी वचनों के लिए है,
06:03जिन्होंने दूसरों का जीवन नश्ट कर दिया या उन्हें गहरी हानी पहुँचाई.
06:08विशेश रूप से वे आत्माए, जिन्होंने न्याय के समक्ष जूट बोलकर निर्दोशों को दंडित कराया, वे अब यहां रूरु सर्पों
06:17के तीखे फनों से खुद को निरंतर कटा हुआ पाती हैं.
06:21उन आत्माओं का हर दंश एक याद दिलाता है उस जूट की जिसने किसी और के जीवन को बरबाद किया
06:29था, और उनकी पीड़ा अनवरत बढ़ती जाती है.
06:33और वे जिन्होंने भोले भाले लोगों को अपनी चालाकी से ठगा, उनका शरीर अब रूरु सर्पों के लिए एक ऐसा
06:41भोज बन जाता है, जो कभी समाप्त नहीं होता.
06:45हर बार जब एक सर्प उन्हें काटता है, तो उन्हें वही खालीपन महसूस होता है, जो उन्होंने अपने धोके से
06:52दूसरों के जीवन में भर दिया था.
06:55यह चक्र अनन्थ है, गरुड सर्प उन्हें बार-बार डस्ते हैं, आत्माई चीखती हैं और फिर से सर्प उन्हें खोज
07:03निकालते हैं, इस पीडा का कोई अन्थ नहीं
07:08गरुर्क भगवान विश्नों के वचनों को सुन और इंद्रिश्यों को देख, अपने पंखों को कसकर समेट लेते हैं, उनके मुखपर
07:16भय और करुणा का गहरा भाव अनकित है
07:20भगवान विश्नों का स्वर गंभीर हो जाता है, क्योंकि वे समझाते हैं कि यह नरक उन पापों की गंभीरता को
07:27दर्शाता है, जो समाज के तानेबाने को जूट और धोखे से फार देते हैं
07:34रौरव नरक का विस्तार अनन्त प्रतीत होता है, जहां अगनी, धुआ और चीखे मिलकर एक ऐसा भयाव सिंफनी रचते हैं,
07:42जो पाप के गहरे परिनामों की गवाही देती है
07:46यह रौरव का अन्त है, गरूर परंतु नरक के द्वार कई हैं, और प्रत्येक द्वार पापियों के लिए एक अध्वितिय
07:54और भयानक नेती रखता है
07:58भगवान विश्णु ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से गरूर की ओर देखा और गंभीर स्वर में अगले नरक लोक, कुम्भी पाक का
08:05भयावः विवर्ण देना आरंभ किया, जो कुरूरता और पीडा का अनंत सागर है
08:12उनके शब्दों के साथ ही एक अध्रिष्श शक्ती गरूर को एक ऐसे भयानक लोक की ओर ले गई जहां अनंत
08:19कश्टों की ज्वालाएं सदैफ प्रजवलित रहती थी
08:24दूरक्षितिजपर गरूर ने कुम्भी पाक के पहले दर्शन किये, जहां से हजारों आत्माओं की चीखें और उबलते तेल की भयानक
08:32गंध हवा में घुल कर एक भयावः वातावर्ण बना रही थी
08:36यह वह कुम्धी पाक नरक था, जहां पापियों को विशालकाय कड़ाही में खौलते तेल में डुबोया जाता था, उनके पापों
08:44का घिनोना फल पलपल भुगतने के लिए
08:48प्रत्य कड़ाही से उबलते तेल की आवाज एक भयानक गर्जना जैसी थी, जो नरक की इस शाखा में हर क्षन
08:56व्याप्थ होने वाली पीडा की निरंतर्ता का प्रतीक थी
09:00फिर नरक के द्वारपाल, यमदूत, दुर्बल और भयभीत आत्माओं के जुंड को बेर्हमी से घसीकते हुए विशाल कड़ाईयों की ओर
09:08लाते हुए दिखाई दिये
09:11यमदूतों का स्वरूप इतना भयावह था कि उन्हें देखकर स्वयंकाल भी एक पल को सहम जाए, उनकी आखों में केवल
09:19क्रूर्ता और न्याय की ज्वाला धधक रही थी
09:23एक यमदूत ने एक भयभीत आत्मा को, जिसने धर्ती पर निर्दोश प्राणियों को अकारण कश्ट दिया था, क्रूर्ता से उठाया
09:31और उसे खौलते हुए तेल के सागर में धकेल दिया
09:36जैसे ही आत्मा तेल में गिरी, एक चीक अंतरिक्ष को चीरती हुई उठी और उसका अद्रिश शरीर ततकाल जल कर
09:44भस्म होने लगा, एक असहनिय पीडा का अनुभव करते हुए
09:49कुम्भी पाक में हर और से अंगिनत आत्माओं की चीखें गूंज रही थी, जो एक सामुहिक वेदना की सिंफनी रच्ती
09:57थी, जिसे सुनकर हृदय काम उठता था
10:00किन्तु यह अंत नहीं था, जैसे ही एक आत्मा का शरीर नश्ट होता, वह तुरंट अपने आध्यात्मिक स्वरूप में पुना
10:09निर्मित हो जाता, ताकि वह पीडा फिर से सह सके
10:13यह पुनर्जन्म नहीं, बलकि दंड की एक भयानक निरंतरता थी, जहां आत्मा को बार-बार उसी असहनिय दर्द का अनुभव
10:22करने के लिए मजबूर किया जाता था
10:25गरूर यह सब देखकर गहरे सदमे में थे, उनकी आखें इस अकल्पनिय क्रूरता को देखकर विस्मय और पीडा से चौड़ी
10:34हो गई थी
10:36भगवान विष्णु ने गरूर की पीडा को महसूस किया और समझाया कि यह नरक उन आत्माओं के लिए है जिन्होंने
10:43जीवन में जानबूच कर जीवों को कष्ट पहुँचाया, प्राणियों पर अत्याचार किया
10:49वे लोग जिन्होंने पशुओं को अकारण सताया, मनोरंजन के लिए उनका शिकार किया या निरीः प्राणियों को पीडा दी, उन्हें
10:58यहां कुम्भी पाक में अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है
11:03भगवान विश्णू ने द्रिड़ता से कहा कि स्रिष्टी के हर प्राणी में जीवन का अंश है और किसी भी जीव
11:10को जानबूच कर कष्ट पहुँचाना सबसे गंभीर पापों में से एक है
11:15उनके स्वर में न्याय की प्रतिध्वनी थी जब उन्होंने बताया कि चाहे वह छोटे से छोटा कीठो या विशालकाय पशुक
11:23हर प्राणी की पीडा का हिसाब यहां चुकाना पड़ता है
11:28यमराज का न्याय निश्पक्ष है और कुम्भी पाक उन आत्माओं के लिए अंतिम पड़ाव है जो इस संसार में दूसरों
11:36के कष्टों पर अपनी प्रसन्नता की नीम रखते हैं
11:41कुम्भी पाक में हर पल, हर क्षन, पापी आत्मा को उसी तीवर वेदना से गुजरना पड़ता है जब तक कि
11:48उसके पापों का हिसाब पूरी तरह चुकता न हो जाए
11:52यह कुम्भी पाक का अंति है, गरूर परंतु नरक के द्वार कई हैं और प्रत्येक द्वार पापियों के लिए एक
12:00अध्वितिय और भयानक नियती रखता है और अब हम अगली पीडा की ओर बढ़ते हैं
12:07विश्नु अगली भीशन यातना का वर्णन करते हुए गरूर को बताते हैं कि यह पापी आत्माओं के लिए असिपत्रवन नामक
12:15वन है, जहां भयानक तलवारों जैसी पत्तियां उगती हैं
12:20इस घने वन के व्रिक्षों पर हरीभी पत्तियों के बजाए, खूंखार तलवारों के समान तीखे और चमकीले फलत लटके हुए
12:28हैं, जो हर क्षन प्राणों को भेदने को तयार हैं
12:33यहां वे आत्माए आती हैं, जिन्होंने अपने मित्रों के विश्वास को तोड़ा, अपने धर्म को त्याग दिया और पवित्र कर्तवियों
12:41से मुहु मोड लिया
12:44जैसे ही यह आत्माए वन में प्रवेश करती हैं, एक भयानक हवा का जोंका चलता है, जो इन तलवार रूपी
12:51पत्तों को प्रचंड वेग से हिलाता है
12:54हवा के साथ सहसरों तीखे पत्ते पेडों से तूटकर बारिश की तरहें नीचे बरसने लगते हैं, हर आत्मा को बिना
13:02किसी भेदभाव के काटते हुए
13:05हर एक कट एक असहनिय पीडा देता है, जैसे शरीर को हजार तलवारों से एक साथ बीनधा जा रहा हो,
13:13खून की धाराए अद्रिश्य रूप से बहती है
13:17पापी आत्माए दर्द से चीखती हैं, बेथाशा इधरुधर भागने लगती हैं, परन्तु इस वन से बचने का कोई मार्ग नहीं
13:26है
13:27हर कदम पर नए पत्ते उन्हें चीरते हुए गिरते हैं, उनके अद्रिश शरीर को लगातार क्षत्विक्षत करते रहते हैं
13:37पेडों की शाखाए स्वयन तल्वारों से बनी हुई प्रतीत होती हैं, आत्माओं के भागने के मार्ग को अवरुध करती हैं,
13:45और उन्हें और अधिक गहराईयों में धकेलती हैं
13:49कुछ आत्माए पेडों से चिपक कर चिपने का प्रयास करती हैं, परंतु तल्वार रूपी पत्तिया उन्हें वहाँ भी नहीं छोडती,
13:57हर पत्ती एक शिकारी की तरह हमला करती हैं
14:01वन की मिट्टी जो अब अधरिश्यरक्ट से संत्रिप्थ है, चिपचिपी और भयानक हो जाती है, जिससे आत्माओं का भागना और
14:10भी कठिन हो जाता है
14:13यह यातना तब तक जारी रहती है, जब तक उनके पापों का भार कम नहीं हो जाता
14:19हर घाव एक सबक सिखाता है, जिसे उन्होंने प्रित्वी पर भुला दिया था
14:25विश्वास घात और कर्तव्य विमुखता की कटू स्मृती हर आत्मा को भीतर से भी चीरती है, बाहरी घावों से कहीं
14:32अधिक तीवर
14:34यमराज के दूत अध्रिश्य रूप से इस वन की रखवाली करते हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि कोई भी पापी
14:41अपनी नेती से बच न पाए
14:44वन के भीतर एक अजीब धातुई खड़खडाहट और चीखों का मिश्रन निरंतर गूंचता रहता है, जो इस भयानक स्थान के
14:53संगीत जैसा लगता है
14:56गरुड इस भयावह द्रिश्य को देखकर भीतर से हिल उठते हैं, उनकी आखों में असीन करुणा और भय का भाव
15:03जलक रहा है
15:06भगवान विश्नु, शान्त और गंभीर होकर गरुड की ओर देखते हैं, उनके दिव्य मुख पर ज्यान और न्याय का अटल
15:13संकल्प जलक रहा है
15:16वे बताते हैं कि यह पीडा उन लोगों के लिए है, जो अपने आसपास के लोगों का भरोसा तोड़ते हैं,
15:23क्योंकि विश्वास की नीम तूटने पर ही सबसे गहरी चोट लगती है
15:29यह केवल शारिरिक यातना नहीं, बलकि आत्मा का शुद्धिकरण है, जहां प्रत्येक घाव किये गए विश्वास खात की कड़वी याद
15:37दिलाता है
15:40असिपत्रवन की यह भयानक यात्रा एक कठोर सत्य सिखाती है, कि धर्म और विश्वास का पत प्यागने वालों को अंत्य
15:48ऐसी ही तीच्षन पीडाओं से गुजरना पड़ता है
15:52असिपत्रवन की करूर यातनाओं के पश्चात, भगवान विश्णू और गरुड एक ऐसे नए नरक लोक में प्रवेश करते हैं, जहां
16:00का वायूमंदल भी विश्वास खात की अगनी से संतप्त प्रतीत होता है
16:06गरुड के विस्मय भरे मुख को देखकर, भगवान विश्णू शांत स्वर में इस नरक की प्रकृती समझाते हैं, जहां वासना
16:14और विश्वास खात के पापियों को भयानक दंड मिलता है
16:19यह शालमली नरक है, प्रभो बताते हैं, जहां लालच और अनैतिक संबंधों में लिप्ट आत्माएं, जिन्होंने अपने जीवन साथी को
16:28धोखा दिया, सबसे असहनिय पीडा जहिलती हैं
16:32उनके सामने एक भयानक द्रिश उपस्थित होता है, अन्गिनत विशाल प्रतिमाएं, सफेद गर्म, पिघले हुए लोहे की बनी, आसमान को
16:42छूने को उद्यत खड़ी हैं
16:45भयानक यमदूत, जिनके मुख पर क्रूर्ता स्पष्ट जलकती है, आत्माओं को इन धधक्ती प्रतिमाओं की ओर खीजते हुए दिखाई देते
16:54हैं, उनकी चीखें वातावर्ण में गूंजती हैं
16:58यमदूतों के शरीर पर खुर्दुरी, काली त्वचा, उनकी आखों में प्रतिशोध की अगनी और उनके हाथों में घातक अस्त्रशस्त्र, उनकी
17:07भयाभता को और भी बढ़ा देते हैं
17:11एक आत्मा को बलपूर्वक एक धधक्ती लोह प्रतिमा से चिपका दिया जाता है, और क्षण भर में उसके सुक्ष्म शरीर
17:19से उठता चीख का ज्वाला मुखी पूरे नरक को कमपकमपा देता है
17:25वह पिघला हुआ लोहा आत्मा के आध्यात्मिक स्वरूप में धनस्ता चला जाता है, मानो वह पाप की जड़ तक पहुँचकर
17:33उसे जलाकर भस्म कर रहा हो
17:35यह पीडा उन धोखे बाजों के लिए है, जिनकी वासना ने प्रेम की पवित्रता को रौन्द दिया, जिन्होंने अपने जीवन
17:43साथी के विश्वास को अगनी में जोक दिया
17:47आत्मा छट पटाती है, दूर भागने का प्रयास करती है, किन्तु यम्दूतों की क्रूर पकड उसे उस दहकती प्रतिमा से
17:55अलग होने नहीं देती
17:57जलने और फिर से आंशिक रूप से पुनर जीवित होने का यह चक्र अनवरत चलता रहता है, जहां प्रतेक शन
18:05नई पीड़ा लेकर आता है
18:08गरूर के विशाल हृदय में करूना का सागर उमडाता है, इन आत्माओं की अन्थीन यंत्रना देखकर उनकी आखों में गहन
18:16वेधना जलकती है
18:19भगवान विश्णु का मुखमंडल अब भी शांत और गंभीर है, उनके दिव्यन नयन न्याय के अटल सिधान्त को प्रतिबिंबित करते
18:27हैं
18:29नरक की इस भयानक भूमी में हर ओर सिर्फ चीखें और सिस्किया गूंज रही हैं, जो आत्माओं की अमर पीडा
18:36का प्रमाण है
18:39वातावर्ण स्वय ही इस पीडा का साक्षी है, हवा में जलते मास की गंध, धर्ती से उठता धुआ और हर
18:46वस्तु पर मृत्यू की काली चाया
18:49प्रत्येक घाव उन्हें प्रित्वी पर किये गए विश्वास घात और वासना के कृत्य की याद दिलाता है, यह केवल शारिरिक
18:57नहीं, आत्मिक शुद्धिकरण है
19:00हृदय और आत्मा को जुलसा देने वाली यह अगनी उन्हें अपने पापों के वास्तविक भार का एहसास कराती है, जहां
19:08कोई पलायन नहीं है
19:11दूर से आत्माओं का एक और समोह दरे हुए और असहाय यम्दूतों द्वारा खीचते हुए उन धधक्ती प्रतिमाओं की ओर
19:19लाया जा रहा है
19:22भगवान विश्णु अपनी गहरी शांत वानी में समझाते हैं कि जीवन साथी के प्रति विश्वासगात एक ऐसा पाप है जो
19:30आत्मा की जड़ों को जला देता है
19:34गरूर इन भयानक द्रिश्यों और भगवान के शब्दों से स्तब्ध मानव जीवन में धर्म और नैतिक्ता के महत्व पर गेहन
19:41चिंतन करते हैं
19:44गरूर के मन में अभी भी पिछले द्रिश्यों की भयाभता गूंज रही थी जब भगवान विश्णु ने अपनी शांत गहरी
19:52वानी में एक नए पाप और उसके अकल्पनिय दंड का वर्णन करना आरंब किया
19:58भगवान विश्णु ने बताया कि प्रिथवी पर ऐसे पापी भी होते हैं जो स्वयं के लिए तो स्वादिष्ट भोजन बनाते
20:05हैं पर कभी किसी भूखे या महमान को एक निवाला भी नहीं देते
20:11ऐसे लोग जो अपनी धनसंपत्ती और अन्न केवल अपने स्वार्थ के लिए संचित करते हैं गरीबों और जरूरत मंदों से
20:19आखें फेर लेते हैं वे मृत्यू के बाद एक विशेश नरक के भागी बनते हैं
20:25उस नरक का नाम है क्रिमिभोजन जहां आत्माओं को सबसे घ्रेनित और भयावः पीडाओं से गुजरना पड़ता है
20:34यह एक विशाल अन्थीन जील है जिसका पानी नहीं बलकी भयानक काला तेजाब है जो हर उस चीज को जला
20:42देता है जो उसमें गिरती है
20:45इस तेजाब में असंख्य, मास खाने वाले क्रिमी और कीड़े भरे होते हैं जो हर पल भूख से तडपते रहते
20:53हैं
20:55जो आत्माओं प्रिथवी पर स्वार्थी जीवन जीती हैं उन्हें यमदूत पकड़ कर इस भयानक तेजाबी जील के पास लाते हैं
21:04वे आत्माएं अपनी पिछली त्रुटियों को याद करती हुई चीखती हैं पर उनकी चीखें इस नरक की दिवारों से टकरा
21:12कर लौट आती हैं कोई सुनने वाला नहीं होता
21:16यमदूत निर्दैटा से उन असहाय आत्माओं को उस तेजाबी जील में धकेल देते हैं जहां उनका नया असहनिय दंड आरंब
21:25होता है
21:27जैसे ही आत्माओं तेजाब को छूती हैं उनके शरीर पिघलने लगते हैं हर कोशिका में भयानक जलन फैल जाती हैं
21:35मानों उनके अंदर आग लगा दी गई हो
21:39वेधना से बिल्खती हुई आत्माओं तेजाब के भीतर छट पटाती हैं और उसी पल मास खाने वाले क्रिमी उन पर
21:47तूट पड़ते हैं
21:49वे क्रिमी आत्मा के हर कण को भीतर तक नोच नोच कर खाते हैं जिससे उन्हें निरंतर असहनिय पीड़ा होती
21:57है
21:59आत्माओं मरना चाहती हैं पर मृत्यू उन्हें नहीं मिलती उन्हें बार-बार यह दर्ध जहेलना पड़ता है जब तक उनके
22:07पापों का फल पूरा न हो जाएं
22:09यह दंड उन लोगों के लिए है जिन्होंने जीवन में अन्न की महत्ता को नहीं समझा और उसे केवल अपनी
22:17उदरपूर्ती का साधन माना
22:20गरुड इस नई भयानक यातना को सुनकर गहरे सदमे में डूब गए उनके हृदय में जीवों के प्रती करुणा और
22:27धर्म के प्रती निष्ठा और बढ़ गई
22:30उन्होंने विन्मर्ता पूर्वक भगवान विश्णू से पूछा है प्रभू क्या इस भयानक नरक से बचने का कोई उपाय नहीं है
22:40भगवान विश्णू ने मुस्कुराते हुए कहा निश्चित रूप से गरुड धर्म और करुणा का मार्ग सदै खुला रहता है
22:49उन्होंने समझाया कि जो व्यक्ती जीवन में दानपुने करता है भूखों को भोजन कराता है और अतिथियों का सम्मान करता
22:58है वह इस पाप से मुक्त हो जाता है
23:02अन्दान महादान है और जो इसे सच्चे मन से करता है, वह केवल इस लोक में ही नहीं, पर लोक
23:09में भी सम्मान पाता है
23:12गरुर ने भगवान के वचनों को अपने हृदय में उतारा, यह समझकर की वास्तविक धन वह नहीं जो संचित किया
23:19जाए, बलकि वह है जो दूसरों के साथ साजा किया जाए
23:24भगवान विश्नु ने आगे कहा, हे गरुर, जिन्होंने अन्न दान का महत्व समझा और निभाया, वे मोक्ष की ओर अग्रसर
23:32होते हैं, परन्तु जिन्होंने अपनी शक्ती का दुरुप्योग किया, उन्हें एक भयानक यातना से गुजरना पड़ता है
23:41गरुर ने उच्सुकता पूर्वक अपनी द्रिष्टी भगवान विश्नु पर केंद्रित की, उनके मुख मंडल पर आने वाली भयंकर कथा का
23:49पूर्वाभास था
23:51भगवान बोले वे करूर आत्माए जिन्होंने निर्बलों को सताया और अपनी सत्ता का दुरुप्योग किया, संधातन नामक नरक में प्रवेश
24:00करती हैं, जहां उनकी पीडा अथा और अवर्णनिय होती है
24:06यमदूत उन आत्माओं को घसीटते हुए एक भयानक घाटी से गुजरते हैं, जहां से केवल कराहने की ध्वनिया और निराशा
24:14की गंधाती है
24:17दूर से ही संधातन के विशालकाए, गतिशी चट्टानों का विहंगम द्रिश दिखाई देता है, जो एक दूसरे की ओर धीरे
24:25-धीरे सरकते हुए, अपने बीच आने वाली हर चीज को कुचलने को तयार खड़े थे
24:31ये वे आत्माए थी जिन्होंने प्रित्वी पर रहते हुए अपनी राजनीतिक या सामाजिक शक्ती का दुरुप्योग कर निर्बलों का शोशन
24:40किया और उन पर अत्याचार किये थे
24:43जैसे ही आत्माए चट्टानों के बीच धके ली जाती हैं, वे अविश्वसनिय पीड़ा के साथ कुचल दी जाती हैं, उनके
24:51शरीर एक भयानक ध्वनी के साथ चकनाचूर हो जाते हैं
24:57हड्डियों के चटकने और आत्माओं की चीखों की भयावह गूंच पूरी घाटी में फैल जाती हैं, जो किसी भी जीवित
25:04प्राणी की रूह कमपाने के लिए परियाप्थ थी
25:08पर मृत्यू यहां अंत नहीं थी, कुछ ही क्षणों में कुछली हुई आत्माएं अपने मौलिक रूप में वापस आ जाती
25:15हैं, केवल फिर से कुछले जाने के लिए
25:19गरुर ने भैभीत आखों से इस अंथीन पुन्रावरित्ती को देखा, उनके हृदय में उन आत्माओं के लिए गहन पीडा और
25:27न्याय के लिए गहन सम्मान उमड़ाया
25:31भगवान विश्णु ने कहा, यह उन अहंकारी आत्माओं का दंड है, जिन्होंने अपनी शक्ती का उप्योग दूसरों को रौंदने, उन्हें
25:39उनकी गरिमा से वंचित करने और उनके जीवन को नरक बनाने के लिए किया
25:45उनके पापों का बोज इतना भारी था कि अब वे स्वयं उन पत्थरों के बीच कुछ ले जाते हैं, जिस
25:52तरह उन्होंने धर्ती पर निर्दोशों को कुछ ला था
25:56उन शासकों और अधिकारियों को यहां भयानक दंड मिलता है, जिन्होंने न्याय के स्थान पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया और
26:04अपनी प्रजा को लूटा
26:06उन धनी व्यक्तियों को भी यह यातना सहनी पड़ती है, जिन्होंने निर्धन और असहाय लोगों का शोशन करके अपनी संपत्ती
26:15अर्जित की बिना किसी दया के
26:18यह यातना अनंत काल तक चलती है, जब तक कि उनके पापों का हर अंश पूरी तरह से भस्म नहीं
26:25हो जाता, उन्हें क्षनिक भी शान्ती नसीब नहीं होती
26:28इस भयानक स्थल पर केवल चीखें, पत्थरों के टकराने की गड़गडाहट और आत्माओं के भीतर से फूटती निराशा की आवाजें
26:38ही सुनाई देती है
26:41भगवान विश्णू की आखें, जो सामान्यतह दया से भरी रहती हैं, अब न्याय और अटल कर्मफल के सिध्धान्त को दर्शाते
26:49हुए गंभीर और स्थिर थी
26:52गरुर ने समझा की वास्तविक शक्ती दूसरों को उचा उठाने में है, न कि उन्हें दबाने में और सत्ता का
27:00दुरुप्योग केवल आत्मविनाश की गोर ले जाता है
27:04भगवान के वचनों ने गरुर को यह स्पष्ट कर दिया कि ब्रहमांदिय नियम सभी के लिए समान हैं, और कोई
27:11भी अपने कर्मों के परिणामों से बच नहीं सकता
27:15गरुर ने अपने स्वामी के इन भयंकर पाठों को अपने हृदय में संजोया, यह प्रण लेते हुए कि वे सदैव
27:23धर्म और न्याय के मार्ग पर चलेंगे
27:26भगवान के गहन वचनों को आत्म साथ करते हुए भी, गरुर का मन नरक के उन अन्थीन भयानक ग्रिश्यों से
27:33विचलित था, जिनकी भयाभता हर पल बढ़ती ही जा रही थी
27:38प्रत्येक आत्मा की चीक, प्रत्येक पीडा की गूंज उसके दिव्यहरिदय को भीतर तक जखजोर रही थी, मानो वह स्वया उन
27:46यात्नाओं को अनुभव कर रहा हो
27:49फिर एक क्षण ऐसा आया, जब उसने एक आत्मा को देखा, जिसे असिपत्रवन नरक में तीखे तलवार पत्तो वाले व्रिक्षों
27:58से काटा जा रहा था, और यह द्रिश्य उसकी सहन शक्ती की अंतिम सीमा थी
28:04असहनिय पीडा से भरे हुए, पक्षियों के राजा गरुर के अश्रु अविराम बहने लगे, उनकी आखें ब्रहमांडिय दुख से लाल
28:12हो गई
28:13उसने अपने शक्तिशाली पंखों को कसकर समेटा, जैसे कोई अपनी भावनाओं को समेटने का व्यर्थ प्रयास कर रहा हो, और
28:22उसका दिव्य धैर ये तूट गया
28:24अंतिम रूप से वह धर्ती पर घुटनों के बलगिर पड़ा, उसका भव्य रूप ब्रहमांडिय पीडा के बोज तले जुख गया
28:33उसने अपने स्वामी भगवान विश्नु की ओर अपनी करुणा भरी द्रिष्टी उठाई, उनके दिव्य चहरे पर उत्तर और सांत्वना की
28:41तलाश की
28:43उसकी आवाज दुख और आशाहिंता से भर गई थी, जैसे उसने अनंत पीडा को एक साथ महसूस कर लिया हो
28:52कि प्रभू गरूर ने कापते हुए कहा, क्या इस अनंत कष्ट का कभी कोई अंत है? क्या यम्राज के क्रोध
29:00में दया का कोई अंश भी नहीं है?
29:03गरूर के प्रश्ण ने एक गहरी चुप्पी तोर दी और ब्रहमांड स्वयां उनके स्वामी के अगले शब्दों की प्रतीक्षा में
29:11ठहर गया
29:13भगवान विश्णू ने गरूर की ओर अपनी अनंत करुणा और गहन समझ से भरी द्रिश्टी डाली उनके मुख पर एक
29:20शांत दिव्यमुस्कान थी
29:23उन्होंने अपनी दिव्यवानी में बोलना आरंभ किया प्रतेक्षब्द ब्रहमांडिय सत्य और प्रेम से भरा हुआ था
29:31गरूर उन्होंने कहा यमराज का न्याय क्रोध नहीं बलकी कर्मों का अकाट्य फल है यह ब्रहमांडिय संतुलन का एक आवश्यक
29:40अंग है
29:42हर प्राणी को अपने कृत्यों का सामना करना पड़ता है और यही नियम धर्म के चक्र को बनाए रखता है
29:50सच्ची दया दुख से मुक्ती नहीं है बलकी वह अवसर है जो आत्माओं को अपने कर्मों से सीखने और अंत्ह
29:58मोक्ष की ओर बढ़ने के लिए मिलता है
30:02विश्णू ने समझाया कि नरक की यातनाए भी अंत्ह एक उच्चतर उद्देश की पूर्ती करती हैं जो पापों का शोधन
30:10और आत्मा का शुद्धिकरण है
30:13धीरे धीरे गरुड के हृदय में निराशा का अंधकार कम होने लगा और ज्यान की एक नई किरन फूट पड़ी
30:22उसने यह स्विकार करना शुरू कर दिया कि ब्रहमांडिय नियम कठोर लग सकते हैं किन्तु वे अंत्ह न्याय और संतुलन
30:30की सेवा करते हैं
30:32भगवान ने अंतिम रूप से जोर दिया कि प्रित्वी पर किये गए कर्मों का सीधा प्रभाव होता है और पिंडदान
30:40जैसे अनुष्ठान प्रेतों को भी शान्ती प्रदान कर सकते हैं
30:45उन्होंने धर्म प्रायन जीवन जीने को ही परम मुक्ती का मार्ग बताया जो गरूर के हृदय में आशा और संकल्प
30:52की नई लौ प्रजवलित कर गया
30:55गरूर के विशाल हृदय में परम्पिता के इन गूड वचनों ने केवल आशा ही नहीं अपितु ब्रहमांडिय न्याय की गेहन
31:03समझ का एक नया अध्याय खोल दिया
31:06उसने अब यमराज की कुरूरता के बजाए उनके निश्पक्ष दंड में छिपी परम्पिता की अग्रिश्य योजना को देखना प्रारंभ कर
31:14दिया था
31:16गरूर ने विनमर्ता से सिर जुकाया यह स्विकार करते हुए कि हर आत्मा अपने कर्मों के चक्र में स्वयही लिप्थ
31:24होती है
31:26भगवान विश्णु ने गरूड की आंतरिक शांती को भाप लिया और अपने शांत स्वर में कर्म के नियम की सार्वभावमिक्ता
31:33पर प्रकाश डाला
31:36उन्होंने समझाया कि यह नियम केवल मनुशों तक ही सीमित नहीं, अपितु देवों, दानवों और समस्त ब्रहमांडिय प्राणियों पर समान
31:44रूप से लागू होता है
31:47प्रत्येक आत्मा, चाहे वह कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अपने कर्मों के फलों से मुक्त नहीं हो सकती
31:55उन्होंने विस्तार से बताया कि कर्म केवल बड़े कृत्यों तक सीमित नहीं होते, बलकि हमारे विचार, शब्द और छोटी से
32:03छोटी क्रिया भी इसमें शामिल है
32:07एक भी अनकहा विचार या अंदेखी भावना, ब्रहमांडिय संतुलन पर अपना सुक्षम प्रभाव छोड़ती है
32:15गरुर ने यह सुनकर गंभीरता से सिरहिलाया, इस गेहन सत्य की विशालता को समझने का प्रयास कर रहा था
32:24फिर भगवान ने कर्म के तीन प्रमुख प्रकारों का वर्णन किया, संचित, प्रारब्ध और क्रियमान कर्म
32:31उन्होंने समझाया कि संचित कर्म वे सभी कर्म हैं जो आत्मा ने जन्मों जन्मों से एकत्र किये हैं, एक विशाल
32:39ब्रहमांडिय बैंक खाते की तरह
32:42प्रारब्ध कर्म उन्होंने आगे कहा, वह हिस्सा है जो वर्तमान जीवन में फल देने के लिए तैयार है, नेती के
32:50धागों में बुना हुआ
32:52और अंत में क्रियमान कर्म वे कर्म है, जो आत्मा हर पल अपनी स्वतंत्र इच्छा से कर रही है, भविश्य
32:59को आकार दे रही है
33:02गरूर को यह जानकर विस्मय हुआ कि मनुष्य के पास प्रारब्ध के भीतर भी अपने क्रियमान कर्मों से भविश्य को
33:09बदलने की शक्ती है
33:12भगवान ने गरूर की उच्सुपता को भाप लिया और स्वतंत्र इच्छा के महत्व पर जोर दिया
33:19उन्होंने कहा कि यही वह दिव्य उफहार है जो आत्मा को अपने कर्मों का चयन करने और अपनी नेती को
33:26गढ़ने का अफसर प्रदान करता है
33:30किंतु इस स्वतंत्रता के साथ ही चुनाव के परिणामों की गहन जिम्मेदारी भी आती है
33:37अत्य उन्होंने निश्कान कर्म के सिध्धान्त का अनावरण किया, परिनामों की इच्छा के बिना कर्म करना
33:45यह वह मार्ग है जो आत्मा को कर्मों के चक्र से मुक्त करता है और परम मोक्ष की ओर ले
33:51जाता है
33:53गरूर के हृदय में अब केवल भय नहीं, अपितु गेहन ज्यान और अदमे संकल्प की एक स्थाई जोती से प्रजवलित
34:01हृदय के साथ भगवान विश्नु के सम्मुख खड़ा था, ब्रहमांडिय सत्यों को समझने के लिए तयार
34:17इस पावन प्रसंग में The Spark of Hope, The Path to Rebirth की महिमा का वर्णन किया गया है
34:24भगवान विश्नु ने अपनी दिव्य आखों में एक गहरी करूना लिए गरुड की ओर देखा, उसकी आत्मा में आये इस
34:32परिवर्टन को महसूस करते हुए और अब अंतिम सत्य को उजागर करने के लिए तयार थे
34:39इस पावन प्रसंग में The Spark of Hope, The Path to Rebirth की महिमा का वर्णन किया गया है
34:47महान देव ने समझाया कि नर्प की भयावह यातनाय शाश्वत दंड नहीं, बलकि आत्मा की शुद्धी के लिए एक आवश्यक
34:55दिव्य प्रक्रिया है
34:58इस पावन प्रसंग में The Spark of Hope, The Path to Rebirth की महिमा का वर्णन किया गया है
35:05प्रत्येक पीडा अगनी की एक पवित्र लौ के समान है, जो आत्मा के संचित पापों को सोने से अशुद्धियों को
35:13निकालने के समान धीरे-धीरे जला देती है
35:17इस पावन प्रसंग में The Spark of Hope, The Path to Rebirth की महिमा का वर्णन किया गया है
35:24पापों के बोज से दबी आत्मा धीरे-धीरे अपनी भारी कर्मिक परतों को त्याग देती है, प्रत्येक परीक्षा के साथ
35:32हल्की और अधिक सुक्ष्म होती जाती है
35:36इस पावन प्रसंग में The Spark of Hope, The Path to Rebirth की महिमा का वर्णन किया गया है
35:44विश्नु ने समझाया की कैसे इन लोकों में दुहक का सार अहंकार, आसक्ती और अज्यान के गहरे दागों को आत्मा
35:52से सावधानी पूर्वक मिटा देता है
35:55इस पावन प्रसंग में The Spark of Hope, The Path to Rebirth की महिमा का वर्णन किया गया है
36:03उन्होंने जोर दिया कि यह कठोर प्रक्रिया ब्रहमांड की न्याय और संतुलन के प्रती अटूट प्रतिबधता का प्रमाण है जो
36:11सुनिश्चित करती है कि प्रत्येक्रिया की सटीक प्रतिक्रिया हो
36:16इस पावन प्रसंग में The Spark of Hope, The Path to Rebirth की महिमा का वर्णन किया गया है
36:24अंत्र नरक के अंधकार्मय कोनों में शुद्ध आत्माओं के चारों और एक मंद जिल मिलाता प्रकाश प्रकट होता है जो
36:32अतीत के कुकर्मों की अथक पकड़ से मुक्ती की नई आशा का प्रतीक है
36:46एक बार पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाने के बाद नरक के सबसे गहरे कोनों में एक स्वर्गिये द्वार धीरे
36:53से खुलता है जो अब बोज मुक्त आत्मा को पार्गमन की एक जलक प्रदान करता है
36:59इस पावन प्रसंग में The Spark of Hope, The Path to Rebirth की महिमा का वर्णन किया गया है
37:07अथा गहरायों से दूर अब पीडा से मुक्त सुक्ष्म आत्मा धीरे धीरे ब्रहमांडी अस्तित्व की परतों के माध्यम से अपनी
37:15कठिन चढ़ाई शुरू करती है
37:18इस पावन प्रसंग में The Spark of Hope, The Path to Rebirth की महिमा का वर्णन किया गया है
37:26यह शांत विशाल इत्रिय विमानों को पार करती है
37:30एक अद्रिश दिव्यधारा द्वारा निर्देशित होती है
37:33इसका रूट सुक्ष्म और चमकदार होता है जो परिवेशिय ब्रहमांडी उर्जाओं को अवशोशित करता है
37:41इस पावन प्रसंग में The Spark of Hope, The Path to Rebirth की महिमा का वर्णन किया गया है
37:49फिर आत्मा स्वर्गिय मार्गों से होकर गुजरती है
37:52चमकती हुई निहारिकाओं और दूर के तारों के पास से होती हुई भौतिक लोकों की ओर अपनी लंबी यात्रा पर
38:00आगे बढ़ती है
38:02इस पावन प्रसंग में The Spark of Hope, The Path to Rebirth की महिमा का वर्णन किया गया है
38:10जैसे ही यह नश्वर दुनिया के करीब आती है, आत्मा एक शक्तिशाली चुम्बकिये खिंचाव महसूस करती है, जीवन के चक्र
38:18में फिर से प्रवेश करने और अनुभव करने की एक आदिम लालसा
38:31इसके बाद यह और नीचे उतरती है, मूल तत्वों, वायू, जल और प्रित्वी में घुल जाती है, प्राकृतिक दुनिया की
38:40जटिल बुनाई के साथ एक हो जाती है
38:44इस पावन प्रसंग में The Spark of Hope, The Path to Rebirth की महिमा का वर्णन किया गया है
38:51आत्मा एक पौधे, एक अन्न के दाने या पानी की एक बूंद में निवास कर सकती है, चेतना के रूप
38:59में फिर से प्रकट होने के लिए कर्म के सही संगम की धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा करती हुई
39:05इस पावन प्रसंग में The Spark of Hope, The Path to Rebirth की महिमा का वर्णन किया गया है
39:13नेती और स्वतंत्र इच्छा के जटिल नरित्य के माध्यम से शुद्ध कर्मिक सार अंतह एक नए जीवन की शुरुवात के
39:20लिए तैयार एक उप्युक्ट जीवित प्राणी में अपना मार्ग पाता है
39:26इस पावन प्रसंग में The Spark of Hope, The Path to Rebirth की महिमा का वर्णन किया गया है
39:34गर्भाधान के शुभक्षन में आत्मा अब चेतना की एक परिश्कृत चिंगारी नए जीवन के साथ विलीन हो जाती है एक
39:42मा के गर्भ के पवित्रस्थान में प्रवेश करती है
39:46इस पावन प्रसंग में The Spark of Hope, The Path to Rebirth की महिमा का वर्णन किया गया है
39:54गर्भ के भीतर आत्मा फिर से निर्मान की अपनी यात्रा शुरू करती है अतीत के स्थूल दागों से मुक्त केवल
40:02अपने परिश्कृत कर्म के सुक्ष्म छापों को धारन करती है
40:07इस पावन प्रसंग में The Spark of Hope, The Path to Rebirth की महिमा का वर्णन किया गया है
40:15भगवान विश्नुने निशकर्ष निकाला इस कठोर ब्रह्मान्डिय नियम में नहित गेहन करुणा को प्रकट करते हुए क्योंकि यह प्रत्येक आत्मा
40:24को परम्मोक्ष और विकास का अवसर प्रदान करता है
40:28इस पावन प्रसंग में The Spark of Hope, The Path to Rebirth की महिमा का वर्णन किया गया है
40:36गरुर्त दिव्य योजना की भव्यता और करुणा से अभिभूत होकर गेहन श्रद्धा में जुक गया
40:42उसका मन अब पुनरजन्म और मोक्ष के शाश्वत सत्य से प्रकाशित था
40:48इस पावन प्रसंग में The Spark of Hope, The Path to Rebirth की महिमा का वर्णन किया गया है

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