गरुड़ पुराण के 15वें अध्याय में जानिए गर्भवास का वो भयानक सच जिसे सुनकर रूह कांप जाएगी। जब एक जीवात्मा मां के गर्भ में बंद होती है, तो उसे अपने पिछले 100 जन्मों का हिसाब याद आता है। वह भगवान विष्णु से रो-रोकर मुक्ति की भीख मांगती है, लेकिन जन्म लेते ही माया का ऐसा पर्दा गिरता है कि सब कुछ भूल जाता है। देखिए आत्मा के पुनर्जन्म का ये रोंगटे खड़े कर देने वाला सफर! #GarudaPurana #GarbhaGita #Rebirth #HinduMythology #LifeAfterDeath #Karma
Category
🦄
CreativityTranscript
00:00पूर्वजों के सम्मान में किये गए अनुष्ठानों के पश्चात गरुड ने भगवान विश्णू से जिग्यासा पूर्वक पूछा की एक पुनर्जन
00:07महेतुनियत आत्मा प्रित्वी पर किस प्रकार लोगती है।
00:12भगवान विश्णू ने मंद मुस्कान के साथ स्रिष्टी के इस गहरे रहस्य को उजागर करना आरंभ किया, जो जीवन के
00:20शाश्वत चक्र को नियंत्रित करता है।
00:24उन्होंने समझाया कि मृत्यू के क्षण में स्थूल शरीर को त्याग कर आत्मा एक सुक्ष्म अद्रिष्य सत्ता के रूप में
00:32ब्रहमांड में विचर्ण करती है।
00:35यहां आत्मा कर्मों के सूत्र से बंधी हुई, नवजीवन की प्रतीक्षा में ब्रहमांड के अग्रिष्य पथों पर तैरती रहती है,
00:43एक अज्यात गंतव्य की ओर बढ़ती हुई।
00:46भगवान ने आगे बताया कि कर्मों का अग्रिष्य खिंचाव ही इस आत्मा को पुनह प्रिथवी लोग की ओर खींचता है,
00:54जैसे एक अग्रिष्य धागा उसे नीचे की ओर खींचता है।
00:59उपर से देखने पर पृत्वी एक चमकते हुए नीले रत्न की भाती प्रतीत होती है, जिस पर जीवन का स्पंदन
01:07स्पष्ट महसूस होता है।
01:32और खिर पहली वर्षा की बूंद आकाश से गिरती है, अपने साथ उस सुक्ष्म आत्मा को लेकर जो अब जीवन
01:40के नए अध्याय की ओर बढ़ रही है।
01:59और आत्मा को वनस्पती जगत का हिस्सा बना देता है।
02:05पौधा जो अब उस आत्मा को अपने भीतर धारन किये हुए है, जीवन की पूनता की ओर बढ़ता है, अंकुरित
02:12होता, बढ़ता और फलता फूलता है।
02:16अंत्र यह पौधा फल या अनाज के रूप में परिपक्व होता है, और आत्मा अब उस अनाज के कणों में
02:23समाहित हो जाती है।
02:26किसान अपनी मेहंत के फल को काटते हुए, अनजाने में ही नवजीवन की इस यात्रा के वाहग बन जाते हैं।
02:34यह अनाज फिर भोजन के रूप में मनुश्यों द्वारा ग्रहन किये जाते हैं, और आत्मा पिता के शरीर में प्रवेश
02:42कर जाती है।
02:43अनाज के माध्यन से प्राप्त यह आत्मा अब पिता के शरीर में समाहित होकर नवजीवन के बीज का निर्मान करती
02:52है।
02:53यह एक पवित्र मिलन है, जहां शरीर, आत्मा और प्रकृती के तत्व मिलकर एक नए जीवन की नीव रखते हैं,
03:01अत्यंत गुक्त और दिव्य रूप से।
03:04इस प्रकार आत्मा सुक्ष्म रूप से प्रित्वी पर लौट आती है, और नवजीवन के स्रिजन में अपनी भूमी का निभाती
03:12है, जन्म के रहस्यमई चक्र को पूरा करती है।
03:16गरुड इस गहन और जटिल प्रक्रिया को सुनकर स्तब्ध रह गए, उनके हृदय में स्रिश्टी के प्रती एक नई श्रधा
03:24जाग उठी।
03:25भगवान विश्णू ने अपनी बात समाप्त करते हुए, जीवन के इस सुक्ष्म पत की पवित्रता और उसके अविरल प्रवाह पर
03:34बल दिया, जो हर जीव के लिए अनिवार्य है।
03:37इसके पश्चात भगवान विश्णू ने गंभीर वानी में गर्भाधान के उस गोपनिय और सुक्ष्म विध्यान का वर्णन आरंब किया, जो
03:47आत्मा के पुनह प्रित्वी पर साकार होने का प्रथम चरण है।
03:52उन्होंने समझाया कि जब एक पुरुष और स्त्री का भौतिक मिलाप होता है, तब ब्रह्मान के पंच महाभूत, प्रित्वी, जल,
04:00अगनी, वायू और आकाश एक अद्रिश बिंदू पर संरेखित हो जाते हैं।
04:06उसी क्षण अपने पूर्व जन्मों के संचित कर्मों और संसकारों की भारी पोटली उठाए हुए सुक्ष्म शरीर अंतरिक्ष के अनंत
04:14अंधकार में एक टिम्टिमाते तारे की भांती तैरता है।
04:19दैव अर्थात प्रारब्ध की अमोग शक्ती उस सुक्ष्म आत्मा को एक अद्रिश और तीवर गुरुत्वाकर्शन से खीच कर उसके कर्मों
04:28के अनुकूल माता की कोख की ओर धकेलती है।
04:32माता के गर्भ के उस पवित्र और अंधकार्मय गर्भाश में नवजीवन के स्रिजन के लिए जैविक उर्जा की एक रहस्य
04:40में अगनी प्रजवलित हो उठती है।
04:43पिता के बीज की जीवन दाइनी शक्ती और माता के गर्भ का पोशित रज मिलकर एक सुक्ष्म भौतिक धाचा तयार
04:51करते हैं, जो उस सुक्ष्म जीव का नया घर बनने वाला है।
04:57भगवान विश्नु ने गरूर को बताया कि यह सुक्ष्म आत्मा, जो अब तक निराकार आकाश में थी, अचानक एक तीवर
05:05खिंचाव के साथ उस नवनिर्मित भौतिक बिंदु में प्रवेश करती है।
05:10वह सुक्ष्म आत्मा माता द्वारा ग्रहेन किये गए, अन्न और जल के माध्यम से उसके प्राणों में विलीन होकर, धीरे
05:18-धीरे कोख के तरल में अपना स्थान बनाती है।
05:22जैसे ही वह सुक्ष्म शरीर उस गर्भाशय के तरल पदार्थ से मिलता है, पूरे ब्रहमांडिय नियम के प्रभाव से कोख
05:30में एक मौन परंतु तीवर कमपन उत्पन होता है।
05:34इस महामिलन के क्षन वह ननहा भौतिक अंश अचानक एक तीवर और अलोकिक सुनहरी रोशनी से जगमगा उठता है, जो
05:43चेतना के वहां आगमन का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
05:47युगों युगों तक अनन्ट आकाश में स्वतंत्र घूमने वाली वह आत्मा, अब उस संकीर्ण, गर्म और अंधकार में भौतिक कोख
05:55के बंधन में स्वयन को पहली बार बंधा हुआ पाती है।
05:59कोख में प्रवेश करते ही, सत्व, रज और तम नामक तीन गुन उस नवजात जीव की सुक्ष्म चेतना को घेर
06:08कर उसके भावी चरित्र और नेती का तानाबाना बुनने लगते हैं।
06:13गरुर ने अत्यंत विस्मय से भर कर पूछा कि है प्रभु वह मुक्त आत्मा इस संकीन कोख के कश्ट को
06:20कैसे सहन करती है और उसका अगला अनुभव क्या होता है।
06:25भगवान विश्णू ने उत्तर दिया कि उस आत्मा के पिछले जन्मों के समस्त संचित कर्म उसके विकासशील शरीर की प्रत्येक
06:34कोशिका में अपनी अमिट छाप छोड़ना प्रारंभ कर देते हैं।
06:39गर्भाशय का वह तरल पदार्थ उस समय एक रहस्यमई दरपन बन जाता है, जिसमें उस सुक्ष्म चेतना को अपने पूर्व
06:47जन्मों के धुंधले द्रिश्य और बिछले हुए चेहरे दिखाई देने लगते हैं।
06:53यद्यपी वह एक अत्यंत सुक्ष्म और असहाय अवस्था में होता है, परंतु उस आत्मा के पास इस समय एक तीवर
07:01और तीक्ष्न ब्रह्मांडिये चेतना होती है, जो उसे उसके वास्तविक स्वरूप का स्मरण कराती है।
07:09ततपश्चात, स्रिष्टी के शाश्वत नियम यानी रित के प्रभाव से माता की कोख का द्वार पूरी तरह से बंध हो
07:16जाता है, और आत्मा उस भौतिक कारागार में नौ महीनों के लिए बंध हो जाती है।
07:23भगवान विश्णु ने जोर दे कर कहा कि कोख का यह अंधकार में और संकियन कक्ष कोई सन्योग नहीं, बलकि
07:30जीव द्वारा स्वया अर्जित किये गए कर्मों का ही न्याय संगत परिनाम है।
07:36जैसे जैसे दिन बीटते हैं, वह सुक्ष्म भुरून धीरे धीरे बढ़ने लगता है, और पंच्तत्वों की परतें उस अमर आत्मा
07:44को नश्वर मास और हड्डियों के पिंजरे में लपेटने लगती हैं।
07:50इस प्रकार गर्भाधान का प्रथम चरण पूर्ण होता है, और वह कोख एक गहरे, रहस्यमई और भारी सन्नाटे में डूब
07:58जाती है, जहां वह आत्मा अपनी भयानक और लंबी यात्रा के लिए तयार होती है।
08:05प्रथम मास के आरंभिक दिनों में गर्भाधान का वह सन्युक्त बीज केवल एक तरल जल बिंदु के रूप में कोख
08:12के असीम अंधकार में तैरता रहता है।
08:16भगवान विश्नु पक्षी राज गरूर को बताते हैं कि कैसे उस सुक्ष्म तरल बिंदु के चारों और पंच्चतत्व अपनी पहली
08:24अद्रिश परते लपेटना शुरू करते हैं।
08:28आत्मा के पूर्व जन्मों का संचित कर्म ही वह अद्रिश मूर्तिकार है, जो उस निश्प्रान द्रव को एक निश्चित भौतिक
08:36आकार देने की प्रक्रिया शुरू करता है।
08:39लगभग साथ से दस दिनों के बीतने पर वह साधारन तरल बिंदु धीरे-धीरे एक छोटे से पारगर्शी बुलबुले का
08:47रूप धारन करने लगता है।
08:50इस सुक्ष्म बुलबुले के भीतर ब्रहमांडिय प्रान उर्जा का प्रथम संचार होता है, जो उसे बिखरने से रोक कर स्थिर्टा
08:58प्रदान करता है।
09:01पंद्रवे दिन तक आते-आते वह बुल-बुला घना होने लगता है और एक मुलायम चिप-चिपे मास के पिंड
09:08में बदलने की दिशा में बढ़ता है।
09:11श्री हरी स्पष्ट करते हैं कि माता के उदर की सुक्ष्म जठरागनी उस तरल मांस्पिंड को धीरे-धीरे पका कर
09:18ठोस बनाना प्रारंभ कर देती है।
09:22इस पक्ते हुए पिंड के भीतर कैद अमर आत्मा पहली बार अपने नए नश्वर धाचे की तपन और संकीर्नता को
09:29महसूस करने लगती है।
09:33बीसवे दिन के आसपास यह मांस्पिंड और अधिक कठोर होकर एक निश्चित अंडाकार आकार ग्रहन कर लेता है।
09:41इसी समय माया का गेहन आवर्ण उस चेतना को अपने प्रभाव में लेने लगता है, जिससे पिछले जन्मों की स्मृतियों
09:49पर धुंध चाने लगती है।
09:52जीव के पूर्व संचित कर्मों की व्यवस्था के अनुसार उस पिंड के भीतर लिंग और शारिरिक विशेष्टाओं का सुक्ष्म आधार
10:00निर्मित होने लगता है।
10:0325 दिन तक उस ठोस होते पिंड के भीतर आंतरिक कोशि का विभाजन तीवर हो जाता है, जो भविश्य के
10:11अंगों की नीम रखता है।
10:1225 माता के गर्भाशय के रसों में तैरती हुई वह आत्मा बिना सांस और गती के अत्यंत असहाय अवस्था में
10:20कोख के जल में पड़ी रहती है।
10:24भगवान विश्णू बताते हैं कि किस प्रकार माता द्वारा ग्रहें किये गए भोजन का सुक्ष्म सार्रस उस बढ़ते पिंड को
10:31निरंतर पोशन प्रदान करता है।
10:35तीसवे दिन के अंत तक वह आरंभिक जलबूंद पूरी तरह से एक कठोर संवर्ठित मासाहारी पिंड में परिवर्तित हो जाती
10:43है।
10:45इस कठोर पिंड के बनते ही आत्मा स्वयन को भौतिक सीमाओ के एक अत्यंत संकीर्ण और बंद कक्ष में पूर्णत
10:52फंसा हुआ अनुभव करती है।
10:56गरुर अत्यंत ध्यानपूर्वक सुनते हैं जब प्रभु प्रकट करते हैं कि कैसे यह छोटा सा पिंड ही भावी जीवन के
11:03समस्त सुखों और दुखों का आधार बनता है।
11:08सुक्ष्म शरीर अब इस भौतिक मानसाहारी पिंड से मजबूती से बंध जाता है, जिससे आत्मा का इस नश्वर संसार से
11:16शारिरिक संबंध स्थापित हो जाता है।
11:20प्रथम मास की समाप्ती पर वह कोख अब दूसरे महीने में होने वाले सिर और मुख्य अंगों के अंकुरन के
11:27लिए तयार होने लगती है।
11:30केवल एक जल की बून का ऐसा कठोर मानस्पिंड बनना ही इस बात का प्रमान है कि कर्म का चक्र
11:37कितना अचूक और अप्रिवर्तनिय है।
11:40हे खगेश्वर तीसरे महीने के बाद जब चतुर्थ मास का आरंभ होता है तो वह निराकार पिंड धीरे-धीरे मानव
11:48स्वरूप धारन करने की दिशा में बढ़ने लगता है।
11:53पंचम महीने में प्रवेश करते ही उस सुक्ष्म जीव का सिर जिसमें बुद्धी और चेतना का वास होना है, स्पष्ट
12:01रूप से आकार लेने लगता है।
12:04उसी अंधकारमई गर्भाशे में अंकुरित होते बीजों की भानती उस जीव के ननहे हाथ, पैर और उंगलियों का निर्मान होने
12:12लगता है।
12:14धीरे धीरे एक अत्यंत कोमल त्वचा उस नवनिर्मित मास को ढख लेती है, जो उस ननहे जीव को बाहरी संसार
12:22से पूरी तरह प्रिथक कर देती है।
12:25इसी अवधी में आख, कान, नाक और मुख के सूश्म द्वार खुलने लगते हैं, मानोचेतना के लिए पाँच जरोखे तयार
12:34किये जा रहे हो।
12:36भगवान विश्नु के इस रहस्यमई वर्णन को सुनकर पक्षी राज गरोड का हरिदय काम उठता है और वे अत्यंत आदर
12:44पूर्वक प्रभू की ओर देखने लगते हैं।
12:47गर्भ के संकुचित स्थान में अभर्दय की धड़कन आरंभ होती है और वह ननहा जीव पहली बार अपने अस्तित्व के
12:55स्पंदन को महसूस करता है।
12:59परंतु इस विकास के साथ ही उस ननहे शरीर में बंध जीवात्मा को अचानक अपने बंधनों और इस घोर अंधकार्मई
13:07कारागार का भान होने लगता है।
13:10जैसे जैसे शरीर बढ़ता है वह कोमल कोख और भी संकरी होने लगती है जिससे जीव के घुटने और सिर
13:18आपस में पूरी तरह सट जाते हैं।
13:22इसी समय माता के शरीर की जठरागनी जो भोजन को पचाती है उस कोख के अत्यंत समीप प्रचंड रूप से
13:29धधकने लगती है।
13:31उस दिव्य जठरागनी की असहनिय उष्णता गर्ब के जल को खौलाने लगती है जिससे उस सुकुमार जीव का रोम्रोम जलने
13:40लगता है।
13:42कोख की उस संकरी और अंधकारमय कोठरी में वह असहाय जीवात्मा तवे पर रखे पानी की बूंद की तरहे तडपने
13:50और छट पटाने लगती है।
13:53माता द्वारा ग्रहन किये गए कडवे, तीखे, खटे और नमकीन रसों का सीधा प्रभाव उसको मल गर्ब पर पड़ता है,
14:01जिससे उसकी पीड़ा और बढ़ जाती है।
14:05माता की हर करवट और हल्चल उस ननहे जीव के लिए किसी भयानक भूकम्प या परवत के गिरने जैसी विनाशकारी
14:13चोट के समान होती है।
14:16इस असहनिय पीड़ा के बीच अचानक उस जीव के मन में उसके पिछले सैकडों जन्मों के सारे कर्म और स्मृतियां
14:24बिजली की तरह कौंध उठती हैं।
14:27वह अपने पूर्व जन्मों के पापों, जूठे अभिमान और नश्ट किये गए समय को याद करके गर्ब के भी तरही
14:34मौन विलाप करने लगता है।
14:37अत्यंत व्याकुल होकर वह आत्मा इश्वर से प्रार्थना करती है कि है प्रभु मुझे इस बार इस नरक से निकालो,
14:45मैं केवल आपका ही भजन करूंगा।
14:48परंतु कर्मों का चक्र निर्दई है और जठरागनी का वह निरंतर संताप उसे उसके पिछले कर्मों का फल भुगतने के
14:56लिए विवश करता रहता है।
14:59विस्मित और द्रवित होकर गरूर पूचते हैं कि हे कमलनियन दया के सागर होकर भी आप इस अबोध जीव को
15:07इतनी भयानक यातना क्यों देते हैं।
15:10तब श्री हरी मंद मुसकान के साथ समझाते हैं कि यह संताप कोई दंड नहीं बलकि आत्मा को पुनह जागरित
15:18करने और उसे माया के बंधनों से सचेट करने का एक महाशुद्धिकरण है।
15:25यहां आंतरिक तपस्याही जीव को माया के गहनतम अंधकार से निकाल कर आत्मज्यान के प्रकाश की ओर धकेलती हैं, जहां
15:33उसे अपने वास्तविक स्वरूप का बोध होता है।
15:37इसी महान शुद्धी के क्रम में गर्भावस्था के सात्वे मास में सुक्ष्म जीव के समवेदी अंगपूर्न रूप से विक्सित होने
15:46लगते हैं।
15:48आखें, कान, त्वचा और जिहवा धीरे-धीरे बाहरी संसार को ग्रहन करने के लिए अपनी चेतना की पहली परत खोलते
15:56हैं।
15:57और फिर एक अप्रत्याशित क्षण में आत्मा गेहन निद्रा से जागरित होकर सक्रिय चेतना के साथ इस नवीन देह में
16:05प्रविष्ठ होती है।
16:08चेतना के जागते ही, जीव को अपनी तंग और संकुचित स्थिती का भयंकर बोध होता है, जैसे वह एक अंधेरी
16:16गर्म कोठरी में बंध हो।
16:19वह पहली बार मा के शरीर की कोमल हलचल, उसके चलने फिरने से होने वाला धीरे-धीरे जूलने का अनुभव
16:26करता है।
16:27कभी अचानक जटका लगने से यामा के असहज होने पर उसे भी तीवर असुविधा और भय का अनुभव होता है।
16:37इसके साथ ही माद्वारा ग्रहेन किये गए भोज्य पदार्थों का सार एक असपष्ट स्वाद के रूप में उसकी जिहवा तक
16:45पहुँचता है।
16:47यह स्वाद कभी सुखत जुडाव का एहसास कराता है तो कभी विरक्ती और विवश्टा की भावना भर देता है।
16:56परंतु इन सबसे उपर उसे अपनी सीमित, बंधी हुई देह और कोख के भीतर की भारी दमगोंटू स्थिती का असहनिय
17:04बोज महसूस होता है।
17:07यह पीडा उसे बार-बार अपनी मुक्ती की आकांक्षा से भर देती है, किन्तु शारिरिक बंधन उसे असहाय कर देते
17:15हैं।
17:16इस अदमय कश्ट के बीच ही उसकी चेतना के किसी कोने में धुन्धली और खंडित स्मृतियों का एक शीन प्रकाश
17:24टिम्टिमाता है।
17:26यह प्रकाश धीरे-धीरे फैलने लगता है और उसे अपने पिछले जन्मों के कुछ धुन्धले चित्र, स्वपन की तरह दिखाई
17:34देने लगते हैं।
17:36असपश्टता से निकल कर ये स्मृतिया अधिक स्पश्ट होने लगती हैं। उसे अपने पूर्व जन्मों की विशिष्ट घटनाओं और कर्मों
17:45की जाकी मिलती है।
17:48सुखदुख प्रेमघेना, आशा निराशा, सभी भावनाएं एक साथ उसके ननहे से अस्तित्व को घेर लेती हैं, जैसे एक विशाल जलधारा
17:57में डूग रहा हो।
17:59तब उसे जन्म और मृत्यू के इस अन्थीन चक्र, संसार की माया और कर्म के अटल विधान का भयानक सत्य
18:07समझ में आता है।
18:09अपने पिछले कर्मों के फल, उनके कारण हुई पीडा, और इस चक्र से मुक्ती न पाने का अपार दुख उसे
18:17भीतर तक जखजोर देता है।
18:19इस गहन अंधकार और पीडा से मुक्त होने की तीवर इच्छा से प्रेरित होकर, वह आत्मा अपने हृदय से परम्पिता
18:28परमात्मा से प्रार्थना करती है।
18:31तब श्री हरी अपने दिव्यस इनहासन पर आसीन होकर उस अबोध जीव की हृदय विदारक प्रार्थना को सुनते हैं और
18:39मंद मुस्कान के साथ उसकी चेतना को स्विकारते हैं।
18:44श्री हरी समझाते हैं कि गर्भ का यह गेहन कारावास और पूर्व जन्मों की स्मृति का जागर्ण ही आत्मा को
18:52मोक्ष की और उन्मुख करने का एक अनिवार्य सोपान है।
18:57भगवान श्री हरी की असीम क्रिपा से उस अबोध जीव के भीतर का ज्यान्चक्षु अचानक जागरत हो जाता है और
19:04काल का रहस्य में परदा हटने लगता है।
19:09देखते ही देखते उस अंधकार्मय गर्भ की दीवारे धुंधली पड़ जाती हैं और आत्मा के सामने पिछले सहसरों जन्मों का
19:17एक विक्राल और सजीव द्रिश्य प्रकट होने लगता है।
19:22प्रथम दर्शन में आत्मा स्वयन को एक अहंकारी और वैभवशाली समराट के रूप में देखती है, जो स्वर्ण और रतनों
19:30से ढके महल में बैठकर निर्धनों की चीटकार को अंदेखा कर रहा था।
19:34अगले ही क्षन वह अपने उस समराट रूप की अकस्मात मृत्यू और उसके बाद उसके सामराज्य, स्वर्ण तथा अभिमान को
19:43धूल में मिलते हुए देखती है।
19:46काल चक्र आगे घूमता है और आत्मा पाती है कि एक अन्य जन्म में वह एक निर्धई योध्धा थी, जिसने
19:54अपने बाहुबल के मद में अंगिनत निर्धोशों का रक्त बहाया था।
19:59युद्ध भूमी में अपने अंतिम खशनों में तडपते हुए उस योध्धा को यह बोध हुआ था कि उसकी हिंसा का
20:06परिनाम केवल घोर एकाकीपन और अंथीन संताप ही था।
20:12ततपश्चात आत्मा एक छली व्यापारी का रूप देखती है, जिसने अपने जीवन भर जूठे तराजू और कपट से असहाय ग्रामीनों
20:20को ठक कर अपार धन एकत्र किया था।
20:23किन्तु मृत्यू शया पर पड़े उस व्यापारी ने देखा कि उसका बटोरा हुआ अधर्मी धन उसकी रक्षा न कर सका
20:31और उसके परिजन उसकी सांसे छूटने से पहले ही संपत्ती पर लड़ने लगे थे।
20:37इसके बाद आत्मा पशुपक्षियों की निन्न योनियों में बिताए अपने भयावह जन्मों को देखती है जहां वह घने जंगलों में
20:45केवल क्षुधा और प्रानभय से ग्रसित थी।
20:49शिकार और शिकारी के इस क्रूर दुछक्र में वह अंगिनक बार चीरफाड और भयानक पीडा सहते हुए मृक्यू के मुख
20:57में धकेली गई थी।
20:59वह यह देखकर काम्प उठती है कि कैसे व्रिक्ष और स्थावर योनियों में बंद रहकर उसने सदियों तक घोर ग्रीश्म,
21:07शीतल बर्फ और कटाई का मुख कष्ट सहन किया था।
21:11एक अन्यद्रिश में वह स्वयं को वासना और क्षनिक सुखों में डूबा हुआ पाती है जहां उसने धर्म और इश्वर
21:19के मार्ग को तुछ समझ कर ठुकरा दिया था।
21:22किन्तु उस विलासिता का अंत तब हुआ जब यमदूतों के भयानत पाश ने उसे जकड लिया और उसका सारा जूठा
21:30अहंकार क्षन भर में वाश्प बनकर उड़ गया।
21:34आत्मा यह देखकर शौक में डूब जाती है कि उसने 84 लाख योनियों के इस विशाल जाल में अंगिनत मातापिता,
21:42पति-पत्नी और संतानों को पाया और खोया है।
21:46जिन प्रिजनों के मोह में उसने अधर्म किये, वे सभी काल के गाल में समा चुके थे और किसी को
21:53भी उसके अस्तित्व का तनिक भी स्मरन नहीं रहा था।
21:56अपने पिछले सभी जूठे नामों, उपाधियों और शारिरिक पहचानों को धूल में बदलते देखकर उसका समस्त अभिमान छिन्नभिन हो जाता
22:06है।
22:08वह सपष्ट देखती है कि क्षनिक दैहिक सुखों के लिए किये गए पापों का दंड भोगने के लिए उसे किनकिन
22:15दारुन नर्कों की यातनाओं से गुजरना पड़ा था।
22:19गर्भ के उस संकुचित और घोर अंधकार में कैद होकर अबोध जीव का चेतना रूप 84 लाख योनियों के प्रचंट
22:27भार से भैभीत होकर थर-थर कामपने लगता है।
22:31उसकी आत्मा में पश्चात्ताप की तीवर अगनी जल उठती है और वह संसार की समस्त नश्वर वस्तूओं और मिथ्या संबंधों
22:40से अपना मुह मोड लेती है।
22:43अत्यंत दीनभाव से वह अबोध जीव गर्भ में ही अपने छोटे से हाथ जोड कर श्री हरी से प्रार्थना करता
22:51है कि है प्रभुक मुझे इस भवबंधन से सदा के लिए मुक्त कर दीजिए।
22:56गर्भ के भीतर घोर संकुचित अंधकार में लिप्ता हुआ वह अबोध जीव अपने पिछले जन्मों के अंथीन दुखों और पापों
23:04को याद करके थर-थर कामपने लगता है।
23:08अपने कोमल और अविक्सित हाथों को श्रधा पूर्वक जोड कर वह सुक्षम जीव अपनी समस्त चेतना को जगत के रक्षक
23:16भगवान श्री हरी विश्नु के चर्णों में केंद्रित करता है।
23:21उट घोर अंधकार मई कोख के भीतर, जीव की आंतरिक दिव्यद्रिष्टी के सामने शेशनाग पर विराजमान भगवान विश्नु का परम
23:29तेजस्वी और अलौकिक रूप प्रकट होता है।
23:33पश्चात ताप के आसुओं में डूबी वह ननही आत्मा अपने पूर्व जन्मों के अहंकार और मिथ्या अभिमान को स्वीकार करते
23:41हुए भगवान के सामने फूट फूट कर रोपड़ती है।
23:46उसे याद आता है कि किस प्रकार पिछले मानव जन्मों में वह केवल भौतिक धन, वासना और सांसारिक मोहमाया के
23:54जाल में फसकर दूसरों के दुखों को अंदेखा करता रहा।
23:58वह अबोध जीव अत्यंत दीन स्वर में उनक्षणों के लिए क्षमा मांगता है जब उसने लोग के वश में होकर
24:06अपनी वास्तविक दिव्य चेतना को भुला दिया था।
24:09गर्भाशय की उस दंभोंटू और संकरी कोठरी में भगवान विश्णू की असीम करुणा की एक दिव्य और कोमल किरण उस
24:18असहाय जीव को संबल प्रदान करती है।
24:21वह हृदय से यह प्रतिग्या करता है कि इस बार मृत्यू लोक में कदम रखते ही वह संसार के प्रत्येक
24:29प्राणी को उसी परम्पिता परमेश्वर का अंश मान कर आधर देगा।
24:34वह जीव द्रिड संकल्प लेता है कि वह वासना और अहंकार रूपी माया के जूठे बंधनों को त्याग कर पूर्णतय
24:42धर्म, परोपकार और सात्विक मार्ग पर अग्रसर रहेगा।
24:46उसकी अंतरद्रिष्टी में चतुर भुजधारी भगवान नारायन के हाथों में चमकता सुदर्शन चक्र और शंक दिखाई देते हैं, जिनकी स्वर्णेम
24:55आभा उस अंधकारमय गर्भ को आलोकित कर देती है।
25:00वह जीव मन ही मन करोन पुकार करते हुए नारायन से पूछता है कि हे प्रभु मुझे इन संकुचित अस्थियों
25:08और मास के भयानक पिंजरे में और कितनी देर तडपना होगा।
25:13वह अपनी असहनिय पीडा बया करते हुए कहता है कि माता के पेट की जठरागनी और शारिरिक उष्णता उसके इस
25:20अत्यंत सुकुमार और अविक्सित शरीर को प्रतिपल जुलसा रही है।
25:26गर्भ के मलिन वातावर्ण और घोर अंधकार के बीच छट पटाता हुआ वह जीव केवल भगवान विश्णु के शीतल चरण
25:34कमलों की शरण में ही परमशांती का अनुभव करता है।
25:39वह परमेश्वर को साक्षी मान कर प्रतिग्या करता है कि उसके आगामी जीवन का प्रत्येक श्वास केवल और केवल नारायन
25:47नाम के संकीरतन और भक्ती में ही समर्पित होगा।
25:51उसकी इस व्याकुल पुकार को सुनकर भगवान विश्णु का नीलमेग शामल रूप अत्यंत मंद मुस्कान के साथ असीन करुणा और
26:00वातसल्य की वर्शा करने लगता है।
26:03वह जीव पूर्ण विनमर्ता से स्वीकार करता है कि उसका यह वर्तमान गर्भवास का घोर कश्ट किसी और के कारण
26:11नहीं, बलकि उसके स्वयं के संचित कर्मों का ही फल है।
26:16वह अश्रुपूर्ण नेत्रों से प्रार्थना करता है कि हे माधव, जन्म लेते ही मुझे आपकी माया पुनह ग्रसित न कर
26:24ले और मैं इस भयानक गर्भवास की प्रतिग्या को कभी न भूलूं।
26:29अपनी प्रार्थना को और अधिक तीवर करते हुए, वह आत्मा इस जैविक पिंजरे से मुक्त होकर सीधे भगवान के परम
26:37धाम वैकुंठ को प्राप्त करने की आचना करती है।
26:41तभी भगवान विश्नु के वक्षस्थल पर सुशोभित कौस्तुभ मनी से एक दिव्य और शीतल स्वर्णिन प्रकाश निकलता है, जो उस
26:50भून को चारों और से सुरक्षा कवच की भानती ढक लेता है।
26:55परम समर्पन और अटूट विश्वास से भरा हुआ वह अबोध जीव अब गर्भ की इस पीड़ा को मोक्ष प्राप्ती की
27:02एक स्वर्णिन सीधी मान कर अत्यंत शांत भाव से श्री हरी के ध्यान में मगन हो जाता है।
27:09जैसे ही दस्वा मास लगा, प्रकृती के चक्र ने अपनी अंतिम यात्रा का आरंब किया, ब्रह्मांडी उर्जाओं में एक सुक्ष्म
27:17परिवर्तन आया जो उस गर्भस्थ शिशु के लिए एक नए अध्याय का संकेत था।
27:24धीरे धीरे प्रसूती वायू की अलौकिक शक्ती ने अपनी उपस्थिती दर्स करानी शुरू की, जैसे कोई अध्रिश्य धारा उस जीव
27:32को अपने प्रवाह में खीचने का प्रयत्न कर रही हो।
27:36गर्भ की दीवारों में एक धीमी लैबध संकुचन की अनुभूती हुई, जिसने उस आत्मा को एक अप्रिचित और असहज दबाव
27:45का एसास कराया।
27:48कौस्तुभ मनी से निकला दिव्यस्वर्णिम प्रकाश, जो सुरक्षा कवच बना हुआ था, अब बाह्य शक्तियों के बढ़ते प्रभाव से कुछ
27:56क्षन के लिए मंद पढ़ने लगा।
27:59प्रसूती वायू का वेग अब और तीवर हो चला था, जो उस जीव को धीरे-धीरे नीचे की ओर धकेलने
28:06लगा, मानो कोई अद्रिश शक्ती उसे जन्म के द्वार की ओर खीच रही हो।
28:11श्री हरी के ध्यान में मगन उस जीव की शांती अब भंग होने लगी थी, क्योंकि बढ़ती हुई पीड़ा उसे
28:19अपनी आध्यात्मिक एकागरता से विचलित करने का प्रयास कर रही थी।
28:45इस अमानविय दबाव के कारण शिशु का शरीर स्वय ही प्रतिक्रिया देने लगा और उसका सिर्फ प्राकृतिक रूप से नीचे
28:53की ओर बाहर निकलने के मार्ग की ओर मुड़ गया।
28:57पीड़ा की एक तीचन लहर उस अबोध जीव को जख जोर गई जैसे सहस्त्रों बिच्छूों ने एक साथ डंक मार
29:05दिया हो।
29:06विश्नु के वक्षस्थल से निकली दिव्य शक्ती का वह कवच अब भीशन युद्ध लड़ रहा था, जो उस आत्मा को
29:13पूर्णत है कुछले जाने से रोकने का अथक प्रयास कर रहा था।
29:17इस असहनिय यंत्रणा के बावजूद उस आत्मा का द्रिड संकल्प और श्री हरी पर उसका अटूट विश्वास ही उसे इस
29:26अंधकार्मय यात्ना से जूजने की शक्ती प्रदान कर रहा था।
29:31प्रत्यक्षन के साथ पीडा और अधिक विक्राल होती गई, मानो विशाल परवत्खंड उस ननहे से अस्तित्व को पीसे जा रहे
29:39हो और मुक्ती की आशा धूमिल पड़ने लगी।
29:43जन्मार्ग अब एक ऐसी संकरी सुरंग में बदल चुका था, जहां से गुजरना किसी भी जीवित प्राणी के लिए मृत्यू
29:50के समान कष्ट दाई था।
29:53बाहर की दुनिया से मा के शरीर की तीवर पीडा भी उस भुरून तक पहुँच रही थी, जो उसके अपने
30:00संधर्श को और अधिक भयावा बना रही थी।
30:03अंतह प्रसूती वायू ने अपनी अंतिम और सबसे प्रचंड शक्ती का प्रदर्शन किया, जिससे शिशु को एक अविश्वस्निय धक्का लगा,
30:12जो उसे जीवन और मृत्यू की सीमा रेखा की ओर धकेल रहा था।
30:17एक अंतिम कश्ट दायक जटके के साथ, वह ननहा शरीर उस अंधकार मै कारागार से सिर के बल बाहर निकला,
30:25एक नए अज्यात संसार की ओर।
30:29गर्भ के अंधकार और पीडा से मुक्थ होकर, उस आत्मा ने एक शनिक शांती का अनुभव किया, जैसे गहन रात्री
30:37के बाद भोर का पहला प्रकाश फूट पड़ा हो।
30:40नाभी से जुडावह जीवन सेतु कट्ते ही, पहली बार वायू के स्पर्ष से उस नवजात ने एक गहरी, कष्ट प्रत
30:48सांस ली, जिससे उसका छोटा शरीर जीवन के पहले रुदन में सिमट गया।
30:54इस नए भौतिक शरीर में प्रविष्ट होकर भी, उस आत्मा को अपनी पिछली आध्यात्मिक यात्रा और श्री हरी से जुडाव
31:02की एक धूमिल, किन्तु गहन स्मृती अभी भी शेश थी, जिसने उसके अस्तित्व को एक अनोखी पहचान दी।
31:09उसी क्षन क्षीर सागर के दिव्यधाम से भगवान श्री हरी विष्णू की परम इच्छा से उनकी त्रिगुनात्मक शक्ती वैश्नवी माया,
31:19जागरित हो उठी।
31:21संसार के माया जाल को अक्षुन रखने के लिए, वह मोहिनी माया एक दिव्य एवं अद्रिश्य स्वर्णिन कोहरे के रूप
31:28में प्रिथवी लोग की और तीवर वेग से बढ़ी।
31:32नवजात के पहली बार रोते ही, उस अभेध्य वैश्नवी माया का प्रचन प्रहार सीधे शिशु के कोमल और नवजागरित मस्तक
31:40पर पड़ा।
31:42गर्भवास के अंधकार में जिस आत्मा का संबंध पर मात्मा से निरंतर जुडा हुआ था, वह चेतना की अद्रिश्य दोर
31:50माया के स्पर्ष से कामपने लगी।
31:53माया की स्वर्णिम तरंगों ने शिशु के आग्या चक्र को ढख लिया, जैसे किसी उजवल दरपन पर अकस्मात धूल की
32:00एक मोटी परत जम जाती है।
32:04नवजात का सूक्ष्म शरीर उस अनपेक्षित आगहात से सिहर उठा, क्योंकि उसके हजारों पिछले जन्मों का संचित ज्यान पलभर में
32:13धुन्धलाने लगा था।
32:15राजाओं के मुकुट, तपस्वियों के तपोबल और अनेक योनियों के संचित कर्म फल सब एक जोके में भाप बनकर उड़ने
32:23लगे।
32:24गर्भ के घोर कष्ट में उस आत्माने भगवान श्री हरी से मुक्ती पाने और भक्ती करने का जो द्रिढ वचन
32:31दिया था, वह संकल्प स्मृति के पन्नों से मिटने लगा।
32:36वह चतुर्भुज नारायन का अलौकिक सौंदर्य जो गर्भ की पीडा के समय एक मात्र सहारा था, अब विस्मृति के अंधकार
32:44में लुप्थ हो गया।
32:46जैसे जैसे आध्यात्मिक चेतना सुप्थ हुई, वैसे वैसे शिशु की भौतिक आखें इस नश्वर संसार की वस्तुओं और प्राणियों पर
32:55टिकने लगी।
32:57माया ने अज्यानता का वह परदा गिरा दिया, जिसके कारण ज्यानी आत्मा स्वयन को केवल मास और रक्ट से बना
33:04एक छोटा सा शरीर समझने लगी।
33:08स्मृति के अंतिमक्षणों में आत्मा ने ओम का जाप करने का प्रयास किया, किन्तु नवजात मुख से केवल एक असहाय
33:15रुदन ही बाहर निकल सका।
33:18वैकुंठ में विराजमान श्री हरी ने अपनी इस माया लीला को देखा, जो जीव को संसार चक्र में बांधने के
33:25लिए अति आवश्यक थी।
33:28देवी महा माया ने नवजात के मस्तक का स्पर्श कर, उस पर अहंकार और ममता के अटूट बंधन अनकित कर
33:35दिये।
33:37आत्मा का वह रोधन जो कभी संसार से विरक्ती की पुकार था, अब सासारिक शुधा और कश्ट का साधारन रोधन
33:45बन गया।
33:46सुतिका ग्रह में एकत्र कुटुमबजन आनंदित हो उठे, इस बात से पूर्णत अंजान की बंध कोख में मिला परम ज्यान
33:54सदा के लिए खो चुका है।
33:57माता के प्रथम दुलार और स्पर्ष की उश्मा ने सांसारिक मोह के अंतिन द्वार को भी सदा के लिए बंद
34:04कर दिया।
34:06गत जन्मों के कर्मों का अपार सागर अब अवचेतन मन की गहराईयों में छिप गया और जागरित मन एक कोरे
34:13कागस की भाती शून्य हो गया।
34:16मैं और मेरा के मायावी जाल में पूरी तरह उलच कर वह अमर आत्मा इस मृत्य लोक के द्वैत और
34:23बंधनों में सिमट गई।
34:25इस प्रकार वैशनवी माया के अचूप प्रभाव से मोहित होकर वह आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को भूल कर एक नए
34:33भौतिक जीवन की कठिन यात्रा पर निकल पड़ी।
34:37उस तंग और अंधकार में प्रसूती ग्रह में, नौ महीनों के भीशन कष्ट के बाद वह ननहा जीव अंत्तह इस
34:45भौतिक जगत की कठोर वायू का स्पर्श करता है।
34:49जैसे ही बाहरी संसार की ठंडी हवा नवजात के कोमल शरीर को छूती है, उसके प्रान काप उठते हैं और
34:57वह पहली बार सांस लेने के लिए छट पटाता है।
35:01जन्म लेते ही उस बालक के कंट से एक तीखी और व्याकुल ध्वनी फूट पड़ती है, जो वास्तव में उस
35:08अमर आत्मा का पहला क्रंदन है।
35:11वह नवजात शिशु रोते हुए आध्यात्मिक रूप से क्वरहम अर्थात मैं कहा हूं की करुन पुकार लगाता है, जो उसके
35:20भटके हुए अस्तित्व की व्यथा को दर्शाता है।
35:24लेकिन इस भौतिक संसार के अज्यान में डूबे मनुश्यों को वह दिव्य आध्यात्मिक पुकार केवल एक साधारन शिशु के कुवा
35:32-कुवा रोने की आवास जैसी सुनाई देती है।
35:36प्रसव की असहनिय पीडा से ठकी हुई माता अपने शिशु की उस पहली आवास को सुनकर अपने सारे कश्ट भूल
35:44जाती है और मातरत्व के असीम सुख में डूब जाती है।
35:49शीरसागर में शेशनाद पर विराजमान भगवान विश्नु अत्यंत गंभीर मुद्रा में पक्षीराज गरुर को इस सांसारिक ध्रम और माया के
35:58अचूप प्रभाव का रहस्य समझाते हैं।
36:02गरुर जी अत्यंत विस्मय और श्रद्धा से अपने दोनों हाथ जोड़े, भगवान नारायन के इस परम सत्य को सुनते हैं
36:10कि कैसे एक मुक्त आत्मा पुनह कर्मों के जाल में जकडली जाती है।
36:16प्रसूती ग्रिह में उपस्थित व्रिधस्त्रिया अत्यंत हर्ष के साथ उस नवजात शिशु को औशधिय जल से स्नान कराती हैं और
36:24उसे रेश्मी वस्त्रों में लपेटती हैं।
36:28कुटिया के द्वार पर खड़ा पिता, पुत्र के जन्म का समाचार सुनते ही प्रसन्नता से भर जाता है और उसके
36:35नेत्रों से आनंद के अश्रु बहने लगते हैं।
36:39घर के आंगन में बैठे आचार्य वेदमंत्रों का पाठ करते हुए जातकर्म संसकार का अनुष्ठान आरंभ करते हैं, ताकि बालक
36:48को इस नवीन जीवन में दीरगायू और समरिधी प्राप्थ हो।
36:53इसी समय वैश्नवी माया की सुनहरी और अद्रिश्य रश्मिया उस बालक के मस्तिश्क को चारों ओर से घेर कर उसके
37:01पूर्वजन्मों के अंतिम अवशेशों को भी मिटा देती हैं।
37:06अब वह शिशु अपनी निश्पाप और कोमल आखों को खोल कर अपने नए मातापिता को देखता है, किन्तु उसे यह
37:13भान भी नहीं रहता कि ये संबंध केवल इस जन्म के क्शनभंगुर नाटक हैं।
37:20द्वार पर एकत्र हुए संबंधी और ग्रामेन हर्शोलास के साथ मिठाया बाट रहे हैं। इस बात से पूरी तरह अंजान
37:28की एक जीवात्मा पुनह कर्म और पुनरजन्म के चक्रव्यूह में बंदी बन चुकी है।
37:35अंतरिक्ष के अद्रिश्य लोक से कर्म के अधिश्ठाता देव इस द्रिश को देखते हुए काल के उस अनंत बही खाते
37:41में इस जीव का एक नया अध्याय अंकित कर देते हैं।
37:47माता जब उस रोते हुए बालक को अपनी चाती से लगाती है, तो स्तनपान के साथ ही ममता और मेरा
37:54मेरा का वह अध्रिश्य बंधन और सुद्रिड हो जाता है।
37:58भौतिक संसार के इस प्रथम स्पर्ष और माता की गोदी की उश्मा पाते ही, वह शिशु अपनी सारी आध्यात्मिक तडप
38:06भूल कर अज्यान की गहरी और शांत निद्रा में लीन हो जाता है।
38:12भगवान हरी मुस्कुराते हुए गरूर से कहते हैं कि जो आत्मा गर्भ में मुक्ती की भीख मांग रही थी, वही
38:19अब भौतिक सुख के जूठे आश्वासन में संतोष पाकर सो रही है।
38:25प्रसूती कक्ष के कोनों में मंदरा रहे यमराज के सुक्ष्म दूत अब शांत हो जाते हैं क्योंकि इस आत्मा का
38:32नया कर्मचक्र अब पूरी तरहे प्रारंभ हो चुका है।
38:37इस प्रकार तारों भरी शांत रातरी के आचल में उस छोटे से मिट्टी के घर से उठती मंगल गीतों की
38:44ध्वनी के बीच संसार का वह पुराना और मायावी जाल पुनह कस जाता है।