00:00अचार जी, दिमाग में हमेशा कुछ चलता रहता है, पता नहीं क्या है, इसा क्यों है?
00:05अब शारेरी क्रिया किसी की बहुत ज्यादा होती हो, तो ऐसे तो फिर तुम्हें दस्त लगे हो, तो तुम्हें महापुरुष
00:11घोशित कर दें?
00:15देखो, आम आदमी, एक बार दिन में, क्या कर पाएं तुम्हारे जीवन का, कितना वजन है तुम्हारी हस्ती में, आधा
00:29किलो कुल, वो भी दिन में एक बार, और इधर देखो, ये किलो में नहीं, लीटर में तॉले जाते हैं,
00:43ऐसी प्रतिभाह, युगों में जन्म लेती है, दिन के 8-8, 6-6, 10-10 लीटर, हसे रहो नो, तो
00:54जब किसी को चिंतक बोला जाता है, तो कहे के लिए ऐसे हो जाते हो, कीड़ा है उसके दिमाग में,
01:00पेट में कीड़ा होता है, तो आदमी ज्यादा हगता है, दिमाग में कीड़
01:08होता है, तो आदमी ज्यादा सोचता है, एक को सोच कहते हैं, और दूसरे को शौच कहते हैं, पर नहीं,
01:22यहां कितना भी हसलो, अभी बाहर निकलते ही कोई मिलेगा ऐसे,
01:33एक दम ऐसे हो जाओगे कि लोट जाएं, कि यह मिला असली आदमी दमदार, वहाँ फालतो मंच पे चड़के अचारे
01:41बोले ही जा रहा था, यह सोचता है आदमी, नि मैं बोल भी रहा होता हूं, तो कई यह से
01:48सामने बैठे होते हो ऐसे,
02:00पर हंकार के लिए, शोच से आशा रखना थोड़ा मुश्किल होता है, गन्हाती है, सोच से आशा रखना सोगम होता
02:09है, दूर तक जाती है, अतीद को उठाया, भविशे की कल्पना गरी, वो सब चीजें मल के साथ उपलब्ध नहीं
02:17हो पाती है,
02:17आप एक चीज को घोशित कर देते हो, कि अच्छी है, कि गंदी है, कि बुरी है, तो सब प्रकृति
02:23कई दायरे में न, और जब ये देख लो तो विचार से, जो आशा बांदी होती है, वो गिरने लगती
02:30है, अगर आप बहुत सोचते हो, सोचने की बिमारी है आपको, तो उस
02:47सोचने का आग्रह ही कम हो जाएगा, क्योंकि ये सोच वैसे भी प्राकृतिक नहीं है, ये वो सोच है, जिसमें
02:55सोच के घोड़े को जबरदस्ती दोड़ाया जा रहा है,