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Transcript
00:00काठ राख को नहीं जान सकता
00:04पर अगर काठ से पूछोगे कि राख क्या चीज़ है तो वो बोलेगा मेरी मौत है
00:11उसको मौत इसलिए लग रही है क्योंकि उसने दबा रखा है आग से अपने इश्क को
00:17और आग काठ से बाहर नहीं होती है
00:22वो काठ के भीतर ही होती है
00:25बस उसको चाहिए कि बाहर की कोई आगा आके मुझे स्पर्श कर दे तो मेरे भीतर वाली भी दहक उठे
00:32उसे अपने ही भीतर की अगनी से प्रेम है वो इस बात को दबाए हुए है इसलिए राख होने से
00:40डरता है
00:43हाँ जब राख हो जाता है मौज आ जाती है
00:46तब कहता है कि अब पूरी बात समझ में आ रही है राख काठ को जानती है
00:51राख को सब पता है काठ का कापना
00:57सिहरन
00:58विरोध
01:00राख सब जानती है
01:02और फिर राख यही कहती है
01:05मौज तो है पूरी राख होने में
01:07बस एक अफसोस रहेगा
01:09वक्त बहुत खराब कर दिया
01:12क्या कर दिया
01:14वक्त बहुत खराब कर दिया
01:15किसमें वक्त खराब कर दिया
01:16आत्मरक्षा में
01:19लकड़ी लगी होई थी कि किसी तरह से
01:21आग से बच कर चल लूँ
01:23और बड़ा समय न जाने कितने दशा
01:25खराब कर दिये, कई होना तो पूरा जनम ही
01:27बचे बचे खराब कर दिया
01:29जब राख हो जाते हो तब समझ में आता है
01:31मौज तो इसमें, पर वो मौज
01:35अननुमे है
01:37टाठ
01:39बने रहकर के उसका अंदाजा
01:41नहीं लगाया जा सकता है

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