00:00हम पाते हैं कि एक नहीं लगभग सभी धार्मिक धाराओं में फास्टिंग का प्रावधान है उसको अलग-अलग नामों से
00:11जाना जाता है वरत बोल देते हैं उपवास बोल देते हैं रोजा बोल देते हैं यद्यपी वरत का बहुत उचा
00:19अर्थ होता है उपवास का भी बहु
00:27से ही जोड लेते हैं कि जो नहीं खारा उसको हम कहते हैं आज उसका भरत है तो ये सारे
00:32प्रावधान उस बंदे के लिए बनाए गए थे जो किसी और तरीके से मानने को राजी ही नहीं है वो
00:38खाता ही जाता है खाता ही जाता है खाता ही जाता है तो उसका कहा गया यार तू एक क
00:53तो भी परहेज कर भी लिया
00:58कुछ नहीं बतला
01:00वास्तव में भारतियों से ज्यादा फास्टिंग तो शायद ही कोई करता हो
01:05और गरीबी इधर इतनी रही है पिछले 300 साल में कि बहुत सारी फास्टिंग तो
01:11बिना चाहे ही हो जाती है
01:15कुछ नहीं हो रहा
01:19ये विधी काम आने से रही
01:22ये विधी काम नहीं आएगी
01:26नखाने से अगर मुक्ति मिलती होती
01:29तो भारतियों को तो 40 के दशक में ही मिल गई होती
01:35दुनिया का सबसे बड़ा आकाल हमने जेला था जितिये विश्युद्ध के समय
01:39कम से कम पूरे बंगाल और बिहार को तो मुक्ति मिली जानी चाहिए थी
01:46नखाने से मुक्ति ठीक वैसे जैसे खाने से भी मुक्ति नहीं मिलती
01:52नखा के मिलेगी नखा के मिलेगी
01:55क्योंकि खाना और नखाना दोनों किस से संबंधित बाते हैं शरीर से
02:01यहां मामला दूसरा है
02:04यह बात दिल की है
02:06कोई विधी काम नहीं करेगी किसके बिना
02:10नियत के बिना
02:12प्यार के बारे में क्या कह गए कबीर साथ
02:19प्रेम मगन जब मन भया
02:22कौन गिने तितिवार
02:27हम भूले कब थे कि फलाने दिन जाकर के
02:30प्रियतम को याद करें
02:31हमें तो लगातार याद है
02:33वो असली सेलिबरेशन है
02:35वैसे रहिए
02:36ठीक है