00:00गुरू, ग्रंथ, वेदान्त, उपनिशद, कोई भी अंत नहीं होते, अंत तो आप ही हैं, ये सब कुछ आपके ही लिये
00:07है, ये रह गया, इसको उचा स्थान मिल गया, और आपको लाभ नहीं हुआ, बलकि आप पाखंडी बन गए, तो
00:20क्या फाइदा, क्या फाइदा,
00:25आपकी परिक्षा होती है, उसके ढाचे से आपको कुछ बाते स्पश्ट नहीं होती, क्या, कभी हम आपसे पूछते हैं, कि
00:37सीधे आप लिखिये जरा यहां पे, कि गीता, सात्वा, ध्या, 21 श्लोक कौन सा है, कभी ऐसा प्रशन आया, कभी
00:45आपसे पूछा गया, कि यहां पर य
00:48यह जो शब्द आया है इस श्लोक में, इसका अर्थ बताईए है, साब पुछा गया, सारे सवाल आपकी जिन्दगी से
00:55संबंदित होते हैं, गीता सिर्फ इसलिए नहीं है कि आप गीता को समझें, गीता इसलिए ताकि आप गीता के माध्यम
01:02से स्वयम को समझें, कोई कहें, �
01:06गीता को समझता हूँ, पर खुद को नहीं समझता, तो पगला है, गीता व्यर्थ हो गई उस पर, ग्यानी बनने
01:14की वृत्ति यही होती है, मैं गीता को समझता हूँ, खुद को नहीं भी समझते तो क्या हो गया, उनहीं
01:21होने देना,