00:00एक थी वो नगरवधू, सीधे बोलिये विश्या थी, तो उसको बुद्ध का एक भिक्षू मिल गया, और वो बड़े उचे दरजे की वो सुन्दरी थी, तो भिक्षू कुछ दिन उसके इहां रह गया, भिक्षू का काम कुछ दिन एक शहर एक गाउं में रते हैं, फिर आग
00:30बनाऊंगी संबंध, वो शारेट संबंध की बात कर रहा था, बोली मुझे नहीं कर दो, उस वक्ते का भाव थोड़ा और गहरा हो गया होगा, वो बोलता है, ठीक है मैं तुमसे विवाह गरने को तो यार हूं, वो बोलती है नहीं, तुमसे विवाह भी नहीं कर, तो अब �
01:00पागल, भिक्षूओं का ये तरीका होता है, वो आते हैं, रुकते हैं, चले आते हैं, वो लोटेगा थोड़ी तुमारे, बोलती ही नहीं, वो ही पती है मेरा, वो और हसने लगा, कौन सा पती, कैसा पती, वो पती है तो उसको बुलाओ, बोली बुलाने की कोई बात नहीं,
01:30जिसको सच्च की सुगंध मिल जाती है वो फिर किसी भी हाल में जगत की दुर्गंध से सामंजस से नहीं बैठा सकते
01:40वो नहीं है बस उसकी खुश्बू है तो भी वो खुश्बू भारी पड़ रही है उन सब चीजों पर जो तुम मुझे देखे रिजहाल उभा रहे हो