00:00इतने वर्षों तक जंगल से बाहर रहने के बाद जब बुद्ध को ग्यानोदय हुआ, भीतरी तोर पर परिपक्कु हुए, कोहरा छटा कुछ,
00:17तो कह जाता है कि उन्होंने किसी को भी कुछ कहने समझाने से इंकार कर दिया, उसके बाद जीवन और जीव कुछ उनको दिखाई देने लगे, ये बात है, पर ये जो बात उनको दिखी, उन्होंने कहा हम किसी से कहना नहीं चाहते, बिल्कुल नहीं कहना है,
00:47पर वो जिस तरीके से कथाओं में अभिवेक्त होती है वो यह है कि फिर सीधे देवताओं को ही आना पड़ा
00:57और देवताओं ने कहा कि आपने जो बात समझी है वो किसी बिरले को ही समझ में आती है
01:06अब आपने इसको जान लिया है तो दुनिया के साथ बाटते क्यों नहीं है तो तथागत बुलते हैं कि देखो ये बात ऐसी है
01:25कि जिसको समझ में आ गई है उसको तो जाहिर है समझाने की जरूरत नहीं और जिसको नहीं समझ में आई है
01:35उसको समझाई जा नहीं सकती तो जो भी लोग थे जो बुद्ध से आगरह करना चाहते थे कि नहीं आपने जो जाना है उस अब तक पहुँचाईए
01:47तुरों नहीं का अच्छे एक बात बता है आपने दो कोटियां बताई एक जो समझे ही हुए हैं उन्हें समझाने की जरूरत नहीं एक जो नीचे बैठे हैं उन्हें समझाना असंभव सा है एक तीसरी कोटी भी तो हो सकती है ना
02:01क्या जो हैं तो नीचे पर उबे हुए हैं नीचे रहने से जो हैं तो नीचे और सिर्फ छोड़ने को तयार नहीं है
02:19जान लगा कर कीमत चुका कर छोड़ना चाहते हैं आप जाकर थोड़ा सा सहारा दे देंगे तो बात स्पष्ट हो जाएगी
02:31तो इस तरह की बात थी वो फिर बुद्ध को जची बोले ठीक है सिर्फ ऐसे ही लोगों के लिए मैं बोलूँगा