Skip to playerSkip to main content
विष्णु पुराण की गाथा में, महर्षि पराशर मैत्रेय को ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्यों में से एक – मन्वंतरों (Ages of Manus) के अद्भुत विधान से अवगत कराते हैं। जानिए कैसे हर मन्वंतर में बदल जाते हैं ब्रह्मा, देवता, ऋषि और यहाँ तक कि धरती के शासक भी! ✨ भगवान विष्णु कैसे हर युग में धर्म की स्थापना और ब्रह्मांड के संतुलन को बनाए रखते हैं? इस एपिसोड में हम स्वयं स्वयंभुव मनु से लेकर वर्तमान वैवस्वत मनु तक की यात्रा करेंगे और जानेंगे कि यह विराट समय चक्र कैसे सृष्टि के अस्तित्व को नियंत्रित करता है। एक ऐसी कहानी जो आपकी समय और अस्तित्व की समझ को बदल देगी! ⏳ #VishnuPurana #Manvantara #CosmicCycles #HinduMythology #सनातनधर्म
Transcript
00:00महर्शी पराशर, जिनका ज्ञान सूर्य के समान तेजस्वी था, अब मैत्रे को ब्रहमांड के उस विशाल समय चक्र से परिचित
00:08करा रहे थे, जहां स्वय भगवान विश्नु की लीला अनन्त रूप से प्रकट होती है.
00:14उन्होंने समझाया कि किस प्रकार आत्मा की अमर्ता और माया से मुक्ती का मार्ग स्वय भगवान विश्नु की परमसत्ता से
00:22जुड़ा है, जो संपूर्ण स्रिष्टी के मूल में हैं.
00:27मैत्रे अपने गुरु के शब्दों से मंत्रमुग्ध होकर आत्मा और परमात्मा के रहसियों की गहराई में डूपते जा रहे थे,
00:35उनके हृदय में ज्ञान की जोती प्रजवलित हो रही थी.
00:39अब महर्शी पराशर ने ब्रहमांड के कालचक्र के एक और व्रिहत्तर आयाम की और मैत्रे का ध्यान आकरशित किया, जो
00:47मात्र युगों के छोटे चक्रों से कहीं अधिक विशाल और जटिल था.
00:52उन्होंने समझाया कि स्रिष्टी का अस्तित्व केवल सहसरों युगों के एक छोटे चक्र तक सीमित नहीं, बल्कि यह कल्प नामक
01:00अत्यंत विशाल समयवधियों में फैला हुआ है.
01:05प्रत्येक कल्प ब्रह्मांड के जन्म, पालन और सहार के एक पूर्ण चक्र को दर्शाता है, जिसमें युगों के अंगिनत फेरे
01:12समाहित होते हैं.
01:15और इन कल्पांतरों के भीतर, भगवान विश्णों की लीला मनवंतर नामक विशिष्ट कालों में अनन्त रूप से प्रकट होती है,
01:23जहां वे धर्म की स्थापना और स्रिष्टी का संतुलन बनाये रखते हैं.
01:29मैत्रे ने चकित होकर पूछा, ये गुरुदेव, ये मनवंतर क्या हैं और ये ब्रहमांडिये समय चक्र में कैसे फिट होते
01:37हैं?
01:39महर्शी पराशर ने उत्तर दिया कि एक मनवंतर एक निश्चित अवधी है, जो मानवजाती के एक मनु के शासनकाल से
01:47संबन्धित है, जो उस विशेश युग के मानवजाती के पूर्वज और विधिनिर्माता होते हैं.
01:54प्रत्येक मनवंतर में एक नया मनु, नय सबतर्शी और एक विशिष्ट इंद्र प्रकट होते हैं, जो उस कालखंड की स्रिष्टी
02:02के मार्ग दर्शक बनते हैं.
02:05यह विशाल कालखंड देवताओं और राक्षसों के बीच होने वाले ब्रहमांडिय संघर्शों धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश से
02:14भरा होता है.
02:16इन मनवंतरों में ही भगवान विश्णु विभिन अवतारों में प्रकट होकर स्रिष्टी को हर संकट से बचाते हैं और धर्म
02:24की पुनर्स्थापना करते हैं.
02:27कल्पना करो मैत्रे की एक ब्रह्मा के एक दिन में 14 मनवंतर होते हैं और प्रत्येक मनवंतर में 70 से
02:35अधिक चतुर्यूगी होते हैं
02:38यह मात्र एक कल्प का विवर्ण है और ऐसे असंख्य कल्प हुए हैं और होंगे यह सब भगवान विश्णू की
02:46अनंत शक्ती और लीला का ही विस्तार है
02:50प्रत्येक मनवंतर की समाप्ती पर एक प्रलय होती है जहां स्रिष्टी का एक भाग विश्राम लेता है केवल कुछ तत्व
02:58ही शेश बचते हैं जो अगले मनवंतर के लिए बीज बनते हैं
03:03फिर से भगवान विश्णू की इच्छा से एक नया मनु प्रकट होता है और स्रिष्टी का चक्र एक बार फिर
03:11से प्रारंभ होता है अपने नए स्वरूप में
03:14ये मनवंतर केवल भौतिक रचना के चक्र नहीं बलकि वे आध्यात्मिक प्रक्ति और धर्म के विकास के भी साक्षी होते
03:23हैं जहां आत्माएं अपने कर्मों के अनुसार यात्रा करती हैं
03:28हर मनवंतर में विष्णू की दिव्य लिलाएं एक नए रूप में प्रकट होती हैं कभी मत्स्य के रूप में जलप्रले
03:35से स्रिष्टी को बचाते हुए तो कभी वामन के रूप में दानव के अहंकार को तोड़ते हुए
03:42महर्शी पराशर ने जोर देकर कहा कि इस अनंत समय चक्र को समझना ही विष्णू की असीमित महिमा और उनकी
03:50सनातन सत्ता को समझना है
03:53मैत्रे अब ब्रहमांड के इस विराठ समय चक्र को अपनी आखों के सामने स्पष्ट रूप से देख रहे थे
04:00जहां भगवान विष्णू की अनंत लीला हर पल, हर युग, हर मनवंतर में प्रकट हो रही थी
04:07महर्शी पराशर ने मैत्रे की ओर देखते हुए काल के सुक्ष्म गणित को समझाते हुए बताया कि एक मनवंतर की
04:14अवधी सामान्य मानव कल्पना से परे होती है
04:19उन्होंने स्पष्ट किया कि जब चारों युग, सत्युग, त्रेता, द्वापर और कल्युग 71 बार बीटते हैं, तब जाकर केवल एक
04:27मनवंतर का काल पूरा होता है
04:31ब्रहम देव के केवल एक दिन यानी एक कल्प में ऐसे 14 मनवंतर बीट जाते हैं, जिसके बाद ब्रहमांड में
04:39आंशिक प्रलय की रात्री आती है
04:42महर्शी पराशर ने आगे बताया कि प्रत्येक मनवंतर में मानव जाती के मार्गदर्शन और वंश वृद्धी के लिए एक नए
04:50मनुकी नियुक्ती होती है
04:53इसके साथ ही धर्म और ज्ञान के सनरक्षन के लिए साथ महान रिशियों यानी नए सब्तर्शियों का चयन किया जाता
05:01है
05:03देवराज इंद्र का पदभी स्थाई नहीं है क्योंकि हर मनवंतर के बदलते ही स्वर्गलोग का एक नया इंद्र सिनहासन पर
05:11आसीन होता है
05:13केवल राजा और रिशी ही नहीं बलकि ब्रहमांडिय संतुलन बनाए रखने वाले 33 कोटी देवताओं का समूह भी हर मनवंतर
05:22में बदल जाता है
05:24इस प्रशासनिक बदलाव के केंद्र में साक्षात भगवान श्री हरी विश्नु विराजमान रहते हैं जो सम्पून ब्रहमांड की व्यवस्था को
05:33सुचारू रूप से संचालित करते हैं
05:36नए मनु अपने शासनकाल में उस यूग की परिस्थितियों के अनुसार धर्म शास्त्रों और सामाजिक नियमों की पुनरस्था अपना करते
05:45हैं
05:46सब्तर्शी अपने अपने मनवंतर में वेदों के पवित्र ज्यान को सुरक्षित रखकर भावी पीढ़ियों तक पहुचाने का गुरुतर दायत्व निभाते
05:55हैं
05:57वही नए इंद्र अपने दिव्यास्त्रों और बादलों के स्वामी के रूप में तीनों लोकों की रक्षा करते हुए रितु चक्र
06:04का संतुलन बनाये रखते हैं
06:07महर्शी पराशर ने ध्यान दिलाया कि वर्तमान में चर रहा मनवंतर सात्वा मनवंतर है जिसके स्वामी व्यवस्वत मनु है
06:17मैत्रे ने अपनी अंतरग्रिष्टी से पूर्व के छै मनों, स्वायंभुव, स्वरोचिश, उत्तम, तामस, रैवत और चाक्षुष के दौर को देखा
06:26दो मनवंतरों की संधी के दौरान ब्रहमांड में जल्प्रलय का समयाता है, जहां पुरानी व्यवस्था समाप्थ होकर नई व्यवस्था का
06:35उदे होता है
06:38भगवान विश्णु हर मनवंतर में एक विशेश अंशावतार धारन करते हैं, ताकि धर्म की रक्षा और इंद्र के पद की
06:46सहायता की जा सके
06:48यह पूरी ब्रहमांडिय प्रणाली बिना किसी त्रुटी के रित यानि ईश्वर के परम सत्य और नियम के अनुसार निरंतर संचालित
06:56होती रहती है
06:58इसके बाद पराशर ने भविश्य में आने वाले सावर्णी मनुओं के युगों की जलत भी प्रस्तुत की, जो आने वाले
07:06समय में स्रिष्टी को संभालेंगे
07:09समय के इस असीन विस्तार को सुनकर मैत्रे को बोध हुआ की मानव जीवन की अलपावधी और अहंकार इस अनंत
07:17कालचक्र के सामने तिनके के समान है
07:21महर्शी मैत्रे ने विस्मय और श्रद्धा से भरकर पराशर के सामने अपने हाथ जोड लिये और विश्णू की अचूक संचालन
07:29शक्ती की सराहना की
07:31पराशर ने यह कहकर समापन किया कि भले ही मनु, इंद्र और देवता बदलते रहें लेकिन इस चक्र के पीछे
07:39की मूल शक्ती भगवान श्री हरी विश्णू, अटल और अविनाशी है
07:45मैत्रे की जिग्यासा को शांत करते हुए महर्शी पराशर ने स्रिष्टी के प्रथम मनवंतर के अधिपती, स्वयंभोव मनु के दिव्य
07:53प्राकट्य की गाथा आरंभ की
07:56ब्रह्मा जी ने जब स्रिष्टी के विस्तार हेतु अपने शरीर के दो भाग किये तो उनसे पुरुष रूप में स्वयंभोव
08:03मनु और स्त्री रूप में महारानी शत्रूपा का जन्म हुआ
08:08प्रथम पुरुष स्वयंभोव मनु अपने तेजस्वी रूप, सुद्रिध कांती और धर्म प्रायन नेत्रों के साथ ब्रह्मांडी अगनी के बीच प्रकट
08:16हुए
08:17उनके समीप ही अद्भुत लावन्य और पावन्ता से परिपून प्रथम नारी शत्रूपा प्रकट हुई, जिनके रूप से संपून दिशाएं आलोकित
08:27हो उठी
08:28पितामा ब्रह्मा ने स्वयंभोव मनु को प्रिथवी पर धर्म के शासन और मानव प्रजा के समवर्धन का सर्वोच उत्तरदायत्व सौपा
08:38जब प्रिथवी प्रलय के अगाध जल में निमगन थी, तब मनु ने जगत्पती विश्नु का ध्यान कर भूदेवी के उध्धार
08:46की प्रार्थना की
08:47श्री हरी ने महाकाय वराह रूप धारन कर रसातल से प्रिथवी को अपने दंतों पर उठाकर पुनह जल के उपर
08:55स्थापित किया
08:57प्रिथवी के पुनरुद्धार के पश्चात स्वयंभोग मनु और शत्रूपा ने धरा पर प्रथम दिव्य राज्य की स्थापना कर ग्रिहस्थ आश्रम
09:05का शुभारंभ किया
09:07महारानी शत्रूपा की कोख से दो अत्यंत शूरवीर एवं तेजस्वी पुत्रों प्रियवरत और उत्तानपाद का जन्म हुआ
09:16इसके पश्चात उनके घर तीन परम गुणी पुत्रियों आकरिती, देवहूती और प्रसूती का अवतरण हुआ जिनसे महान रिशियों के वंश
09:25चले
09:27मनुने समाज को अनुशासित करने के लिए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पर आधारित, सनातन, सामाजिक व्यवस्था और नियमों का
09:35निर्मान किया
09:37देवहूती का विवाह महान प्रजापती कर्दम रिशी से हुआ, जिनकी तपस्या से स्वय भगवान कपिल देव ने अवतार लिया
09:46आकृती का विवाह प्रजाप्ती रुची से हुआ, जिनके यग्य से भगवान विश्नु के आशिक अंशुरूप यग्य और दक्षिना का जन्म
09:54हुआ
09:55प्रसूती का विवाह ब्रहमा के मानस पुत्र दक्ष प्रजापती से हुआ, जिनसे सती सहित अनेक कन्याओं का जन्म हुआ और
10:03स्रिष्टी का विस्तार हुआ
10:05महाराजा प्रियवरत ने अपने दिव्यरत के पहियों से साथ विशाल महादवीपों और साथ समुद्रों का निर्मान कर संपूर्ण भूमंडल को
10:14विभाजित किया
10:16दूसरे पुत्र राजा उत्तानपाद ने धर्म पूर्वक राज्य संभाला, जिनके पावन वंश में परम भक्त बालक ध्रुव का प्राकट्य हुआ
10:25इस पूरे मनवंतर के संचालन में भग्वान श्री हरी विश्नु की गुप्त शक्ती ही राजा मनु को न्याय और धर्म
10:32की प्रेणा देती रही
10:35पराशर ने बताया कि स्वयंभुव मनवंतर केवल एक समयकाल नहीं, बल्कि मानव जाती की सभ्यता और संस्कृती का आधारस्तम्ध था
10:45मैत्रे रिशी ने अत्यंत विस्मय से सुना कि किस प्रकार प्रथम मनवंतर ने ब्रहमांडिय अनुशासं की अमर अमरगाथा लिख दी
10:53थी
10:55पराशर ने निशकर्ष निकाला कि समय का प्रत्येक मनवंतर श्री हरी की लीला का ही एक नया प्रिष्ट है जो
11:02स्रिष्टी को मोक्ष की ओर ले जाता है
11:06मैत्रे प्रथम मनवंतर के पश्चात ब्रहमाजी के संकल्प से द्वितिय स्वरोचिश मनवंतर का उदे हुआ, जिसने स्रिष्टी में नए जीवन
11:14और नए चेतना का संचार किया
11:17इस युग के अधिपती स्वरोचिश मनु थे, जो अपनी न्यायप्रियता और तेज के लिए जाने जाते थे, और उनके शासन
11:26में प्रिथवी पर समरिधी का एक नया अध्याय लिखा गया
11:30इस स्वरोचिश मनवंतर में भगवान श्री हरी ने विभू अवतार के रूप में जन्म लेकर अधर्म का नाश किया और
11:37विश्यमुनियों के यग्यों की रक्षा की
11:40समय का पहिया और आगे घूमा और फिर त्रीतिय उत्तम मनवंतर का आगमन हुआ जिसमें उत्तम नामक मनुने धर्म की
11:49धोजा को अत्यंत गर्व से फहराया
11:52उत्तम मनवंतर में देवराज इंद्र के रूप में सुशान्ती ने स्वर्ग का सिनहासन संभाला और अपनी वजर जैसी शक्ती से
12:00देवताओं को अभय प्रदान किया
12:02इस पावन मनवंतर के सबतर्शियों ने अपने कठोर तप से ब्रहमांडिय उर्जा को संतुलित रखा जिससे संपूर्ण चराचर जगत में
12:12शान्ती और संतोश का प्रसार हुआ
12:15जब जब धर्म पर संकट मंडराया तब तब भगवान नारायन ने इस युग में सत्यसेन रूप धारण कर दुष्टों का
12:23सहार किया और सत्य की स्थापना की
12:26इसके बाद स्रिष्टी ने चतुर्थ तामस मनवंतर में प्रवेश किया जहां अंधकार और प्रकाश के बीच एक नया संतुलन स्थापित
12:35करने की परीच्शा थी
12:37तामस मनुने अपने अदमय साहस और ग्रिड संकल्प से इस युग के जीवों को आत्मनियंत्रण और कठिन परिस्थितियों में भी
12:45धर्म पर टिके रहने की सीख दी
12:48इस काल में महाबली शिभी इंद्र के पद पर सुशोभित थे जिन्होंने अपनी न्यायप्रियता और त्याक से स्वर्ग लोग को
12:56एक नई उचाई प्रदान की
12:59इसी चतुर्थ मनवंतर में भगवान विश्णु ने हरी रूप में प्रकट होकर मगरमच के चंगुल से गजराज को मुक्त कराया
13:07था
13:07जिसे संसार आज भी गजेंद्र मोक्ष के रूप में पूझता है
13:13काल की अनंत धारा बहती रही और फिर पंचम रैवत मनवंतर का प्रकट्य हुआ
13:18जो अपनी अत्यधिक आध्यात्मिक और अलोकिक उर्जा के लिए प्रसिद्ध है
13:24रैवत मनु ने समस्त मानव जाती को आत्म ज्यान का मार्ग दिखाया
13:29और उनके पावन शासनकाल में प्रित्वी पर यग्यों की दिव्य सुगंध फैली रही
13:35इस मनवंतर के सबतर्शियों ने दिव्य वेदों के छिपे हुए रहसियों को उजागर किया
13:40जिससे देवताओं और मनुश्यों के बीच का संबंध और भी सुद्रिड हो गया
13:45इस युग में भगवान श्री हरी ने वैकुंध अवतार लिया
13:50जिन्होंने अपने भक्तों के लिए परमधाम वैकुंध की महीमा को इस नश्वर संसार के सम्मुख प्रकट किया
13:58ततपश्चात छठा चाक्षुष मनवंतर प्रारंभ हुआ
14:01जिसने सृष्ची के विकास और ब्रह्मांड के मन्थन की पूर्वपीठि का तयार की
14:07ब्रहमा जी के नेतरों से उतपन्न चाक्षुष मनूने इस युग का नेत्रित्व किया
14:12जिनकी दिव्यद्रिष्टी से संपून ब्रहमांड की गतिविधियों का संचालन होता था
14:17चाक्षुष मनवंतर में अत्यंत तेजस्वी और वेगवान मनोजव इंद्र के रूप में देवताओं का नेत्रित्व कर रहे थे
14:26जिनका पराक्रम अद्वितिय था
14:29इसी काल में भगवान विश्णू ने अजित रूप धारण किया
14:33जो आगे चलकर देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मन्थन के महान कार्य का मुख्य आधार बने
14:41मेत्रे इस प्रकार स्वरोचिश से लेकर चाक्षुष तक के ये पांच मनवंतर सिध करते हैं
14:47कि काल का हर क्षण केवल श्री हरी की लीला का ही एक अनंत और दिव्य विस्तार है
14:53महर्शी पराशर अपने शिश्य मैत्रे को समझाते हैं कि छठा चाक्षुष मनवंतर समाप्त होने के बाद
15:00ब्रहमांड ने वर्तमान और अत्यंत महत्वपूर्ण सात्वे मनवंतर में प्रवेश किया जिसे हम वैवस्वत मनवंतर कहते हैं
15:09इस नए मनवंतर के अधिपती सूर्य देव के प्रतापी पुत्र श्राध्ध देव बने जिन्हे संसार में वैवस्वत मनु के नाम
15:18से जाना जाता है
15:20वैवस्वत मनु परमधार्मिक, सत्यवादी और भगवान विश्णु के अनन्य भक्त थे जो सदैव स्रिष्टी के कल्यान के लिए तपस्या में
15:29लीन रहते थे
15:31एक सुभह जब मनु कृत्माला नदी में तरपन कर रहे थे, तब उनकी अंजली के जल में अचानक एक अत्यंत
15:38छोटी और चमकीली सुनहरी मचली आ गई
15:42उस नन्ही मचली ने मनु से मानवीय स्वर में बात की और बड़े जीवों से अपनी रक्षा करने की गुहार
15:49लगाई, जिससे मनु का हृदय करुना से भर उठा
15:53मनु ने उस छोटी मचली को अपने कमंडलू में रख लिया, लेकिन कुछ ही क्षणों में वह मचली इतनी बड़ी
16:00हो गई कि कमंडलू उसके लिए छोटा पड़ गया
16:04तब मनु ने उसे एक बड़े मटके में डाला, परन्तु वहां भी वह अध्भुत मचली देखते ही देखते विशाल काय
16:11होकर मटके की सीमाओं से बाहर आ गई
16:15आश्चर यच्कित मनु ने उसे एक बड़े तालाब में स्थानांतरित किया, लेकिन पल भर में उस रहस्य में मचली ने
16:22पूरे तालाब का स्थान भी घेर लिया
16:26अंतर जब मनु ने उसे विशाल महासागर में छोड़ा तो उस असाधारन मचली ने पूरे समुद्र को भी छोटा साबित
16:34कर दिया जिससे मनु को उसकी दिव्यता का आभास हुआ
16:38तब भगवान श्री हरी ने अपने वास्तविक मत्स्य रूप को प्रकट किया और मनु को सचेट किया कि शीध्र ही
16:45समस्त पृत्वी को डुबाने वाली एक भयंकर महाप्रलय आने वाली है
16:51भगवान मत्स्य ने मनु को आदेश दिया कि वे एक विशाल नौका का निर्मान करें जिसमें समस्त जीव जन्तूओं के
16:59बीज, वनस्पतियां और सब्तर्शी सुरक्षित रखे जा सकें
17:04भगवान की आग्या मानकर मनु ने देवशिल्पी की सहायता से एक अभेद्य और अत्यंत विशाल दिव्य नौका का निर्मान कार्य
17:12प्रारंब कर दिया
17:14जैसे ही प्रलै का समय निकट आया, गगन में भयानक गर्जना के साथ साथ प्रकार के प्रल्यंकारी मेग उमड़ पड़े
17:22और मूसलाधार वर्षा ने पूरी प्रित्वी को जल मगन करना शुरू कर दिया
17:28व्यवस्वत मनु ने सभी जीवों के सूक्षम बीजों, पवित्र वेदों और महान सब्तर्शियों को लेकर उस सुरक्षित दिव्य नौका में
17:36प्रवेश किया
17:37जब समुद्र के भयानक थपेडों से वह नौका डगमगाने लगी और प्रलै का जल प्रल्यंकारी रूप धारन कर चुका था,
17:45तब भगवान मत्स्य वहां पुनह प्रकट हुए
17:49भगवान ने मनु को निर्देश दिया कि वे वासुकी नाग को रस्सी बनाकर उस विशाल नौका को उनके मस्तक पर
17:57उगे विशाल सींग से बांध दें
17:59इस प्रकार भगवान मत्स्य ने उस भयंकर जल प्रलै के बीच उस नौका को सुरक्षित खीचते हुए ब्रहमांडिये विनाश से
18:08बचाया
18:08इस प्रलैकारी यात्रा के दौरान भगवान मत्स्य ने मनु और सबतर्शियों को परम ज्यान प्रदान किया जो आज मत्स्य पुरान
18:18के रूप में विख्यात है
18:21जब प्रलै का जल शान्त हुआ तब भगवान ने उस नौका को हिमालय की सबसे उची चोटी से बांध दिया
18:28जिससे जीवन को पुनह पनपने का स्थान मिला
18:32महर्शी पराशर कहते हैं कि इस प्रकार व्यवस्वत मनु ने वर्तमान स्रिष्टी की नीवख्य और आज भी श्री हरी इस
18:40सात्वे मनवंतर में संपूर्ण मानवता की रक्षा कर रहे हैं
18:45व्यवस्वत मनु की इस पावन कथा को सुनकर परम जिग्यासु मैत्रे ने अत्यंत आदर पूर्वक हाथ जोड़कर महर्शी पराशर से
18:53भविश्य के मनवंतरों के बारे में जानने की इच्छा प्रकट की
18:58महर्शी पराशर ने मन्द मुस्कान के साथ अपने शिश्य की ओर देखा और ब्रह्मांड के अनन्तकाल चक्र के अगले चरण
19:06यानी भविश्य के साथ मनवंतरों का रहस्य उजागर करना आरंभ किया
19:12पराशर जी ने बताया कि समय का यह चक्र कभी नहीं थमता और वर्तमान वैवस्वत मनवंतर के पश्चात आठवे मनु
19:20के रूप में सूर्य पुत्र सावर्णी मनु प्रिथवी का शासन संभालेंगे
19:25सावर्णी मनु का यह आठवा मनवंतर धर्म न्याय और अटूट शांती का युग होगा जिसमें संपून स्रिष्टी पुन्ह दिव्य उर्जा
19:34से सराबोर होकर प्रग्ती पत पर अग्रसर होगी
19:38इसके बाद नौवे मनवंतर में प्रजाप्ती दक्ष के कुलीन वन्शज दक्ष सावर्णी मनु के रूप में अवत्रित होकर धर्म की
19:46नई मर्यादाओं की स्थापना करेंगे
19:49नौवे मनवंतर का समय वैदिक यग्यों और अनुष्ठानों की चरम सीमा का काल होगा जहां मनुष्य और देवता परस पर
19:57समवाद करते हुए स्रिष्टी के संतुलन को बनाये रखेंगे
20:00काल चक्र आगे बढ़ने पर दस्वे मनवंतर का नेत्रित्व ब्रहमा सावर्णी मनु करेंगे जो ब्रहमा जी के समान परम ज्यान
20:10और गहन बौधिक चेतना के प्रतीक होंगे
20:13ब्रहमा सावरनी के इस दस्वे मनवंतर में सम्पूर्ण मानव जाती आध्यात्मिक उनती के शिखर पर पहुँचेगी और हर हिरिदय में
20:22केवल भक्ति रसका प्रत्रवा होगा
20:25तदुप्रांत ग्यारहवे मनवंतर में धर्म सावर्णी मनु का शुभागमन होगा, जो सत्य, सत्यनिष्ठा और न्याय के साक्षात स्वरूप बनकर धरा
20:34को पवित्र करेंगे
20:37ग्यारहवे मनवंतर की यह विशेष्टा होगी कि इस युग में पाप का लवलेश भी नहीं होगा और सभी जीव पूर्णत
20:44है सुखद और निरोगी जीवन व्यतीत करेंगे
20:48बारहवे मनवंतर में रुद्र सावर्णी मनु का शासन होगा, जो भगवान शिव की दिव्य और विनाशकारी उर्जा के अंश से
20:56युक्त होकर समय की गती को तीवर करेंगे
21:00यह बारहवा मनवंतर कठोर तपस्या और अंतर्मन की शुद्धी का काल होगा, जहां जीव माया के बंधनों को काट कर
21:08परमपद की प्राप्ती के योग्य बनेगा
21:11इसके पश्चात तेरहवे मनवंतर में देव सावर्णी मनु पृत्वी का कार्यभार संभालेंगे, जो देवताओं की दिव्य आभा और महिमा से
21:20संपूर्ण जगत को आलोकित करेंगे
21:23तेरहवे मनवंतर में स्वर्ग और पृत्वी के बीच की दूरियां समाप्थ हो जाएंगी और मनुष्य सीधे देवलोक के एश्वर्य और
21:32दिव्य ज्यान का अनुभव कर सकेगा
21:34और फिर इस कल्प का अन्तिम यानी चौदहवा मनवंतर आएगा जिसके स्वामी इंद्र सावर्णी मनु होंगे जो देवराज इंद्र के
21:43समान परम वैभव और एश्वर्य का प्रतिनिधित्व करेंगे
21:47इंद्र सावर्णी का चौदहवा मनवंतर इस पूरी स्रिष्टी के परिपक्व होने और उसके अंतिम आध्यात्मिक उतकर्ष का महान काल होगा
21:58महर्शी पराशर समझाते हैं कि इन चौदह मनवंतरों के पूर्ण होने पर एक कल्प की समाप्ती होती है और स्रिष्टी
22:06पुनह अपने मूल कारण भगवान विश्णु में विलीन हो जाती है
22:11पराशर जी की दिव्यवानी सुनकर मैत्रे के मन में स्रिष्टी के इस शाश्वत, अनंत और निरंतर चलने वाले समय चक्र
22:19के प्रती अगाध श्रधा उत्पन हो गई
22:22वे समझ गए कि ब्रहमांड की यह पूरी लीला केवल उस आदियनन्त श्री हरी विश्णु की एक क्रीडा मात्र है
22:30जो संपून समय को अपनी उंगली पर नचाते हैं
22:34इस प्रकार महर्शी पराशर और मैत्रे का यह समवाध हमें स्मरण कराता है कि समय अनंत है और इस परिवर्तनशील
22:43संसार में केवल भगवान विश्णु का नाम ही एक मात्र शाश्वत सत्य है
22:49महर्शी पराशर ने मैत्रे को बताया कि कैसे प्रत्येक मनवंतर में जब धर्म की जोती मंद पढ़ने लगती है और
22:57अधर्म का अंधकार चाने लगता है तब भगवान विश्णु अपनी अलौकिक शक्ती से इस ब्रहमांड की रक्षा करते हैं
23:06उन्होंने समझाया कि भगवान विश्णु जो सम्पूर्ण स्रिष्टी के पालनहार हैं अपनी इच्छा से भिनभिन युगों में अनेक रूप धारन
23:15कर ब्रहमांड को विनाश से बचाते हैं और धर्म की स्थापना करते हैं
23:21मैत्रे ने श्रधा पूर्वक पूछा ये गुरुदेव प्रत्यक मनवंतर में भगवान विश्णु किस रूप में प्रकट होते हैं और उनकी
23:29लीलाएं कैसे ब्रहमांड को स्थिर्टा प्रदान करती हैं
23:34पराशर जी ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया कि विश्णु हर मनवंतर में प्रत्यक्ष रूप से अवतार न भी लें तब
23:41भी वे अपनी योगमाया से मनु और सब्तर्शियों को धर्म का मार्ग दिखाते हुए स्रिष्टी के नियामक बने रहते हैं
23:50उन्होंने आगे बताया कि विश्णु की यह लीला इतनी सुक्ष्म और विशाल है कि वे कभी स्वयन एक राजा के
23:57रूप में धर्म की रक्षा करते हैं तो कभी किसी रिशी के माध्यम से ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं
24:04जब-जब स्रिष्टी पर घोर संकट आता है और अधर्म अपने चरम पर पहुँच जाता है तब भगवान विश्णु किसी
24:12न किसी अध्भुत रूप में प्रकट होकर ब्रहमांड को बचाते हैं
24:17पराशर जी ने मैत्रे को प्रथम मनवंतर के महान प्रलै का स्मरण कराया जब भगवान मत्स्य के रूप में प्रकट
24:25होकर उन्होंने समस्थ स्रिष्टी को डूबने से बचाया था
24:29उन्होंने बताया कि कैसे उस विशालकाय मचली के रूप में विश्णु ने मनु और सबतर्शियों को एक दिव्य नाव में
24:37बिठा कर प्रल्यकारी जल से बाहर निकाला था
24:41भगवान मत्स्य का शरीर पर्वतों जैसा विशाल था और उनकी आभासे अंधकार में समुद्र भी प्रकाशित हो उठा था जो
24:49उनकी परम शक्ती का प्रतीक था
24:52इस लीला से मैत्रे समझ गए कि भगवान विश्णु न केवल स्रिष्टी के निर्माता और पालक हैं बल्कि वे प्रत्यक
25:00युग में धर्म के उध्धार करता भी हैं
25:04पराशर जी ने आगे बताया कि दूसरे मनवंतर में जब देवों और असुरों ने मिलकर क्षीर सागर का मन्थन किया
25:11तब भगवान विश्णु ने कच्छप के रूप में मंदराचल परवत को सहारा दिया था
25:17भगवान कूर्म का शरीर इतना विशाल और मजबूत था कि वह अनंत ब्रह्मांड के भार को भी आसानी से धारण
25:25कर सकता था और मंदराचल को बिना डूबे स्थिर रखा
25:29उस अध्भुत लीला में जब देव और असुर अमरित के लिए संधर्ष कर रहे थे तब भगवान विश्णु ने मोहिनी
25:37रूप धारण कर उन्हें न्याय संगत वितर्ण सुनिश्चित किया
25:41मोहिनी के मनमोहक रूप ने असुरों को मंत्रमुग्ध कर दिया और देवों को अमरित पान का अफसर मिला जिससे ब्रह्मांड
25:49में संतुलन पुनह स्थापित हुआ
25:52पराशर जी ने कहा कि ये तो केवल कुछ उदाहरण है क्योंकि विश्णु के अवतारों और लिलाओं की कोई सीमा
25:59नहीं है वे अनन्थ हैं और प्रत्येक मनवंतर में बगलते हैं
26:05वे हर युग में धर्म की स्थापना, सजजनों की रक्षा और दुष्टों के सहार के लिए अवतरित होते हैं जिससे
26:13कालचक्र सुचारों रूप से चलता रहे
26:16मैत्रे ने देखा की कैसे भगवान विश्णु अपनी योग निद्रा में भी इस विशाल ब्रहमांड को अपनी शक्ती और चेतना
26:24से संचालित करते रहते हैं
26:27विश्णु का प्रतेक अवतार, प्रतेक लीला, इस बात का प्रमान है कि वे ही इस परिवर्तनशील संसार के एक मात्र
26:35शाश्वत और अप्रिवर्तनिय सत्य हैं
26:39मैत्रे के मन में अब कोई संशय नहीं था, उन्होंने समझा कि भगवान विश्णु का विराट समय चक्रही संपून ब्रहमांड
26:47को निरंतर गती प्रदान करता है
26:50इस प्रकार पराशर जी के गहन ज्यान से मैत्रे ने भगवान विश्णु की परमसत्ता, उनकी अनन्त लिलाओं और ब्रहमांड में
26:59उनके अविनाशी स्थान को पूर्णता आत्मसाथ कर लिया
27:04महर्शी पराशर ने अपनी प्रग्यासे मैत्रे को समझाया कि कैसे यह ब्रहमांड केवल एक सतत प्रवाह नहीं, बलकि धर्म और
27:12अधर्म के सनातन द्वंद्व से बुना एक विराट चक्र है
27:17उन्होंने आगे बताया कि यह द्वंद्व प्रत्येक मनवंतर में युग्युगांतर तक चलता रहता है, जहां ब्रहमांड की आत्मस्वयन एक शाश्वत
27:27नाटक का मंचन करती है
27:30जैसे एक श्वास ब्रहमांड को रच्चती है और दूसरी उसका सहार करती है, वैसे ही हर मनवंतर में धर्म अपने
27:38उतकर्ष पर पहुँचता है और फिर अधर्म उसे चुनौती देता है
27:43आरंभ में, सत्ययुक के प्रकाश में, धर्म एक अडिक परवत की तरहे खड़ा होता है, जहां न्याय और सद्भाव सर्वव्यापी
27:52होते हैं
27:54किन्तु समय के साथ कलह और स्वार्थ के बीज धीरे-धीरे अंकुरित होने लगते हैं, जो अधर्म की काली चाया
28:01को जन्न देते हैं
28:04जैसे जैसे अधर्म बलवान होता जाता है, यह धर्म के स्तंभों को क्षीड करता है और ब्रहमांड में अराजकता फैलने
28:12लगती है
28:14मनुष्य अपने कर्मों के जाल में उलज जाता है, जहां सत्य धूमिल होता है और लोग तथा अहंकार सर्वोप्री हो
28:22जाते हैं
28:24तब धर्म के संरक्षत, रिशी और साधु इस विकट स्थिती पर शोक मनाते हुए परम शक्ती से प्रार्थना करते हैं
28:33उनकी पुकार ब्रहमांड के हरिदय तक पहुँचती है, जहां भगवान विश्नु अपने शाश्वत योग निद्रा में लीन रहते हुए भी
28:41सब कुछ जानते हैं
28:44तब विश्नु का परम विधान सक्रिय होता है, जो अदरिश्य सूत्रों से पूरे ब्रहमांड को नियंत्रित करता है और अधर्म
28:52के अंत की योजना बुनता है
28:55प्रत्येक मनवंतर में जब धर्म की आभाक्षीन पढ़ने लगती है, भगवान अपने अवतारों के माध्यम से पृत्वी पर अवत्रित होते
29:04हैं
29:05वे अन्याय और उत्पीडन के अंधकार को चीरते हुए एक नए युग की भोर लेकर आते हैं, जहां धर्म पुन्ह
29:13अपने गौरवशाली स्वरूप में स्थापित होता है
29:17उनके प्रत्येक अवतार का उद्देश केवल ब्रहमांडिय संतुलन बनाए रखना नहीं, बल्कि यह भी दर्शाना है कि विश्णू की इच्छा
29:26ही सर्वोच्च और अटल है
29:29वे ही स्रिष्टि करता, पालन करता और संहार करता हैं, जिनकी लीला से यह संपूर्ण जगत नित्य गतिशील रहता है
29:39पराशर ने समझाया कि प्रत्येक आत्मा के कर्म, चाहे अच्छे हो या बुरे, इस महाचक्र का एक अविभाज अंग है
29:48ये कर्म ही युगों के स्वरूप को निर्धारित करते हैं, जब धर्म के कर्म बढ़ते हैं, तो स्वर्ण युग आता
29:55है, और जब अधर्म के, तो कलियुग का अंधकार चाजाता है
30:01फिर भी इस उतार चढ़ाव के बावजूद, विष्णू की अधरिश्य शक्ती सदैव ब्रह्मांडिय संतुलन को बनाये रखती हैं, और धर्म
30:09की विजय सुनिश्चित करती है
30:12मैत्रे ने समझा कि कोई भी कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, वह भगवान विष्णू के परम विधान को भंग
30:19नहीं कर सकता
30:21अधर्म का सामरा जिक्षनिक होता है, जबकि धर्म का प्रकाश शाश्वत है, जो अंत्ता हर अंधेरे को मिटा कर पुनह
30:30स्थापित होता है
30:41अविनाशी स्थान को पूर्णता आत्मसाथ कर लिया, महर्शी पराशर ने शांत वन में बैठे मैत्रे को समझाना शुरू किया कि
30:50समय का सबसे विशाल और भव्य चक्र कल्प कहलाता है, जो सृष्टी के उदे और विलय की संपूर्ण गाथा है
30:59उन्होंने बताया कि जिस प्रकार क्षणों से मिलकर दिन और वर्ष बनते हैं, उसी प्रकार मानविय युगों की अंगिनत कडियों
31:06के जुड़ने से ब्रहमा जी का एक कल्प निर्मित होता है
31:11जब ब्रहमा जी की रात्री समाप्थ होती है, तब वे अपनी योग निद्रा से जागते हैं और उनके एक नए
31:18दिन के आरंभ के साथ ही सृष्टी का नया चक्र शुरू होता है
31:24पराशर जी ने रहस्योद घाटन किया कि ब्रहमा जी के इस एक कल्प के भीतर कुल चौधा मनवंतर बीचते हैं,
31:31जिन में से प्रत्येक का अपना एक अलग मनु और रक्षक इंद्र होता है
31:37प्रत्येक मनवंतर में न केवल मनु बदलते हैं, बलकि सब्तर्शी और देवगण भी बदल जाते हैं, जो मिलकर उस विशेश
31:45कालखंड में ब्रहमांडिय व्यवस्था और धर्म का संचालन करते हैं
31:51जैसे रत के पहिए के आरे गूंते हैं, वैसे ही ये 14 मनवंतर एक के बाद एक आते हैं, और
31:58प्रत्येक मनवंतर पृत्वी पर सभ्यता और ज्यान के नए युग की नीम रखता है
32:05जब चौधवे मनवंतर का अंतिम्चरण समाप्थ होता है तब ब्रह्मा जी का वह विशाल दिन भी पूर्णता की ओर बढ़ता
32:12है और स्रिष्टी पर संध्या की छाया पढ़ने लगती है
32:17इस ब्रह्मांदिय संध्या के आते ही प्रकृती शान्त होने लगती है और समस्थ प्राणी उस परम विश्राम की ओर खिंचे
32:25चले जाते हैं जो प्रलय से ठीक पहले आता है
32:29प्रलय के प्रारंभ में आकाश में बारह सूर्य एक साथ उदित होते हैं जिनकी प्रचंड और असहनिय उश्मा से समस्थ
32:38महासागर सूख जाते हैं और प्रित्वी निर्जल हो जाती है
32:43इसके पश्चात पाताल लोक से उठने वाली समवर्तक अगनी संपूर्ण तीनों लोकों को अपनी लप्टों में घेर लेती हैं जिससे
32:51हर तिनका और पाशान भस्म होकर शुद्ध हूर्जा में बदलने लगता है
32:57जब अगने सब कुछ भस्म कर देती है तब आकाश में विशाल और दरावने समवर्तक मेग उमरते हैं जो सदियों
33:05तक मूसलाधार वर्षा करके उस भयंकर ज्वाला को शांत करते हैं
33:11धीरे धीरे संपूर्ण ब्रहमांड जल्मगन हो जाता है और चारों और केवल एक असीम, शांत और अंधकार्मय महासागर ही शेश
33:20रह जाता है जिसे एकार्णव कहा जाता है
33:24समस्ट स्रिष्टी का उपसनहार करके स्रिष्टी के रच्चिता ब्रहमाजी स्वयं को अपनी योगनिद्रा में लीन कर लेते हैं जिससे उनकी
33:32कालवधी की रात्री प्रारंभ होती है
33:36इस महाप्रलय के मध्य केवल परमेश्वर भगवान विश्णु शेशनाग की शयापर योगनिद्रा में विराजमान रहते हैं जो संपूर्ण ब्रहमांड के
33:46बीजों को अपने भीतर सुरक्षित रखते हैं
33:50प्रत्येक आत्मा, प्रत्येक तत्व और संपूर्ण स्रिष्टी का अस्तित्व उस समय भगवान श्री हरी के विशाल और आनंदमई विग्रह में
33:58विलीन हो जाता है जैसे नदिया समुद्र में खो जाती है
34:03यह वह परम्मौन की अवस्था है जहां न तो समय का स्पंदन होता है और नहीं स्रिष्टी का कोलाहल बलकि
34:11सब कुछ विश्णू की दिवय चेतना में सुक्त रहता है
34:16पराशर जी समझाते हैं कि जितनी लंबी ब्रहमा जी की स्रिष्टी की अवधी थी उतनी ही लंबी उनकी यह रात्री
34:23भी होती है जो ब्रहमांडिय संतुलन का प्रतीक है
34:28इस विस्मयकारी सत्य को सुनकर मैत्रे का हृदय भक्ती से भर गया और उन्होंने महसूस किया की भौतिक संसार का
34:36हर सुख दुख क्षन भंगुर है
34:39जैसे ही यह लंबी ब्रहमांडिय रात्री समाप्थ होगी वैसे ही पुन्ह एक नया कल्प शुरू होगा और 14 नए मनवंतरों
34:47के साथ जीवन का चक्र फिर से गतिमान हो उठेगा
34:52अंतह महर्शी पराशर ने हाथ जोड़कर भगवान विश्नु के इस विराट कालचक्र को नमन किया जो हमें सिखाता है कि
35:00हर अंत केवल एक नय और सुन्दर आरंभ की पूर्व संध्या है
35:06महर्शी पराशर ने मैत्रे की ओर देखते हुए अत्यंत शांत स्वर में कहा कि यह संपून कालचक्र, मनवंतर और ब्रहमांड
35:14की रचनाविनाश की लीला और कुछ नहीं, बलकि भगवान विश्नु की एक सामान्य श्वास मात्र है
35:22अपने गुरु के इन परम वचनों को सुनकर मैत्रे के भीतर का अज्ञान पूरी तरह नश्ठ हो गया और उन्हें
35:29इस नश्वर संसार की क्षनभंगुर्ता का साक्षात अनुभव होने लगा
35:35पराशर जी ने आगे समझाया कि जब तक मनुष्य इस भौतिक जगत के सुख दुखों में उल्जा रहता है, तब
35:42तक वह माया के चक्र से मुक्ठ होकर उस परम आनंद को प्राप्ट नहीं कर पाता
35:47इस स्रिष्टी में जितने भी मनवंतर बीटते हैं और जितने भी मनु और रिशी बदलते हैं, वे सब केवल उस
35:55अनंत चेतना के रंगमंच पर अभिनीत होने वाले दृष्य मात्र हैं
36:01जो मनुष्य इस परम सत्य को जान लेता है कि हर परिवर्तन के पीछे केवल श्रीहरी की ही इच्छा कार्यरत
36:08है, वह भय और शोक से सदा के लिए मुक्ठ हो जाता है
36:13रिशी पराशर ने अपनी दिव्यद रिष्टी से कालचक्र की उस अग्रिश्य धुरी को दर्शाया, जिसके प्रभाव से कोटि-कोटी ब्रहमांड
36:21उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं
36:25भगवान नारायन का वह विराट स्वरूप ही समय से परे है, जहां न भूतकाल है, न भविश्य और नहीं वर्तमान
36:33का कोई अस्तित्व शेश रहता है
36:36मैत्रे ने अत्यंत श्रद्धा भाव से पूछा की है गुरुदेव, इस विक्राल और अनन्ट काल के महासागर को पार करने
36:44की नौका भला मनुष्य को कैसे मिल सकती है
36:48महर्शी पराशर ने मंद मुस्कान के साथ उत्तर दिया कि भगवान विश्नों की अनन्य भक्ती और उनके नाम का स्मरण
36:56ही वह परम नौका है, जो जीव को भवसागर से पार उतारती है
37:02स्रिष्टी का प्रतेक परमानू, प्रतेक जीव और प्रतेक शन केवल उसी परमात्मा की सत्ता से स्पंदित हो रहा है, जिसके
37:10बिना कुछ भी संभव नहीं है
37:13यह अन्मोल ज्यान मनुष्य को केवल बुद्धी के स्तर पर नहीं, बलकि अपनी आत्मा के गहरे स्तर पर अनुभव करना
37:21चाहिए ताकि वह मोक्ष की ओर बढ़ सके
37:24जैसे गंगा नदी अनेक पहाडों और जंगलों को पार करके अन्तह समुद्र में विलीन हो जाती है, वैसे ही यह
37:32जीवात्मा अन्तह भगवान विश्णु के परम धाम को प्राप्त करती है
37:37इस स्रिष्टी में कलपों और युगों के बीतने पर भी जो सत्य कभी नहीं बदलता, वही सनातन सत्य केवल आदिपुरुष
37:45भगवान नारायन ही है
37:49महर्शी पराशर ने मैत्रे के सिर पर अपना वर्देहस्त रखते हुए, उसे इस परम रहस्य में ज्यान के पूल्न अधिकारी
37:56होने का आशिरवाद प्रदान किया
37:59गुरु के स्पर्ष मात्र से ही मैत्रे के हृदय में दिव्य प्रकाश का उदे हुआ, जिससे उनके सारे संदे और
38:07सांसारिक बंधन तक्षण ही छिन्नभिन हो गए
38:11मैत्रे ने गदगद कंट से गुरुदेव के चर्णों की वंदना की और स्विकार किया कि आठ उन्हें संसार के सबसे
38:18बड़े रहस्य का ज्यान हो गया है
38:22पराशर जी ने अंतिम उपदेश देते हुए कहा कि जो कोई भी इस मनवंतर और कालचकर के ज्यान को श्रद्धा
38:29पूर्वक सुनता है, वह जन्ममर्ण के बंधन से मुक्थ हो जाता है
38:34पूरा आश्रम दिव्य उर्जा और पवित्र सुगंध से महक उठा, मानोस्वय देवगण भी इस अध्भुत ज्यान चर्चा के साक्षी बनकर
38:43पुष्पवर्शा कर रहे हुँ
38:45इस प्रकार सुरिष्टी की इस अध्भुत लीला के पीछे छिपी भगवान विश्णू की अनंत महिमा का यह भव्य अध्या यहां
38:53पूर्णता को प्राप्थ हुआ
38:56आए हम सब मिलकर उस अनंत और सर्वव्यापी नारायन को नमन करें जो समय के निर्माता भी हैं और समय
39:04से परेपरम सत्य भी
Comments

Recommended