राजा कलमाषपाद (मित्रसह) की असाधारण कहानी में गोता लगाएँ, सूर्यवंश के उस राजा की गाथा जिसने एक भयंकर श्राप के कारण राक्षसी जीवन जिया! 😈 एक शाही शिकार से शुरू हुई यह कथा, गुरु वशिष्ठ के क्रोध, एक प्रतिशोधी राक्षस की साज़िश, और रानी मदयंती के अथक प्रेम की पराकाष्ठा है। देखें कैसे वासना, कर्म और नियति एक शक्तिशाली सम्राट को नरभक्षी राक्षस में बदल देती है, और कैसे वह इस भयंकर श्राप से मुक्त होकर एक नए भविष्य की ओर बढ़ता है। इस महागाथा में जानें कि कैसे कर्मों का फल मिलता है और अंत में धर्म की विजय होती है। क्या कलमाषपाद अपने कर्मों का प्रायश्चित कर पाएगा? इस रोमांचक प्रकरण में जानें! #विष्णुपुराण #सूर्यवंश #कलमाषपाद #वशिष्ठ #हिंदूपौराणिककथाएँ #राक्षस #श्राप #कर्मफल
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00:00गंगा के पवित्र अवतरण के बाद सूर्यवंश की पावन गाथा आगे बढ़ती है, जहां अयोध्या का वैभवशाली सिनहासन नए महाप्रतापी
00:09समराट के स्वागत के लिए सज उठता है.
00:13इस गौरवशाली सामराज्य के अधिपती के रूप में राजा मित्रसह का राज्या भिशेख होता है, जिनके पराक्रम की गाथाएं तीनों
00:21लोकों में गूझ रही हैं.
00:24राजगुरु महर्शी वशिष्ट के मार्ग दर्शन में राजा मित्रसह ने धर्म की मर्यादा को सर्वोच रखते हुए अनेक यग्यों का
00:32अनुष्ठान प्रारंभ किया.
00:34अपने राज्य की सुरक्षा के लिए राजा ने एक ऐसी अपराजे सेना का निर्मान किया, जिसके सामने शत्रु भय से
00:42थर्थर कापते थे.
00:44प्रजा के कश्टों को दूर करने के लिए राजा मित्रसह स्वय न्याय की तराजू हाथ में लेकर निश्पक्ष निर्नय सुनाते
00:52थे, जिससे वे लोक्प्रिय शासक बन गए.
00:56किन्तु अपार सफलता और यश के बीच राजा के हरिदय में क्रोध और अहंकार का एक सुक्ष्म बीज धीरे-धीरे
01:03पनपने लगा था.
01:05एक संध्या अपने विशाल प्रासाद की छत से सामराज्य को निहारते हुए राजा को अपनी शक्ती का अत्यंत घमंड महसूस
01:14होने लगा.
01:15सांसारिक सुखों के प्रती उनका आकर्षन बढ़ता गया और वे राजसी विलासिता के सुंदर उध्यानों में अधिक समय व्यतीत करने
01:24लगे.
01:25उनकी महारानी मध्यंती जो अपनी बुद्धिमत्ता और रूप के लिए विख्यात थी, राजा के इस बदलते व्यवहार से चिंतित होने
01:34लगी.
01:35अपने मन की चंचलता और बढ़ते क्रोध को शांत करने के लिए राजा ने घने जंगलों में शिकार करने का
01:42निश्चय किया.
01:44वन की गहराईयों में जाते ही राजा को एक अलौकिक और जादूई स्वर्ण म्रिग दिखाई दिया, जिसने उनके भीतर तीवर
01:52त्रिशना जगा दी.
01:54म्रिग का पीछा करते हुए राजा के अचूक तीर भी विफल होने लगे, जिससे उनका क्रोध और हट सात्वें आस्मान
02:01पर पहुँच गया.
02:03गुस्से में पागल राजा ने वन के शांत वातावर्ण को अपने चिल्लाहट और घोडों की टापों से अशांत कर दिया.
02:11तभी वन के बीच उन्हें एक परम तेजस्वी तपस्वी मिले, जो मौन धारन कर ध्यान में लीन थे, किन्तु राजा
02:19ने उनका आदर नहीं किया.
02:22बिना प्रणाम किये राजा वहां से लौट आये, परन्तु उनके मन में वासना और क्रोध की जो अगनि सुल्गी थी,
02:29वह शांत होने का नाम नहीं ले रही थी.
02:33महल लोटकर राजा ने स्वयन को एक एकांत कक्ष में बंद कर लिया, जहां उनकी चेतना पर अभिमान की गहरी
02:40चाया चाने लगी.
02:43महर्शी वशिष्ठ ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से राजा के इस पतन को भाप लिया और वे उन्हें सचेत करने राजसभा में
02:50पधारे.
02:52परन्तु अहंकार में चूर राजा मित्रसह ने गुरु के वचनों को अनसुना कर दिया, जो की विनाश का पहला संकेत
02:59था.
03:01अन्धेरी रात में अयोध्या के महल पर एक भयानक साया मंदराने लगा, जो राजा के आने वाले भयानक भाग्य की
03:08गवाही दे रहा था.
03:10इस प्रकार एक महान और न्यायप्रिय राजा अपनी वासना और क्रोध के कारण एक भयंकर विनाशकारी मार्ग पर पैर रख
03:19चुका था.
03:20अपनी वासना और क्रोज से ग्रस्थ होकर राजा मित्रसह ने एक दिन घने जंगल में अपने सामराज्य की शक्ती दिखाने
03:28का निर्णय किया
03:29अंजाने में एक ऐसे मार्ग पर बढ़ रहा था जहां भाग्य का अंधकार मैजाल उसका इंतजार कर रहा था
03:37इस पावन प्रसंग में शाही शिकार और राक्षस का अंतकी महिमा का वर्णन किया गया है
03:44राजा अपनी विशाल सेना के साथ जिसने सोने और रतनों से जड़े अपने कवच पहन रखे थे
03:51गरविले ढंग से राजमहल से बाहर निकला और धीरे-धीरे सभ्यता की सीमाय छोड़कर असीम वन में प्रवेश किया
03:59इस पावन प्रसंग में शाही शिकार और राक्षस का अंतकी महिमा का वर्णन किया गया है
04:07घने वन में प्रवेश करते ही हवा में ताजी मिट्टी और फूलों की खुश्बू घुल गई जहां उचे व्रिक्षों के
04:14बीच से छनकर आती सूर्य की किरने धर्ती पर अध्भुत चित्रकारी कर रही थी
04:20इस पावन प्रसंग में शाही शिकार और राक्षस का अंतकी महिमा का वर्णन किया गया है
04:28परंतु अचानक राजा की तेज आखों ने तूटी हुई डालियों और विशाल पैरों के निशानों को देखा
04:34जो किसी सामान्य वन्य जीव के नहीं थे बलकि एक असाधारन और भयानक उपस्थिती का संकेट दे रहे थे
04:43इस पावन प्रसंग में शाही शिकार और राक्षस का अंतकी महिमा का वर्णन किया गया है
04:50कुछ देर बाद एक फुर्तीले हिरन ने राजा के सामने से चलांग लगाई
04:55जिसे राजा ने अपने स्वर्नच्टित धनुष से एक ही तीर में मार गिराया अपनी अचूक निपुन्ता का प्रदर्शन करते हुए
05:04इस पावन प्रसंद में शाही शिकार और राक्षस का अंतकी महिमा का वर्णन किया गया है
05:11जैसे जैसे वेवन के गहरे हिस्सों में आगे बढ़ते गए
05:15वातावर्ण में एक अजीब सी खामोशी चा गई
05:18पेडों की घनी चायाए और भी गहरी होने लगी
05:27इस पावन प्रसंद में शाही शिकार और राक्षस का अंतकी महिमा का वर्णन किया गया है
05:34सहसा एक दिल दहला देने वाली गर्जना ने पूरे जंगल को कमपा दिया
05:39जिससे पक्षी आकाश में उड़ गए और सैनिकों के हृदय में भय की एक लेहर दोड़ गई
05:46इस पावन प्रसंद में शाही शिकार और राक्षस का अंतकी महिमा का वर्णन किया गया है
05:53और फिर अंधेरे से निकल कर एक भयानक राक्षस सामने आया
05:58जिसकी आखें अंगारों सी देहक रही थी और जिसका शरीर पत्थरों से भी अधिक कठोर प्रतीत होता था
06:05मानो भपाताल से ही निकल कर आया हो
06:09इस पावन प्रसंद में शाही शिकार और राक्षस का अंतकी महिमा का वर्णन किया गया है
06:16राजा मित्रसह पहले तो पल भर के लिए स्तब्ध रह गये
06:20लेकिन तुरंत उनका चहरा द्रिड संकल्प और क्रोज से भर गया
06:24उन्होंने अपनी तलवार की मूठ पर मजबूती से हाथ रखा
06:29इस पावन प्रसंद में शाही शिकार और राक्षस का अंतकी महिमा का वर्णन किया गया है
06:36राक्षस ने एक भयंकर हुंकार भरी और अपनी विशालकाय मुठी से भूमी पर प्रहार किया
06:43जिससे धर्ती कांप उठी और उसके सैनिक दरकर पीछे हटने लगे
06:47इस पावन प्रसंद में शाही शिकार और राक्षस का अंतकी महिमा का वर्णन किया गया है
06:55अपने सैनिकों को पीछे हटते देख
06:58राजा मित्रसह ने अदमय साहस का परिचय देते हुए स्वय राक्षस पर धावा बोल दिया
07:04मानो वह अपनी प्रतिष्था और वीर्ता के लिए युद्ध कर रहे हूँ
07:09इस पावन प्रसंद में शाही शिकार और राक्षस का अंतकी महिमा का वर्णन किया गया है
07:17तलवारों की खनक और राक्षस की चीखों से पूरा जंगल गूंज उठा
07:21जैसे राजा और दानव के बीच एक प्रल्यंकारी युद्ध छिड़ गया हो जहां हर वार जीवन और मृत्यु का निरनय
07:28कर रहा था
07:30इस पावन प्रसंग में शाही शिकार और राक्षस का अंतकी महिमा का वर्णन किया गया है
07:37अपनी पूरी शक्ती और अनुभव का उप्योग करते हुए राजा ने एक घातक वार किया
07:43उनकी स्वर्नच्टित तलवार राक्षस के विशाल हृदय में गहराई तक समा गई जिससे वह जोर से चीख उठा
07:51इस पावन प्रसंग में शाही शिकार और राक्षस का अंतकी महिमा का वर्णन किया गया है
07:59भयंकर राक्षस एक अंतिम काप के साथ धर्ती पर गिर पड़ा
08:03उसके विशाल शरीर से खून की धाराय फूट पड़ी जिससे आसपास की धर्ती लाल हो गई और उसकी करूर आखें
08:11हमेशा के लिए बंध हो गई
08:13इस पावन प्रसंग में शाही शिकार और राक्षस का अंतकी महिमा का वर्णन किया गया है
08:21राजा मित्रसह अपनी तलवार उची किये विजय का उद्गोश करते हुए खड़े थे उनके सैनिक हर्षोलास से जयकार कर रहे
08:29थे
08:30मानो उन्होंने एक महान युद्ध जीता हो
08:33इस पावन प्रसंग में शाही शिकार और राक्षस का अंतकी महिमा का वर्णन किया गया है
08:41लेकिन तभी पेडों की घनी चायाओं से एक और राक्षस प्रकट हुआ
08:46जिसने अभी अभी अपने भाई को राजा के हाथों मरते देखा था
08:50उसकी आखें प्रतिशोध की आग से जल रही थी
08:54इस पावन प्रसंग में शाही शिकार और राक्षस का अंतकी महिमा का वर्णन किया गया है
09:02दूसरे राक्षस का चहरा अपने मृत भाई को देख कर गहरे दुख और बेकाबु क्रोध से विकृत हो गया
09:09उसका शरीर प्रतिशोध की ज्वाला में काम प्रहा था
09:13इस पावन प्रसंग में शाही शिकार और राक्षस का अंतकी महिमा का वर्णन किया गया है
09:20उसने अपने भाई के शव पर हाथ रख कर आकाश की ओर देखा और एक भयानक प्रतिज्याली की वह राजा
09:28मित्रसह से उसके इस धिनोने कार्य का बदला अवश्य लेगा
09:31चाहे उसे कुछ भी करना पड़े
09:34इस पावन प्रसंग में शाही शिकार और राक्षस का अंतकी महिमा का वर्णन किया गया है
09:42राजा अपनी विजय के नशे में चूर था
09:45अन्भिग्य की उसने केवल एक युद्ध जीता था
09:48लेकिन एक ऐसी भयानक शत्रुता को जन्न दे दिया था जो उसके भविश्य को अंधकार में धकेलने वाली थी
09:56इस पावन प्रसंग में शाही शिकार और राक्षस का अंतकी महिमा का वर्णन किया गया है
10:04अंधकार से भरे एक गेहन गुफा में वह राक्षस जिसने अभी अभी पराजय का स्वात चका था
10:10प्रतिशोध की अग्नी में धधक रहा था उसकी आखें लाल अंगारों सी देहक रही थी
10:17अपनी भयावः शक्ती और मायावी कला का उप्योग करते हुए उसने धीरे धीरे अपने राक्षस रूप को त्याग कर एक
10:25साधारन मनुष्य का वेश धारन करना शुरू कर दिया
10:29कुछ ही क्षणों में उसकी विक्राल आक्रिती अब राजमहल के प्रधान रसोये एक सामान्य दिखने वाले व्यत्ती के शांत और
10:37विनम्र रूप में बदल गई थी
10:40बिना किसी संदेह के वह कप्टी रसोया चुपचाप राजमहल के विशाल रसोय घर में दाखिल हुआ जहां सुबह का कोलाहल
10:48अभी शुरू ही हुआ था
10:51पीतल के बड़े-बड़े बर्तनों की खनक और मसालों की खुश्बू से रसोय घर जीवन थो उठा था जहां हर
10:58कोने में पकवानों की तयारी चल रही थी
11:01उसने अपनी पैनी नजरों से अन्य रसोयों और सेवकों को पर्खा उनके दैनिक कारियों और आद्तों को सुक्षमता से समझने
11:10का प्रयास किया
11:12धीरे धीरे और बड़ी चतुराई से उसने रसोय के दैनिक कारियों पर अपना नियंतरन स्थापित कर लिया जैसे कि यह
11:20उसका जन्मसिद अधिकार हो
11:22आज एक विशेश भोज की तैयारी थी जिसके लिए दुरलब सामगरी लाई गई थी जिसे केवल विशिष्ट अतिथियों के लिए
11:31परोसा जाता था
11:33यह भोज महान रिशी वशिष्ट के सम्मान में आयोजित किया जाना था जिनकी प्रतीक्षा राजमहल में बड़ी श्रद्धा के साथ
11:41की जा रही थी
11:43इस समाचार ने रसोये के चहरे पर एक सुक्ष्म भयानक मुस्कान ला दी जो उसके दुष्ट इरादों को उजागर कर
11:51रही थी
11:52उधर राजा कलमाशपाद अपनी राजगद्धी पर विराजमान अपने गुरु के आगमन की प्रतीक्षा में निश्चिन्त थे अपनी जीत के आनंद
12:02में ली
12:03दूर से रिशी वशिष्ट अपनी शान्ति पूर्ण और दिव्य आभा के साथ राजमहल की ओर अपने पवित्र आश्रम से प्रस्थान
12:12कर रहे थे
12:14उनकी उपस्थिती से वातावर्ण में एक अद्भुत शान्ती और पवित्रता का संचार हो रहा था
12:20प्रकृती भी उनके सम्मान में नत्मस्तक प्रतीत हो रही थी
12:25रसोई में छद्म रसोईया एक विशिष्ट व्यंजन पर ध्यान केंद्रित कर रहा था
12:30जिसे विशेश रूप से रिशी वशिष्ट के लिए तयार किया जा रहा था
12:35उसने उन गुप सामगरी को मिलाया जो देखने में तो साधारन थी
12:40पर अपने भीतर एक भयावः और अनिष्टकारी रहस्य छिपाए हुए थी
12:46चुपचाप और बड़ी सावधानी से उसने उस व्यंजन पर कुछ रहस्यमय मंत्र बुद्बुदाए
12:52जो साधारन था किसी भोज का हिस्सा नहीं होते थे
12:56अब वह भयानक व्यंजन एक भव्यस्वर्ण थाली में सजाया गया था
13:01जो बाहर से तो अत्यंत आकर्शक दिख रहा था
13:04किन्तु अंदर से विश्च से भरा था
13:08तभी राजमहल में रिशी वशिष्ट के आगमन की घोशना हुई
13:12जिससे वातावर्ण में एक शनिक उत्साह और गहरी शांती चागई
13:18प्रसोया अपने दुष्ट कार्य को पूरा करने के लिए उत्सुक उस घातक थाली को लेकर तयार खड़ा था
13:24उसके मुख पर एक बनाव्टी विनमर्ता चाई हुई थी
13:29रिशी वशिष्ट अपनी दिव्यगरिमा के साथ शांत कदमों से भोजन कक्ष में प्रवेश कर रहे थे
13:36अन्भिग्य की उनके लिए कैसी भयावा नियती प्रतीक्षा कर रही थी
13:41राजा मित्रसह ने अत्यंत आदर और विनमर्ता के साथ परम पूज महर्शी वशिष्ट को स्वर्ण जडित उचे आसन पर विराजमान
13:49किया
13:51रसोई घर के अंधकार में छिपा दुष्ट राक्षस रसोईया अपनी कुटिल योजना की सफलता पर मन ही मन अट्तहास कर
13:58रहा था
14:00सोने की थाली में सजाकर वह दूशित और निशिध मानव मास रिशी के समक्ष परोसने के लिए आगे बढ़ाया गया
14:08जब राजा के संकेट पर रसोईये ने वह घ्रेनित भोजन महर्शी वशिष्ट के सामने परोसा तो भोजन कक्ष की हवा
14:16अचानक भारी हो गई
14:19महर्शी वशिष्ट ने जैसे ही भोजन द्रहन करने के लिए हाथ बढ़ाया उनके तपस्वी मन में एक अजीब सी अशान्ती
14:27और संशय उत्पन हुआ
14:29सत्य को जानने के लिए महर्शी ने अपनी आखें मून्द ली और अपनी दिव्यद रिष्टी को उस परोसे गए भोजन
14:37पर केंद्रित किया
14:39दिव्यद्रिष्टी के खुलते ही रिशी को उस स्वर्ण थाली में किसी निरीह मनुष्य का मास दिखाई दिया, जिससे उनकी आत्मा
14:47कांप उठी
14:48अक्यंत घेना और तीवर क्रोध से भर कर रिशी वशिष्ट की आखें लाल अंगारे की तरहे धधक उठी
14:56रिशी के इस अचानक और भयानक रौद्र रूप को देखकर राजा मित्रसह भय और व्याकुलता से कामपने लगे
15:05महर्शी वशिष्ट ने अपने आसन से उठकर गरचते हुए स्वर में राजा पर रिशी मर्यादा के घोर उलंधन और इस
15:12जगन्य पाप का आरोप लगाया
15:15पकड़े जाने के भय से वह छद्म वेशी राक्षस रसोया अपने वास्तविक भयानक रूप में प्रकट होकर वहां से अग्रिश
15:23हो गया
15:24राजा मित्रसह ने थर्थराते हाथों से प्रार्थना करते हुए रिशी के चर्णों में गिरकर अपनी अज्यानता और निर्पराध होने की
15:33दुहाई दी
15:34क्रोध के वशीभूत होकर महर्शी वशिष्ठ ने राजा की किसी भी याचना को सुनने से इनकार कर दिया और अपना
15:42कमंडल उठा लिया
15:44महर्शी ने अपने हाथ में पवित्र जल लेकर राजा को श्राप दिया कि उसने जो नर्मास परोसा है वही उसका
15:52मुख्य भोजन बनेगा और वह राक्षस बन जाएगा
15:56श्राप के प्रभाव से राजा मित्रसह का शरीर तडपने लगा और उनकी त्वचा का रंग बदलने लगा
16:04राजा के सिर पर भयानक सींग उगने लगे उनके दान्त नुकीले हो गए और उनके नक हिंसक पशु की भानती
16:11बड़े होने लगे
16:13इस घोर अन्याय से पीडित होकर क्रोधित राजा ने भी अपने गुरु वशिष्ट को प्रतिश्राप देने के लिए अपने हाथ
16:21में जल उठा लिया
16:23तभी राजा की बुद्धिंती राणी मध्यन्ती ने दोड़ कर उनका हाथ पकड़ लिया और उन्हें अपने परम गुरु को श्राप
16:30देने के महापाप से रोका
16:33राणी के रोकने पर राजा ने वह अभिमंत्रित जल अपने ही पैरों पर गिरा दिया, जिससे उनके पैर जल कर
16:40काले कोले जैसे हो गए
16:43इस प्रकार राजा मित्रसय सदा के लिए कलमाश पाद नामक भयानक नर्भक्षी राक्षस में परिवर्तित होकर वन की ओर भाग
16:51गए
16:52अपने भयानक राक्षसी रूप और कोले जैसे काले पैरों के साथ, राजा कलमाश पाद दर्द और भूख से चीखते हुए
17:00नैमिशारने के घने और अंधकार्मय जंगलों में गहरे चले गए
17:06श्राप के भयानक प्रभाव से धीरे धीरे राजा के मस्तिश्क से उनके गौरवशाली इतिहास की सभी मानविय स्मृतिया मिटने लगी
17:14और केवल इंसानी मास की भूख बची रही
17:18उसी समय वन के एक शान्त कोने में वशिष्ठ रिशी के परम ज्यानी जेश्ट पुत्र रिशी शक्ती नदी किनारे अपनी
17:26संध्या वंदना और अनुष्ठान कर रहे थे
17:30जाडियों के पीछे छिपे हुए नर्भक्षी राक्षस कलमाश पाद की लाल-लाल दहकती आखों ने जब उस दिव्य तेजस्वी युवा
17:38रिशी को देखा तो उसकी भूख और तीवर हो गई
17:42किसी भयानक संकट का आभास होते ही रिशी शक्ती अपने स्थान पर उठ खड़े हुए और उन्होंने अपने हाथ में
17:50जलका कमंडल लेकर उस भयानक जीव का सामना किया
17:54अपनी राक्षसी भूख से पागल होकर कलमाश पाद ने इतनी जोर से गर्जनाकी की पूरे जंगल के पेड़ कांप उठे
18:02और पक्षी भयभीत होकर आसमान में उड़ गए
18:06रिशी शक्ती ने उस राक्षस के शरीर पर फटे हुए शाही आभूशनों को देख कर उसे उसकी पूर्व पहचान और
18:14मर्यादा याद दिलाने का प्रयास किया
18:16लेकिन राक्षस को केवल भूख सुनाई दे रही थी
18:20अपनी चेतना खोचुके राक्षस कलमाश पाद ने एक भयानक दहार के साथ हवा में छलांग लगाई और सीधे तेजस्वी युवा
18:29रिशी शक्ती पर तूट पड़ा
18:32विधाता के कुरूर लेक और श्राब के वश में आकर उस भयानक दानव ने पलक जपकते ही वशिष्ट के परम
18:39ज्यानी पुत्र रिशी शक्ती को अपने ग्रास में ले लिया
18:43उसी क्षन अपनी कुटिया में ध्यानमगन महर्शी वशिष्ट का हृदय अचानक एक अज्यात पीडा से तडप उठा और उन्होंने व्याकुल
18:51होकर अपनी आखें खोल दी
18:54महर्शी वशिष्ट ने अपनी दिव्यद रिश्टी से देखा कि कैसे उनके प्रिय और सदाचारी जेश्ट पुत्र शक्ती का एक भयानक
19:02राक्षस द्वारा अंत कर दिया गया है
19:06अपने पुत्र की इस अकाल और भयानक मृत्यू को देख कर महर्शी वशिष्ट की आखों से क्रोध और शोक के
19:13अश्रुबह निकले जो भूमी पर गिरते ही चिंगारियां बन गए
19:18उधर वन में रिशी का भक्षन करने के बाद कलमाश पाद का राक्षसी विवेक कुछ क्षणों के लिए जागरित हुआ
19:25और वह अपनी इस महापापी दशा पर जोर जोर से रोने लगा
19:30शोक से व्याकुल महर्शी वशिष्ठ अपनी गर्भवती पुत्रवधु अद्रिशंती को साथ लेकर अत्यंत भारी मन से उस घने और भयावह
19:39जंगल की ओर चल पड़े
19:42जब वशिष्ठ जी उस खून से सने और उजाडवन प्रदेश में पहुँचे तो अपने पुत्र के अवशेशों को देखकर उनका
19:50हृदय शोक के असीम सागर में डूग गया
19:53घने व्रिक्षों की ओट में छिपा हुआ राक्षस कलमाश पाद जब महर्शी वशिष्ठ के तपोबल के तेज को देखता है
20:01तो उसकी राक्षसी आत्मा भैसे कांप उठती है
20:06महर्शी वशिष्ठ ने उस राक्षस को भस्न करने के लिए हाथ में जल उठाया परंतु क्रोध की विनाशकारी शक्ती को
20:13समझ कर उन्होंने अपने तपोबल को शांत कर लिया
20:18अपने पती के वियोग में तड़पती हुई अद्रिशन्ती ने अपने गर्भ पर हाथ रखकर भगवान विश्णू से न्याय और अपने
20:25होने वाले बालक की सुरक्षा की प्रार्थना की
20:29तभी आकाश से एक अत्यंत मधुर और गंभीर दैविय आकाशवानी हुई जिसने वशिष्ठ जी को समझाया कि यह सब नेती
20:38का खेल है और बारह वर्ष बाद राजा इस पाप से मुक्थ हो जाएंगे
20:43भगवान विश्णों की इस लीला और परम विधान के सामने सिर जुका कर महर्शी वशिष्ठ अपने दुहक को पी गए
20:51और वह राक्षस अत्यंत विलाप करता हुआ वन के और गहरे अंधकार में विलीन हो गया
20:57महर्शी वशिष्ठ की आखों में पीड़ा अभी भी गहरी थी किन्तु भाग्य के परम विधान को स्विकार कर उन्होंने अपने
21:05हृदय के घावों को शांत किया पर ब्रहमांड का चक्र अभी भी अपनी गती से घूम रहा था
21:12वहीं दूसरी और राजा जो अभी तक अपने ही क्रोध की अगनी में जल रहा था उस दैविय संकेट से
21:19अन्भिग्य गुरु वशिष्ठ के विरुध अपने हृदय में एक प्रतिशोध की ज्वाला प्रजवलित किये हुए था
21:26उसके हाथों में एक पवित्र पात्र था जिसमें वशिष्ठ जी को श्राप देने के लिए अभिमंत्रित जल भरा था जिसकी
21:34हर बूंद में प्रतिशोध का विश्भुला हुआ था
21:38तभी रानी मध्यन्ती जिसका हृदय अपने पती के आसन विनाश को भापकर काप रहा था एक बिजली की गती से
21:46वहाँ प्रकट हुई उसके मुख पर भय और करुणा का मिश्रण था
21:51रानी ने अपने प्राणों की परवाह किये बिना अपने क्रोध से भरे पती और पूझे गुरु के बीच एक धाल
21:58बनकर खड़ी हो गई जिससे एक भयावह टकराव टल सके
22:03उसने राजा से विनमरता पूर्वक गुरु को श्राप न देने की विन्ती की उसकी आखों में आसु थे जो उसके
22:10हरिदय की व्यथा को बया कर रहे थे
22:14मध्यन्ती के प्रेम और निष्ठा ने एक पल के लिए क्रोध से धुन्धलाई राजा की आखों में सनेह की एक
22:20शीन किरन जगा दी जिससे उसका हाथ कापने लगा
22:25राजा अपने हरिदय में प्रेम और प्रतिशोध के बीच द्वंधव जहलते हुए अंत्त अपने क्रोध पर पूरी तरह नियंत्रन नहीं
22:33रख पाया पर रानी के प्रेम ने उसे गुरु पर श्राप देने से रोक दिया
22:39उसने जल से भरे पात्र को जो गुरु वशिष्ट के लिए था अपनी भुजाओं से दूर फेंका नहीं अपितु उसे
22:46एक अप्रत्याशित दिशा में मोर दिया
22:49एक आवेग भरेक्षण में राजा ने उस श्रापित जल को जो किसी और के विनाश के लिए था अपने ही
22:57राजसी पैरों पर गिरा दिया
22:58मानो अपने भाग्य पर ही एक अमोग वार कर रहा हो
23:03जैसे ही जल की पहली बूंद उसके पैरों से टकराई एक तीवर असहनिय पीडा की लहर उसके पूरे शरीर में
23:11दोड़ गई
23:11मानो हजारों बिच्छूों ने एक साथ डंक मार दिया हो
23:16और फिर पलक जपकते ही जहां जहां श्रापित जल गिरा था उसके पैर धीरे धीरे एक भयावहप गहरे काले रंग
23:24में बदलने लगे मानो कालिक से रंग गए हो
23:28उसके राजसी पैरों की सुनहरी त्वचा एक भयावहप कोईले जैसी काली रंगत में बदल गई, जिससे उसकी भव्यता एक क्षण
23:36में कलंकित हो गई
23:38राजा का गौर्वपूर्ण नाम सौदास अब एक नए, श्रापित पहचान में बदल गया कलमाशपाद जिसका अर्थ था काले पैरों वाला
23:48राणी मध्यन्ती के मुख से एक तीवर चीख निकली, जो उसके हरदय की गहराई से उठी थी, अपने प्रियपती के
23:56इस भयावह परिवर्तन को देख कर वह विहवल हो गुठी
24:01राजा कलमाशपाद अपने ही क्रोध और श्रापित जल के परिणाम से स्तब्ध अपने काले हो चुके पैरों को देख रहा
24:08था, उसकी आखों में विश्वास और पीडा का मिश्रण था
24:13महर्शी वशिष्ठ अपनी आखों में गहरी करुणा लिये इस दुरभाग्यपूर्ण घटना को देख रहे थे, क्योंकि वे जानते थे कि
24:21नियती ने अपना क्रूर खेल खेल लिया है
24:25इस प्रकार एक क्षण के क्रोध और एक पत्नी के त्याग ने राजा को एक नए स्थाई श्राप से बांध
24:32दिया, जो अब उसके जीवन का अभिन्न अंग बन गया था
24:37मध्यन्ती ने अपने पती को अपनी भुजाओं में भर लिया, उसके दुख को अपने हृदय में समेखते हुए, क्योंकि उसके
24:45लिए यह कलमाश पाध ही उसका राजा और उसका प्रेन था
24:50और इस प्रकार एक राजसी नाम के अंत और एक श्रापित पहचान के जन्म के साथ भाग्य की एक और
24:57भयावह अध्याय का आरंभ हुआ, जो विश्नु पुराण के पन्नों में सदा के लिए अनकित हो गया
25:04उसक्षन जैसे ही शाप के अंतिम शब्द गूंजे, राजा के भीतर एक भयानक परिवर्तन आरंभ हुआ, जिसने उसके हरकन को
25:12विद्रूपता में बदल दिया
25:15उसकी मानस्पेशिया फूलने लगी, त्वचा काली पढ़कर खुर्दुरी हो गई, और उसके मुखमंडल पर एक क्रूर पाश्विक भाव उभर आया
25:25मध्यन्ती की करूण चीक उसके दानविय गर्जन में विलीन हो गई, जो अब किसी मनुष्य की नहीं, बलकी एक हिंसक
25:33दानव की थी
25:35वासना और प्रतिशोध की आग में जलता हुआ वह जंगल की गहराईयों में भाग निकला, जहां उसकी नई भयानक पहचान
25:43उसे बुला रही थी
25:45भूख और क्रोध से अंधा होकर, उसने जंगल के निर्दोष प्राणियों पर अपना प्रकोप धाया, उसकी पहली शिकार एक भोली
25:54हिर्नी बनी
25:56उसक्षण उसने अपनी मानविय चेतना को त्याग दिया, और एक नर्भक्षी राक्षस की भूख ने उसे पूरी तरह से घेर
26:03लिया
26:05जैसे ही जंगल से चीखें गूंजने लगी, पास के गावों में भय का साया फैल गया, क्योंकि एक अज्यात बुराई
26:13ने अपना आतंग फैलाना शुरू कर दिया था
26:16एक दिन जंगल से गुजरते एक निहत्थे पथिक का सामना उस भयानक राक्षस से हुआ, जिसका अंतपलक जपकते ही हो
26:24गया
26:26राज्य में निराशा छा गई, क्योंकि उनके प्रियराजा के स्थान पर अब एक अद्रिश्य राक्षस वनों में घूमता था, जो
26:34उनके लोगों को निगल रहा था
26:37राक्षस का आतंक बढ़ता गया, और वह अब केवल जंगलों तक ही सीमित नहीं था, बलकि गावों और खेतों के
26:44करीब भी भयंकर रूप से प्रकट होने लगा
26:48प्रजा ने अपने राजा को खो दिया था, और अब उन्हें बस एक भयानक दोहस्वपन का सामना करना पड़ा, जिसकी
26:55कोई सीमा नहीं थी
26:58प्रत्येक भक्षन के साथ, राजा कलमाश पाद की मानविय आत्मा का एक अंश नश्ट होता गया, और केवल राक्षस की
27:06वासना शेश रही
27:08सर्दिया आई और गई, वसंत के फूल खिले और मुर्जाय पर राक्षस का आतंक अचूता रहा, उसकी भूख कभी शान्त
27:16नहीं हुई
27:18निर्जन वनों में तपस्या कर रहे रिशिमुनियों पर भी उसका कहर तूटा, उनकी पवित्र तपस्या को अपवित्र करते हुए
27:27स्वर्ग में भी यह समाचार पहुँचा, जहां देवताओं ने इस बढ़ते हुए अंधकार को चिन्ता की द्रिष्टी से देखा, पर
27:35श्राप के नियम अटूट थे
27:37उसकी गुफा, कभी एक शांत आश्रय, अब हड्डियों और डरावनी चायाओं से भरी एक नर्भक्षी का मान्द बन चुकी थी
27:46कुछ बहादूर योध्धाओं ने उसे चुनोती देने का साहस किया, पर वे भी उसके अदमय क्रोध और शक्ती के सामने
27:54मिट्टी में मिल गए
27:56जीवित बचे लोग अब दिन रात उस राक्षस के खौफ में जी रहे थे, हर आहट उन्हें मौत का पैगाम
28:03लगती थी
28:04इस प्रकार बारा भयावः वर्ष बीट गए, जिन में कलमाशपाद का नाम केवल आतंक और विनाश का परियाय बन गया
28:12था
28:14राजा कलमाशपाद जो कभी एक धर्मात्मा शासक था, अब स्मृती मात्र रह गया था, उसकी जगह एक करूर नर्भक्षी राक्षस
28:23ने ले ली थी
28:25जंगल की गहराईयों में राजा कलमाशपाद जो अब एक दरावना राक्षस बन चुका था, अपनी अमानविय भूख मिटाने के लिए
28:34शिकार की तलाश में भटक रहा था
28:37उसकी प्रतेक पच्चाप प्रिथवी को कमपा देती थी और उसकी राक्षसी गर्जना दूर दूर तक भय का सामराज जस्थापित कर
28:45देती थी
28:46इस भयावह समय में एक युवा ब्राहमन और उसकी धर्म प्रायन पत्नी अंजाने में उसी जंगल से गुजर रहे थे,
28:55जहां राक्षस का आतंक व्याप्त था
28:58वे अपनी यात्रा में लीन प्रभु के नाम का स्मरण करते हुए, प्रकृती की शांत सुन्दर्ता में खोए हुए थे,
29:06आने वाले संकट से बेखबर
29:09तभी जंगल की घनी जाडियों से एक जोडी चमकती हुई, लाल आखें उन पर टिक गई, जिन में कुरूरता और
29:16भूख की भयावह ज्वाला धधक रही थी
29:20ब्राहमन ने अचानक हवा में एक अप्शकुनी कमपन महसूस किया, जैसे किसी अद्रिश्य भयावह उपस्थिती ने उनके पवित्र एकांत को
29:29भंग कर दिया हो
29:31इससे पहले की वे कुछ समझ पाते, एक विशाल भयावह आकरिती जाडियों से बाहर निकली, जिसने अपने कुरूर पंजों से
29:39ब्राहमन को दबोच लिया
29:42ब्राहमन ने पीडा में चीखते हुए, अपनी पतनी की ओर एक अंतिम्प मर्मसपर्शी द्रिश्टी डाली, उसकी आखों में असहायता और
29:51भय स्पष्ट था
29:53राक्षस ने एक भयानक गर्जना करते हुए, ब्राहमन को अपने विशाल मुख में खीच लिया, उसकी हड्डिया चर्मराहट के साथ
30:01तूटती जा रही थी
30:04ब्राहमनी ने यह वीभत्स द्रिश देखा, उसके प्राण मानो शरीर छोड़ कर जा रहे हूँ, वह स्तब्ध और भयभीत रह
30:11गई
30:12उसके पती का जीवन एक क्षण पहले ही उसके सामने समाप्थ हो गया था, और अब केवल रक्ट और खंडित
30:20मास के अवशेश ही बचे थे
30:23सदमे से उबर कर ब्राहमनी चीक उठी, उसकी आवाज जंगल की भयावः शान्ती को चीरती हुई, गर्द और निराशा से
30:31भरी थी
30:33वह अपने पती के रक्तसने हुए अवशेशों के पास घुटनों के बल गिर पड़ी, उन्हें अपनी चाती से लगा कर
30:40बिल्खने लगी
30:42उसका दुख धीरे धीरे एक प्रचंड अगनी में बदल गया, उसकी आखों में प्रतिशोध की ज्वाला धधक उठी
30:50वह क्रोध में कापते हुए खड़ी हुई, उसकी द्रिष्टी सीधे उस राक्षस पर थी, जो अब भी अपने शिकार से
30:57लिप्टा हुआ था
30:59हे नीच राक्षस उसने गरचते हुए कहा, तुने मेरे सुहाग को छीन लिया, मेरे जीवन को उजार दिया है
31:08मैं तुझे श्राप देती हुँ, यदि तु कभी भी अपनी पत्नी के साथ संभोग करने का प्रयास करेगा, तो उसी
31:17क्षन तेरी मृत्य हो जाएगी, जैसे मेरे पती ने तेरी क्रूरता से प्राण त्यागे
31:23श्राप के शब्दों ने वायुमंडल को चीर दिया, और राक्षस के क्रूर हृदय में एक अन्पेक्षित भय भर गया, जो
31:30अब अपनी अमर्ता पर प्रश्न उठाने लगा था
31:34अपने पती के लिए प्रतिशोध की अगनी शांत होने पर ब्राहमनी का शरीर काप उठा और वह शक्तिहीन होकर वहीं
31:42भूमी पर गिर पड़ी
31:45कलमाशपाद अपने शरीर पर लगे श्राप के बोज और अपने अपराधों के भयानत परिनाम को महसूस करते हुए एकांत में
31:53खड़ा रह गया
31:55घने और अभिशप्त जंगलों में व्यतीत हुए वे बारा वर्ष राजा कलमाशपाद के लिए किसी नरक से कम नहीं थे
32:02जहां उनके भीतर का मनुष्य और राक्षस लगातार एक दूसरे से जूचते रहे
32:08जैसे ही बारहवे वर्ष की अंतिम रात्री समाप्थ होने को आई
32:12घने बादलों को चीरती हुई सूर्य की एक दिव्य और स्वर्ण किरन उस घने जंगल की भूमी पर आकर गिरी
32:20तभी एक चमतकार हुआ और राजा कलमाश पाद की भयानक राक्षसी त्वचा तूटने लगी और उसके नीचे से उनकी मूल
32:29मानविय कांती पुनह प्रकट होने लगी
32:32अपने क्रूर राक्षसी स्वरूप से पूर्णतह मुक्थ होकर राजा कलमाश पाद पुनह एक परम तेजस्वी और प्रतापी राजा के रूप
32:41में उठ खड़े हुए जिनकी आखों में पश्चाताप के आसू थे
32:46एक शांट और स्वच्वन सरोवर के जल में अपनी मानविय छवी को देखकर राजा का हृदय भर आया पर साथ
32:53ही उन्हें अपने द्वारा किये गए पापों की भयाभता भी स्मरण हो उठी
32:59अपने राज्य की सीमा की ओर बढ़ते हुए राजा कलमाश पाद ने सूर्य देव को नमन किया और मन ही
33:06मन अपनी प्रजा से पुनह मिलने की तीवर उठकंठा का अनुभव किया
33:11जैसे ही राजा ने अयोध्या के विशाल स्वर्ण द्वारों में प्रवेश किया वहां एकत्रित जनसमुदाय अपने प्रिय राजा को मानविय
33:20रूप में देखकर हर्ष और विस्मय से जयकार करने लगा
33:24महल के प्रांगण में खडी रानी मध्यंती जो वर्षों से विरह की अगनी में जल रही थी अपने पती को
33:31सकुषल लौट आया देखकर अपने आसू न रोक सकी
33:36दोनों का मिलन अत्यंत भावुक था परन्तु राजा ने जैसे ही अपनी रानी की ओर हाथ बढ़ाया उन्हें ब्राहमनी का
33:44वह भयानक और विनाशकारी श्राप याद आ गया जिसने उनके कदमों को वही रोक दिया
33:50अपने भव्य राज सिनहासन पर बैठने के बाद भी राजा कलमाश पाद का मस्तक उस भयानक श्राप के बोज से
33:58जुका रहा जो उनके वन्ष के विनाश का कारण बन सकता था
34:03एकांत कक्ष में राजाने कापते स्वर में रानी मद्यान्ती को उस भयानक श्राप के बारे में बताया कि यदि उन्हों
34:10ने कभी भी दाम पत्य सुख का प्रयास किया, तो उनका जीवन उसी क्षन समाप्थ हो जाएगा
34:17यह क्रूर सत्य सुनकर रानी मध्यन्ती के पैरों तले जमीन खिसक गई और वे इक्षवाकू वन्ष की संतानहींता और अपने
34:25पती के जीवन के संकट को सोच कर विलाप करने लगी
34:30इस विकट संकट से मुक्ती का मार्ग खोजने और अपने महान वन्ष की रक्षा के लिए राजा और रानी ने
34:37अपने कुलगुरु परम ज्यानी महर्शी वशिष्ट को आमंत्रित किया
34:42महर्शी वशिष्ट ने अपनी आखें बंद कर ध्यान लगाया और अपनी दिव्यद रिष्टी से उस भयानक श्राप के संपून प्रभाव
34:50और उसके पीछे के डैविय विधान को देखा
34:54रिशी वशिष्ट ने प्राचीन धर्म ग्रंथों के रहसियों को टटोला ताकि वे धर्म की मर्यादा को बिना तोड़े इस महान
35:01राजवंश को एक उत्तराधिकारी प्रदान करने का कोई सात्विक उपाय खोज सके
35:08अंतह महर्शी वशिष्ट ने शास्त्रों के अनुसार नियोग प्रथा का सुझाव दिया जिसके माध्यम से वे स्वय रानी मध्यन्ती के
35:16गर्व से राजा के लिए एक प्रतापी संतान की उत्पत्ती करेंगे
35:21अपने कुल की रक्षा और पूर्वजों के पिंडदान को सुनिश्चित करने के लिए राजा कलमाश पाद ने अपने व्यक्तिगत गर्व
35:29को त्याग कर भारी मन से इस पवित्र मार्ग को स्वीकार कर लिया
35:34रानी मध्यन्ती ने भी अपने पती के प्रती अगाध निश्ठा और राज्य के भविष्य के प्रती अपने कर्तव्य को सर्वोप्री
35:42मानते हुए इस धार्मिक अनुष्ठान के लिए अपनी सहमती दी
35:47मंत्रो चार और पवित्र अगनी की साक्षी में वह दिव्य अनुष्ठान संपन हुआ जिसने इक्ष्वा को वंश के बुच्चते हुए
35:55दीपक को पुनह प्रजवलित करने का मार्ग प्रशस्त किया
35:58अंत में राजा कलमाश पाद ने अपने महल की अटारी से उगते हुए सूर्य को देखा और महसूस किया कि
36:06यद्यपी उनका निजी जीवन अभिशप्त था परन्तु उनके राज्य का भविश्य अब सुरक्षित था
36:14गुरु वशिष्ट द्वारा रोपित वह दिव्य गर्भ अब रानी मध्यन्ती के उदर में धीरे धीरे एक अलोकिक जीवन के रूप
36:21में आकार लेने लगा
36:23महीने बीटते गए और फिर कई वर्ष भी बीट गए किन्तु रानी मध्यन्ती के गर्भ से वह शिशु बाहर नहीं
36:31आया जिससे महल में गहरी चिंता फैल गई
36:35राजा कलमाश पाद ने अपने कुल देवता के सम्मुक सिर जुका कर प्रार्थना की की उनके वन्ष का यह अंतिम
36:42चिराग सुरक्षित रूप से इस संसार में आये
36:45तीन वर्षों की लंबी अवधी बीत जाने पर भी रानी मध्यन्ती ने उस असहनिय गर्भभार को दिव्य सहनशीलता के साथ
36:53धारण किये रखा
36:56कुलगुरु वशिष्ठ ने अपने ध्यान में इस असाधारण विलम के आध्यात्मिक कारणों को देखा और रानी के कष्ट को कम
37:03करने के लिए कठोर अनुष्ठान किया
37:06जब गर्भकाल पांचवे वर्ष में प्रवेश कर गया तब संपूर्ण अयोध्या नगरी इस अलोकिक घटना से चकित होकर अपने भावी
37:15राजा के लिए प्रार्थना करने लगी
37:18साथ वर्षों का अत्यंत लंबा और कठिन गर्भकाल बीत जाने के बाद रानी मध्यन्ती का शरीर इस अपार भार से
37:26शिथिल होने लगा था
37:28अपनी व्याकुल परिचारिकाओं से घिरी हुई रानी मध्यन्ती ने अपनी पीड़ा से मुक्ती पाने के लिए मन ही मन भगवान
37:36विश्नु का स्मरण किया
37:38रानी की मरनासन अवस्था को देख कर अत्यंत भैभीत राजा कलमाश पाद ने तुरंत ही कुलगुरु वशिष्ट को अंतहपुर में
37:47आमंत्रित किया
37:48कुलगुरु वशिष्ट अपने दिव्यतेज और तपोबल से युक्त होकर पीड़ित रानी की सहायता के लिए तुरंत राजभवन के कक्ष में
37:57पधारे
37:58वशिष्ट जी ने रानी के शयनकक्ष में बैठकर रिगवेद के उन शक्तिशाली मंत्रों का उच्चारण शुरू किया जिससे पूरा वातावर्ण
38:06स्पंदित हो उठा
38:09गर्भ के इस अलौकिक अवरोध को समाप्त करने के लिए गुरु वशिष्ट ने यज्यवेदी से एक अभिमंत्रित और पवित्र पत्थर
38:17हाथ में लिया
38:19महर्शी ने उस दिव्य पत्थर से रानी मध्यन्ती के उदर को अत्यंत को मलता से स्पर्ष किया जिससे गर्भ में
38:26अवरुध उर्जा मुक्त हो गई
38:28पत्थर के स्पर्ष करते ही एक तीवर स्वर्णिन प्रकाश कक्ष में फैल गया और रानी मध्यन्ती को साथ वर्षों की
38:36पीडा से क्षन भर में मुक्ती मिल गई
38:39शंकनाद जैसी सुरीली ध्वने के साथ एक अत्यंत तेजस्वी और स्वस्थ बालक का जन्म हुआ जिसकी किलकारियों से पूरा महल
38:48गूँज गुठा
38:50पत्थर के स्पर्ष से जन्म लेने के कारण कुलगुरु वशिष्ठ ने उस नवजात अलौकिक बालक का नाम अश्मक रखा
38:58राजा कलमाश पाद ने अपनी आखों में हर्ष के आसू लिये अपने नवजात पुत्र को देखा और महसूस किया कि
39:06उनका श्राप अब मिट गया है
39:09राणी मध्यंती ने अपनी सारी ठकान भूल कर अपने ननहे अश्मक को अपनी चाती से लगा लिया जिससे उनके चहरे
39:17पर मात्रित्व की आभा बिखर गई
39:20अयोध्या की प्रजाने इस चुब समाचार को सुनते ही घी के दिये जलाएं और फूलों की वर्षा कर सूर्यवंश की
39:27अटूट निरंतरता का उत्सव मनाया
39:30गुरु वशिष्थ ने बालक अश्मक को अपनी दिव्यबाहों में उठा कर आशिरवाद दिया कि यह बालक सूर्यवंश के यश को
39:38युगों-युगों तक अमर रखेगा
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