00:00जितने भी लोग अब नौकरियां कर रहे हैं, जिसमें वो स्थिर स्थाई स्टेबल हो चुके हैं, उन्चे सबसे ये प्रश्ण
00:07है, तुम्हारी नौकरी अब तुम्हारे लिए आकाश है या पिंजरा, वो तुम्हें पंख दे रही है कि उड़ो, क्योंकि पैसे
00:15और आ रहे है
00:17तुम्हें पंख दे रही है, या सीमाएं दे रही है, ये सबसे प्रश्ण है, और कोई भी विशह हो जीवन
00:25का, चाहे वो नौकरी हो, चाहे विचार हो, वस्तु हो, कि व्यक्त हो, उससे अपने रिष्टे को परखने के लिए
00:32और तो कोई प्रश्ण होता ही नहीं, यही होता
00:34है, कि इससे मुझे आसमान मिल रहा है, ये पिंचरा मिल रहा है, किसी को भी जीवन में इसलिए राया
00:41जाता है, उसकी उप्योगिता, सार्थकता इसी में यह जिन्दगी में आएगा, तो हमारे पंक खुलेंगे, उस पंक कभी खुले होंगे,
00:50कभी बिलकुल ऐसा था कि उस �
00:52नौकरी से जो पैसा आ रहा है, उसकी आपको जरूरत थी, पर निर्मरता से बचने के लिए जरूरत थी, तो
00:57कभी हुआ होगा कि उसके पंक खुले होंगे, ठीक वैसे जैसे कभी घर में डॉक्टर की भी जरूरत होती है,
01:03और कभी घर में प्लमर की भी जरूरत होती है, पर �
01:06डॉक्टर को घर बोला करके उसे घर में रख थोड़ी ही लोगे आप सबसे उपर हो सब कुछ आप के
01:12लिए है नौकरी जिंदगी नहीं है नौकरी जिंदगी के लिए है और जब नौकरी जिंदगी के काम आना कम हो
01:21जाए या बंदी हो जाए तब नौकरी में टिके रहने का को