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इस महाकाव्य एपिसोड में, भगवान शिव आखिरकार देवी पार्वती की अटूट तपस्या और प्रेम को स्वीकार करते हैं। उनकी प्रेम कहानी एक दिव्य विवाह में परिणत होती है, जहाँ तीनों लोक साक्षी बनते हैं पुरुष और प्रकृति के मिलन के। इस दिव्य मिलन से, वीर और शक्तिशाली कार्तिकेय (स्कंद) का जन्म होता है, जो देवताओं की सेना का नेतृत्व कर क्रूर राक्षस तारकासुर का वध करते हैं, ब्रह्मांड को उसके आतंक से मुक्त करते हैं। यह एपिसोड शिव-पार्वती के अमर प्रेम, कार्तिकेय के जन्म और धर्म की विजय की गाथा कहता है। #विष्णुपुराण #शिवपार्वतीविवाह #कार्तिकेय #तारकासुरवध #महादेव #पार्वती #स्कंद #हिंदूधर्म #पौराणिककथाएं
Transcript
00:00हिमालय की गोद में देवी पार्वती ने अपने हिदय में भगवान शिव को बसा कर त्रिलोकों को विस्मित करती हुई
00:07कठोर्तम तपस्या का श्रीगनेश किया, जिनकी अडिग निष्ठा का तेज हर दिशा में फैलने लगा।
00:13उनकी अटूट श्रद्धा की अगनी से वनस्पती सूखने लगी, नदिया शांत पड़ गई, और यहां तक की कठोर चट्टाने भी
00:22उनकी तपस्या की प्रचंड उर्जा से पिघलने लगी, जिससे प्रकृती भी मंत्रमुग्ध सी देखने लगी।
00:29ब्रहमा के लोक में देवगन चिंतामगन थे, क्योंकि तारकासुर का उत्पात ब्रहमांड में बढ़ता जा रहा था और भगवान शिव
00:38की गेहन तपस्या के भंग होने का कोई मार्ग दिखाई नहीं दे रहा था।
00:43देवर्शी नारद ने अपनी वीना के दिव्यनाद के साथ कैलाश पर भगवान शिव के समाधि स्थल पर पहुँच कर उन्हें
00:51ब्रहमांड की विकट स्थिती का स्मरण कराने का प्रयास किया, किन्तु शिव अपने ध्यान में अटल रहे।
00:58तपस्या की भीशंता चरम पर थी। देवी पारवती ने अनजल त्याग कर केवल पत्तों पर जीवन बिताया, फिर उन्हें भी
01:06छोड़ दिया और अपरना कहलाईं, उनकी काया सूख कर भी दिव्य तेज से प्रकाशित थी।
01:13अपने गहन ध्यान में लीन होते हुए भी भगवान शिव की दिव्य द्रिश्टी पारवती की अडिग निश्था को अप्रत्यक्ष रूप
01:20से निहार रही थी, और उनके हृदय में एक अद्रिश्य स्पंदन उठ रहा था, जो युगों के एकांत को भेदने
01:28लगा।
01:29ग्रिश्म रितू में पंचगनी के बीच, वर्षा में खुले आकाश के नीचे और शीत में बर्फीले जल में पारवती ने
01:37प्रकृती के हर प्रहार को सहर्ष स्विकार किया, उनकी तपस्या की ज्वाला और भी प्रखर होती गई।
01:44उनकी दिव्य उर्जा से तीनों लोकों में कमपन हुआ और स्वयन शिव के कैलाश पर भी उनकी तपस्या की दिव्य
01:51जोती महसूस की गई, जो ब्रह्मांड के संतुलन को परिवर्तित कर रही थी।
01:57पार्वती की त्यागपूर्ण भक्ती ने अंत्य शिव के योगी मन की परतें तोड़ दी, उनके हृदय में प्रेम और करुणा
02:04का एक नया अंकुर फूटा, जिसने युगों की समाधी को पिघला दिया।
02:10ब्रह्मांड को स्तब्ध कर कैलाश के गहन ध्यान में लीन भगवान शिव ने अपनी समाधी तोड़ी, उनकी आखों में एक
02:18अद्वितिय तेज जलक रहा था जो स्रिष्टी के नए अध्याय का संकेत था।
02:23एक पल भी नगवाते हुए, देवों के देव महादेव ने पार्वती के तपस्या स्ठल की ओर प्रस्थान किया। उनकी चाल
02:31में ब्रह्मांडिय शक्ती का अगाध प्रवाह था और हर कदम पर एक नया युग जन्मा।
02:38अचानक एक दिव्य प्रकाश से सारा वन आलोकित हो उठा और शिव अपनी अनन्त महिमा के साथ पार्वती के समक्ष
02:46प्रकट हुए, जहां वे दशकों से अपनी अटूट साधना में लीन थी।
02:51अपने आराध्य को प्रत्यक्ष देखकर पार्वती की आखें अश्रूओं से भर गई, उनके तपस्या का हर कण, उनके हृदय की
02:59हर धड़कन उस पावन क्षन की प्रतीक्षा में थी।
03:04भगवान शिव ने अपने शांत और गंभीर स्वर में देवी पार्वती को संबोधित किया, उनकी तपस्या की सराहना करते हुए
03:12कहा कि ब्रहमांड ने ऐसा अडिक त्याग कभी नहीं देखा।
03:16उन्होंने देवी पार्वती की अडिक निश्था, उनकी सहनशीलता की असीमित गहराई और उस प्रेम की शक्ती का बखान किया, जिसने
03:25स्वय महादेव के हरिदय को भी अपनी अनन्त तपस्या से विचलित कर दिया।
03:31प्रेम और श्रद्धा से उत्प्रोथ हो, भगवान शिव ने अंत्त देवी पार्वती को अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्विकार करने
03:39की अपनी सहमती व्यक्त की एक ऐसे प्रस्ताव से जो ब्रहमांड को चिरकाल के लिए बांधने वाला था।
03:47पार्वती का हृदय अपार हर्ष से भर गया, उनके मुख मंडल पर दिव्य शान्ती और स्विक्रिती का तेस्ठ हा गया,
03:54जैसे वर्षों की साधना अपने परम फल पर पहुंची हो।
03:58आकाश से देवों ने पुश्प वर्षा की और मंगल ध्वनी से दिशाय गूंज उठीन, जैसे समस्त ब्रहमांड ने इस पवित्र
04:06मिलन को अपनी अनंत स्विक्रिती प्रदान कर दी हो।
04:09शिव और पार्वती एक दूसरे के सम्मुख खड़े थे, उनके दिव्य मिलन से एक नई उर्जा का संचार हुआ, जो
04:18स्रिजन और विनाष के संतुलन को बनाए रखने वाली थी, एक चिरंतन शक्ती का उदे हुआ।
04:23उस पवित्रक्षन के साथ शिव पार्वती के विवाह की घोशना हुई और समस्त ब्रह्मांड उच्सुकता से उस महामिलन की प्रतीक्षा
04:33करने लगा, जो एक नए युग का सूत्रपात करेगा, जिसकी गाथा अनंत काल तक गुंजेगी।
04:40हिमा च्छादित पर्वत शिखरों के मध्य देवी पार्वती अत्यंत कठोर तपस्या में लीन थी, और उनके तपोबल की अगनी संपूर्ण
04:49हिमालय को दिव्य प्रकाश से आलोकित कर रही थी।
04:52कैलाश की शांत उंचाईयों पर विराजमान भगवान शिव ने पार्वती के प्रेम की अटूट परीक्षा लेने का निर्णै लिया ताकि
05:01संसार के सामने उनके अनन्य पतिवरत धर्म की महीमा सिध्ध हो सके।
05:06भगवान शिव ने क्षण भर में एक युवा ब्रहमचारी वटू का रूप धारण कर लिया, जिनकी कांती सूर्य के समान
05:14दीप्तिमान थी और जिनके हाथ में कमंडलू तथा दंड सुशोभित था।
05:19बर्फानी हवाओं को चीरते हुए वह वटू धी में और गंभीर कदमों से देवी पारवती की तपोभूमी की ओर बढ़ा,
05:27जहां चारों और दिव्यवातावर्ण छाया हुआ था।
05:31तपस्यारत देवी पारवती ने एक अतिथी ब्रहमचारी का आगमन देखकर तुरंट अपनी समाधी से उठकर पूर्ण श्रद्धा और आदर के
05:40साथ उनका स्वागत किया।
05:43वटु ने पारवती द्वारा अर्पित जल और फल्ग रहन किये और फिर अपनी कप्ती द्रिष्टी से उनकी सुकुमारता को देखकर
05:51जूठी दया प्रकट करने का अभिनय किया।
05:54वटु ने बड़े ही विस्मय के साथ पारवती से पूछा कि इतनी सुकुमार राजकुमारी को इस कठोर और वीरान परवत
06:02पर ऐसा उग्रतप करने की क्या आवश्यक्ता आपड़ी।
06:06पारवती की सक्षियों ने आगे आकर वटु को बताया कि राजकुमारी पारवती सर्वशक्तिमान भगवान शिव को पती के रूप में
06:14पाने के लिए यह दुशकर तपस्या कर रही है।
06:19यह सुनते ही वटु जोर से हस पड़ा और उसने पारवती के निर्णय का उपहास उडाते हुए कहा कि ऐसा
06:26चुनाव केवल एक नासम्ष्त्री ही कर सकती है।
06:30वटु ने भगवान शिव की निंदा शुरू करते हुए कहा कि वह श्मशान में भटकने वाले, भस्म लपेटने वाले और
06:38अमंगलकारी रूप धारन करने वाले जोगी हैं।
06:42वटु ने तंस कस्ते हुए कहा कि जिसके गले में विशैले सर्प लिप्टे हो और जो हाथी की खाल पहनता
06:49हो, वह किसी सुकुमारी का वर कैसे बन सकता है।
06:54उसने पारवती को उकसाते हुए कहा कि राजमहलों की लक्षमी का एक निर्धन, बेघर और बिना कुलगोत्र वाले अगोरी से
07:02विवाह करना सर्वता अनुचित है।
07:06अपने परंप्रिय भगवान शिव के लिए ऐसे अपमानजनक शब्द सुनकर पारवती का हृदय क्रोध से भर उठा और उनकी आखें
07:14अगनी के समान लाल हो गई।
07:16पारवती ने अत्यंत ग्रिडता और निर्भीकता के साथ वटू के सामने कदम बढ़ाया और गरचते हुए शिव के वास्तविक ब्रहमानडिय
07:26स्वरूप का मंदन किया।
07:27उन्होंने वटू को चेतावनी दी की अज्यानी मनुष्य शिव के बाहरी विक्राल रूप को देखते हैं, परन्तु उनके भीतर छिपे
07:36कल्यानकारी और परम सत्य को नहीं पहचान सकते।
07:41पार्वती ने गर्व से घोषणा की की चाहे शिव निर्धन हो या धनी, श्मशानवासी हो या जगत के स्वामी वही
07:48मेरे जन्मजन मांतर के एक मात्र पती हैं।
07:52जब वटु ने फिर से शिव की निंदा करने के लिए अपना मुख खोला, तो पार्वती ने अपने दोनों कान
07:59धक लिए और वहां से मुढ कर जाने लगी।
08:03पार्वती के इस अटूट प्रेम और निश्चल भक्ती को देख कर वटु ने तुरंट अपना छद्म रूप त्याग दिया और
08:10अपने वास्तविक रूप को प्रकट करने लगे।
08:13भगवान शिव अपने पूर्ण त्रिलो की नाथ रूप में प्रकट हुए, जिनकी मस्तक पर चंद्रमा, गले में वासुकी और हाथों
08:21में चमकता हुआ त्रिशूल सुशोभित था।
08:25महादेव ने पारवती का हाथ अपने हाथों में थाम कर कहा कि तुम्हारी निशकाम, तपस्या और अनन्य प्रेम ने मुझे
08:33सदास्दा के लिए तुम्हारा दास बना दिया है।
08:37वटू रूपी शिव के अपमान जनक वचनों ने जैसे पारवती के हरिदय पर वजरपात कर दिया, जिससे उनके मुखमंडल पर
08:44सहसा क्रोध की अगनी धधक उठी, मानो ब्रहमांड स्वयें एक पल के लिए थम गया हो।
08:51अपमान के तीवरबानों से घायल होने के बावजूद, पारवती का शिव पर अटूट विश्वास तनिक भी विचलित नहीं हुआ, बलकी
08:59वह दिव्य उर्जा से और भी द्रिड हो गई, जैसे कोई परवत अडिक खड़ा हो।
09:05वटू जो की स्वय महादेव थे, पारवती के मुख पर उभे क्रोध और उसके पीछे छिपी द्रिडता को देख मंदमंद
09:13मुस्कुराते रहे, उनके नेत्रों में एक गहरा संतोष और विस्मय झलक रहा था।
09:19अपनी भावनाव पर नियंत्रन साथते हुए, पारवती ने अपनी द्रिष्टी वटू पर स्थिर्की उनकी आखों में अब क्रोध नहीं, बलकि
09:28शिव के प्रती अपने अगाध प्रेम और भक्ती का संकल्प चमक रहा था।
09:33उनकी वानी जोक्षन भर पहले अपमान से काप रही थी, अब एक दिव्य द्रिड़ता के साथ उभी प्रतेक शब्द शिव
09:42के प्रती उनके अविनाशी प्रेम और अडिग आस्था का प्रतीक था।
09:47उन्होंने वटु को चुनौती देते हुए कहा कि शिव के बाहरी स्वरूप को देखकर उनके वास्तविक दिव्य स्वरूप को समझना
09:55असंभव है, जैसे कोई महासागर की गहराई को केवल तट से नहीं नाप सकता।
10:01पार्वती ने द्रिड़ता से समझाया कि शिव का वैरागी रूप ही उनकी सर्वोच शक्ती और अनासक्ती का प्रतीक है, जो
10:09समस्त मायावी बंधनों से परे ब्रहमांड के मूल तत्व को दर्शाता है।
10:15उन्होंने विस्तार से बताया कि शिव ही समस्त लोकों के पालक और संहारक हैं, जो विश्पान कर नीलकंट कहलाते हैं
10:23और स्रिजन प्रलय के चक्र को अपनी इच्छा से संचालित करते हैं।
10:29पार्वती ने द्रिडता से दोहराया कि उनकी भक्ती किसी बाहरी दिखावे पर आधारित नहीं, बलकि शिव के उस अग्रिश्य परम
10:37सक्य पर है, जिसे केवल हृदय की गहराई से ही समझा जा सकता है।
10:43उन्होंने अपनी कठिन तपस्या का स्मरण कराया, जिसके बल पर उन्होंने शिव को प्राप्त करने का संकल्प लिया था और
10:51किसी भी बाधा से विचलित न होने की प्रतिग्या की थी।
10:55पार्वती ने घोशना की की उनका प्रेम शिव के लिए इतना पवित्र और गहरा है की कोई भी तुछ निंदा
11:02उसे कलंकित नहीं कर सकती, जैसे सूर्य का प्रकाश किसी अंधेरे से नहीं छिप सकता।
11:09उन्होंने वटु पर तीखी टिपपणी की की वह दिव्य प्रेम और तपस्या के वास्तविक अर्थ को समझने में असमर्थ है,
11:16उसकी बुद्धी केवल सांसारिक द्रिश्टी तक ही सीमित है
11:22पार्वती ने वटु को चेतावनी दी की शिव की निंदा करके, उसने न केवल उनका बलकी स्वय अपने भाग्य का
11:29भी अपमान किया है, जो अक्षमय पाप है
11:33वटु ने पार्वती की वानी में निहित दिव्य शक्ती को महसूस किया, उसके मुख पर भले ही उपेक्षा का भाव
11:40था, पर उसके भीतर शिव का हृदय इस अडिक प्रेम पर मुग्ध हो रहा था
11:46पार्वती ने स्पष्ट शब्दों में वटु को तुरंत वहां से चले जाने का आदेश दिया, उनकी वानी में अब कोई
11:53संकोच नहीं, केवल एक देवी का अटल निश्चय था
11:57उन्होंने घोशना की की जो कोई शिव की निंदा सुनता है और चुप रहता है, वह भी उतना ही पापी
12:04है, जितना निंदा करने वाला, इसलिए वह इस अपमान को और नहीं सहेंगी
12:10उनकी दिव्य उर्जा ने वातावर्ण को इतना प्रखर बना दिया, कि व्रिक्षों की पत्तिया भी काप उठेन और हवा में
12:18एक अज्यात भय की सहरन दोड़ गई, जैसे कोई प्राचीन मंत्र जागरित हो गया हो
12:24यह देखकर की पारवती अपने निश्चे से टस से मस नहीं होंगी, वटु के मुख पर छिपी मुस्कान और गहरी
12:32हो गई, और उसने अपनी माया को समेटने का निर्णय लिया
12:37पारवती, क्रोध और अटल विश्वास के संगम में खड़ी थी, उनकी दिव्यदेह से एक ऐसी उज्जा फूट रही थी, जो
12:44किसी भी चुनोती का सामना करने को तयार थी
12:48उनकी वानी में अब भी वही अडिक द्रिडता थी, जो शिव के प्रती उनके अगाथ प्रेम और ब्रहमांड के प्रती
12:56उनके न्याय के संकल्प को व्यक्त कर रही थी, मानो वह स्वयन स्रिष्टी की शक्ती का साकार रूप थी
13:03वटु ब्रहमचारी के मुख से भगवान शिव की निंदा सुनते ही देवी पार्वती का हृदय अत्यंत, व्यथित और क्रोधित हो
13:10उठा
13:12अपने आराध्य देव के अपमान को सहन करने में असमर्थ होकर पार्वती जी ने तुरंट अपना मुख वटू की ओर
13:19से फेर लिया
13:21वे उस स्थान को तुरंट छोड़ कर जाने का द्रिढ निश्चय करते हुए जैसे ही आगे बढ़ी तपोवन का वातावर्ण
13:28एक अलोकिक उर्जा से स्पंदित होने लगा
13:32अचानक वटू ने पार्वती का मार्ग रोका और उसके शरीर से इंद्रधनुशी दिव्य प्रकाश की अंगिनत किरने फूटने लगी
13:41देखते ही देखते वटू का भौतिक रूप विलीन हो गया और वहा ब्रहमांडिय तेज का एक विशाल वलय निर्मित हो
13:49गया
13:50उस दिव्य प्रकाश के मध्य से स्वयंत्रिलोकस्वामी भगवान सदाशिव अपने परम भव्य और शांत स्वरूप में प्रकट हुए
13:59उनके जटाजूट में चंद्रकला सुशोगित थी, गले में नागराज वासुकी विराज रहे थे और मुख पर मंद मुस्कान चाई हुई
14:07थी
14:09पार्वती जी ने जब अपने सामने अपने सर्वस्व शिवजी को देखा, तो वे असीम आनंद और आश्चर्यसिस्थिर रह गई
14:18अश्रुपूरत नेत्रों के साथ पार्वती जी ने भगवान शिव के चरण कमलों में अपना मस्तक जुका कर नमन किया
14:26महादेव ने अत्यंत स्नेह से अपना वर्देहस्त पार्वती के शीश पर रखा और उन्हें प्रेम पूर्वक उठा कर खड़े होने
14:33का संकेत दिया
14:36शिवजी ने मधुरवानी में कहा कि है पार्वती तुम्हारी कठोर तपस्या और अगाध भक्ती ने मुझे सदा के लिए खरीद
14:44लिया है
14:46तुम्हारी इस परीक्षा ने सिद्ध कर दिया कि तुम्हारा प्रेन निश्चल सत्य और तीनों लोकों में अतुलनिय है
14:54उसी क्षण स्वर्ग लोक से समस्त देवगण, ब्रह्मा जी और भगवान विश्नु इस अद्भुत द्रिश्य को देखकर प्रसन्न हो उठे
15:03आकाश से गंधर्वों का मधूर संगीत गूँज उठा और अपसराओने युगल पीठ पर दिव्य पारिजात पुश्पों की वर्षा की
15:12भोले नाथ ने पार्वती को पत्नी रूप में स्विकार करने का अपना अंतिम और अटल वचन दे दिया
15:19शिव के विवाह के वचन को सुनते ही पार्वती जी का संपूर्ण स्वरूप असीम सौंदर्य और अलौकिक कांती से खिल
15:27उठा
15:29वर्षों से शांत पड़ा हिमालय परवत आज उच्सव के आनंद में डूब गया और चारों और प्राकृतिक सौंदर्य बिखर गया
15:38भगवान शिव ने अपनी त्रिपुंद धारी दृष्टी से पार्वती को आशिरवाद दिया जिससे समस्त सृष्टी में प्रसनता की लेहर दोड
15:46गई
15:47पार्वती जी ने हाथ जोड़ कर अपने होने वाले स्वामी के प्रती कृतग्यता व्यक्त की और उनकी कृपा की सराहना
15:55की
15:56इस प्रकार शिव और शक्ती के इस परम्मिलन ने आगामी भव्य दिव्य विवाह और तारकासुर के अंत की नीव रख
16:03दी
16:05कैलाश पर्वत के दिव्य शिखर पर महादेव शिव ने मंद मुस्कान के साथ सबतर्शियों और देवताओं को माता पार्वती के
16:13ग्रह प्रस्थान करने की अनुमती प्रदान की
16:16वैकुंठ लोक में विराजमान भगवान विश्णों ने अपनी मंद मुस्कान और परम तेज से सबतर्शियों को इस पावन विवाह प्रस्ताव
16:25की गुरुता और उसके ब्रहमांडिय महत्व को समझाया
16:29परम ज्यानी सबतर्शी वशिष्ट के नेतरित्व में सातों दिव्य रिशी ब्रहमांडिय प्रकाश के पुंच के समान आकाश मार्ग से नीचे
16:37की ओर अवतरित होने लगे
16:40देवराज इंद्र अपने एरावत हाथी पर सवार होकर अत्यंत हर्शित मन से सबतर्शियों के साथ इस पावन यात्रा में सम्मिलित
16:49हुए
16:50हिमाले राज हिमवान ने जब आकाश मंडल में देवताओं और रिशियों के दिव्य तेज को देखा तो उनका हृदय असीम
16:58भक्ती और विस्मय से भर गया
17:01राजा हिमवान ने तुरंट अपने भव्य स्वर्ण राजदर्बार को इन दिव्य अतिथियों के स्वागत के लिए सजने का आदेश दिया
17:10रानी मेना ने अपनी दासियों के साथ मिलकर अत्यंत प्रसंता पूर्वक राजाग्या के अनुसार स्वागत के लिए सोने के थाल
17:18में कुम-कुम, अक्षत और दीप सजाए
17:21दिव्य प्रकाश पुन्च के बीच से निकल कर सब्तर्शी और प्रमुख देवता हिमवान के भव्य और जग्मगाते राजदर्बार में पधारे
17:29राजा हिमवान ने आगे बढ़कर सब्तर्शियों के चर्णों का स्पर्श किया और उन्हें आदर पूर्वक रत्नजडित स्वर्ण सिनहासनों पर बिठाया
17:39इस पावन बेला में संपूर्ण सभाग्रह में भगवान श्रीहरी विश्नु की दिव्य और अद्रिश उपस्थिती की सुगंधित बयार बहने लगी
17:50सब्तर्शी वशिष्ठ ने सभा को संबोधित करते हुए अत्यंत गंभीर और मधुरवानी में शिव और शक्ती के शाश्वत पुनर्मिलन के
17:58महत्व पर प्रकाश डाला
18:01रिशियों ने पूरे सम्मान के साथ महादेव शिव की ओर से राजकुमारी पारवती के पानिग्रेहन का आपचारिक प्रस्ताव हिमवान के
18:09समक्ष रखा
18:11इस अलोकिक प्रस्ताव को सुनकर राजा हिमवान का हृदय गदगद हो गया और उनके नित्रों से हर्ष के अश्रु अविरल
18:19बहने लगे
18:20अपनी पुत्री के इस परम सौभाग्य की बात सुनकर माता मेना का मातरित्व सुख से सराबोर हृदय हर्ष के सागर
18:28में गोते खाने लगा
18:30महल के जरोखे के पीछे खड़ी देवी पार्वती लोक मर्यादा के कारण मंद मंद मुस्कुराते हुए लज्जा से लाल हो
18:38उठी
18:39राजा हिमवान ने अपने मंत्रियों और राज्य के मुख्य पुरोहितों से परामर्ष किया जिन्होंने एक स्वर में इस ब्रहमांडिये विवाह
18:47को अपनी सहर्ष स्वीकृती दी
18:50सभा के सम्मुख खड़े होकर हिमवान ने अपने दोनों हाथ जोड़कर अत्यंत विनमर्ता से इस दिव्य विवाह प्रस्ताव को स्वीकार
18:59कर लिया
19:01सब्तर्शियों ने प्रसन्न होकर इस विवाह की स्वीकृती को पक्का करने के लिए एक पवित्र वैदिक अनुष्ठान संपन्न किया
19:09इस शुभ निर्णय की घोशना होते ही स्वर्ग से देवताओं ने फूलों की वर्शा की और गंधर्वों ने मंगल गान
19:16गाना प्रारंभ कर दिया
19:19सब्तर्शियों और देवताओं ने राजा हिमवान और रानी मेना को अखंड सौभाग्य का आशिरवाद दिया और विवाह की तैयारियों के
19:27लिए कैलाश वापस प्रस्थान किया
19:31शिवपार्वती के दिव्य विवाह की शुभ खबर एक मीठी हवा की तरहें तीनों लोकों स्वर्ग, मृत्यू और पाताल्द में बिजली
19:39की गती से फैल गई, हर हृदय को आनंद और उत्साह से भरती हुई
19:44स्वर्ग लोक में इंद्रासन पर विराजमान देवराज इंद्र अपनी वजर की चमक और देवताओं के आनंदित मुख देखकर स्वया हर्ष
19:53विभोर हो उठे क्योंकि युगों से प्रतीक्षित शुभ घड़ी अब निकट आ चुकी थी
19:59ब्रह्मा लोक में स्रिष्टिकर्ता ब्रह्मा ने अपने चार मुखों से एक साथ मंगल ध्वनी का उच्चारण किया उनके कमंडलू से
20:08अमरित वर्षा हो रही थी जो तीनों लोकों में नई आशा और उर्जा का संचार कर रही थी
20:15वैकुंठ में भगवान विश्णु अपनी पत्नी लक्ष्मी के साथ शेशनात पर लेटे हुए इस दिव्य समाचार से प्रसन्न होकर मंदमंद
20:24मुस्कुरा रहे थे उनकी आखों में एक शांति पूर्ण ब्रह्मांडिय संतोष जलक रहा था
20:31देवर्शी नारद अपनी वीना के मधुर तारों पर विवाह के गीट छेड़ते हुए तीनों लोकों में तीवर गती से भ्रमन
20:38कर रहे थे हर जगह आनंद का संदेश और उच्सव की तरंगे फैलाते हुए
20:45मृत्यो लोक में राजाओं के महलों से लेकर सामान्य कुटिया तक हर व्यक्ति भगवान शिव और देवी पार्वती के विवाह
20:52की चर्चा कर रहा था
20:54अपने अपने तरीके से इस मंगल अफसर का जश्न मना रहा था
20:59पाताल लोक में भी नागराज वासुकी और अन्य नागों ने अपने फनों को उचा कर आनन से जुमते हुए
21:06शिव पार्वती के मिलन के लिए उच्सुकता पूर्वक प्रतीक्षा की क्योंकि इस विवाह से समस्त स्रिष्टी का कल्यान सुनिश्चित था
21:15पूरे त्रिलोक में उच्सव का एक अभूत पूर्व माहौल बन गया था
21:20जैसे स्वयन ब्रहमांड भी इस अद्वितिय प्रेम कहानी के चर्मोतकर्ष का गवाह बनने के लिए पुलकित हो उठा हो
21:28इधर हिमालय में विवाह की भव्यत अयारिया अपने चरम पर थी
21:33देवभूमी हिमवान का हर कोना अब दिव्य फूलों जगमगाती रोशनी और मंगल ध्वनियों से सराबोर हो रहा था
21:41परवतराज हिमवान का महल जो पहले अपनी शांत भव्यता के लिए जाना जाता था
21:47अब स्वर्ग से उत्रे हुए किसी इंद्रधनुशी स्वपनलोग जैसा प्रतीत हो रहा था
21:53देवी पारवती अपने कक्ष में एक सुनहरे आइने के सामने बैठी अपनी सक्खियों के साथ विवाह के लिए अलोकिक रूप
22:02से तयार हो रही थी
22:03उनके मुख पर आनंद और लज्जा का एक दिव्य मिश्रन चमक रहा था
22:09कैलाश पर भगवान शिव अपने ध्यान से बाहर आकर एक शांत ब्रहमांडिय मुस्कान के साथ अपनी आने वाली पत्नी और
22:17अपनी दिव्य लीला का चिंतन कर रहे थे
22:20उनका त्रिशूल पास ही चमक रहा था
22:23सबसे पहले शीर सागर से भगवान विश्नु और ब्रहम लोग से स्रिष्टि करता ब्रहमा अपने अपने दिव्य वाहनों पर सवार
22:31होकर इस शुभ अफसर के साक्षी बनने के लिए हिमाले पहुँचे
22:36उनकी उपस्थिती ने वातावर्ण को और भी पवित्र और तेजस्वी बना दिया जैसे स्वयन ब्रहमांडिय शक्ती उनके आगमन पर जुप
22:45गई हो
22:47अग्निनार आयन, वायुदेव और जल के देवता वरोन सहित सभी प्रमुख देवतागन अपने अपने दिव्य स्वरूकों और वाहनों पर सवार
22:55होकर हिमाले की ओर प्रस्थान करने लगे
22:59उनके पीछे-पीछे सब्तरिशी और महान तपस्वी जैसे वशिष्ट, विश्वामित्र और अत्री अपनी दिव्य आभा और गेहन ज्यान के साथ
23:08इस पवित्र मिलन का हिस्सा बनने के लिए आप पहुँचे
23:13देवर्शी नारद जो पहले से ही वहाँ उपस्थित थे, अपनी वीना पर मंदल गान करते हुए, सभी देवताओं और रिशियों
23:21का स्वागत कर रहे थे, उनके हर स्वर में ब्रहमांडिय आनंद गूँज रहा था
23:27हिमाले के हर कोने में कुशल शिल्पकार और अपसराय मिलकर विवाह मंडप को अध्भुत नकाशी, सुगंधित फूलों और बहुमूल्य रत्नों
23:36से सजा रहे थे, जिससे वह स्वर्ग से भी सुन्दर प्रतीत हो रहा था
23:42महाराज हिमवान ने देवताओं और रिशियों के सम्मान में अलौकिक भोज और दिव्य मनोरंजन की व्यवस्था की थी, जहां संगीत
23:50और नृत्य की गूंज हवा में घुल रही थी
23:53विवा के शुभ मुहूर्ट का निर्धारन करने के लिए सभी प्रमुख देवता और महान रिशिगन एक साथ एकत्रित हुए ताकि
24:02यह सुनिश्चित हो सके की यह ब्रहमान्डिय मिलन सबसे शुभ क्षण में संपन्न हो
24:08अंतह महर्शी वशिष्ठ ने अपने गहन जोतिशिय ज्यान के आधार पर ब्रहमान्डिय गणनाय की और शिवपार्वती के विवाह के लिए
24:16सबसे शुभ और सटीक मुहूर्ट की घोशना की
24:20इस घोशना के साथ ही समस्थ त्रिलोक में एक बार फिर हर्श की लहर दोड़ गई और शिवपार्वती के विवाह
24:28की प्रतीक्षा अब और भी तीवर हो उठी
24:32कैलाश की शुभर चोटियों से देवों के देव महादेव ने अपनी जटाओं में चंद्रमा और गंगा को समेटे विवाह के
24:40पवित्र संकल्प के साथ प्रस्थान की तैयारी आरंभ की उनकी मुख मुद्रा पर एक अलोकिक शांती विराजित थी
24:48उनकी एक ध्वनी मात्र से ब्रहमांड के कोने कोने से उनके गण भूत प्रेट, पिशाच और विविध रूप वाले विचित्र
24:56प्राणी अपनी अपनी गुफाओं और श्मशानों से निकल कर अपने आराध्य की बारात में शामिल होने को आतुर हुए
25:04नंदी शिव का प्रियवरिशब, दिव्य तेज से दीप्तिमान, अपनी भव्यता और बल के साथ सबसे आगे खड़ा था, जिसकी आखों
25:13में अपने स्वामी के विवाह का असीम हर्ष पष्ट जलक रहा था
25:18शिव के गण विचित्र वेश भूशा में कोई नृत्य करता, कोई गायन करता, तो कोई अपने अजबगजब वाध्य यंत्रों से
25:26अजीबो ग्रीब ध्वनिया निकालता हुआ, अपनी अनूठी मस्ती में बारात में शामिल हो रहे थे
25:33भूतों का जुंड कंकाल और प्रेट आत्माओं के साथ अद्रिश्य और ग्रिश रूपों में भयानक गर्जना करते हुए और कभी
25:41मंध हंसी के साथ इस दिव्य विवाह यात्रा का हिस्सा बन रहा था
25:46पिशाचों की टोलिया, रक्तरंजित मुखों और दरावनी आखों के साथ मानसल शरीर और पैनी नाखुनों वाले हाथों से डमरू बजाते
25:55हुए बारात में एक भयावह सौंदर्य का संचार कर रही थी
26:00देव लोग से नारद मुनी अपनी वीना के साथ इस अद्भुत और अनोखी बारात को देखकर चकित रह गए उनके
26:08माथे पर विस्मय के भाव स्पष्ट थे
26:12स्वय भगवान विश्नु और ब्रहमा भी वैकुंठ और ब्रहम लोग से इस विचित्र द्रिश्य को निहार रहे थे उनके दिव्यमुखों
26:20पर हल्की मुस्कान और आश्चर्य की छाया थी
26:24महादेव की बारात ने अंतह अपनी यात्रा आरंभ की एक धीमी, भव्य और अकल्पनिय गती के साथ जो देवताओं और
26:33मनुष्यों दोनों के लिए एक अविस्मर्निय द्रिश्य बन गई
26:37अनेकानिक वाध्य यंत्रों से निकलने वाली अजीबो ग्रीब ध्वनिया, शंकनाद, दमरू की गर्जना और भूतों के भयावा हास्य से मिलकर
26:46एक ऐसी संगीतलय का निर्मान कर रही थी, जो कर्णभेदी होते हुए भी मंत्रमुख्ध कर देने वाली थी
26:54देवलोग से रिशिमुनी और अपसराय भी इस विचित्र शोभायात्रा को देखने के लिए लालायत थे, उनकी आखों में असीन कौतुक
27:02और भक्ती का संगम था
27:05कहीं भूत प्रेत आनंद में जूमते हुए दिखाई दिये, तो कहीं पिशाच भयावह मुद्राय बनाते हुए ठाहा के लगा रहे
27:13थे, उनकी उनमत उर्जा समूचे वातावर्ण को एक अद्वितिय जीवन्तता प्रदान कर रही थी
27:20प्रत्येक गण अपनी अद्वितिय पहचान के साथ महादेव के प्रती अपनी अनूठी श्रद्धा और प्रेन को प्रदर्शित कर रहा था,
27:28कोई नाचता, कोई गाता, कोई मौन ध्यान में ली
27:33कहीं रास्ते में पढ़ने वाले शान्त, तालाबों और जहर्नों का जल भी इस दिव्य उर्जा से स्पंदित होकर एक रहस्य
27:41में आभा से चमक रहा था
27:43इस अनोखी बारात में भूत प्रेतो और विचित्र प्राणियों के बीच भी महादेव का शांत, तेजस्वी स्वरूप एक धुरुव तारे
27:51की भांती चमक रहा था, जो सभी को अपनी और आकर्शित कर रहा था
27:57कहीं कंकाल हड्डियों से बनी मालाय पहन कर अपने भयानक नरीती से सबको भयभीत कर रहे थे, तो कहीं नंदी
28:05की गर्जना से परवतों में प्रतिध्वनी गूंज रही थी
28:10भोलेनात का यह अनूठा काफिला, जहां एक ओर भय और विस्मय का अद्भुत मिश्रण था, वहीं दूसरी और अटूट भक्ती
28:18और आनंद का महासागर भी उमड रहा था
28:22हिमवान के राज्य की ओर बढ़ते हुए, यह दिव्य बारात धीरे-धीरे अधिक भव्य और विस्तरित होती जा रही थी,
28:29मानोस्वयम प्रकृती भी इस महापर्व का हिस्सा बन रही हो
28:34देवताओं के विमानों और रिशियों के आश्रमों से भी इस अलौकिक द्रिश्य की छटा को निहारा जा रहा था, हर
28:41कोई महादेव की इस लीला पर विस्मय से भरा था
28:46दूर से ही, हिमवान की नगरी के द्वार पर उच्सव की तयारिया कर रहे लोग, आकाश में उमरते इस विराट
28:53समोह को देखकर सास रोके खड़े थे, उनकी आखों में अविश्वास और रोमाच का मिश्रण था
29:00समस्त ब्रहमांड पुरुष और प्रकृती के अलोकिक विवाह उच्सव का साक्षी बनने के लिए दिव्यकांती से प्रज्वलित हो उठा था
29:10वैकुन्ठप्ती भगवान श्री हरी विश्नु माता लक्ष्मी के साथ शिवजी की भव्य बारात की अगवानी के लिए अत्यंत मनमोहक रूप
29:18में पधारे
29:20ब्रहम लोक से पधारे परंपिता ब्रहमा जी ने वेद मंत्रों के पावन उच्चारण से पवित्र विवाह वेदी को जागरित कर
29:27दिया
29:28नववधु के रूप में सजी देवी पारवती सरवग्य सौंदर्य और संपूर्ण प्रकृती की शक्ती को अपने स्वरूप में समेटे हुए
29:37थी
29:38अगोरी रूप त्याग कर भगवान शिव अती सुंदर्वर के रूप में प्रकट हुए जिनका मुख कोटी सूर्यों के समान दीप्तिमान
29:46था
29:47नंदी की पीठ पर विराजमान शिवजी की अद्भुत बारात में देव, गंधर्व, गण और रिशिमुनिपरम आनंद में जूम रहे थे
29:57हिमवान और रानी मेना ने अश्रुपूरित नेत्रों और अपार श्रधा के साथ त्रिलो की नाथ भगवान शिव का भव्य स्वागत
30:04किया
30:05स्वर्ण और मनियों से सुसजित अलौकिक विवाह मंडप में भगवान शिव ने प्रथम पच्चेन रखकर वाताबर्ण को पावन किया
30:15अपसराओं के संद मंद मंद गती से आती देवी पारवती के आगमन से संपूर्ण विवाह मंडप सुगंधित पुष्पों से महक
30:22उठा
30:23जब शिव और शक्ती की दृष्टियां एक दूसरे से मिली तब संपूर्ण ब्रहमांडिय उर्जा एक परमशान्ती में लीन हो गई
30:33महाराज हिमवान ने वैदिक मंत्रों के बीच अपनी प्रिय पुत्री पारवती का पानिग्रहें हेतु कन्यादान संपन्न किया
30:41भगवान शिव ने अत्यंत प्रेम और आदर के साथ जगजन्नी पारवती का कोमल हाथ अपने हाथों में ठाम लिया
30:50पावन अगनी कुंड में आहुतियां डालते हुए ब्रहमाजी ने दोनों शक्तियों के शाश्वत मिलन की घोशना की
30:58शिव और पारवती ने पवित्र अगनी देव को साक्षी मान कर ब्रहमांडिय मर्यादा के साथ सब्तपदी के साथ फेरे पूरे
31:06किये
31:07भगवान शिव ने देवी पारवती के माथे पर अमर सिंदूर सजाया जिससे दसों दिशाएं परम प्रकाश से जग्मगा उठी
31:16यह विवाह केवल दो देवों का मिलन नहीं बलकी चेतना रूपी पुरुष और पदार्थ रूपी प्रकृती का महासंगम था
31:25देवराज इंद्र और समस्त देवताओं ने आकाश से पारिजात पुष्पों की वर्षाकर जय जयकार के शंकनात किये
31:34भगवान विश्णू और माता लक्ष्मी ने नवदमपती को दिव्य उपहार भेंट कर संपूर्ण स्रिष्टी के कल्यान का आशिरवाद दिया
31:43कैलाश के दिव्य सिनहासन पर विराजे शिव पार्वती के दर्शन कर समस्त लोकों में अमर शान्ती और संतुलन छा गया
32:02महादेव, शिव और देवी पार्वती मन्दाकिनी के शान्त तटों के समीप अपने एकांत कक्ष की ओर प्रस्थान करते हैं
32:11जैसे ही दोनों परम शक्तियां एकाकार होने लगती हैं
32:15संपून ब्रहमांड में एक ऐसी अग्रिश्य और प्रचंड उर्जा का संचार होने लगता है जिससे दिशाएं थर्थराने लगती हैं
32:25शिव और पार्वती का यह मिलन केवल भौतिक नहीं बलकि दो परम चैतन्य शक्तियों का महाविलय था जिससे ब्रहमांड का
32:33सबसे शक्तिशाली तेज प्रकट होने लगा
32:37इस दिव्य मिलन से उत्पन्नवह महातेज एक ज्वलंत सूर्य के समान प्रखर होकर तपने लगा जिसकी तपन को सहने की
32:45शक्ति किसी भी लोक में नहीं थी
32:48स्वर्गलोक में बैठे सभी देवता इस प्रचंड ताप से व्याकुल हो उठे और उन्हें भय सताने लगा कि यह तेज
32:56संपून स्रिष्टी को भस्म कर देगा
32:59तब भगवान विश्णु ने देवताओं को समझाया कि इस महातेज में एक परम शक्तिशाली पुत्र का अंश है जो तारकासुर
33:07का वध करने में सक्षम होगा
33:10ब्रह्मा जी ने भी सहमती जताई और कहा कि इस उर्जा को नश्ट नहीं किया जा सकता अपितु इसे किसी
33:18ऐसे पात्र को सौमपना होगा जो इसकी तपन को सहन कर सके
33:23सभी देवताओं के परामर्ष के बाद अगनी देव को इस महान और कठिन कार्य के लिए चुना गया जो स्वयन
33:30तपन के स्वामी है
33:33अगनी देव अत्यंत विनीत होकर और मन में महादेव का स्मरण करते हुए कैलाश की ओर बढ़े जहां वह असहनिय
33:41दिव्यतेज स्थित था
33:44कैलाश के गर्भगरिह में महादेव शिव और देवी पारवती ने स्रिष्टी के कल्यान के लिए उस प्रजवलित महातेज को मुक्त
33:51कर दिया
33:52जब वह दिव्यतेज अगनी देव के समक्ष आया तो उसके प्रचन प्रकाश के सामने स्वय अगनी की ज्वालाई भी फीकी
34:01प्रतीत होने लगी
34:03स्रिष्टी के संरक्षन का गुरुतर दायत्व उठाते हुए अगनी देव ने अपनी अंजली आगे बढ़ाई और उस अत्यंत गर्म दिव्य
34:11बीज को ग्रहेन करना प्रारंब किया
34:15जैसे ही वह महातेज अगनी देव के शरीर में प्रविष्ठ हुआ उनके भीतर एक असहनिय तपन उत्पन हो गई और
34:23उनका स्वर्नस्मान शरीर धधक उठा
34:26अगनी देव इस भीशन उर्जा को अपने भीतर दबाने का प्रयास करते हुए आकाश मार्ग से तीवर गती से भागने
34:34लगे ताकि उनका अस्तित्व नश्ट न हो जाए
34:38देवराज इंद्र और अन्य देवता आकाश गंदा से इस द्रिश को अत्यंत चिंता और भय के साथ देख रहे थे
34:46क्योंकि अगनी देव का शरीर तपने लगा था
34:50अत्य अगनी देव की सहनशक्ती की सीमा समाप्थ हो गई और उन्होंने महसूस किया कि यदि उन्होंने इस तेज को
34:57शीघ्र ही बाहर नहीं निकाला तो वे स्वय धस्म हो जाएंगे
35:02तब भगवान विश्णु ने आकाशवाणी के माध्यम से व्याकुल अगनी देव को मार्गदर्शन दिया कि वे इस दिव्य तेज को
35:10किसी शीतल और पवित्र स्थान पर स्थापित कर दें
35:14भगवान विश्णु के आदेशानुसार अगनी देव तेजी से नीचे उत्रे और उस स्थान की खोज करने लगे जहाँ वह इस
35:22दिव्य उर्जा को सुरक्षित छोड़ सके
35:26अंतह उन्होंने देव नदी गंगा के शीतल और पावन जल में प्रवेश किया और उस तप्त दिव्य तेज को गंगा
35:33मया के गर्भ में सौंप दिया
35:36जैसे ही वह दिव्य तेज गंगा के शीतल जल में समाहित हुआ, वैसे ही जल का रंग स्वर्णमी हो गया
35:43और इस प्रकार सकंद के जन्म की प्रिष्ठ भूमी तैयार हुई
35:48देवताओं की प्रार्थनाओं से द्रवित अगनिदेव भगवान शिव के अत्यंत तेजस्वी वीर्य को जिसकी प्रकर उर्जा उन्हें भी भस्म कर
35:56रही थी, धारन करने हेतु संधर्ष करते हुए अपनी दिव्य आभा से प्रज्वलित हो उठे
36:03अगनिदेव उस असहनिय दिव्यताप को और अधिक सहन न कर पाने के कारण विवश होकर उस तेजस्वी बीज को पवित्र
36:11गंगा नदी की शीतल धाराओं में सावधानी पूर्वक विसर्जित कर देते हैं, जिससे जल भीक्षन भर के लिए स्वर्णिम हो
36:19उठता है
36:21पवित्र गंगा उस असाधारन देविय तेज को अपनी गर्भ में धारन कर उसे अपने शितलता से पोशित करती हुई अत्यंत
36:29सावधानी और सम्मान के साथ ब्रह्मांडिय धाराओं में आगे बढ़ती है, जिससे उसके जल में स्वर्णिम आभा फैल जाती है
36:39अंतह गंगा उस अविश्वस्निय रूप से शक्तिशाली दिव्यतेज को हिमालय की गोद में स्थित, घने और रहस्यमई शर्वन के जंगलों
36:47में जहां स्वर्ण कमल खिलते थे, एक पवित्र और एकांत स्थान पर सरकंडों के बीच छोड़ देती है
36:56शर्वन के उन पवित्र जंगलों में, छै कृतिकाएं, ले देश, अपनी दैनिक यात्रा के दौरान सरकंडों के बीच अचानक प्रकट
37:04हुए एक अलौकिक शिशु को देखती हैं, जिसका दिव्यतेज पूरे वन को प्रकाशित कर रहा था
37:11असीन वादसल्य से भरकर, कृतिकाएं उस दिव्यत शिशु का पोशन करती हैं, और बालक सकंद अपनी छै मुखों से उन
37:19सभी देवियों का एक साथ दूध पी कर अपनी असाधारन प्रकृती को प्रकट करते हैं
37:27सकंद देवताओं के दिव्य सेनाप्ती बनने के अपने भाग्य के अनुसार सामान्य बच्चों से कहीं अधिक तीवरता से पलक जपकते
37:35ही एक तेजस्वी शिशु से पराक्रमी और शक्तिशाली युवा योध्धा में रूपांतरित हो जाते हैं
37:42असीम शक्ति और तेज से युक्त इस अध्भुत युवा को देखकर चिंतित देवतागन इंद्र के नेत्रित्व में उसके प्राकटिस्थल पर
37:51एकत्रित होते हैं उनके चहरों पर आशा और विस्मय का अध्भुत मिश्रण था
37:57स्रिष्टी के रचिता भगवान ब्रह्मा उस दिव्य सभा में प्रकट होकर घोशना करते हैं कि यही वह बालक सकंध है
38:05जो देवताओं का सेनाप्ती बनेगा और तारकासुर के अत्याचारों का अंत करेगा जिससे देवताओं में नई उर्जा का संचार हुआ
38:15अपनी दिव्य नियती को स्वीकार करते हुए सकंध एक तेजस्वी योध्धा के रूप में खड़े होकर देवताओं के सेनाप्ती का
38:23पद ग्रहन करते हैं उनके चहरे पर ग्रिड संकल्प और अदमय साहस की चमक थी
38:29सकंध के नेतरित्व में देवताओं की सेना पहले से कहीं अधिक संगठित और आत्म विश्वास से भरी हुई तारकासुर के
38:37विरुध होने वाले महायुध की तयारी करती हैं उनके अस्त्रशस्त्र दिव्य उर्जा से चमक रहे थे
38:44क्रोर राक्षस तारकासुर अपने विशाल और भयावध दानव जुन्डों के बीच बैठा ब्रहमांड पर अपने निर्बाद शासन का महिमामंदन कर
38:54रहा था उसके आसपास विनाश और पीडा की चाया मंदरा रही थी
39:00अचानक तारकासुर को एक अज्यात शक्ती का अहसास होता है जो देवताओं की ओर से उठ रही थी जिससे उसकी
39:08तानाशाही की नीम भिल जाती है और वह अपने असुर बलों को एक भयंकर युद्ध के लिए तयार होने का
39:14आदेश देता है
39:17दिव्य ध्वनियों और उद्गोशों के साथ सकंद अपने राजसी मयूर वाहन पर आरूढ होकर चमकते हुए अस्त्रों से सुसजजित देवताओं
39:26की विशाल और भव्य सेना का नेत्रित्व करते हुए युद्ध भूमी की ओर प्रस्थान करते हैं
39:34देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ जाता है जिसमें आकाश में अस्त्रों की चमक और दोनों पक्षों के
39:41वीरों की गर्जना से पूरा ब्रहमांड गूंज उठता है जिससे भयावः विनाश और प्षती होती है
39:49रणभूमी में सकंद का पराक्रम अद्वितिय था वे अपने दिव्य शक्ती के साथ तूफानी गती से दानवों का सहार करते
39:57हैं उनकी हर चाल में विजय और न्याय की अगनी झलक रही थी
40:02अंत्य युद्ध भूमी के केंद्र में सकंद और तारकासुर एक दूसरे के आमने सामने आते हैं दोनों की आखों में
40:10एक दूसरे को नश्ट करने का द्रिड संकल्प था जिससे एक भीशन ब्रहमांडिय टकराव का मंच तयार होता है
40:19सकंद और तारकासुर के बीच एक विनाशकारी द्वंद्व शुरू होता है जिसमें उनके अस्त्रों के टकराव से उठने वाली उर्जा
40:27से पूरी स्रिश्टी काप उठती है प्रत्येक वार ब्रहमांड को विचलित कर रहा था
40:33अपने दिव्यभाले शक्ती का प्रयोग करते हुए सकंद तारकासुर के हृदय पर अंतिम और निर्नायक प्रहार करते हैं जिससे वह
40:42विशालकाय राक्षस एक भयानक चीख के साथ धराशाई हो जाता है और उसके अत्याचारों का अंत होता है
40:51तारकासुर के वद के साथ देवताओं की विजय होती है ब्रहमांड उसके आतंक से मुक्त हो जाता है और सकंद
40:58को ब्रहमांड के उधार करता के रूप में जैजैकार किया जाता है जिससे हर दिशा में हर्ष और शांती का
41:05प्रसार होता है
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