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अयोध्या के महान सम्राट दशरथ की गाथा! 👑 रघुवंश के गौरव को आगे बढ़ाते हुए, दशरथ को एक गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ता है – वंश को आगे बढ़ाने वाला कोई उत्तराधिकारी नहीं। क्या ऋषि वसिष्ठ का ज्ञान और महर्षि ऋष्यशृंग का अद्भुत यज्ञ अयोध्या को बचा पाएगा? पुत्रकामेष्टि यज्ञ के रहस्य, तीन रानियों का संघर्ष, और एक दिव्य आशीर्वाद की कहानी! ✨ इस एपिसोड में देखिए कैसे एक महायज्ञ ने बदल दी अयोध्या की किस्मत, और एक नए युग की नींव रखी गई। #विष्णुपुराण #दशरथ #पुत्रकामेष्टि #अयोध्या #रामकथा #हिंदूधर्म #पौराणिककथाएँ
Transcript
00:00रानी इंदुम्ती के आकस्मिक विरह में व्याकुल समराथ अज सर्यू के तटपर बैठकर अपनी प्रिया की स्मृतियों में अशुरुपात कर
00:08रहे थे।
00:09राज प्रासाद के भव्यक अक्षों की प्रत्येक वस्तु समराथ अज को अपनी प्रियत्मा की याद दिलाकर उनका हृदय चलनी कर
00:17रही थी।
00:19अयोध्या के उस प्रतापी सिनहद्वार और राज सिनहासन को देखकर अज का मन गलानी और अगाध दुहक से भर जाता
00:27था।
00:28समराथ की यह शोका कुल दशा देखकर कुल गुरु महर्शी वशिष्ट और महामंत्री सुमंत्र अत्यंत चिन्तित हो उठे।
00:37महर्शी वशिष्ट ने समराथ को धैर्य बंधाते हुए समझाया कि आत्मा अमर है और यह संसार केवल क्षन भंगुर माया
00:45मात्र है।
00:47गुरु के ज्यानपूर्ण उपदेशों को सुनने के उपरांत भी समराथ का हृदय विरह की उस्तीक्षन पीडा को भुला नहीं पा
00:54रहा था।
00:56उसी समय तेजस्वी और धर्मनिष्ट बालक राजकुमार दशरत ने पिता के चर्नों में उपस्थित होकर उन्हें प्रणाम किया।
01:05अपने वीर और गुनवान पुत्र दशरत का मुख देखकर अज को रगुवंश के भावी उत्तरदायत्व का बोध हुआ।
01:13समराट अजने निर्नै लिया कि वे अब अयोध्या के सामराज्य का पूर्ण भार अपने पुत्र दशरत के हाथों में सौंप
01:21देंगे।
01:22अयोध्या पुरी में नव्युवक दशरत के राज्याभिशेक की तैयारिया पूरे विधिविधान और उत्साह के साथ आरंभ हो गई।
01:30पवित्र राज सभा में समराट अजने स्वया अपने हाथों से रत्नजडित मुकुट राजकुमार दशरत के मस्तक पर सुशोगित किया।
01:40वेदपाथी ब्राहमनों के शंकनाद और मंत्रो चार के मध्य सर्यू के पवित्र जल से दशरत का अभिशेक किया गया।
01:48संपूर्ण अयोध्या नगर में नए राजा के जैकारे गूंजुठे किन्तु अज का चित्त संसार के समस्त बंधनों से विरक्थ हो
01:56चुका था।
01:57राजदंड और प्रजा के पालन का उत्तरदायत्व सौपकर पूर्व समराथ अज ने अपने भौतिक कर्तवियों का इतिश्री कर दिया।
02:07सांसारिक मुहमाया का पूर्ण त्याग करके अज सर्यू नदी के शांत और एकांत तटपर स्थित एक आश्रम में चले गए।
02:16सर्यू के किनारे एक विशाल वटवरिक्ष के नीचे पदमासन लगाकर वे अपनी श्वासों को नियंतरित करने लगे।
02:24योग साधना की पराकाश्था पर पहुँच कर उनके ध्यान में भगवान श्री हरी विश्नु का परम दिव्यरूप प्रकट हुआ।
02:32परम समाधी की अवस्था में समराट अजने योगबल से अपने प्राणों को ब्रहमरंध्र के मार्क से मुक्त कर दिया।
02:40देवलोग से देवताओं और अपसराओं ने उस निश्पाप राजर्शी की आत्मा पर दिव्य पारिजात पुष्पों की वर्षा की।
02:49पिता के देह त्याग का दुखद समाचार मिलते ही नवस्मराट दशरत और पूरी अयोध्या शोक के अगाध सागर में डूब
02:57गई।
02:58शोक के बादलों को चीरते हुए, राजकुमार दशरत ने कुलगुरु वशिष्ट के चर्णों का स्पर्श कर अपनी मात्री भूमी के
03:06प्रती परम कर्तव्य निभाने का संकल्प लिया।
03:10अयोध्या के विशाल राजदर्बार में मंत्रियों और सभास दों ने युवा राजकुमार को सिनहासन की रक्षा के लिए राजजाभिशेक हेतु
03:18सादर आमंत्रित किया।
03:21पवित्र नदियों के जल और सुगंधित आउशधियों से सजे स्वर्ण कल्षों से राजकुमार दशरत का मंगल स्नान संपन्न हुआ
03:30राज्या भिशेक के पावन पर्व पर पूरी अयोध्या नगरी को रंग बिरंगे पुश्पों, स्वर्णिन दीपों और मांगलिक तोर्णों से दुलहन
03:38की तरह सजाया गया
03:40यग्यशाला के पवित्र कुंड में प्रजवलित होती पावन अगनी के समक्ष वेदमंत्रों के सस्वर पाठ से संपून वातावर्ण गुंजायमान हो
03:49उठा
03:50मंत्रो चार के बीच कुलगुरु वशिष्ठ ने भावी समराथ दशरत को सूर्यवन्ष के अधिपती के रूप में प्रतिष्ठित होने का
03:58आदेश दिया
04:00अत्यंत्विनीत भाव से राजकुमार दशरत ने अपने दोनों हाथ जोड़ कर उस अलोकिक और एतिहासिक सुवर्ण सिनहासन की ओर कदम
04:08बढ़ाए
04:10कुलगुरु वशिष्ठ ने अत्यंत्षरधा के साथ दशरत के भाल पर दिव्यचंदन और कुमकुम का राज्तिलक लगाया
04:19हर्शध्वनी के साथ कुलगुरु ने महाराज मनु और रग्धु की विरासत के प्रतीक अत्यंत भव्य राजमुकुट को दशरत के सिर
04:26पर धारण कराया
04:28नवनियुक्त समराठ दशरत ने देवर्शियों और ब्रहमर्शियों के चरनों में जुककर उनका मंगलकारी आशिर्वात पराप्त किया
04:37सिन्हासन पर विराज मान होकर समराट दशरत ने न्याय और प्रजापालन के प्रतीक राजगंड को द्रिडता से अपने हाथों में
04:45लिया
04:47समराट दशरत का मुखमंडल सूर्य के समान बैदी प्यमान हो उठा जिससे संपूर्ण प्रजाका हृदय आशा और विश्वास से भर
04:55गया
04:56हाथ में कुश और गंगाजल लेकर नवसमराट ने सूर्यवंश की मर्यादा को सदा अक्षुन रखने की महान प्रतिग्या ली
05:05उन्होंने प्रतिग्या की कीवे सूर्यवंश के गौरवशाली इतिहास और पूर्वज राजाओं की मर्यादा पर कभी कोई आच नहीं आने देंगे
05:15महाराज दशरत ने घोशना की कीवे हर परिस्थिती में अपनी प्रजा को अपनी संतान मान कर उनकी रक्षा और सेवा
05:23करेंगे
05:25समराट की इस उदार घोशना से अभिभूत होकर स्वर्ग से देवताओं ने उन पर दिव्य पारिजात और मंदार पुश्पों की
05:33वर्षा की
05:34पूरी अयोध्या नगरी में महाराज दशरत की जय होके गगनभेदी जय घोश गूंज उठे जिससे चारों दिशाएं आनन्दित हो उठी
05:44राजमाता और राजमहल की वधों ने मंगल आर्ती उतार कर नवस्मराट के दीरगायू और यशस्वी जीवन की कामना की
05:53शोक के गहन अंधकार को परास्त कर अयोध्या में पुनह सुख, शान्ती और सम्रिध्धी की एक नई चेतना का उदे
06:01हुआ
06:03सिनहासन पर द्रिढ निश्चय के साथ विराजमान होकर महाराज दशरत ने अयोध्या के सुनहरे भविश्य की रचना का संकल्त लिया
06:12सिनहासन संभालते ही महाराज दशरत ने अयोध्या की प्रशासनिक व्यवस्था और सैन्य शक्ती को सुद्रिढ करने के लिए दूरदर्शी नीतियों
06:21की घोशना की
06:23प्रजा को अकाल और विपदाओं से बचाने के लिए समराथ ने स्वया राज्य के विशाल अन्न भंडारों और सर्यू नदी
06:30से जुड़ी नहरों का निरीच्षन किया
06:34राजसभा में बिना किसी भेदभाव के हर नागरिक की पीडा सुनकर न्यायप्रिय दशरत तुरंट समाधान प्रदान करते थे
06:42इसी बीच गुपतचरों ने सूचनादी की दूरस्थ सीमावर्ती वनों में दुष्ट उपदर्वी और दानवी शक्तिया रिशियों के आश्रमों को प्रताडित
06:51कर रही है
06:53आश्रमों और प्रजा की रक्षा हेतु महाराज दशरत ने ततकाल अपनी विशाल चतुरंगिनी सेना के साथ धर्म युद्ध का शंकनाद
07:02कर दिया
07:03युद्ध भूमी में उतर कर समराट दशरत ने अपनी अध्भूत शब्द वेधी बान कला का प्रदर्शन करते हुए अद्रिश्य शत्रूओं
07:11के भी छक्के छुडा दिये
07:14महाराज की तीवर बानवर्शा ने पलक जपकते ही अधर्मी सेना को अस्तव्यस्ट कर दिया और पूरी रनभूमी उनके जैकारों से
07:22गुंज उठी
07:24शत्रों का पूर्ण विनाशकर महाराज दश्रत ने दंडकारने के निकटवर्ती समस्ट आश्रमों में शान्ती और निर्भैता की पुनह स्थापना की
07:34जब विजी समराट अयोध्या लोटे तो संपूर्ण नगर की जनता ने छतों और गलियों से पुश पवर्षा करके अपने प्रिय
07:42राजा का भव्य स्वागत किया
07:45सामराज में व्यापार और यातरियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दशरत ने प्रमुख मारगों पर सशक्त सैनिक चोकिया निरमित
07:53करवाई
07:55महाराज ने गुरुकुलों और विद्वान रिशियों को उदारता पूर्वक दान देकर राज्य में विद्या और वैदिक अनुष्ठानों का निरंतर प्रोच
08:03साहन किया
08:05संपूर्ण अवध शेत्र में सुन्दर विश्रामग्रेह, मिठास से भरे जलाशे और विशाल उपवन बनवाए गए ताकि हर पथिक को सुख
08:13प्राप्थ हो सके
08:15दश्रत की अपार वीर्ता और सदाचार को देख कर पडोसी राज्यों के राजाओं ने स्वेच्छा से उनके नेत्रित्व को स्विकार
08:24कर लिया
08:25राज्य की अभूतपूर्व उन्नती के बीच भी महाराज दश्रत सदैव अपने कुल गुरु ब्रहमर्शी वशिष्ट से धर्म और नीती की
08:33शिक्षा लेते रहते थे
08:36महर्शी वशिष्ठ ने समराट की न्याय प्रेता और सत्यनिष्ठा की सराहना करते हुए उन्हें चिरंजीवी और यशस्वी होने का आशिरवाद
08:45दिया
08:46दश्रत के शासनकाल में अयोध्या धंधान्य, शान्ती और सुरक्षा का ऐसा केंद्र बन गई जिसकी तुलना केवल देवलोग से की
08:55जा सकती थी
08:57स्वर्ग के देवताओं और गंधरवों ने भी महाराज दश्रत के इस निश्कलंक और कल्यानकारी शासन की प्रशनसा में मंगल गीत
09:05गाए
09:07संध्याकाल में समराट दश्रत सर्यू के तट पर जाकर समूचे विश्व के कल्यान और शान्ती के लिए नियमित रूप से
09:14महारती करते थे
09:16परंतु इस अपार सुख और सम्रिध्धी के मध्य भी महाराज के हृदय में संतान हींता का एक मौन और गहरा
09:24दुख सताने लगा था
09:26रगुवन्ष की परंपरा को आगे बढ़ाने और उत्तराधिकारी प्राप्त करने के विचार ने महाराज दशरत को एक महान संकल्प की
09:34और प्रेरित किया
09:36महाराज दशरत का प्रथम विवाह कोशल देश की परं सुन्दरी और धर्म प्रायन राजकुमारी कौसल्या के साथ अत्यंत धूमधाम से
09:45संपन हुआ
09:47महाराणी कौसल्या के सौमय रूप, शांत स्वभाव और भक्ती भाव ने अयोध्या के राजमहल को अलोकिक पवित्रता से भर दिया
09:56प्रतिदिन प्रातहकाल ईश्वर आराधना और ब्राहमनों की सेवा में लीन रहकर कौसल्या ने संपूर्ण नगर में संसकारों की नई जोती
10:05जलाई
10:06इसके पश्चात समराट दश्रत का दूसरा विवाह काशी की अत्यंत बुद्धिंती, गुनवती और धैर्यशाली राजकुमारी सुमित्रा से हुआ
10:17महारानी सुमित्रा ने अपने त्यागम आचर्ण और अगाध निस्वार्थ प्रेम से राजपरिवार के प्रत्येक सदस्य के हृदय में विशेश स्थान
10:26बना लिया
10:27ततपश्चात कैके देश के राजा अश्वप्ती की अत्यंत तेजस्वी, साहसी और रूपवती पुत्री कैकेई दशरत की तीसरी पट्रानी बनी
10:38युध्धकला और अस्त्रशस्त्र संचालन में निपुन राजकुमारी कैकेई अपने असीं साहस और चंचल सौंदर्य से महाराज का मन मोह लेती
10:47थी
10:48युद्ध क्षेत्र में भी राजा दश्रत के रत का कुशलता पूर्वक संचालन करने वाली महारानी कैकेई के शौर्य की गाथाए
10:56सर्वत्र गूंजने लगी
10:58तीनो रानियों के आगमन से अयोध्या का स्वर्णिम राजमहल तीन दिव्य निधियों की भांती जग्मगा उठा
11:06कौसलिया, सुमित्रा और कैकेई के मध्य बहनों जैसा अपार्स ने सम्मान और अटूट प्रेम देखकर समूचा राजमहल आनंदित हो उठता
11:15था
11:17भव्य देव मंदिर में महारानी कौसलिया के साथ सुमित्रा और कैकेई एक साथ बैठकर प्रतिदिन राष्ट्र कल्यान के लिए आहुतिया
11:26देती थी
11:27अपने सिन्हासन पर विराजमान समराट दशरत अपनी तीनों गुनवती पत्नियों के साथ धर्म और नीती के अनुसार राज्य का संचालन
11:36करते थे
11:38कौसलिया की धार्मिक निष्ठा, सुमित्रा का गूड विवेक और कैकेई का अध्भुत साहस मिलकर राजा दशरत की सबसे बड़ी शक्ती
11:46बन गए थे
11:48अयोध्या के प्रजाहितैशी वातावर्ण और तीनों महारानियों के मधुर व्यवहार से संपून प्रजास्वयं को परम सौभागेशाली मानती थी
11:58राजसभा में संगीट, नृत्य और वैदिक मंत्रों की मधुर गूंच के बीच तीनों महारानियों का भव्यसतकार नियमित रूप से होता
12:06था
12:08महल के विश्राम कक्षों में सुमित्रा सदैव कौसल्या और कैकेई के विचारों में सामनजस्य स्थापित कर प्रेम की दोर को
12:16मजबूत बनाय रखती थी
12:19महाराज दशरत अपनी तीनों धर्म प्रायन रानियों के साथ जीवन के संपून सुख भोगते हुए भी रखुकुल की मर्यादा का
12:27पालन करते थे
12:29परंतु इतने अपार सुख और समरिध्धी के बीच भी तीनों रानियों के मन में संतान की लालसा एक मौन कसक
12:36बनकर सदैव विद्यमान रहती थी
12:39रखुकुल के वंश को आगे बढ़ाने के लिए तीनों महारानिया महाराज के साथ नित्य भगवान विश्णू की विशेश उपासना करने
12:48लगी
12:49अंतह महाराज दश्रत और उनकी तीनों रानियों ने एक साथ मिलकर पुत्र प्राप्ती हेतु महायग्य के भव्य आयोजन का द्रिड
12:57संकल्प लिया
12:59पुत्र प्राप्ती के महायज्य के ग्रिड संकल्प के साथ ही अयोध्या के राजभवन में एक अध्वितिय उर्जा का संचार हुआ
13:07जहां हर इंट और पत्थर आशा के नए आलोक से प्रकाशित हो उठे
13:13महाराज दश्रत ने इस परम अनुष्ठान के लिए देश्विदेश के सिध्धेहस्त रिशियों और विद्वानों को निमंत्रित किया जिनमें रूमपात के
13:22तपस्वी जामाता महर्शी रिश्यश्रिंग का नाम अग्रिन पंक्ती में था
13:27आथक एक शुभ दिन शांतचित और तेजस्वी महर्शी रिश्यश्रिंग ने अयोध्या में प्रवेश किया जिनके आग्मन से ही बातावर्ण में
13:36एक दिव्य और पवित्र आभाचा गई
13:40राजभवन के प्रांगण में वेदों के मंत्रों से अभिमंत्रित एक विशाल और भव्य यद्य मंडप का निर्मान किया गया
13:46जिसके खंभे स्वन से मढ़े थे और छत रंगीन वस्त्रों से सुशोभित थी जो दैविय अनुग्रह की प्रतीक्षा में खड़ा
13:54था
13:56महाराज दशरत अपने मस्तक पर चिन्ता की सूक्षम रेखा लिये हुए किन्तु हृदय में अदमेश रध्धा और आशा के साथ
14:04अपनी तीनों महारानियों कौशलया, सुमित्रा और कैकेई के साथ उस पवित्र यग्यशाला में प्रविश्थ हुए
14:12महरशी रिश्यश्रिंग ने अपनी अलौकिक शक्ती और वेदग्यान के साथ उत्रकामिश्थी यग्य का शुभारंब किया, जहां उनके मुख से निकले
14:21प्रत्येक मंत्र ब्रहमांड में गूंच कर एक अद्रिश्य शक्ती को आहवान कर रहा था
14:27यग्य कुंड की अगनी प्रजवलित हुई और उसकी लप्टें आकाश को चूमने लगी, घी, समिधा और हविश्य के अरपन से
14:35अगनी देव का तेज कई गुना बढ़ गया, मानो स्वयन देवताओं का आहवान हो रहा हो
14:41दिन बीटते गए और यग्य अनवरत चलता रहा, वातावर्ण वैदिक मंत्रों की गुंजन, हवन की सुगंध और एक गेहन आध्यात्मिक
14:50उर्जा से भर गया, जिसने हर उपस्थित प्राणी के मन को शांती और विश्वास से भर दिया
14:57यग्य की भव्यता के बीच भी महाराज दशरत की आखों में एक गहरी, अनकही व्यथा तैर रही थी, वे रह
15:05रहकर अपनी रानियों की ओर देखते, जिनके मुख पर प्रतीक्षा और प्रार्थना का मिलाजुला भाव था
15:12महारानियों के चहरे पर आशा और भक्ती का एक शांत किन्तु गहन प्रकाश था, प्रत्यक आहुती के साथ उनकी आखें
15:20बंध हो जाती और वे मौन प्रार्थना में लीन हो जाती, मानों अपना सर्वस्व उस पवित्र अग्नी को अर्पित कर
15:27रही हो
15:29यग्य के अंतिम चरण में, जब मंत्रों की ध्वनी चरम पर थी और अग्नी की लप्टे स्वर्ण रश्मियों से दमक
15:36रही थी, तभी यग्यकुन से एक अलोकिक और भव्य आकृती का प्राकट्य हुआ, जिसने सभी को विस्मय से भर दिया
15:45अग्नी के मध्य से स्वय अग्निदेव प्रकट हुए, उनका शरीर जलती हुई स्वर्ण आभा से लिप्टा था, मुखमंडल पर दिव्य
15:53तेज था और उनके हाथों में एक चम्चमाते हुए स्वर्ण पात्र में दिव्यखीर, पायसम, विद्यमान थी
16:01दिव्यवानी में अग्निदेव ने महाराज दशरत को संबोधित किया, हे राजन, तुम्हारी निष्ठा और तपस्या से प्रसन्न होकर देवताओं ने
16:10तुम्हें यह दिव्यखीर प्रदान की है, जिसके सेवन से तुम्हें चार तेजस्वी पुत्रों की प्राप्ती हो�
16:27मानों उन्होंने स्वयम ब्रह्मांड का सबसे बड़ा वर्दान प्राप्त कर लिया हो।
16:57मानों धंग से वित्रित किया, हर भाग में एक नई आशा समाहित थी।
17:27हो चुकी हैं और इस खबर ने पूरे राज्य में हर्शोलास की एक नई लहर दोडा दी, मानों हर घर
17:34में उत्सव मन रहा हो।
17:36माह बीटते गए और महारानियों के गर्भ में पल रहे नवजीवन के आगमन की प्रतीक्षा अयोध्या के हर प्राणी को
17:44रोमाचित करने लगी, जिससे अयोध्या का कोना कोना उत्सव और उत्साह से भर गया।
17:50गर्भग्रे से आती नवजीवन की आहट और भावी राजकुमारों के आगमन की मंगल ध्वनी ने अयोध्या की गलियों में एक
17:58अध्भुत उल्लास भर दिया, प्रत्येक नागरिक अपने भविश्य के राजाओं के स्वागत के लिए लालायत था।
18:06अयोध्या के महल से लेकर साधारन कुटिया तक हर आख नवजीवन के आगमन की प्रतीक्षा में टकटकी लगाए थी, जहां
18:14समय की हर टिक-टिक एक सुनहरे भविश्य की उम्मीद जगा रही थी।
18:18उसी क्षन्क देवलोक में भी एक अध्भुत हलचल थी, जहां देवतागन प्रित्वी पर होने वाले इस महान अवतरण के लिए
18:27अपनी आखें गड़ाए हुए थे।
18:29मानोस्वयम ब्रह्मांड एक पवित्र नाटक का साक्षी बनने को तयार हो।
18:35महारानी कौशल्या के गर्भ में एक अलौकिक शक्ती का अनुभव हो रहा था।
18:40जैसे सूर्य का तेज उनके भीतर समाहित हो गया हो जो एक ऐसे पुत्र की आहट थी जो युगों तक
18:47धर्म की स्थापना करेगा।
18:49वहीं महारानी सुमित्रा भी अपने भीतर दो दैविय अंशों की उर्जा महसूस कर रही थी, जिनकी आभा चंद्रमा की शितलता
18:58और नक्षत्रों की चमक के समान थी, जो आने वाले वीर पुत्रों का संकेत था।
19:05और महारानी कैकेई के गर्भ में एक अद्वितिय वीर्ता और तेज का अनुभव हो रहा था, मानो कोई प्रजवलित अगनी
19:13उनके भीतर विश्राम कर रही हो, जो एक पराक्रमी पुत्र के आगमन की पूर्व सूचना थी।
19:19महर्शी वसिष्ट अपनी गहन साधना और जोतिशिय ग्यान से नक्षत्रों की चाल और ग्रहों की स्थिती का सुक्षमता से अवलोकन
19:28कर रहे थे, ताकि भावी राजकुमारों के जन्म का शुभ मुहूर्प निर्धारित किया जा सके।
19:35अपनी गन्नाय पूरी करने के बाद उन्होंने समराथ दशरत को सबसे शुभ घडी का ग्यान दिया, जब ग्रहों की स्थिती
19:43ऐसी थी कि वह चारों दिशाओं में धर्म, न्याय और पराक्रम का प्रतिनिधित्व करती थी।
19:50राजमहल की हवा में एक अजीब सी उत्तेजना और पवित्रता घुल गई थी, जहां हर कोने से नवजीवन की प्रतीक्षा
19:58में प्रार्थनाओं और मंत्रों की ध्वनिया गुंज रही थी।
20:01और फिर वह घडिया पहुँची जब महारानी कौशल्या को प्रसव पीड़ा हुई एक ऐसी पीड़ा जो आने वाले युग के
20:09सबसे महान नायक के आगमन का अग्रदूद थी।
20:31स्वर्ग से पुष्प वर्षा हुई देवदूतों ने शंखनात किया और पवन्देव ने दिव्य संगीत की धुने बिखेर दी। जैसे स्वयं
20:40प्रकृती इस अद्वितिय जन्म का स्वागत कर रही हो।
20:44ततपश्चात महारानी सुमित्रा ने दो अद्भुत पुत्रों को जन्म दिया लक्षमन जो राम के प्रती अपने अविचल प्रेम और सेवा
20:52के प्रतीक बने और शत्रुगन जो धर्म के मार्ग पर चलने वाले थे।
20:57और अंतह महारानी कैकेई ने भरत को जन्म दिया जो सत्यनिष्ठा और त्याग के प्रतीक बने एक ऐसे पुत्र जिसने
21:06अपने जीवन में कर्तव्य प्रायंता का सर्वोच आदर्श थापित किया।
21:11समराट दशरत का हरिदय आनन से भर गया। उनके चारों पुत्रों के जन्म ने अयोध्या को एक नए युग की
21:19दहलीज परला खड़ा किया, जहां हर तरफ खुशियों की धारा बह रही थी।
21:24अयोध्या की गलिया, जो अब तक उत्सव के लिए प्रतीक शारत थी, अब धोलन गाडों और शंखध्वनी से गूंज उठीन
21:32हर घर में दीप जलाए गए और हर नागरिक ने अपने राजा के सुख में हिस्सा लिया।
21:38समराट दश्रत ने अपनी असीम उदारता का परिचय देते हुए ब्राहमनों और गरीबों को दान्दक्षिना दी, जिससे अयोध्या का हर
21:47कोना खुशियों और आशिरवात से भर गया।
21:51कुलकुरु महर्शी वसिष्ठ ने राजकुमारों के नामकरण संसकार की तयारी की, जहां हर नाम केवल एक पहचान नहीं, बलकि उनके
22:00दैविये डेस्टिनी का प्रतीक बनने वाला था।
22:03आठवे दिन महर्शी वसिष्ठ ने बड़े राजकुमार को राम नाम दिया, दूसरे को भरत और जुड़वा राजकुमारों को लक्षमन तथा
22:12शत्रुगन नाम से पुकारा, जिससे अयोध्या के नामकरण की महिमा और बढ़ गई।
22:18महर्शी ने प्रत्येक नामका अर्थ और उसके पीछे छिपे दैविय महत्व को समझाया, जिससे यह स्पष्ठ हो गया कि यह
22:26राजकुमार केवल दशरत के पुत्र नहीं, बलकि स्वयं ब्रह्मांड की आशा थे।
22:32इस प्रकार अयोध्या ने अपने भविश्य के शास्कों का स्वागत किया और हर दिल में यह आशा जागी की यह
22:39राजकुमार धर्म और न्याय की स्थापना कर एक नए स्वर्णिन युग की शुरुवात करेंगे।
22:46महाराज दशरत इन भविश्यवानियों से अत्यंत प्रसन्न और भावुक होकर महर्शी वसिष्ट के चर्णों में श्रधा पूर्वक नमन करने लगे।
22:56समस्त राज सभा में एक अनकही शांती और गहरी आशा का संचार हो गया, जैसे स्वयन देवताओं ने अयोध्या को
23:04आशिरवात दिया हो।
23:06दश्रत ने हाथ जोड कर महर्शी से पूछा कि क्या यह स्वपन मात्र है या यह दिव्य भविश्य सच में
23:13साकार होगा।
23:15महर्शी वसिष्ठ ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया कि यह ब्रह्मा की इच्छा है और यह अवश्य पूर्ण होगा, परंतु इसके
23:23लिए विशेश अनुष्ठान की आवश्यक्ता होगी।
23:27वसिष्ठ ने समझाया कि रगुवंश को आगे बढ़ाने और इन तेजस्वी पुत्रों को प्राप्त करने हेतु एक अत्यंत पवित्र पुत्र
23:35कामिष्टी यग्य संपन्न करना होगा।
23:38उन्होंने आगे कहा कि इस यग्य को सफलता पूर्वक संपन्न करने के लिए एक अध्वितिय रिशी की आवश्यक्ता है, जिनकी
23:46तपस्या अतुलनिय हो।
23:48वह महान तपस्वी हैं महर्शी रिश्यश्रिंग, वसिष्ठ ने गंभीर स्वर में घोशना की, जिनकी पवित्रता तीनों लोकों में विख्यात है।
23:59महर्शी वसिष्ठ ने रिश्यश्रिंग के जन्म और उनकी अध्भुत तपस्या के विशय में विस्तार से बताया कि कैसे वे एक
24:07म्रिगी और रिशी विभांडक के पुत्र हैं
24:11उन्होंने उलेख किया कि रिश्यश्रिंग ने कभी बाहरी संसार नहीं देखा, वे सदा अपने पिता के आश्रम में ही रहे
24:19हैं, संपूर्णत है पवित्र और निश्पा
24:23दश्रत ने उच्सुक्ता से पूछा कि क्या ऐसे अनाडी रिशी को अयोध्या तक लाना संभव होगा, जो बाहरी दुनिया से
24:30बिल्कुल अन्भिग्य हैं
24:33वसिष्ठ ने आश्वासन दिया कि उचित मार्गदर्शन और सम्मान के साथ रिश्यश्रिंग अवश्य अयोध्या आएंगे, क्योंकि यह देवताओं का ही
24:42विधान है
24:45महाराज दश्रत ने ततकाल अपने सबसे बुद्धिमान और वफादार दूतों को रिश्यश्रिंग को अयोध्या आमंत्रित करने का आदेश दिया
24:54उन्होंने दूतों को विशेश रूप से निर्देश दिया कि वे रिशी का अत्यंत आदर सतकार करें और उन्हें किसी भी
25:02प्रकार से अपमानित न करें
25:05दूतों ने सिर जुका कर महाराज की आग्या स्विकार की और तुरंत महर्शी रिश्यश्रिंग के आश्रम की दिशा में प्रस्थान
25:13करने की तैयारी करने लगे
25:16राजमहल से बाहर निकल कर दूतों ने अपनी यात्रा के लिए आवश्यक सामगरी और घोडों का प्रबंध किया उनके मन
25:23में एक पवित्र उद्देश्य का संकल्प था
25:27अयोध्या की सीमाओं को पार करते हुए वे घने वनों और दुर्गम मार्गों से गुजरने लगे हर कदम पर रिशी
25:34तक पहुँचने की उतकंठा लिए
25:37दूर एक शांत और पवित्र स्थान पर महर्शी रिश्यश्रिंग अपने पिता विभांडक के साथ प्रकृती के बीच गेहन तपस्या में
25:45लीन थे
25:47रिश्यश्रिंग का चेहरा अध्भुत शांती और दिव्य तेज से प्रकाशित था उनकी काया तपस्या के कारण अत्यंत शुद्ध और पावन
25:56दिख रही थी
25:58अयोध्या के दूतों ने कठिन यात्रा के बावजूद अपना साहस बनाये रखा यह जानते हुए कि वे एक ऐसे मिशन
26:05पर हैं जो रगुवन्ष का भाग्य बदल देगा
26:09समस्ट अयोध्या नगरी महाराज दशरत के साथ रिश्यश्रिंग के आगमन की प्रतीक्षा में थी हर हृदय में पुत्र प्राप्ती की
26:18तीवर अभिलाशा प्रज्वलित थी
26:21अयोध्या के दूतों ने रिश्यश्रिंग की दिव्य उपस्थिती से अभिभूत होकर विनम्रता पूर्वक महाराज दशरत का संदेश उन तक पहुँचाया
26:30जिसमें पुत्रकामिष्टी यग्य के लिए उनके आगमन का अनुरोध था
26:36महर्शी रिश्यश्रिंग ने गहन समाधी में कुछ क्षन बिताए उनके मन में अयोध्या की पीड़ा और रगुवंश के भविश्य का
26:43चिंतन चल रहा था जैसे कोई ब्रहमांडिय सूत्र सुल्जा रहा हो
26:49अचानक एक अद्रिश्य दिव्यवानी ने रिश्यश्रिंग को अयोध्या जाने का आदेश दिया जिससे वे पुत्रकामिष्टी यग्य की महत्ता को समझ
26:57सके और उनका संकल्प सुद्रिड हो गया
27:01रिश्य श्रिंग ने अपनी आखें खोली और शांत भाव से दूतों को बताया कि वे दशरत के निमंतरन को स्वीकार
27:08करते हैं
27:09जिससे दूतों के चहरे पर आशा की किरन डौड गई और उनके हृदय कृतग्यता से भर उठे
27:16वन के अन्य रिशिगन और शिशों ने रिश्य श्रिंग की यात्रा के लिए आवश्यक सामगरी और अनुष्ठानिक वस्तूओं को एकत्र
27:24करना प्रारंभ कर दिया
27:25प्रत्येक वस्तू में पवित्रता और समर्पन का भाव था
27:30रिश्यश्रिंग ने अपने आश्रम को विदा किया, जहां उन्होंने वर्षों तक कठोर तपस्या की थी, प्रकृती भी उनके प्रस्थान पर
27:38मौन साध रही थी, जैसे कोई प्रेजन बिछड रहा हो
27:43दिव्य रिश्यश्रिंग का दल, जिसमें उनके शिश्य और अयोध्या के दूद शामिल थे, पवित्र नदियों और घने वनों से होते
27:51हुए अयोध्या की ओर अग्रसर हुआ, हर कदम एक नए यूग की ओर बढ़ रहा था
27:58जहां जहां रिश्यश्रिंग के चरण पड़ते, वहां की भूमी शुद्ध हो जाती, सुखे पत्ते फिर से हरे होने लगते और
28:05पुष्प खिल उठते, प्रकृती उनके आगमन का अलौकिक स्वागत कर रही थी
28:11एक अश्वारोही दूद तेजी से अयोध्या पहुँचा और महाराज दश्रत को रिश्यश्रिंग के प्रस्थान का शुब समाचार दिया, जिससे पूरे
28:20राजमहल में खुशी की लहर दौड गई और आशा का संचार हुआ
28:25महाराज दश्रत ने तुरंट पूरी अयोध्या नगरी को रिश्यश्रिंग के भव्य स्वागत के लिए सजाने का आदेश दिया, हर घर
28:33में दीप जलाए जाने लगे और तोरंदवार बनाए गए, जैसे कोई महा उत्सव हो
28:40अयोध्या के नागरिक पुत्र प्राप्ती की आशा से भर कर सडकों पर उतर आये और रिश्यश्रिंग के आगमन की खुशी
28:47में मंगल गीत गाने लगे, उनके हृदय में नई उर्जा का संचार हो रहा था
28:54रिश्यश्रिंग का रत अयोध्या की सीमा के पास पहुँचा, जहां दूर से ही नगरी के भव्य तोरंदवार और उत्सवी ध्वज
29:01दिखाई देने लगे थे, जो उनके स्वागत में लहरा रहे थे
29:06स्वय महाराज दश्रत अपने मंत्रियों और राजपुरोहितों के साथ अयोध्या की बाहरी सीमा पर रिश्यश्रिंग का स्वागत करने के लिए
29:14खड़े थे, उनके चहरों पर गहरी श्रधा और कृत अग्यता थी
29:20जैसे ही रिश्यश्रिंग का रत समीप आया, महाराज दश्रत ने उनकी दिव्यकाया और शांत स्वरूप को देखा, जिससे उन्हें अपार
29:28शांती और विश्वास का अनुभव हुआ, मानो वर्षों की प्रतीच्षा पूर्ण हुई हो
29:35महाराज दश्रत ने रत से उतरते ही रिश्यश्रिंग के चर्णों में दंडवत प्रणाम किया, उनकी भक्ती और आदर भाव पूरे
29:42वातावर्ण में फैल गया, जिसे देखकर सभी उपस्थित जन भावुखो उठे
29:49रिश्यश्रिंग ने दश्रत को प्रेमपूर्वक उठाया और उनके सिर पर अपना आशिर्वात का हाथ रखा, जिससे दश्रत को लगा जैसे
29:57साक्षात, देवों का आशिर्वात प्राप्थ हुआ हो और उनका मन शान्थ हो गया
30:03रिश्यश्रिंग महाराज दशरत के साथ एक भव्य शोभायात्रा में अयोध्या नगरी में प्रवेश किया जहां फूलों की वर्षा हो रही
30:11थी और शंकनाद गूंज रहे थे हर और मंगल ध्वनी व्याप्त थी
30:17अयोध्या की गलिया जो अब तक सूनी थी अब जनसमूह से भरी हुई थी हर खिडकी और छत से लोग
30:24रिश्यश्रिंग के दर्शन कर रहे थे मानो साक्षात देव आ गए हो
30:30रिश्यश्रिंग को राजमहल के भीतर एक विशेश कक्ष में ले जाया गया जहां उनके सम्मान में सभी अनुष्ठानिक तैयारिया पूरी
30:38की गई थी प्रत्येक वस्तुशुद्ध और पवित्र थी
30:43रिश्यश्रिंग के आगमन से अयोध्या नगरी में एक अद्वितिय शान्ती और पवित्र ताचा गई पुत्रकामिष्टी यग्य की आधार्शिला अब रखी
30:52जा चुकी थी जो भविश्य के रामराज्य का संकेत था
30:57यग्यशाला के मध्य में वेदी को सुगंधित पुश्पों और पवित्र सामगरी से अलंकृत किया गया जहां देवताओं की उपस्थिती की
31:05कल्पना की जा रही थी
31:08सैक्डों विद्वान ब्राहमन और तपस्वी अपनी अपनी आसनों पर विराज मान हो चुके थे जिनके मुख से उच्चारित प्रारंभिक मंत्रों
31:16से वायुमंडल शुद्ध हो रहा था
31:20महाराज दश्रत अपनी तीनों रानियों सहित गंभीर मुख मुद्रा लिए यग्यशाला में प्रवेश करते हैं उनके हृदय में पुत्र प्राप्ती
31:28की गेहन अभिलाशा धधक रही थी
31:32तभी महरशी रिश्यश्रिंग अपनी तपस्या से उद्धीत यग्यशाला के द्वार से अंदर आते हैं उनकी आभा से सारा बातावर्ण दैविये
31:41तेज से भर उठता है
31:44महाराज दश्रत ने ततकाल उठकर महर्शी रिश्यश्रिंग के चर्णों में श्रधापूर्वक प्रणाम किया, मानोवे स्वयन ब्रह्मा के अंशुँ
31:54रिश्यश्रिंग अपनी दिव्य आभा के साथ यग्यवेदी के समीप अपना आसन ग्रहन करते हैं, जिनकी उपस्थिती मात्र से यग्य की
32:02सफलता सुनिश्चित लग रही थी
32:05पवित्र मंत्रों के उच्चारण के साथ लकडी के शुष्क टुकडों के घर्षन से यग्य की अग्नी प्रजवलित हुई, जिसकी लप्टें
32:13आकाश की ओर उठने लगी
32:16रिश्चिश्रिंग के गंभीर और लैबध मंत्रों चार से यग्यशाला का हर कोना गूंड उठा, मानो स्वयन देवता उन शब्दों में
32:24समाहित हो गए हो
32:26प्रत्येक आहुती के साथ सुगंधित धी और सामगरी अग्नी में अर्पित की जाती थी, जिससे उठने वाला धुआ पवित्रता और
32:35सम्रिध्धी का संचार कर रहा था
32:38महर्शी रिश्यश्रिंग ने देवताओं, गंधरवों और यक्षों को अपनी शक्ती से आहवान किया, ताकि वे यग्यमें उपस्थित होकर फल प्रदान
32:47करें
32:49महाराज दश्रत ने अपनी आखें बंद कर ली और एकागर मन से पुत्र प्राप्ती के लिए देवताओं से करुणा और
32:56आशिरवात की प्रार्थना की उनके चहरे पर गहरी आस्था झलक रही थी
33:02रानिया भी अपने हृदय में उमड रही आकांक्शाओं के साथ, शांत और पवित्र भाव से यग्य की अग्नी को निहारती
33:10हुई पुत्र कामना कर रही थी
33:13जैसे जैसे यग्य की वेदी में अग्नी प्रखर होती जा रही थी, वैसे वैसे संपूर्ण वातावर्ण में एक अग्रिश्य परंतु
33:21शक्तिशाली उर्जा का संचार होने लगा
33:25रिश्य श्रिंग गहरे ध्यान में लीन हो जाते हैं, उनके मुख से निकलने वाले मंत्र ब्रह्मांडिय ध्वनी के समान प्रतीत
33:32हो रहे थे, जो सीधे देवताओं तक पहुँच रहे थे
33:37आकाश में अध्भुत चमक दिखाई देने लगती है, और यग्य की अग्नी से दिव्य सुगंध का प्रसार होता है, जो
33:44देवताओं की स्वीकृती का संकेट था
33:48अचानक प्रज्वलित अग्नी से एक तेजस्वी पुरुष प्रकट होते हैं, जिनका शरीर अग्नी के समान कांतिमान था, हाथों में दिव्य
33:56खीर का पात्र लिये हुए
33:58उस तेजस्वी पुरुष ने महाराज दशरत को संबोधित करते हुए कहा कि यह खीर पुत्रों की प्राप्ती के लिए देवताओं
34:06द्वारा प्रदत दिव्य वर्दान है
34:10महाराज दशरत ने अत्यंत हर्ष और विस्मय के साथ उस दिव्य खीर के पात्र को ग्रहन किया, उनके आखों में
34:17कृतग्यता के आसु छलक आए
34:20दशरत ने प्रेम पूर्वक उस दिव्य खीर को अपनी तीनों रानियों में वित्रित किया, हर एक रानी के चहरे पर
34:27आशा की स्वर्णिम किरन चमक उठी
34:30इस अलोकिक घटना से अयोध्या नगरी में हर शोल लास की लेहर दोड़ गई, जहां हर हृदय में रामराज्य की
34:38स्थापना की नीव रखी जा चुकी थी
34:41महारानी कौसल्या ने अत्यंत श्रधापूर्वक उस दिव्य पायसम को ग्रहन किया, जिससे उनके संपूर्ण शरीर में अलोकिक उर्जा और परमशान्ती
34:51का प्रवाह होने लगा
34:53महारानी कैकेई ने भी भक्ती भाव से उस प्रसादी खीर का प्राशन किया, और उनके मुख मंडल पर स्वर्णिम दिव्य
35:00आभा चमकने लगी
35:03महारानी सुमित्रा ने दो भागों में मिले उस पवित्र पायसम को बड़े आदर से स्विकार किया, जिससे उनका स्वरूप द्विगुनित
35:11अलोकिक तेजोमय हो उठा
35:14तीनों रानियों के दिव्य खीर ग्रहन करते ही संपूर्ण यद्य मंडप में एक अध्भुत और तारों जैसा चमकता हुआ प्रकाश
35:21फैल गया
35:23महर्शी रिश्यश्रिन ने पवित्र स्रुवा उठा कर अंतिम आहुतियों के साथ पुत्र कामिष्टी यग्य की पूर्ण आहुती संपन्न की
35:32ब्रहमर्शी वशिष्ठ ने महराज दश्रत को आशिरवाद देते हुए यह उद्गोश किया कि शीधर ही धर्म की रक्षा हेतु चार
35:40प्रतापी पुत्र जन्म लेंगे
35:43महाराज दश्रत ने महर्शी रिश्यश्रिंग और गुरु वशिष्ठ के चर्णों में नत्मस्तक होकर उनका कोटी-कोटी धन्यवाद किया और ब्रहमनों
35:52को अपार दान दिया
35:54आकाश मार्ग में एकत्रित होकर भगवान ब्रहमा, भगवान शिव और देवराज इंद्र ने प्रसन्नचित होकर अयोध्या पर अपने आशिरवाद की
36:04द्रिश्टी डाली
36:06देव लोग के गंधर्व दिव्यवीना बजाने लगे और अपसराय नंदन्वन में निर्ट्य करते हुए प्रभुश्री हरी के भावी अवतार का
36:14स्वागत करने लगी
36:16स्वर्ग लोग से अयोध्या की पवित्र भूमी और यग्य मंडप पर सुवासित पारिजात पुष्पों की अनवरत वर्षा होने लगी
36:25यग्यकुंड की पावन अगनी धीरे-धीरे शांत होकर सुगंधित स्वर्णिन भस्म में परिवर्तित हो गई जिससे पूरा वातावर्ण महक उठा
36:35महाराज दश्रत वेद मंत्रों की गूंच के बीच अपनी तीनों तेजों में रानियों को आदर पूर्वक राजप्रासाद की ओर ले
36:43चले
36:44भव्य महल के कक्षों में पहुँच कर तीनों रानियों ने अपने भीतर एक अलोकिक स्पंदन और परम चेतना का अनुभव
36:52किया
36:53संपूर्ण अयोध्या नगरी में प्रजाने प्रत्येक द्वार, अटारी और गलियों को हजारों प्रजवलित दीपकों से सजाकर रात्री को भी प्रकाश
37:02मान कर दिया
37:04नगर के कोने-कोने में ढोलन गाडों की थाप, मधुर संगीत और भव्य उच्सवों के साथ आने वाले राजकुमारों के
37:12स्वागत की तैयारिया होने लगी
37:15जैसे-जैसे रात्री ढलने लगी, आकाश में ग्रहों और नक्षत्रों ने एक अत्यंत शुग और अलोकिक योग का निर्मान करना
37:23शुरू कर दिया
37:25राजप्रासाद के शिखरों पर एक नीलिमा युक्त दिव्य प्रकाश तैरने लगा, जो साक्षात जगन्नात श्री विश्नों की उपस्थिती का संकेट
37:34दे रहा था
37:36महाराज दश्रत अपने ज़रोखे से जगमगाती अयोध्या को देख कर कृतग्यतापूर्ण अशुरूं के साथ प्रभो की अनुकम्पा को नमन करने
37:44लगे
37:46तीनों रानिया दिव्य सुरक्षा के घेरे में विश्राम करने लगी, मानो पूरा ब्रहमांड अधर्म के विनाश और धर्म की पुनस्थापना
37:54की प्रतीक्षा कर रहा हो
37:57इस महान यज्य के सफल समापन के साथ ही प्रित्वी पर रामराज्य की अमर और कल्यानकारी अवधारना का बीजारोपन हो
38:05गया
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