00:00आपको एक बाद होता हूँ, आप हसते भी कैसे हो ये भीड़ने ते अगर रखा है, हमारी हसी भी ना
00:09प्राकृतिक है ना आत्मिक है, जानवरों की प्राकृतिक होती है, बुद्धों की आत्मिक होती है, हमारी हसी भी सामाजिक है
00:20बस, जानवर भी अपने चेहरे से सुख दु
00:26कुछ हो जानते हैं इस बात को
00:27अब उसका चेहरा देखके बता दोगे कि अभी
00:31परिशान है
00:32या प्रसंद है
00:35आप हस भी
00:36कैसे रहो न ये
00:38भी आपको भीड़ने सिखाया है
00:40कितने होट खुलने है
00:42दात कुल कितना दिखना है
00:44ये कितना यहां पर एंगल बनेगा
00:46ट्रैंगल का
00:49तो नहीं पता
00:50कुछ भी नहीं है अपना
00:55आत्मग्यान का यही
00:56मतलब होता आत्मग्यान माने भीतर
00:58से कोई कंख़ुरा निकालना नहीं होता
01:01यह ऐसे आख बंद करिये
01:03और पता चला भीतर ऐसे
01:04ऐसे
01:07अत्मग्यान का मतलब यही है कि मुस्कुराए तो मुस्कुराने में भी सब कितना फर्जी है दिख गया
01:15यह मेरी मुस्कुराहट भी पूरी फर्जी है
01:19इसलिए नहीं कि मैं जूट मुट मुस्कुरा रहा हूँ
01:24इसलिए कि मुस्कुराहट की परिभाशा भी मेरी भीड की है
01:29कुछ भी नहीं है पना
01:30जिन बातों के लिए जान देने को तयार हो
01:33वो बाते भी तुम्हें किसी ने अगर सिखाई पढ़ाई नहीं होती
01:37तो इतनी सी कदर करते उन बातों की बोलो
01:41आज जान देने को तयार हो