विष्णु पुराण के सीज़न 2 के 16वें एपिसोड में आपका स्वागत है! ✨ पिछली बार, देवताओं और असुरों ने अमृत मंथन के लिए गठबंधन किया था। अब, इस एपिसोड में, ब्रह्मांड के सबसे बड़े महासागर मंथन का आरंभ होता है! 🌊 मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकि नाग को रस्सी बनाकर, देवता और असुर मिलकर क्षीरसागर को मथना शुरू करते हैं। पर क्या होगा जब मथनी डूबने लगेगी? और इस मंथन से निकलने वाला पहला 'उपहार' क्या होगा? एक ऐसा विष जो पूरी सृष्टि को नष्ट करने की क्षमता रखता है - हलाहल! ☠️ क्या भगवान शिव इस भयानक विष से ब्रह्मांड को बचा पाएंगे? महादेव कैसे बनेंगे 'नीलकंठ'? और कौन-कौन से अद्भुत रत्न और देवियां प्रकट होंगी? इस रोमांचक और ब्रह्मांडीय गाथा को मिस न करें! #VishnuPurana #SamudraManthan #Halahal #NeelkanthMahadev #KurmaAvatar
Category
🦄
CreativityTranscript
00:00दुर्वासा रिशी के श्राप से अपना सारा वैभव गवा चुके विवश्ट देवगण ब्रहमांड के अस्तित्व को बचाने के लिए भगवान
00:07विश्णु के पास सहायता की गुहार लगाने पहुँचे।
00:11श्रीहरी के निर्देशानुसार देवराज इंद्र एक शांती प्रस्ताव लेकर असीम अन्मने भाव से असुरों की राजधानी की ओर बढ़े।
00:41का साहसिक प्रस्ताव रखा। शुक्राचार्य की गुप्ट सलाह पर विचार करते हुए राजा बली ने देवताओं के साथ इस अभूत
00:49पूर्व संधी को स्विकार कर लिया।
00:53तटपर एकत्र हुए देवताओं और असुरों के बीच हुए इस एतिहासिक समझोते ने पूरे ब्रहमांड में एक नई तरंग पैदा
01:01कर दी।
01:02शीर सागर के तटपर विशालकाय मंदराचल परवत को मतनी के रूप में उप्योग करने के लिए चुना गया।
01:10हजारों देवों और असुरों ने मिलकर अपनी पूरी शक्ती से मंदराचल परवत को उसकी जड़ों से उखाडने का सामुहिक प्रयास
01:18चुरू किया।
01:19अत्यधिक भार के कारण जब विशाल मंदराचल परवत नीचे गिरने लगा तब चारों और हाहाकार मच गया।
01:28संकट की इस विकट घड़ी में भगवान श्रीहरी विश्नु अपने अत्यंत मनमोहक और दिव्य रूप में प्रकट हुए।
01:35भगवान विश्नु ने मंदराचल परवत को अपने बाहुबल पर उठाकर सहज्ता से क्षीरसागर के मध्य स्थापित कर दिया।
01:45परंतु बिना किसी ठोस आधार के वह विशाल परवत क्षीरसागर की अगाध गहराईयों में तेजी से धंसने लगा।
01:53परवत को डूबने से बचाने के लिए भगवान विश्नु ने एक विशालकाय सुनहरे कूर्म अवतार का रूप धारण कर परवत
02:01को अपनी पीठ पर थाम लिया।
02:03मन्थन की रस्यों की आवश्शक्ता को पूरा करने के लिए देव और दानव नागलोक के राजा वासुकी के पास पहुँचे।
02:12नागराज वासुकी ने इस महान धर्मकार्य के लिए स्वय को मन्थन की दिव्यरसी के रूप में अर्पित करना सहर्ष स्विकार
02:20कर लिया।
02:22विशालकाए नागराज वासुकी ने मंदराचल परवत के चारों और अपने लंबे शरीर लपेट कर मन्थन का आधार तयार किया
02:31असुरों के अहंकार का लाब उठा कर भगवान विश्नु की चाल से असुरों को वासुकी का मुख और देवताओं को
02:38पूछ का भाग मिला
02:40वासुकी के मुख से निकलने वाली विशैली ज्वालाओं से बेखबर असुर सिर की तरफ और देवगण पूछ की तरफ अपनी
02:48पकड मजबूत करने लगे
02:51आकाशमार्ग में भगवान ब्रह्मा, महादेव और महर्शी नारद इस अग्भुत द्रिश्य को देखने के लिए उच्सुकता से एकत्र हो गए
02:59एक प्रचंड हुंकार के साथ देवों और असुरों ने तालबध तरीके से वासुकी को खीचना शुरू किया और समुद्र मन्थन
03:08का महासंग्राम आरंभ हो गया
03:11जैसे ही देवताओं और असुरों ने नाग्राज वासुकी को मतनी की रस्सी बना कर मंदर परवत को घुमाना प्रारंभ किया
03:19वैसे ही च्शीर सागर में एक प्रचंड हल्चल पैदा हो गई
03:24घर्शन और अत्यधिक दबाव के कारण नाग्राज वासुकी के मुख से ज्वाला जैसी जहरीली फुफकारे निकलने लगी
03:31जिसने असुरों के चहरों को जुलसा दिया
03:35वासुकी की पूँच की ओर खड़े देवराज इंद्र ने तुरंत मेगों को आग्या दी
03:40जिससे हुई शीतल वर्शाने देवताओं की थकान और संताप को हर लिया
03:46मंदराचल परवत की प्रचंड घूरनन गती से समुद्र तल की विशाल चट्टाने आपस में टकराने लगी
03:52और भयानक तरंगे उठकर आकाश को चूने लगी
03:57मंथन के भयानक वेग और कमपन से क्षीर सागर के दिव्य प्राणी तथा जलचर घबराकर इधर उधर भागने लगे
04:05नीचे किसी सुद्रिड आधार के न होने के कारण विशाल काय मंदर परवत के निचले भाग में गहरी दरारें पढ़ने
04:13लगी
04:14परवत अचानक एक और खतरनाक रूप से जुप गया जिससे मन्थन का गतिमान चक्र पूरी तरह से ठप हो गया
04:23देवताओं और दैतियों ने मिलकर परवत को संभालने का अथक प्रयास किया किन्तु परवत का असीन भार उनकी सन्युक्त शक्ती
04:31से भी भारी पढ़ा
04:33एक ब्रहमांडिय गडगड़ाहट के साथ मंदराचल परवत क्षीर सागर की अगाध गहराई में पूरी तरह से धंस गया
04:41परवत के डूपते ही क्षीर सागर में सुनामी जैसी विनाशकारी लहरें उठीन जिन्होंने तट पर खड़े सभी प्राणियों को भैभीत
04:50कर दिया
04:51मंदर परवत के भारी भार के साथ खिंचकर नागराज वासुकी भी गहरे जल में समाने लगे और वेदना से तडप
04:59उठे
05:01असुराज बली और उनके पराक्रमी योद्धा परवत को डूपता देख अत्यंत क्रोध और निराशा से चिलाने लगे
05:09देवराज इंद्र और अन्य देवता असहाय होकर उस विशाल भंवर को घूरने लगे जहां परवत क्षण भर पहले खड़ा था
05:18ब्रहम लोक में विराजमान पितामह ब्रहमा और महर्शी नारद इस महान संकट को देखकर अत्यंत चिंतित हो उठे
05:27अमरत प्राप्ती का परम लक्षे चूर-चूर होता देख असुरों का धैर्य तूट गया और वे देवताओं पर छल का
05:34संदेह करने लगे
05:36संपूर्ण क्षीवसागर में एक भयावह सननाटा चा गया और समुद्र मन्थन का महान कार्य असफलता के कगार पर पहुँच गया
05:45संकट की इस घड़ी में देवराज इंद्रने हाथ जोड कर अपनी आखे मूंदली और भगवान विश्नु का ध्यान करके रक्षा
05:53की गुहार लगाई
05:56देवताओं और असुरों ने अपने परस्पर मतभेद भूल कर एक साथ परंपिता श्री हरी से इस संकट को दूर करने
06:03की प्रार्थना की
06:05तभीक शीरसागर की अगाध गहराईयों से एक अलौकिक नीली और स्वर्णिन दिव्यकांती प्रस्फुटित होने लगी
06:14जगतपालत भगवान श्री हरी विश्णू ने अपने भक्तों की करुन पुकार सुनकर मंदराचल को धारन करने के लिए कूर्मावतार लेने
06:22का निश्चय किया
06:24मंदराचल परवत जो ब्रहमांड का आधार बन चुका था अब अथा सागर में तेजी से धंसने लगा जिससे मन्थन की
06:32पूरी प्रक्रिया चर्मरा उठी
06:35देवों और असुरों के चहरों पर भैस पश्ट जलक रहा था क्योंकि उन्हें लगा कि उनके अथक प्रयासों का अंत
06:42विनाशकारी आपदा में होने वाला है
06:46हलाहल विश्की काली लहरें और अधिक उग्र होकर उठने लगी जो ब्रहमांड के हर जीव को अपने भयावा आगोश में
06:54लेने को आतुर थी
06:57सुदूर वैकुंठ में विराजमान भगवान विश्नु को ब्रहमांड के इस गंभीर संकट का ततकाल आभास हुआ जहां संतुलन भंग होने
07:05लगा था
07:07ब्रहमांड को बचाने की अपनी अटूट प्रतिग्या को याद करते हुए उन्होंने अपनी शांत आखों में अदमे संकल्प और ग्रिडता
07:15धारण की
07:17मंदराचल परवत के नीचे से उठती ब्रहमांडिये चीख को सुनकर भगवान विश्नु ने तुरंक अपनी दिव्य शक्ती को ब्रहमांड के
07:25केंद्र की ओर प्रवाहित किया
07:28उनकी आखें ब्रहमांडी शक्ती से चमक उठीन मानों वे अपनी दिव्य द्रिश्टी से पूरे ब्रहमांड को अपने भीतर समा रहे
07:36हूँ
07:38ब्रहमांड को बचाने के लिए उनकी इच्छा शक्ती ने स्वय को एक विशाल और अटल रूप में प्रकट करना शुरू
07:45कर दिया
07:46धीरे धीरे उनकी दिव्यकाया विशालकाय कूर्म कच्छुए का रूप लेने लगी जो परवत से भी अधिक विशाल और स्थिर था
07:56उनका विशालकाय कवच सागर की गहराईयों को भेदते हुए स्वय एक नया आधार बन गया जिससे सभी देव और असुर
08:04विस्मय से भर उठे
08:07सागर की गहराईयों से एक अविश्वस्निय दिव्य प्रकाश पुंज उभरा जो कूर्मावतार के पूर्ण रूप का अनावरण कर रहा था
08:16भगवान विश्नु अपने कूर्मावतार में धीरे धीरे उस स्थान की ओर बढ़े जहां मंदराचल परवत अनिश्चित रूप से डूब रहा
08:25था
08:26मंदराचल परवत जो अब तक सागर की गहराई में धंस रहा था अब कूर्म की विशाल पीठ पर टिका जैसे
08:33वह एक नए ब्रहमाण्डिय आधार पर आ गया हो
08:37अपनी अनंत शक्ती से कूर्म ने मंदराचल परवत को अपनी द्रिड पीठ पर सहारा दिया जिससे पूरा ब्रहमाण्ड स्थिर हो
08:45गया
08:47परवत के स्थिरी करण से महासागर की प्रचंड लहरें शान्थ हो गई और हलाहल विश्का उगर प्रवाह भी धीमा पड़ने
08:54लगा
08:56देवों और असुरों ने राहत की गहरी सांस ली उनकी आखों में भय की जगह अब कृतग्यता और विस्मय का
09:03भाव था
09:05मंदराचल परवत के स्थिर होते ही देवों और असुरों ने नए उच्साह और अदमय शक्ती के साथ मन्थन फिर से
09:12आरंभ किया
09:14ब्रहमांड की शांती बहाल हुई और स्रिष्टी का चक्र जो रुकने को था अब अपनी निर्धारित गती से आगे बढ़ने
09:22लगा
09:24कूर्मावतार ब्रहमांड के आधार स्तंभ के रूप में सागर की गहराईयों में चुपचाप विराजमान था जो हर पल संतुलन बनाए
09:32हुए था
09:32इस प्रकार भगवान विश्णू ने अपने कूर्मावतार से न केवल मंदराचल को सहारा दिया बलकी संपून स्रिष्टी को एक बड़ी
09:42आपदा से बचा लिया
09:45कूर्मावतार भगवान विश्णू के विशाल और अटल आधार पर टिके मंदराचल परवत को देखकर देवताओं और असुरों के हृदय में
09:53एक नई आशा का संचार हुआ
09:56नव उर्जा से लबरेज होकर उन्होंने वासुकी नाग को पुना मतनी के रूप में ठाम लिया
10:02मानो ब्रहमांड की दो धृविय शक्तिया एक साथ आ गई हो
10:07वासुकी के शरीर को खीचते ही मंदराचल परवत भीशन गर्जना के साथ घूमना आरंभ कर गया
10:14जैसे कोई आदिम चक्र घूम रहा हो
10:18समुद्र ने एक भयावः गर्जना के साथ प्रतिक्रिया दी उसकी सतह पर उठती विशालकाई लहरें स्वर्ग और पाताल तक पहुँचती
10:27प्रतीत हो रही थी
10:29मंधन की असहनिय शक्ती से भयभीत होकर समुद्र की गहराईयों से अंगिनत विचित्र और विशालकाई जी वूपर की ओर उचल
10:37पड़े जो सदियों से अग्यात थे
10:41मंदराचल और वासुकी के मंधन की भीशन ध्वनी पूरे ब्रहमांड में गूंज उठी नक्षत्रों और ग्रहों को भी अपनी धुरी
10:49पर कमपकम पाती हुई
10:51जैसे जैसे मंधन तेज होता गया समुद्र का जल अपनी प्राकृतिक नीली माखोकर एक अपवित्र मटमैले रंग में बदलने लगा
11:00जो आसन्न खत्रे का संकेत था
11:04आकाश में काले भयावा बादल मंडराने लगे सूर्य का प्रकाश धुंधला पड़ गया और एक दरावनी खामोशी ने मन्थन की
11:12ध्वनी को भी निगल लिया
11:15और फिर एक भयानक फुफकार के साथ समुद्र की सबसे गहरी और काली खाई से हलाहल विश्का धुआ उठना शुरू
11:23हुआ जो अपने मार्ग में सब कुछ जलाता हुआ उपर आ रहा था
11:28उस विशाक्त धुए ने तुरंत वातावर्ण को निगल लिया जिससे देवता और असुर दोनों ही भय से काप उठे उनकी
11:36त्वचा जुलसने लगी और श्वास लेना दूभर हो गया
11:40हलाहल विश की लपतें तीनों लोकों को भस्म करने की धमकी दे रही थी, स्वर्ग, पृत्वी और पाताल सभी इस
11:48महाविनाश के आगे असहाय प्रतीत हुए
11:51भय भीत देवताओं ने भगवान विश्णू की ओर देखा, उनके शांत और दिव्य मुख मंडल पर भी इस अप्रत्याशित संकट
11:59की चिंता की हलकी छाया थी
12:02भगवान विश्णू ने अपनी चिरपरिचित शांती से देवताओं को निर्देश दिया कि इस विनाशकारी विश्च को केवल भगवान शिव ही
12:11धारण कर सकते हैं
12:12जब ब्रहमांड हलाहल की अगणी में जल रहा था तब भी कैलाश परवत अपनी शाश्वत शांती में मगन था
12:21हिंसे धकी चोटिया ब्रहमांडिय अशांती से अचुती थी
12:26व्याकुल देवता अपनी दिव्य आभाक होते हुए भैभीत होकर कैलाश की ओर भागे महादेव की शरण लेने को आतुर
12:35ध्यानमग्न भगवान शिव त्रिशूल धारण किये अपने दिव्य आभासे कैलाश को प्रकाशित करते हुए देवताओं के आहवान को सुन रहे
12:44थे
12:45देवी पारवती उनकी अनन्त शक्ती और प्रेम की प्रतीक शांत भाव से भगवान शिव के समीप बैठी थी उनकी आखों
12:54में असीन करुणा थी
12:56करुणा से भरकर महादेव ने उस महाविनाशकारी विश हलाहल को अपनी हथेलियों में समेटा जैसे कोई नगण्य वस्तु हो और
13:06उसे पी गए
13:08जैसे ही विश उनके कंठ में पहुचा देवी पार्वती ने अपने दिव्यस पर्ष से उसे वहीं रोक दिया जिससे उनका
13:15गला नीला हो गया और वे नीकंठ महादेव कहलाए
13:20ब्रहमांड ने राहत की सांस ली और देवता तथा असुर महादेव के इस परमत्याग को नमन करते हुए एक बार
13:28फिर नए उत्साह से समुद्र मन्थन में जुट गए
13:31शीर सागर के भयंकर मन्थन से उठी प्रचंड तरंगों के बीच अचानक समुद्र की अगाद गहरायों में एक भयानक कमपन
13:40उत्पन होने लगा
13:42मंदराचल परवत की तीवर रगड और नागराज वासुकी के श्वास की अगनी से महासागर का जल भीशन रूप से उबलने
13:50लगा
13:52शन भर में सम्पून ब्रहमांड का कोलाहल थम गया और समुद्र के गर्ब से गहरे नीले काले रंग के जहरीले
13:59बुलबुले सतह पर आने लगे
14:02उस विशाक्त महासागर के भीतर से हलाहल विश का प्रचंड धुआ गुबार बनकर आकाश की ओर उठने लगा
14:10फिर समुद्र को चीरते हुए महाविनाशकारी हलाहल विश एक विक्राल दमकते हुए अगनिपुँच के रूप में बाहर प्रकट हुआ
14:19विश के उस अत्यंत तीवर और जहरीले धुए ने कुछ ही क्षणों में सूर्य और नक्षत्रों का प्रकाश पूरी तरह
14:26से ढख दिया
14:28हलाहल विश से निकलने वाली असहनिय गंध और तीक्षन गर्मी ने तीनों लोकों की वायु को जहरीला बना दिया
14:36भयानक विश की तीवर ज्वालाओं से दैतियों के शरीर जलने लगे और वे चीतकार करते हुए पीछे हटने लगे
14:45देवगण भी उस महाविनाशकारी विश के प्रभाव से मूर्चित होकर समुद्र तट पर गिरने लगे
14:52समुद्र के समस्ट जल्चर और नागराज वासु की इस अत्यंत विशैली ज्वाला में तडपने लगे
14:59हलाहल की ज्वालाए अब चौधा भुवनों को भस्न करने के लिए दसों दिशाओं में फैलने लगी
15:06इस महाविनाश को देखकर दिती और अदिती के पुत्रों के बीच का शत्रुतापून अभिमान पूरी तरह नश्ट हो गया
15:15मन्थन रोक कर सभी देव और दानव अपनी रक्षा के लिए उच्चिस्वर में त्राहिमाम त्राहिमाम पुकारने लगे
15:23देवराज इंद्र ने व्याकुल होकर स्विकार किया कि इस महाविश को रोकने में ब्रहमाण की कोई भी शक्ती समर्थ नहीं
15:31है
15:32ब्रहम लोक में विराजमान भगवान ब्रहमा ने भी स्विकार किया कि इस प्रल्यंकारी विश्का सहार केवल देवों के देव महादेव
15:41ही कर सकते हैं
15:43तब सर्वव्यापी भगवान विश्नु अपने परम तेजस्वी रूप में प्रकट हुए और उन्होंने सबको केवल भगवान शिव की शरण में
15:51जाने का मार्ग बताया
15:54समस्थ देव और दानव अपनी पुरानी शत्रुता भूलकर भगवान शिव का आहवान करते हुए हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगे
16:03कैलाश परवत की हिमच्छादित चोटियों पर योग निग्रा में लीन देवों के देव महादेव ने अपनी ध्यानमुद्रा समाप्त की
16:12माता पारवती ने अत्यंत चिंता और अपार करुणा से भरकर भगवान शिव की ओर देखा
16:19ब्रहमांड की रक्षा का द्रिड संकल्प लेकर भगवान शिव अपने त्रिशूल के साथ संहारक विश को शांत करने के लिए
16:26प्रस्थान करने लगे
16:29समुद्र मन्थन की गहराईयों से एक भयंकर निले काले धूमर की भाती हलाहल विश का प्रचंड ज्वाला फट पड़ा जिसने
16:37ब्रहमांड को एक पल में अपनी विनाशकारी आगोश में ले लिया
16:42यह प्रल्यंकारी विश्टीनों लोकों में तेजी से फैलने लगा आकाश को गहरा काला करते हुए जहां से भी यह गुजरा
16:50वहां जीवन का हर अंशक्षन भर में मुर्जाने लगा
16:54उसकी तीवर अगनी से देवलोक, पृत्वी लोक और पाताल लोक धधक उठे और सरवत्र जीवजन्तु, पेड़ पौधे और परवत पिघलने
17:03लगे, मानो समस्त स्रिष्टी एक भयंकर भट्टी में जल रही हो
17:09देवताओं के दिव्य शरीर भी इस असहनिय ताप से जुलसने लगे, उनके स्वर्णिन वस्त्र जलने लगे और उनके मुखमंडल पर
17:17चिंता और भय की गहरी रेखाएं उभराई
17:21असुरों के बलशाली देभी इस विश की अगनी से तडपने लगे, उनके विशाल अस्त्रशस्त्र पिघलने लगे, और उनकी गर्जनाय दर्दनाक
17:30चीखों में बदल गई
17:33रिशिमुनियों के पवित्र आश्रम भी इस विश से अचूते न रहे, उनकी तपस्या भंग हो गई और वे स्वयन पीडा
17:40से कराहते हुए त्राहिमाम करने लगे
17:43वन्यजीव, पक्षी और जल्चर सभी इस भयंकर विश के प्रभाव से व्याकुल होकर अपने प्राण त्यागने लगे, जिससे समस्त प्रकृती
17:52में एक भयानक सन्नाटा चा गया
17:55विश की तीवर ज्वाला इतनी प्रखर थी कि सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश भी मन्द पड़ गया और ब्रहमांड एक
18:03घोर अंधकार और आग के गोले में परिवर्तित होने लगा
18:08भगवान विश्नु अपने वैकुंठ धाम में शेशनाग पर विराजमान इस सर्वनाशकारी द्रिश को अत्यंत चिन्ता और गंभीरता से देख रहे
18:17थे क्योंकि कोई और उपाय शेश नहीं बचा था
18:21ब्रहमा जी भी अपने ब्रहम लोग से इस विनाश को देखकर अत्यंत विचलित हो उठे और उनके चारों मुखों पर
18:29भय और असहायता के भाव स्पष्ट दिखाई दे रहे थे
18:33देव और असुर जोक्षन भर पहले एक दूसरे के शत्रु थे अब एक समान पीड़ा और मृत्यु के भय से
18:41त्रस्थ होकर इस भयानक विश से मुक्ती पाने के लिए बिलख रहे थे
18:46वायुमंडल में प्राणियों की चीतकारे गूंज रही थी जो एक ही नाम पुकार रही थी शिव शिव शिव क्योंकि अब
18:55केवल वही इस महाविनाश को रोक सकते थे
18:59अपसराय और गंधर्व जो अपने सौंदर्य और संगीत के लिए प्रसिद्ध थे अब अपने दिव्य लोकों में भी विश के
19:07प्रभाव से व्याकुल होकर मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे थे
19:11समस्थ स्रिष्टी पर हाहाकार मच गया हर ओर भय और अंधकार का सामराज्य था और जीवन का हरकन अपने अंध
19:19की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा था
19:23देवराज इंद्र ने अपनी समस्थ शक्तिक हो चुके देवताओं और रिशियों के साथ मिलकर इस भयानक संकट से मुक्ती पाने
19:31के लिए महादेव शिव की शरण में जाने का निरनय लिया
19:35असुर भी अपने अहंकार को त्याग कर अपने राजा बली के नेत्रित्व में देवताओं के साथ शिव के पास जाने
19:43के लिए विवश हुए क्योंकि उनके लिए भी कोई आशाशेश नहीं थी
19:48देव असुर, रिशी और समस्त प्राणी एक विशाल जुलूस के रूप में विनाशकारी विश से जुलस्ते हुए शरीर और विचलित
19:56मन के साथ कैलाश परवत की ओर चल पड़े
20:00कैलाश परवत अपनी शाश्वत शान्ती और बर्फ से ढकी चोटियों के साथ इस भयावा प्रलय से पूर्णता अचूता और अविचल
20:09खड़ा था, मानो एक शान्त ग्वीफो विनाश के सागर में
20:14वहां कैलाश की परमशान्ती में भगवान शिव गेहन समाधी में लीन थे, उनके चहरे पर असीम शान्ती और दिव्य आभा
20:23थी, जो बाहरी संसार के कोलाहल से अन्भिग्य थी
20:27परंतु देवी पार्वती, अपने दिव्य ज्यान से इस महा संकट को भामपते हुए, बढ़ती हुई भीड और उनके कश्टों को
20:35देखकर चिंतित हो उठीन और महादेव को जगाने का विचार किया
20:40समुद्र मन्थन से उत्पन हलाहल विश ने अपनी प्रचंट ज्वाला से तीनों लोकों को भस्म करना आरंभ कर दिया, जिससे
20:48समस्त देव और असुर्त राहिमामकर उठे और सृष्टी का अस्तित्व खत्रे में पढ़ गया
20:55कैलाश के हिमशिखर पर भगवान शिव गहन ध्यान में लीन थे, उनके चारों और एक अलोकिक शांती का आवर्ण छाया
21:03हुआ था, जो ब्रहमांड के भीशन कष्टों से अन्भिग्य प्रतीत हो रहा था
21:08सहसा, सृष्टी के हृदय से उम्डा पीडा का चीतकार शिव के अंतर्मन तक पहुँच गया, उनके ध्यान की गहराई को
21:16चीरता हुआ, एक तीवर कंपन्न के रूप में उन्हें जगाते हुए
21:22हलाहल की बढ़ती विनाशलीला ने देवों और असुरों को एक ही बिंदु पर ला खड़ा किया, जहां उनके सारे बल
21:29और अहंकार चूर्चूर हो गए थे, और वे मृत्यू के मुख में असहाय खड़े थे
21:35संकट की इस घड़ी में भगवान विश्णू ने अपनी शांत और प्रज्यावान द्रिष्टी से समस्थ परिस्थितियों का आतलन किया और
21:43देवों को महादेव शिव की शरण में जाने का मार्क दर्शन दिया
21:48स्रिष्टी के पालक भगवान ब्रह्मा ने देवों और असुरों के साथ मिलकर परमपिता शिव का आहवान किया अपनी भुजाए जोड़कर
21:56प्रार्थना में लीन उनके मुख से वेद मंत्रों का उच्चारण हो रहा था
22:02समस्थ स्रिष्टी का सामुहिक आहवान, निराशा और आशा का मिश्रण लिए एक तीवर प्रकाश पुन्च के रूप में कैलाश की
22:10ओर बढ़ा जो महादेव की अगाध चेतना को जखचोरने लगा
22:15प्रार्थनाओं की ध्वनी और स्रिष्टी की पीड़ा से द्रवित होकर भगवान शिव ने अपनी योगनिद्रा तोड़ी और अपनी तीसरी आख
22:23के साथ कमलवत नेत्र खोले, जिससे ब्रहमांड में एक नई उर्जा का संचार हुआ
22:30जैसे ही शिव ने अपनी आखें खोली, वेक्षन भर में कैलाश से अद्रिष्य होकर प्राहिमाम करते हुए देवों और असुरों
22:38के समक्ष प्रकट हुए, जहां हलाहल का क्रोध अपनी चरम सीमा पर था
22:44महादेव के दिव्यदर्शन से देव और असुर दोनों ही अचम्भित और भाव विभोर हो उठे, उनके हृद्यों में ततकाल आशा
22:52की एक नई किरन जग्मगा उठी, मानों अंधकार में प्रकाश का उदे हुआ हो
22:58हलाहल विश्प अपने क्रूर्तम रूप में ब्रहमांडिय संतुलन को भंकरता हुआ, ज्वलंत धुए और भीशन लप्टों के साथ अपनी विनाशकारी
23:07शक्ती का प्रदर्शन कर रहा था, हर प्राणी को थर्राते हुए
23:13महादेव ने अपनी शांत, नीली आखों से हलाहल की विनाशलीला को देखा, और उनके हृदय में समस्त प्राणियों के लिए
23:20असीन करूना उमडपड़ी, उनकी पीडा ने शिव को द्रवित कर दिया
23:26बिना किसी संकोच के, शिव ने ब्रहमांड को बचाने के लिए उस घातक विश्का पान करने का अटल निर्ने लिया,
23:33एक ऐसा त्याग जो उनके स्वयं के लिए भी अत्यंत घातक सिध्ध हो सकता था
23:40संकल्पित होकर, महादेव शिव ने अपना दिव्याहात उस घातक हलाहल विश्की ओर बढ़ाया, जैसे कोई पिता अपने बच्चे को बचाने
23:48के लिए स्वयं को संकट में डाल रहा हो
23:52अविश्वसनिय गती से शिव ने समस्थ ब्रहमांडिय विश्को अपने एक ही हथेली में समेट लिया, जिससे उसकी प्रचंड उर्जा एक
24:01छोटे से नीले गोले में संधनित हो गई
24:04पलक जपकते ही, महादेव ने उस भयंकर विश्व को अपने कंठ में धारन कर लिया, एक ऐसा कृत्य जिसने समस्थ
24:12स्रिष्टी को विनाश से बचा लिया
24:15विश्व की प्रचंड उर्जा ने महादेव के कंठ को नीला कर दिया, परंतुमा पार्वती की शक्ती से वह वहीं रुप
24:22गया, जिससे शिव नील कंठ कहलाए और स्रिष्टी का उद्धार हुआ
24:27जैसे ही विश्शिव के कंठ में समाया, ब्रहमांड ने राहत की एक लंबी सांस ली, हलाहल की ज्वाला शांत हुई
24:35और जीवन की हरीभरी आभा पुनह लोट आई
24:39नीले कंठ वाले महादेव, स्रिष्टी के इस अध्वितिय रक्षक ने अपनी अटल शांती और दिव्य महिमा के साथ खड़े होकर
24:47स्वयंको ब्रहमांड के लिए समर्पित कर दिया
24:51कृतज्यता से भरे देवों और असुरों ने एक स्वर में महादेव की जैजैकार की, उनके सामने नत्मस्तक होकर इस अविस्मनिय
25:00त्याग के लिए कोटि-कोटि प्रणाम अर्पित किये
25:03जब हलाहल विष्की प्रचंड ज्वालाओं ने तीनों लोकों को भस्म करना शुरू किया, तब सम्पून ब्रहमांड में हाहाकार मच गया
25:13समस्त देव और दानव इस विनाशकारी संकट से रक्षा पाने के लिए कैलाश परवत की ओर दोड़े और महादेव से
25:20प्रार्थना करने लगे
25:23स्रिष्टी के कल्यान और सुरक्षा के लिए करुना के सागर भगवान शिव ने स्वय उस प्रांधा तक हलाहल विश को
25:30ग्रहन करने का निर्ने लिया
25:33महादेव ने विश से भरे उस दिव्य पात्र को हाथ में उठाया जिसकी उग्र गर्जना से संपून अंतरिक्ष कांप रहा
25:40था
25:42देवी पार्वती ने अपने स्वामी के इस अपार त्याग को देखा और अत्यंत भक्ती व चिंता के साथ उनके निकट
25:49आई
25:51जैसे ही शिव जी ने उस विनाशकारी विश को अपने होठों से लगाया, पूरा ब्रहमान सांस रोक कर उस द्रिश
25:58को देखने लगा
26:00भगवान शिव ने क्शन भर में पूरे हलाहल विश का पान कर लिया, जिससे उग्र विश की ज्वालाएं उनके शरीर
26:07में फैलने लगी
26:09स्रिश्टी को विश के विनाशकारी प्रभाव से बचाने के लिए देवी पार्वती ने तुरंत आगे बढ़कर शिव जी के कंठ
26:16को स्पर्ष किया
26:19मापार्वती के पावन स्पर्ष और दिव्य शक्ती के कारण विश महादेव के पेट तक नहीं पहुँच सका और गले में
26:26ही रुप गया
26:27विश की अत्यधिक उश्मा और दाह से भगवान शिव का कंठ धीरे-धीरे एक अलोकिक नीले रंग में बदलने लगा
26:36विश के प्रचेंड ताप को शांत करने के लिए शिव जी के गले में लिप्टे नागों ने अपनी विशैली सांसों
26:43से शितलता प्रदान करने का प्रयास किया
26:46महादेव के मस्तक पर स्थित चंद्रमा और गंदाजी की शीतल धाराएं विश की तीवरत अपन को नियंत्रित करने लगी
26:54विश के प्रभाव से मुक्थ होकर ब्रहमाण के सभी प्राणी और तीन लोग पुनह जीवन और शांती का अनुभव करने
27:02लगे
27:04भगवान विश्णु और ब्रहमाजी ने महादेव के इस महान त्याग की सराहना करते हुए उनकी स्तुती में हाथ जोड लिए
27:12देवी पारवती का अगाध प्रेम और शक्ती ही वह आधार बनी जिसने उस विनाशकारी विश को शिव जी के गले
27:20में सुरक्षित बांधे रखा
27:23समस्ट आकाश मंडल में अंधकार छंट गया और सूर्य की दिव्यकिर्णों ने पुनह तीनों लोकों को प्रकाशित कर दिया
27:31गले में चमकते मीले रंग के विश के कारण भगवान शिव को नीलकंठ का अमर नाम प्राप्थ हुआ
27:38देवताओं और रिशियों ने नीलकंठ महादेव पर फूलों की वर्शा की और हर हर महादेव के जैगोश से दिशाएं गूझ
27:46उठी है
27:46इस प्रकार हलाहल विश का पान करके महादेव ने स्वयकष्ट सहकर पूरे ब्रहमान को महाविनाश से बचा लिया
27:56समुद्र मन्थन का सबसे बड़ा संकट तल गया और अब देवता तथा असुर अम्रित की प्राप्ती के लिए पुना मन्थन
28:04की ओर बढ़े
28:06हलाहल विश की काली चाया तलने के बाद देवताओं और असुरों के चहरों पर अंतह एक गहरी शान्ती लोट आई
28:13मानो स्रिष्टी ने स्वयं एक भयानक परीक्षा से सास ली हो
28:19महादेव के नीलकंठ रूप ने भले ही संकट ताल दिया था किन्तु अभी भी क्षीर सागर के गहन गर्भ में
28:26छिपे अमूल्य रत्न और अम्रित की खोज अधूरी थी
28:30एक बार फिर देवताओं और असुरों ने अपनी समूची शक्ती समेट कर मंदराचल परवत को मतना आरंभ किया उनकी भुजाओं
28:39में ब्रह्मांड की उर्जा का संचार हो रहा था
28:42और फिर सागर की गहराईयों से एक मंद प्रकाश उभरने लगा जो धीरे धीरे आकार लेने लगा जैसे कोई दिव्यस्वपन
28:51साकार हो रहा हो
28:53शन भर में उस प्रकाश से एक श्वेतवर्नी सौमय गाय प्रकट हुई जिसके नेत्रों में करुणा और शक्ती का अध्भुत
29:01संगम था यह थी इच्छापूर्ती कामधेनु
29:05देवताओं ने कामधेनु का स्वागत ऐसे किया मानुस्वयन स्वर्ग ने धर्ती पर अवतार लिया हो उनके मुख पर असीम संतोष
29:14और श्रधा के भाव थे
29:16कामधेनु समस्ट इच्छाओं की दाता अपने दिवय तेज से परिपून होकर देवों को आशिर्वाद देती हुई स्वर्गलोग की ओर प्रस्थान
29:25कर गई
29:27समुद्र मन्थन का वेग पुनह तीवर हुआ और अब सागर के अंदर से एक अश्व की हिनहिनाहट गूंजने लगी जो
29:34ब्रहमांड की वायू को चीर्ती हुई आ रही थी
29:38फिर प्रकट हुआ उच्चाहश्रवा साथ सिरों वाला दिव्य घोडा जिसकी गती वायू से भी तेज और सौंदर्य इंद्रधनुष से भी
29:47अधिक मनमोहक था
29:49देवताओं और असुरों दोनों ने उच्चाहश्रवा की अध्वितिय सुन्दर्ता और शक्ती पर मुग्ध होकर उसे प्राप्त करने की इच्छा से
29:57अपनी द्रिष्टी केंद्रित की
30:00किन्तु इंद्र अपनी दिव्य आभा से चमकते हुए उस अध्वितिय अश्व को अपने अधिकार में लेने के लिए ततकाल आगे
30:08बढ़े
30:10उच्चै श्रवा सहच्ता से इंद्र की आध्या मान कर उनके रत का दिव्य अश्व बन गया मानो वह इसी नेती
30:17के लिए प्रतीक्षा कर रहा था
30:20अभी समुद्र मन्थन रुका नहीं था और अब एक और विशालकाय शुभरकाय जीव सागर की गहराईयों से धीरे धीरे उपर
30:28की ओर उठने लगा
30:30और फिर प्रकट हुआ एरावत शुभरवर्ण का आठ दान्तों वाला गजराज जो इंद्र का प्रियवाहन बनने वाला था
30:39इंद्रदेव अपनी विशालकाय सवारी को पहचान कर प्रसंता से भरकर एरावत की ओर बढ़े मानो युगों से बिछडा मित्र मिल
30:47गया हो
30:49एरावत सहच्ता से इंद्र की सवारी बन गया और उन्हें अपने विशाल पीठ पर बिठा कर आकाश गंगा में अपने
30:57स्वामी के साथ विचर्ण करने लगा
31:00सागर मन्थन अपने चरम पर था और अब देवता तथा असुर एक ऐसे रत्न की प्रतीक्षा कर रहे थे जो
31:07तीनों लोकों में अपनी चमक बिखेरे
31:11अचानक सागर की गहराईयों से एक अभूत पूर्व प्रकाश पुंच फूट पड़ा जिसकी चमक सहस्त्र सूरियों को भी फीका कर
31:19रही थी
31:19यह थी कौस्तुभ मनी ब्रह्मांड की सबसे दिव्य और बहुमूल्य रत्न जो अपनी अलोकिक आभासे समस्त दिशाओं को प्रकाशित कर
31:29रही थी
31:30इस दिव्य रत्न को धारण करने का अधिकार केवल भगवान विश्नु को था जो स्वयन स्रिष्टी के पालक और सनरक्षक
31:38थे
31:39भगवान विश्नु ने कौस्तुभ मनी को अपने वक्ष स्थल पर धारण किया जिससे उनकी दिव्य आभा और भी कई गुना
31:47बढ़ गई जो संपूर्ण ब्रह्मांड को आलोकित कर रही थी
31:52शीर सागर के तीवर मन्थन के मध्य अचानक सागर के उद्वेलित वक्ष से एक अलोकिक सुगंधित प्रकाश प्रस्फुटित होने लगा
32:01जल की उत्तुम तरंगों को चीरते हुए स्वर्ग का अमर पारिजात व्रिक्ष प्रकट हुआ जिसके दिव्य स्वर्ण पुष्पो से दिशाएं
32:09महक उठी
32:11पारिजात व्रिक्ष की असीम सुन्दर्ता और दिव्य प्रभा को देख कर देवता और असुर दोनों ही आश्चर यचकित होकर स्तब्ध
32:19रह गए
32:20इस अलोकिक व्रिक्ष की दिव्य सुगंध ने पूरे ब्रहमांड की ठकावट को मिटा कर देवलोक में अक्षय शान्ती और आनंद
32:28का संचार कर दिया
32:30देवराज इंद्र और समस्त देवताओं ने हाथ जोड़ कर इस कल्पवरिक्ष समान पारिजात को स्वर्ग में स्थापित करने की अभिलाशा
32:38व्यक्त की
32:40इसके पश्चात सागर की उठती लहरों के बीच से अत्यंत सुन्दर और लावण्य में देवांगनाय तथा अपसराएं प्रकट होने लगी
32:49रंभा, मेनका और तिलोत्तमा जैसी अपसराओं ने क्शीर सागर के जल पर अपने अलोकिक नरीती से समूचे चराचर को सम्मोहित
32:58कर लिया
33:00अपसराओं के अनुपम सौन्दर्य और लावण्य को देख कर असुर और देवताक्षन भर के लिए मन्थन का श्रम भूल कर
33:07मुगध हो गए
33:09ततपश्चाप क्शीर सागर का जल सहसा एक स्वर्णमई कांती से जगमगा उठा और चारों दिशाओं में अलोकिक शंखनात गूंजने लगा
33:19समुद्र के मध्य विशालकाय शत्दल कमल का दिव्यपुष्प प्रकट हुआ जिसकी पंखुडियों से असीम प्रकाश की किरने फूट रही थी
33:28उसी विशाल स्वर्ण कमल के आसन पर विराज मान होकर धन, समरिध्धी और सौंदर्य की साक्षात देवी महालक्ष्मी प्रकट हुई
33:38देवी लक्ष्मी की दिव्यप्रभा और अलौकिक मुस्कान ने अंधकार्मय ब्रह्मांड को पुनह ऐश्वर्य और कांती से परिपूर्ण कर दिया
33:46चारों दिशाओं के दिगज हाथियों ने अपने स्वर्ण कल्शों से पवित्र गंगाजल की धाराएं बहाकर देवी लक्ष्मी का जलाभिशेक किया
33:57श्रीहरी विश्णु ने अपने कमल नैनों से जगजन्नी महालक्ष्मी की ओर परम प्रेम और शांती भाव से निहारा
34:05देवी लक्ष्मी ने सर्वगुन संपन्न भगवान विश्णु को अपने पती रूप में स्विकार करते हुए उनके गले में वैजन्ती माला
34:13पहनाई
34:26लक्ष्मी के तेजोमय रूप को देखा, किन्तु लक्ष्मी जी की क्रिपा केवल धर्म और सत्य के पक्ष्मे स्थिर रही
34:34देवी महालक्ष्मी ने अपने अभाय और वरध हस्त से समस्त लोकों को सुख, समरिध्धी और अमर ऐश्वर्य का आशिरवात प्रदान
34:42किया
34:43भग्वान श्रीहरी विश्णू और महालक्ष्मी की युगल जोडी ने क्षीर सागर के तटपर संपून ब्रहमांड को अपने दिव्यतेज से आपलावित
34:52कर दिया
34:54महालक्ष्मी के आगमन से समुद्र मन्थन की यह वेला संपून चराचर जगत के लिए कल्यानकारी और मांगलिक बन गई