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विष्णु पुराण के 23वें अध्याय में जानिए दैनिक सदाचार, गृहस्थ धर्म और श्राद्ध कर्म के दिव्य रहस्य! महर्षि पराशर मैत्रेय को बताते हैं कि कैसे सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक के छोटे-छोटे नियम और पंच महायज्ञ मनुष्य के जीवन को आध्यात्मिक ऊंचाइयों पर ले जाते हैं। देखिए कि पूर्वजों को दिया जाने वाला श्राद्ध किस प्रकार ब्रह्मांडीय संतुलन बनाए रखता है और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त कराता है।

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Transcript
00:00शांत और पवित्र गंगा नदी के तटपर स्थित महर्शी पराशर के आश्रम में संध्या की लालिमा बिखर रही थी और
00:07चारों और एक दिवे शांती व्याप्ट थी.
00:11महर्शी पराशर अपनी गहरी समाधी से धीरे धीरे बाहर आ रहे थे और उनके दिवे चहरे पर ब्रहमांडिये ज्यान की
00:18अलौकिक आभा चमक रही थी.
00:21शिश्य मैत्रे ने अपने गुरु के चर्णों में अत्यंत आदरपूर्वक प्रणाम किया और उनके मुख से जीवन के गूढ रहसियों
00:29को सुनने की प्रतीक्षा करने लगे.
00:32मैत्रे ने अत्यंत विनमरस्वर में पूछा की है गुरुदेव एक साधारन मनुष्य इस संसार की व्यावहारिक सीमाओं में रहकर अध्यात्म
00:41को कैसे प्राप्त कर सकता है.
00:44सांसारिक कर्तवियों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कोलाहल में उल्जा हुआ मनुष्य अपनी आंतरिक शुद्धी और मन की शांती को कैसे
00:52अक्षोन रखे.
00:54मैत्रे का यह प्रश्न केवल उनका नहीं था, बलकि भविष्य के कल्यूगी मनुष्यों की सबसे बड़ी दुविधा का एक सार्वभौमिक
01:03समाधान खोजने का प्रयास था.
01:06गुरु पराशर ने अपने शिश्य की जिग्यासा की गंभीरता को समझा और उनके दिव्य नेत्रों में संतोष की एक सुन्दर
01:14चमक दिखाई देने लगी.
01:16महर्शी पराशर ने अत्यंत मधुर और गंभीर स्वर में बोलना प्रारंब्र किया, जिससे पूरा वनप्रांथ और नदी तट जैसे एकाग्र
01:25होकर सुनने लगा.
01:27हे मैत्रे सुनो.
01:29ग्रिहस्थ आश्रम केवल सांसारिक भोग का साधन नहीं है, बलकि यह समस्थ आश्रमों और स्रिष्टी के सनरक्षन की धुरी है.
01:39एक आदर्श ग्रिहस्थ को प्रत्येक दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर प्रकृती की शांत बेला में अपने अंतहकरण को इश्वर के
01:47ध्यान से जोड़ना चाहिए.
01:49पराशर जी ने दैनिक जीवन के नियमों को समझाते हुए शारिरिक और मानसिक शुद्धी के लिए स्नान और संध्यावंदन के
01:57महत्व पर बल दिया.
01:59ग्रिहस्त को पंच महायग्यों के संपादन द्वारा देवों, रिशियों, पित्रों, मनुश्यों और मुख पशुपक्षियों के प्रती अपने रिण को चुकाना
02:08अनिवार्य है.
02:11मैत्रे ने अपने गुरु के प्रत्येक वचन को अपने हृदय की गहराईयों में उतारा और उनकी शंकाएं धीरे-धीरे ज्यान
02:18के प्रकाश में विलीन होने लगी.
02:21भोजन ग्रहन करने से पूर्व उसे परमात्मा को समर्पित करना, भोजन को अन्नसे प्रसाद और सात्विक उर्जा में परिवर्थित कर
02:30देता है.
02:32महर्शी पराशर ने आगे बताया कि जो ग्रिहस्थ द्वार पर आए अतिथी का निस्वार्थ भाव से आदर सत्कार करता है,
02:40वह साक्षात नारायन की पूजा करता है.
02:44संध्याकाल में घर की सीमा पर दीप प्रजवलित करना और मौन रहकर ध्यान करना नकारात्मक शक्तियों को दूर रख ग्रह
02:52को पवित्र बनाता है.
02:55तब मैत्रे ने उच्छुकता से पूछा की है महामुनी हमारे दिवंगत पित्रों की त्रिप्ति के लिए किये जाने वाले श्राध
03:02कर्म का क्या रहस्य है.
03:05पराशर जी ने समझाया की जब हम आदर से तरपन करते हैं, तब हमारे पितर अद्रिश्य रूप में हमारे पास
03:12आकर संतुष्ट होते हैं और हमें आशिश देते हैं.
03:17गुरु और शिश्य के बीच का यह दिव्य समवाद केवल ज्यान की चर्चा नहीं थी, बलकि यह संपूर्ण मानव जाती
03:25के कल्यान के लिए एक दिव्य प्रकाश पुंच था.
03:28इस प्रकार सदाचार और दैनिक जीवन के रहसियों को जानकर मैत्रे का हृदय पूरी तरह से शांत, संतुष्ट और भक्ती
03:37भाव से सराबोर हो गया.
03:39महर्शी पराशर ने मैत्रे को आगे बताते हुए कहा कि रात्री के अंतिन प्रहर यानी ब्रह्मा मुहूर्ट में उठना मानव
03:47के शारिरिक और आध्यात्मिक विकास का पहला सोपान है.
03:52ब्रहमा मुहूर्ट सूर्योदय से पूर्व का वह अत्यंत पवित्र समय है, जब संपूर्ण ब्रहमांड में सात्विक उर्जा का प्रभाव उच्चतम
04:01स्तर पर होता है.
04:04प्रातयकाल की बेला में जागते ही मनुष्य को सबसे पहले भगवान विश्नु, शिव और ब्रहमा का स्मरण करते हुए संपूर्ण
04:11ब्रहमांडिये शक्तियों का धन्यवाद करना चाहिए.
04:15अपनी हथेलियों का दर्शन करते हुए मा लक्षमी, मा सरस्वती और भगवान गोविंद का स्मरण करने से व्यक्ति का पूरा
04:23दिन शुब और उर्जावान बनता है.
04:27शया त्याग कर भूमी पर पहला कदम रखने से उर्व जगदंबा स्वरूप धर्ती माता की क्षमा और उनका दिव्य आशिर्वाद
04:35मांगना परम धर्म है.
04:38शौच और शारिरिक शुद्धी के नियम बताते हुए महर्शी ने स्पष्ट किया कि प्रकृती के नियमों का पालन करने से
04:45ही शरीर रोगमुक्त और मन शान्त रहता है.
04:49मिट्टी और शुद्ध जल के प्रयोग से शारिरिक मैल को दूर कर शरीर को बाह्य रूप से पूरी तरहे पवित्र
04:56किया जाता है.
04:58तीन बार जल से आचमन करने से मानव शरीर की आंतरिक नाडियों की शुद्धी होती है और मन जब तथा
05:06ध्यान के योग्य बनता है.
05:09और शुद्धी अव्रिक्षों की दातून से दांत साफ करते समय वानी की मधुर्ता और सत्यवादिता का संकल्प लेना सदाचार का
05:17महत्वपूर्ण अंग है.
05:20पवित्र नदियों का समरण करते हुए प्रातह सनान करने से मनुष्य के जन्मो जन्मो के पाप धुल जाते हैं और
05:27शरीर में नवावर्जा का संचार होता है.
05:31स्नान के उपरांत स्वच्छ एवं बिना सिले सूती वस्त्रधारन करने से शरीर में सात्विक तरंगों का समावेश होता है
05:40मस्तक पर चंदन या भस्म का तिलक लगाने से आज्या चक्र जागरत होता है और मनुष्य का चित ईश्वर भक्ती
05:48में स्थिर रहता है
05:50सूर्योदय के साथ गायत्री मंत्र का जाप और संध्यावंदन करने से मनुष्य की बुद्धी तीवर होती है और अंधकार का
05:58नाश होता है
06:01उदित होते भगवान सूर्यदेव को तामबे के पात्र से अरग्य अर्पित करने से जीवन में आरोग्यता, तेज और ख्याती की
06:09प्राप्ती होती है
06:11भगवान सूर्यदेव अपनी स्वर्णमई किर्णों से सम्पूर्ण प्रिथवी को आलोकित करते हुए अर्ग्य देने वाले भक्त को दीरगायू और कांती
06:20का वर्दान देते हैं
06:23केवल शारिरिक शुद्धी परियाप्त नहीं है वरन मन से क्रोध, काम्त, लोब और अहंकार का त्याग करना ही वास्तविक आंतरिक
06:31शुद्धी है
06:33महर्शी पराशर ने बल दे कर कहा कि अहिंसा, सत्यक, दया और सभी जीवों के प्रती प्रेन ही ग्रिहस्त जीवन
06:41की सच्ची नीम है
06:44अपने ग्रह मंदिर में दीप जलाकर भगवान श्रीहरी विश्नु की धूप और पुश्पों से आरती करने से घर में सदा
06:51सुक्षान्ती बनी रहती है
06:54इस प्रकार जो व्यक्ति प्रति दिन इन प्रातहकालीन नियमों का निष्ठा पूर्वक पालन करता है, उसका पूरा जीवन ही यग्ये
07:02के समान पवित्र हो जाता है
07:05गुरु पराशर के मुखारविन से प्रतहकालीन सदाचार का यह दिव्य ज्यान सुनकर मैत्रे का हृदय अगात भक्ती और आनन से
07:14सराबोर हो गया
07:16गुरू के मुखारविन से अमरित्वानी का पान कर मैत्रे का हृदय भक्ती के अथा सागर में गोते लगा रहा था
07:23और उन्होंने और ज्ञान की अभिलाशा से अपने गुरू की ओर देखा
07:29महर्शी पराशर ने अपने प्रिय शिष्य की जिग्यासा को भामपते हुए मंद मुस्कान बिखेरी जो उनके असीम ज्यान और धैर्य
07:37का प्रतीक थी
07:39पराशर ने कहा के मैत्रे ग्रिहस्थ जीवन केवल लौकिक सुखों का मार्ग नहीं
07:44अपितु यह यग्य के पांच दिव्य आयामों से ब्रहमांडिय संतुलन बनाए रखने का एक पवित्र अनुष्ठान है
07:53पराशर ने आगे कहा मनुष्य जन्म से ही पंच महायग्यों के रूप में पांच ब्रहमांडिय रिनों से बंधा होता है
08:00जिन्हें ग्रिहस्थ जीवन में प्रति दिन चुकाया जाता है
08:05प्रथम है देव्यग्य, देवताओं के प्रती हमारे कृतग्यता का प्रतीक, जिन्होंने हमें जीवन और प्रकृती का अमरित प्रदान किया है
08:15देव्यग्य में अग्निहोत्र, धूपदीप और नैविध्य के माध्यम से देवताओं को आहुतिया दी जाती हैं, जिससे ब्रहमांड में सकारात्मक उर्जा
08:24का संचार होता है
08:27ये आहुतिया केवल भौतिक नहीं, अपितु श्रद्धा और प्रेम से उत्प्रोत होती हैं, जो देवताओं तक सुक्ष्म रूप से पहुँचकर
08:35हमें आशिर्वात प्रदान करती हैं
08:39दूसरा है पितरी अग्य, हमारे पूर्वजों के प्रती हमारा कर्तविय और सम्मान जिन्होंने हमें जीवन, वंश और संस्कृती की अमोल्य
08:48विरासत दी है
08:51श्राध कर्म और तरपन के माध्यम से पितरों को जल और अन अर्पित किया जाता है, जिससे उनकी आत्मा को
08:58शांती और मुक्ती मिलती है
09:01यह कर्म केवल पूर्वजों का स्मरण नहीं, अपितु उनके प्रती अगाध प्रेम और कृतग्यता की अभिव्यक्ती है, जो हमारे जीवन
09:10को सम्रिध करता है
09:13त्रीतिय है रिशी यग्य, ज्यान के उन प्रकाशस्तंभों के प्रती हमारा समरपन, जिन्होंने वेदों और शास्त्रों के माध्यम से हमें
09:21सत्य का मार्ग दिखाया
09:24रिशी यग्य में वेदों का अध्ययन, गुरूओं का सम्मान और ज्ञान का प्रचारप्रसार सम्मिलित है, जिससे आध्यात्मिक प्रक्ती होती है
09:34यहां रिण चुकाकर हम न केवल अपनी बुद्धी को परिश्कृत करते हैं, बलकि आने वाली पीधियों के लिए भी ज्ञान
09:41की मशाल जलाए रखते हैं
09:44चतुर्थ है मनुष्य यग्य, समाज और सभी मनुष्यों के प्रती हमारी जिम्मेदारी, जिन्होंने हमें समुदाय और सहयोग का आधार प्रदान
09:53किया है
09:55मनुष्य यग्य में अतिथी सत्कार, दानपुन्य और परोपकार के कार्य शामिल हैं, जिससे समाज में सद्भाव और प्रेन बढ़ता है
10:05यह यग्य हमें सिखाता है कि हम केवल अपने लिए नहीं, बलकि संपूर्ण मानवता के कल्यान के लिए जिये
10:13और पंचम है भूत यग्य, सभी जीवित प्राणियों और प्रकृती के प्रती हमारा सम्मान, जिन्होंने हमें जीवन का पोशन प्रदान
10:22किया है
10:24भूत यग्य में पशुपक्षियों को भोजन कराना और परियावरन का संरक्षन करना शामिल है, जिससे प्रकृती में सामनजस्य बना रहता
10:33है
10:34यह यग्य हमें सिखाता है कि हम इस प्रित्वी पर केवल उकभोकता नहीं, बलकि सभी जीवों के साथ सहस्तित्व में
10:42रहने वाले संरक्षक हैं
10:46पराशर ने कहा इस प्रकार ग्रिहस्थ जीवन में ये पंच महायग्य केवल कर्मकांड नहीं बलकि जीवन जीने का एक दिव्य
10:54विधान है
10:56इनका पालन करने से मनुष्य अपने ब्रहमांडिय रिनों से मुक्थ होता है और जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष
11:04के पत पर अग्रसर होता है
11:07यही ग्रिहस्थ का सच्चा धर्म है, जो उसे न केवल सांसारिक सुख प्रदान करता है, बलकि उसे आत्मिक उन्नती की
11:15ओर भी ले जाता है
11:18महर्शी पराशर ने उपदेश की श्रिंखला को आगे बढ़ाते हुए कहा, के मैत्रे पंच महायग्यों के निश्पादन के पश्चात ग्रिहस्थ
11:26का परम कर्तव्य द्वार पर आए अयाचित अतिथी का सहर्ष सतकार करना है
11:32भोजन की थाली ग्रहन करने से पूर्व ग्रिहस्थ को अपने घर के मुख्य द्वार पर खड़े होकर कुछ क्षण किसी
11:39भुखे या ठके हुए पथिक की प्रतीक्षा अवश्य करनी चाहिए
11:44यदि कोई अंजान पथिक दोपहर के समय बिना किसी पूर्व सूचना के द्वार पर आप पहुँचे तो ग्रिहस्थ को उसे
11:52साक्षाक भगवान नारायन का स्वरूप मान कर आसन और जल अर्पित करना चाहिए
11:58शास्त्रों का विधान है कि अतिथी का न तो गोत्र पूछना चाहिए और नहीं उसकी विद्यायाजाती क्योंकि जो तिथी जाने
12:06बिना आये वही सच्चा अतिथी होता है
12:10जो ग्रिहस्थ अपने अतिथी का मिष्ट वानी, शीतल जल और श्रद्धा पूर्वक अन्न से सतकार करता है उस घर में
12:18धंधाने की स्वामिनी देवी लक्षमी का स्थाई वास होता है
12:23परन्तु यदि कोई अतिथी निराश, शुधित और अपमानित होकर किसी द्वार से खाली हाथ लोट जाता है तो वह ग्रिहस्थ
12:31के समस्थ संचित पुन्यों को लेकर अपने पाप उस घर में छोड़ जाता है
12:37महर्शी पराशर ने चेतावनी देते हुए कहा कि जो विवेखीन मनुष्य केवल अपने ही उदर पोशन के लिए भोजन पकाता
12:45है वह अन्न नहीं बल्कि स्वयंपाप का भक्षन करता है
12:50वैदिक ज्यान के अनुसार अन्न ही परब्रहम का प्रत्यक्ष रूप है क्योंकि इसी अन्न के रस्से समस्थ पृत्वी पर जीव
12:58चेतना और प्राण शक्ती धारण करते हैं
13:02जब ग्रिहस्थ अपने भोजन से पूर्व उसका कुछ अंशगव, कुक्कुर और पक्षियों के लिए निकालता है तो वह संपूर्ण चराचर
13:10जगत को त्रिप्ट कर देता है
13:13संसार के समस्थ दानों में अन्न दान को ही सर्वश्रिष्ठ माना गया है, क्योंकि यह दान प्राणी की क्षुधा शांत
13:21कर उसे ततकाल नया जीवन प्रदान करता है
13:26पराशर जी कहते हैं कि यदि घर में अन्न का अभाव भी हो, तो भी अतिथी को भूमी पर कुशका
13:32आसन, शीतल जल और मधुर वचनों का उपहार अवश्य देना चाहिए
13:37दूर देश से आय ठके हुए अज्यात अतिथी के पैरों को धोने और उनकी सेवा करने से ग्रिहस्थ के कई
13:44जन्मांतरों के संचित पाप भस्म हो जाते हैं
13:49भगवान श्री हरी विश्नु स्वयन समयस्मय पर एक साधारण अतिथी का रूप धर कर अपने भक्तों के ग्रिहस्थ, धर्म और
13:57निश्था की परीक्षा लेने आते हैं
14:00जिस ग्रिहस्थ के घर से अतिथी पूर्णत है त्रिप्थ होकर और प्रसंता पूर्वक आशिर्वात देकर प्रस्थान करता है, उस कुल
14:08पर देवताओं की निरंतर कृपा बनी रहती है
14:13अन्दान का पुन्य अर्जन करने वाला प्राणी इस भौतिक संसार में अखंड यश्प्राप्त करता है और मृत्यू के पश्चात सीधे
14:21बैकुंठ लोग का अधिकारी बनता है
14:25कलियुक के घोर अंधकार में जहां स्वार्थ और संकी इनता का राज्य होगा, वहां केवल अतिथी देवो भव का सिध्धान्त
14:32ही मनुष्य को धर्म के मार्ग पर स्थिर रखेगा
14:36जो ग्रिहस्थ किसी भूखे भिक्षुक या सन्यासी की उपेक्षा करके स्वय भोजन ग्रहन कर लेता है, वह चंद्रायन जैसे कठिन
14:44व्रतों के फल से भी वंचित हो जाता है
14:48आथ प्रत्येक धर्म प्रायन ग्रिहस्थ को अपनी क्षम्तानुसार प्रतिदिन कम से कम एक दरिद्र अथवा भूखे जीव को भरपेट अन्न
14:57अवश्य प्रदान करना चाहिए
14:59अन्न का अनादर करना या भोजन को व्यर्थ फेंकना साक्षात माता अन्नपूर्णा का निरादर है, जिससे घर की सुक्षान्ती और
15:08सम्रिध्धी का विलोपन हो जाता है
15:11इस प्रकार महर्शी पराशर ने मैत्रे को यह परम सत्य समझाया कि निस्वार्थ भाव से की गई अतिथी सेवाही ग्रिहस्थ
15:19जीवन की सर्वोच तपस्या और मोक्ष का साधन है
15:24अतिथी सत्कार के उपरांत महर्शी पराशर ने मैत्रे को सदाचार का मूल तत्व समझाते हुए कहा कि वानी में मधुर्ता
15:32और सत्य का वास ही मनुष्य के नैतिक जीवन की प्रथम सीधी है
15:38उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसी सत्य वानी जो दूसरों को पीडा पहुचाए या समाज में वैमन से फैलाए वह सत्य
15:46नहीं बलकी मानसिक हिंसा का ही एक अत्यंत कठोर रूप है
15:51अपनी आजीविका चलाने के लिए मनुष्य को कभी भी छलकपट चोरी या किसी जीव के शोशन का मार्ग नहीं चुनना
15:58चाहिए क्योंकि अन्याय से अर्जित धन अंत्य विनाश लाता है
16:04इमानदारी और सक्चाई से किया गया व्यापार अथवाश्रम साक्षात भगवान विश्णों की पूजा के समान है जो मनुष्य के अंतहकरण
16:13को शुद्ध और पवित्र बनाता है
16:16ग्रिहस्थ जीवन में मातापिता, जीवन साथी और बच्चों के प्रती केवल कर्तवियों का निर्वेहन ही परियाप्त नहीं अपितु उनके प्रती
16:25निस्वार्थ प्रेम और आदर का भाव होना भी अनिवार्य है
16:30पतनी को केवल ग्रहकारियों की दासी नहीं, बलकि साक्षात ग्रिहलक्ष्मी और पुरुष के आध्यात्मिक मार्ग की सहधर्मिनी मानकर सदैव सम्मानित
16:40करना चाहिए
16:42वृद्ध मातापिता की सेवा ही साक्षात देवों की आराधना है, और जो संतान उनकी उपेक्षा करती है, उसके द्वारा किये
16:51गए समस्त धार्मिक अनुष्ठान निश्वल हो जाते हैं
16:55घर के सेवकों, श्रमिकों और सहायकों को अपने परिवार का ही अंश समझ कर उनके श्रम का उचित मूल्य और
17:03मानसम्मान देना प्रत्येक सदाचारी ग्रिहस्थ का परम कर्तव्य है
17:08मूग पशुपक्षियों, विशेशकर गौमाता और आश्रित जीवों के प्रतिदया भाव रखना और उन्हें प्रतिदिन ग्रास देना सीधे भगवान श्रीहरी के
17:18हरिदय को संतुष्ट करता है
17:21इस स्रिष्टी में चीन्टी से लेकर विशालकाय हाथी तक हर जीव के भीतर उसी परमेश्वर का वास है, इसलिए बिना
17:29किसी कारण के किसी भी जीव को कश्ट देना महापाप है
17:33अपने पडोसियों के सुख दुख में निहस्वार्थ भाव से सहभादी बनना और उनके प्रती इश्या, ग्वेश या शत्रुता का भाव
17:42न रखना मानव समाज को अत्यंत सुन्दर और सुखी बनाता है
17:47यदि कोई अंजाने में अपराध कर दे या हमारे प्रती कटू वचन कहे, तो उसे हृदय से क्षमा कर देना
17:54ही सच्चे सदाचारी और भगवान विश्नु के परम भक्त की पहचान है
18:00क्रोध, लोब और अहंकार जैसे विनाशकारी विकारों पर पूर्ण विजय प्राप्त करना ही इंद्रियों का वास्तविक सन्यम है, जिसके बिना
18:09सदाचार का मार्ग अधूरा रहता है
18:13दान करते समय मन में कभी भी अहंकार, श्रिष्ठता का बोध या यश्की लालसा नहीं होनी चाहिए, क्योंकि निस्वार्थ भाव
18:21से किया गया गुप्त दान ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है
18:26परनारी को माता और बहन के समान आदर देना, तथा पराय धन को मिट्टी के ढिले के समान, निश्परान समझना
18:34ही ग्रिहस्त धर्म की पराकाश्ठा है
18:38अपने प्रत्येक दैनिक कर्ण को एक पवित्र यग्य मानकर भगवान विश्णु के चर्णों में समर्पित कर देना ही सदाचारी जीवन
18:46का सबसे बड़ा और दिव्य रहस्य है
18:49महर्शी पराशर समझाते हैं कि यदी मनुष्य के हृदय में करुणा और सत्य नहीं है तो बड़े से बड़ा यग्य,
18:57तपस्या और बाहरी आडंबर भी केवल एक निश्प्रान प्रदर्शन बनकर रह जाता है
19:04गुरुदेव के इन परम कल्यानकारी वचनों को सुनकर शिश्य मैत्रे का हृदय गदगद हो गया और उनके भीतर सदाचार के
19:12प्रती एक अनूठा संकल्प जागरित हुआ
19:15जो मनुष्य इस प्रित्वी पर रहते हुए ग्रिहस्थ धर्म और सदाचार के नियमों का निश्ठा पूर्वक पालन करता है उसके
19:23हृदय में भगवान विश्णू स्वयन सदैव निवास करते हैं
19:28इस प्रकार सदाचार का रहस्य समझा कर महर्शी पराशर अब मैत्रे को पित्री लोग की शांती और ग्रिहस्थ के परम
19:36करतव्य यानि श्राध कर्म की महिमा बताने की ओर बढ़ते हैं
19:42महर्शी पराशर अपनी दिव्यवाणी में समझाते हैं कि ग्रिहस्थ आश्रम का मुख्य आधार विवाह संसकार है जो दो आत्माओं को
19:51धर्म के मार्ग पर चलने के लिए एक जुट करता है
19:55यह पावन गठ बंधन केवल सांसारिक सुखों के लिए नहीं बलकि स्रिष्टी के संतुलन को बनाए रखने और दोनों जीवनों
20:03के आध्यात्मिक कल्यान के लिए रचा गया है
20:08विवाह के समय प्रजवलित की जाने वाली पवित्र अगनी इस बात की साक्षी होती है कि पती और पत्नी अब
20:15से हर सुख दुख में एक दूसरे के पूरक बन कर चलेंगे
20:20शास्त्रों में पत्नी को धर्म पत्नी और अर्धांगिनी का सर्वोच स्थान दिया गया है जिसके बिना पुरुष का कोई भी
20:27धार्मिक कृत्य कभी पूर्ण नहीं हो सकता
20:31जैसे एक विशाल वटवरिक्ष अपनी शाखाओं में समस्त जीव जन्तूओं को आश्रे देता है वैसे ही एक ग्रिहस्थ बाकी तीनों
20:39आश्रमों के साधकों का भरण पोशन करता है
20:44गुरुदेव के इन अत्यंत गंभीर और पवित्र वचनों को सुनकर शिश्य मैत्रे का मुखमंडल ग्रिहस्थ धर्म की इस महीमा को
20:51समझ कर विस्मय और श्रद्धा से खिल उठा
20:55महर्शी पराशर आगे बताते हैं कि एक आदर्ष दमपत्ती को प्रतिदिन पंच महायग्यों का संपादन करना चाहिए जिससे देव, त्रिशी,
21:04पितर, मनुष्य और जीवजन्तु सभी त्रिप्थ होते हैं
21:09द्वार पर आये हुए किसी भी अतिथी का स्वागत साक्षात भगवान विश्नु मान कर करना ग्रिहस्थ जीवन की सबसे बड़ी
21:17और पवित्र साधना मानी गई है
21:20जिस धर में स्त्री का आदर होता है और वह सदैव प्रसन्न रहती है वह स्वय धंधान्य की देवी भगवती
21:28लक्ष्मी अपनी पूरी कृपा के साथ निवास करती है
21:33पती का यह परम कर्तव्य है कि वह अपनी पत्नी की गरिमा, सुरक्षा और सम्मान की रक्षा करे क्योंकि पत्नी
21:41की प्रसन्नता ही कुल के गौरव को बढ़ाती है
21:45जब पती और पत्नी दोनों मिलकर इश्वर की भक्ती और धर्म का आचर्ण करते हैं तो उनका साधारन सा घर
21:53भी एक जीवन्त और पावन देवाले बन जाता है
21:57इस पवित्र बंधन के माध्यम से श्रेष्ट और संसकारी संतान की उत्पत्ती होती है जो भविश्य में जाकर समाज और
22:05कुल का नाम रोशन करती है
22:08एक सदाचारी ग्रिहस्थ की सकारात्मक पूर्जा और उसके द्वारा किये गए हवन पूजन से पूरे वातावर्ण की अशुधिया नश्ठ हो
22:17जाती है और दैविय शक्तिया आकर्शित होती है
22:22शिश्य मेत्रे ने विन्मरता पूर्वक पूछा की है गुरुदेव क्या इस ग्रिहस्थ जीवन के सांसारिक बंधनों में रहते हुए भी
22:29कोई मनुष्य मोक्ष जैसी परमगती प्राप्त कर सकता है
22:34महर्शी पराशर मंद मुस्कान के साथ उत्तर देते हैं कि यदि ग्रिहस्थ बिना किसी आसकती के अपने कर्टवियों को निशकाम
22:43भाव से इश्वर को समर्पित करे तो वह अवश्य मुक्त हो जाता है
22:48वे मैत्रे को भगवान विश्नु और देवी लक्षमी के दिव्य दामपत्य का स्मरण कराते हैं जो संपूर्ण ब्रहमांड के लिए
22:56प्रेम, कर्तव्य और संतुलन का सर्वोच प्रतीक है
23:01संसार के समस्थ देवता भी उस ग्रिहस्थ की वंदना करते हैं जो भूखों को अन देता है, अज्यानियों को ज्यान
23:09देता है और समाज की रीड बनकर खड़ा रहता है
23:14जद्यपी कलियुग में इस पवित्र विवाह बंधन की मर्यादाय कमजोर होंगी, फिर भी जो मर्यादा में रहेंगे, वे इस घोर
23:22कलियुग को भी पार कर जाएंगे
23:25मैत्रे ने अपने गुरु के चर्णों में मस्तक जुका कर इस सत्य को स्विकार किया कि ग्रिहस्थ आश्रम कोई बंधन
23:32नहीं बलकी मोक्ष प्राप्ती का एक अत्यंत सुगम मार्ग है
23:37तपोवन की मंद बयार और आश्रम की शांत अगनी के बीच महर्शी पराशर ने अपने प्रिय शिष्य को आशिरवाद दे
23:45कर इस पावन संबाद के अगले चरण की ओर प्रस्थान किया
23:49इसके पश्चात मैत्रे ने विनीत भाव से प्रश्न किया कि मनुष्य अपने जन्मसिद्ध पित्रिरिन से कैसे मुक्थ हो सकता है
23:57और श्राध कर्म की क्या महिमा है
24:01महर्शी पराशर ने उत्तर देते हुए बताया कि हर ग्रिहस्थ पर देवरिन और रिशरिन के साथ साथ पित्रिरिन का भी
24:09एक अत्यंत महत्वपून गुरुतर भार होता है
24:13पराशर जी ने कहा कि स्रिष्टी की शुरुवात में ही ब्रहमा जी ने समस्थ प्राणियों की त्रिप्ती और वंश्वरिध्धी के
24:20लिए पावन पित्रिग्णों की रचना की थी
24:23ये पित्रिग्ण देवताओं के समान ही दिव्यस्वरूप वाले हैं जो अपने वंश्जों की श्रधा और तरपन से संतुष्ट होकर उन्हें
24:32सुक्समृध्धी का वर्दान देते हैं
24:36वसू प्रुद्र और आदित्य स्वरूप में विराज मान होकर ये पित्रिगण अर्पित किये गए पिंड और जल को तुरंट स्विकार
24:43कर लेते हैं
24:45कृष्ण पक्ष की पवित्र अमावस्या तिथी पित्रों की त्रिप्ती के लिए अत्यंत फल्दाई मानी गई है जब पित्रि लोग के
24:53द्वार प्रित्वी लोग के लिए खुलते हैं
24:56श्राध के समय पवित्र कुशाघास, काले तिल और निर्मल जल का प्रलोग करके वेदियों का निर्मान किया जाता है
25:06ग्रिहस्त को चाहिए कि वह पवित्र और वेदपाथी ब्राहमनों को पित्रि स्वरूप मानकर पूर्ण आदर के साथ आमंत्रित करें और
25:14उन्हें भोजन कराएं
25:17चावल घी, तिल और शक्कर से निर्मित पवित्र पिंड दान करते समय ग्रिहस्त अपने पूर्वजों के नाम और गोत्र का
25:24उच्चारण करता है
25:27साक्षात अगनिदेव इस अर्पित भोजन के अंश को सूक्ष्म रूप में ग्रहन करके पित्रि लोग तक पहुचाने वाले समवाहक बनते
25:35हैं
25:36इसके उपरांध तरपन की प्रक्रियाद्वारा तीन पीडियों के पित्रों का समरण करते हुए अंजली से जल अर्पित किया जाता है
25:46संतुष्ठ हुए पित्रिगन प्रसन होकर अपने वन्ष को दीरगायु, सुयोग्य संतान, आरोग्य और अपार धंधान्य का आशिरवाद देते हैं
25:57पराशर जी ने चेतावनी भी दी की जो मनुश्यक शमता होते हुए भी अपने पित्रों का श्राध नहीं करता, उसके
26:04कुल में अशान्ती और बाधाय उत्पन होती है
26:08गया जी जैसे पवित्र तीर्थों में अर्पित किया गया एक भी पिंड पित्रों को अनंत काल के लिए परम त्रिप्ती
26:15प्रदान करता है
26:18यदि कोई अत्यंत निर्धन हो, तो वह केवल श्रधा पूर्वक दोनों हाथ उठाकर अश्रुपूर्ण नेत्रों से पित्रों को जल अर्पित
26:26करके भी त्रिप्त कर सकता है
26:29श्रधा से दिया गया साधारन सा साथ भी पित्रों के लिए अमरित के समान मिष्ठान बन जाता है, क्योंकि पित्रिगन
26:37वस्तु नहीं वरन भाव स्वीकार करते हैं
26:40महर्शी ने स्पष्ट किया कि समस्त श्राध कर्मों के मूल में भगवान श्री हरी विश्नु ही विराजमान हैं, जो सभी
26:48यग्यों के परम भोगता है
26:51गुरु पराशर के इस मरमस्पर्शी उपदेश को सुनकर मैत्रे का हृदय पित्रिभक्ती और परमेश्वर के प्रती अगाद श्रधा से भर
27:00उठा
27:02पराशर जी ने निशकर्ष निकालते हुए कहा कि पित्रों का पूजन वास्तव में स्वयन जगन्नात विश्नु की ही प्रसन्नता प्राप्ट
27:10करने का मार्ग है
27:12इस प्रकार पित्रिरिन और श्राध धमहिमा के इस अद्भुत समवाद के साथ तपोवन की संध्या बेला शांत और अती पवित्र
27:20उर्जा से परिपूर्ण हो गई
27:22मैत्रे ने अत्यंत नमरता पूर्वक हाथ जोड़ कर महर्शी पराशर से श्राध के विभिन रूपों और पिंडदान के पीछे छिपे
27:31वैग्यानिक रहस्य को समझाने का आगरह किया
27:35पराशर जी ने बताया कि नित्य श्राध प्रतिदिन किया जाने वाला वह सरलतरपण है जिससे ग्रिहस्थ बिना किसी कठिन कर्मकांड
27:43के अपने पूर्वजों का नित्य स्मरण करता है
27:47किसी विशेश तिथी या परिजन के देहावसान के वार्शिक दिन पर किया जाने वाला एकोदिष्ट अनुष्ठान ही नैमित्तिक श्राध कहलाता
27:56है
27:57कामे श्राध धर्मानुरागी साधक द्वारा विशिष्ट कामनाओं जैसे वंश्वरिध्धी अथवा आत्मिक शान्ती की सिध्धी हेतु अत्यंत नियम पूर्वक संपन्न किया
28:08जाता है
28:10परिवार में विवाह या नवजात के जन्म जैसे शुब मांगलिक उत्सवों से पूर्व पित्रों की अनुमती और शुब कामी आशिर्वात
28:18प्राप्त करने के लिए नंदी श्राध का विधान है
28:22पारवन श्राध अमावस्या और पावन पित्रिपक्ष के दौरान तीन पीडियों के पित्रों को संगठित रूप से त्रिप्त करने के लिए
28:30सर्वोत्तम माना गया है
28:33पिंडदान की प्रक्रिया में पके हुए चावल, काले तिल, शुध देसी घी और शहद के मिश्रन से निर्मित पिंड उर्जा
28:40का परम दिव्यवाहक बनता है
28:43महर्शी ने समझाया कि काले तिल में सुख्ष्म आध्यात्मिक तरंगों को अवशोशित करने और मंत्रों की शक्ती को पित्रिलोग तक
28:51प्रसारित करने की अग्धुत क्षमता होती है
28:56कुषघास एक प्राकृतिक उर्जा समभाहक के रूप में कार्य करती है जो भूमी की नकारात मक्ता को रोक कर तरपन
29:03के जल को सीधे सुख्ष्म जगत से जोडती है
29:07जब वेद मंत्रों की दिव्यध्वनिया उच्चारित होती है तब पिंड का भौतिक पदार्थ सुख्ष्म जोतिर्मे उर्जा तरंगों में परिवर्तित हो
29:16जाता है
29:18यह मंत्रपुत उर्जा किरने अंतरिक्ष और सुख्ष्म लोकों की सीमाओं को लांग कर सीधे उन चेतनाओं तक पहुँचती हैं जहाँ
29:26भी वे आत्माए वर्तमान में निवास करती हैं
29:31यदि पितर देवलोक में स्थिती पा चुके हैं तो यह पिंड़दान उनके लिए दिव्य अमरित और आनंद की वर्षा बनकर
29:38उपस्थित होता है
29:41यदि वे आत्माए कर्मवश पशुया पक्षी योनी में हैं तो वही पिंड़दान की उर्जा उनके संताप को हर कर उन्हें
30:02मुक्ती की ओर ले जाती है
30:05पराशर जी ने द्रिड़ता से कहा कि श्रद्धा पूर्वक अर्पित किया गया एक जल का बून भी ब्रहमांड के नियम
30:12के अनुसार कभी व्यर्थ नहीं जाता
30:16अगनेदेव और सूर्यदेव इस तरपन की सूक्ष्म उर्जा को अपनी दिव्यकिर्णों के माध्यम से ग्रहन करके पित्रिलोग के द्वार तक
30:23पहुँचाते हैं
30:26इस सूक्ष्म वैज्यानिक और आध्यात्मिक रहस्य को सुनकर मैत्रे का मन वैदिक रिशियों की अगाध दूर्द्रिष्टी और ज्यान के प्रती
30:34नत्मस्तक हो गया
30:36महर्शी ने अंतमे स्पष्ट किया कि महेंगे आडंबरों की अपेक्षा शुद्ध भावना, मंत्र निष्ठा और हृदय की कृतग्यता ही श्राध
30:45की वास्तविक आत्मा है
30:48संपूर्ण आकाश से त्रिप्थ और प्रसन्न पितर अपने वंश्जों पर धन, आरोग्य, दीरगायू और सत्बुध्धी के दिव्य आशिरवात की अद्रिश्य
30:57वर्षा करने लगे
30:59इस प्रकार श्राध्ध विज्यान के इस गूड ज्यान से आलोकित होकर संपूर्ण आश्रम तारामंडल की शीतल किर्णों के तले शांत
31:08और परम पवित्र अनुभूती में डूब गया
31:11महर्षी पराशर ने आगे वर्णन करते हुए मैत्रे से कहा कि पित्रों का यह तरपन वास्तव में सर्वव्यापी भगवान जनार्दन
31:20की ही परम पूजा है
31:22पराशर जी ने समझाया कि सम्पूर्ण पित्रिकर्मों के केंद्र में स्वयन श्रीहरी विश्नु विराजमान है जो सभी जीवात्माओं और पित्रों
31:31के अंतर्यामी स्वामी है
31:34रिशी पराशर के इन मोक्षदाई वचनों को सुनकर मैत्रे अती भाव विभोर होकर हाथ जोड़े अगनिहोत्र की पावन ज्वाला के
31:43समक्ष नत्मस्तक हो गए
31:45उन्होंने स्पष्ट किया कि जब कोई ग्रिहस्थ पूर्ण भक्तिभाव से पिंड अर्पित करता है तो उसे प्रत्यक्ष रूप से भगवान
31:53जनार्दन ही स्विकार करते हैं
31:57उसी क्षंद रिशमान होता है कि पवित्र पिंड दान के रूप में दी गई आहुती दिव्य स्वर्ण तरंगों में बदल
32:03कर भगवान विश्णु के चर्णों में समर्पित हो जाती है
32:08जब जगत के पालनहार श्रीहरी इस श्राध्धतरपन से संतुष्ठ होते हैं तो समस्थ देवगण और पितरगण स्वतही परम आनंद में
32:17त्रिप्थ हो जाते हैं
32:19दिव्य लोक में वास करने वाले पितर भगवान नारायन की स्वर्णिम आभा से नहा कर जण्ममर्ण के बंधनों से मुक्त
32:27होने लगते हैं
32:29महर्शी ने बताया कि पितरिरिन से मुक्ती प्रदान करने वाले सर्वेश्वर जनारगन ही ग्रिहस्ट को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष
32:37का वर्दान देते हैं
32:40भगवान विश्णों की असीम क्रिपा से ग्रिहस्ट साधक के जन्मजन्मांतर के पाप कट जाते हैं और उसे परमधाम की प्राप्ती
32:48का मार्ग मिल जाता है
32:51पराशर जी ने रहस्य का उद्घाटन करते हुए कहा कि श्रीहरी स्वयन यग्य पुरुष हैं, वे ही आहुती हैं और
32:58वे ही उस्ष्राध्धफल के परम भोकता हैं
33:02यग्य की प्रदीप्त ज्वालाओं के मध्य चतुर्भुज रूप में प्रकट होते हुए जनार्गन का स्वरूप संपून ब्रहमांड को अपनी दिव्यता
33:11से आलोकित कर देता है
33:13तभी मैत्रे ने विन्मर्ता से पूछा की है महर्शी जो निर्धन व्यक्ती बहुमूल्य सामगरी जुटाने में असमर्थ है, वह जनार्गन
33:22को कैसे प्रसंद करे
33:25महर्शी पराशर ने मंद मुस्कान के साथ कहा कि श्रीहरी बाह्य आडंबर से नहीं, बलकि जल के एक बून्द और
33:32कुशा घास से भी प्रसंद हो जाते हैं
33:36एक अत्यंत निर्धन ग्रिहस्थ अश्रुपूरित नेत्रों से केवल जंगली फल और जल अरपन कर भगवान विश्नु का स्मरण करता हुआ
33:44दिखाई देता है
33:46करुणा के सागर भगवान जनारगन उस निर्धन की अपार श्रद्धा से प्रसंद होकर उसके पित्रों को ततकाल उत्तम लोग प्रदान
33:55करते हैं
33:57पराशर जी ने कहा कि शास्त्रों में बताए दैनिक नियमों का निश्ठा पूर्वक पालन करना ही मनुष्य को विश्नुतत्व के
34:04समीक ले जाता है
34:07रिशी के इस दिव्य उपदेश के पूर्ण होते ही आकाश से मंदार के पुष्पों की वर्षा होने लगी और आश्रम
34:14अलौकिक सुगंद से महिक उठा
34:16इस प्रकार महरशी पराशर ने सदाचार ग्रिहस्थ धर्म और श्राध कर्म की महिमा के इस महान पर्व का सफलता पूरवक
34:25समापन किया
34:27परमग्यान की प्राप्ती से कृत-कृत्य होकर मैत्रे ने महर्शी पराशर के श्रीचर्णों में अपना शीश नवाकर कृतग्यता व्यक्त की
34:36अंत में शीर सागर में शेशनाग पर विराजमान भगवान श्रीमन नारायन अपने भक्तों और उनके पित्रों पर अनादी काल तक
34:45क्रिपा की वर्षा करते रहते हैं
34:48महर्शी पराशर ने अत्यंत वातसल्य और सौमेता से अपने शिश्य मैत्रे की ओर देखते हुए अपने अंतिम उपदेश का आरंभ
34:57किया
34:59उन्होंने स्पष्ट किया कि निश्काम भाव से किया गया दैनिक सदाचार ही मनुष्य के अंतहकरण को समस्त पापों से मुक्त
35:06करता है
35:08जब तक मनुष्य अपने पूर्व कर्मों के मल को नहीं धोता तब तक उसके हृदय में भक्ती रूपी निर्मल प्रकाश
35:16का उदे संभव नहीं है
35:19सुर्योदय के समय पवित्र नदियों में किया गया दैनिक्स नान और ध्यान साधक के समस्त दूशित संसकारों को भस्म कर
35:26देता है
35:28पित्रों की त्रिप्ती के लिए श्रद्धा पूर्वक किया गया कार्य केवल एक अनुष्ठान नहीं बलकि संपूर्ण वंश के लिए सुरक्षा
35:36कवच है
35:38जब पुत्र अपने पूर्वजों के लिए अन्न और जल अर्पित करता है तब पित्र लोक से बहने वाली आशिर्वात की
35:46धारा जीवन को धन्य कर देती है
35:50धर्मानुसार संचालित ग्रिहस्थ जीवन ही वह आधार्शिला है जिस पर संपूर्ण समाज का नैतिक और आध्यात्मिक धाचा टिका होता है
36:00शुद्ध विचार और पवित्र आचर्ण से परिपूर्ण ग्रिहस्थ का घर स्वया बैकुंठ के समान दिव्य और आनंदमय बन जाता है
36:10मैत्रे ने अत्यंत श्रद्धा और ध्यान पूर्वक पराशर मुनी के मुख से बहती हुई इस ज्ञान की अमूल्य सरिता का
36:17आचमन किया
36:19पराशर जी ने कहा कि कलियुक के अंधकार्मई प्रभाव से बचने का एक मात्र साधन केवल सदाचार और हरिनाम का
36:27आश्रे है
36:29धर्म के मार्ग पर चलने वाला साधक संसार के समस्त मोहमाया और दुखों के चक्रवात के बीच भी सदा अचल
36:36और सुरक्षित रहता है
36:39निश्काम कर्म और सदाचार का पालन करते हुए जीव सहजी भक्ती के स्वन सेतु द्वारा संसार सागर को पार कर
36:47लेता है
36:49शीरसागर में विराजमान भगवान श्रीमन नारायन अपने प्रत्येक उस भक्त पर विशेश अनुग्रह करते हैं जो अपने धर्म का निश्ठा
36:58से पालन करता है
37:01महर्शी पराशर ने अपने वरध हस्त उठा कर मैत्रे सहित भावी समस्त मानव जाती को परम कल्यान का अमर वर्दान
37:09प्रदान किया
37:10उस दिव्यक्षण में आकाश से देवगणों द्वारा पुष्पवरिष्टी होने लगी और संपूर्ण आश्रम ब्रहम तेज से अलोकिक हो उठा
37:20मैत्रे ने पूर्ण आत्म ज्यान प्राप्त कर अपने गुरुदेव के पावन चर्णों का पुनह स्पर्श किया और लोक कल्यान का
37:27संकल्त लिया
37:29विश्णु पुरान का यह महान ज्ञान सार्वकालिक दिव्य प्रकाश स्तंभ बनकर युगो युगो तक मानव जाती का मार्ग दर्शन करता
37:37रहेगा
37:39समस्त्र शिमुनियों और सुरसुरों ने इस परम ज्ञानमई कथा की श्रेष्ठता को नमन करते हुए जय जयकार की
37:47भगवान विश्णु अपनी मंद मुस्कान के साथ अपने अनन्त स्वरूप में सदाचार का पालन करने वाले जीवों के मोक्ष का
37:55द्वार खोलते हैं
37:57इस प्रकार महर्शी पराशर के इस अंतिन संदेश के साथ सदाचार और ग्रिहस्थ धर्म के माध्यम से मोक्ष प्राप्ती का
38:05यह पावन अध्याय पूर्ण होता है

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