राजा सगर का प्रतिशोध! ⚔️ अपने पिता के हत्यारों, हैहय और विदेशी आक्रमणकारियों पर सगर कैसे विजय प्राप्त करते हैं? महर्षि और्व के मार्गदर्शन में, सगर एक क्रूर युद्ध छेड़ते हैं, लेकिन क्या वह अपने क्रोध पर नियंत्रण रख पाएंगे? इस महागाथा में देखें सगर का न्याय, उनके नए साम्राज्य की स्थापना, और अश्वमेध यज्ञ की शुरुआत, जो 60,000 पुत्रों के विनाश का कारण बनेगा! #विष्णुपुराण #सगर #सूर्यवंश #अश्वमेधयज्ञ #AurvaRishi #Haihaya #Mythology #HinduPuranas #EpicBattles
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00:00महर्शी और्व के तपोवन में राजकुमार सगर धनुर विद्या और युद्ध कला का कठोर अभ्यास कर रहे थे
00:07महर्शी और्व ने सगर को शास्त्रों के गूढ रहस्य और दिव्यास्त्रों का संधान करने की गुप्त विद्याय सिखाई
00:15सगर के बान लक्षे को भेदते हुए आकाश में दिव्यागनी की ज्वालाएं उत्पन करने लगे
00:23रिशिवर ने सगर को आगने आस्त्र का अहवान करने वाले पवित्र वैदिक मंत्रों का ज्ञान प्रदान किया
00:30पवित्र यज्यवेदी के समक्ष ध्यानमग्न होकर सगर ने आत्मिक शक्ती और अदमे साहस को अर्जित किया
00:38माता यादवी अपने पुत्र के पराक्रम को देख कर गर्व और अतीत के गहरे शोक के मिश्रित भावों से भर
00:45गई
00:47यादवी ने सगर को इश्वाकु वंश के गौरवशाली अतीत और अयोध्या के पतन की दुखद गाथा सुनाई
00:55सगर के मानस पटल पर अपने पिता राजा बाहु की पराजय और है है शत्रूओं के क्रूर आक्रमन का द्रिश
01:02कौन्ध उठा
01:04वनों में भटकते हुए असहार राजा बाहु के अंतिन ख्षणों को याद कर सगर का हृदय संताप से भर गया
01:12विश के प्रभाव से मुक्ती पाकर जन में सगर ने जाना कि किस प्रकार महर्शी और वने उनके प्राणों की
01:19रक्षा की थी
01:21अपने मातापिता पर हुए अन्यायों की कथा सुनकर सगर की आखों में प्रतिशोध की प्रचंड ज्वाला भड़क उठी
01:29राजकुमार सगर ने आकाश की ओर खडग उठा कर है है वन्ष और उनके विदेशी सहयोगियों का विनाश करने की
01:37भीश्न प्रतिज्याली
01:39महर्शी और्वने सगर के संकल्प से प्रसन्न होकर उन्हें भगवान विश्नु का अत्यंत प्रभावशाली दिव्य धनुष सौपा
01:48दिव्यास्त्रों का संधान करते ही सगर के चारों और अलौकिक स्वर्णिन तेज और अगनी की तरंगे प्रजवलित हो उठी
01:56महर्शी ने सगर के मस्तक पर भस्म का तिलक लगा कर उन्हें युद्ध में सदा विजी रहने का अमोग आशिर्वाद
02:03दिया
02:05माता यादवी ने सगर का राज तिलक करते हुए उन्हें इक्षवा को कुल की प्रतिष्ठा पुनरस्थापित करने का दायत्व सौपा
02:13सगर ने अपने शरीर पर स्वर्ण कवच धारन किया और पीठ पर दिव्यास्त्रों से भरा तूरीन बांधा
02:21महर्शी और्व द्वारा प्रदान किये गए दिव्यरत पर आरूढ होकर सगर का स्वरूप एक तेजस्वी महायुधा सा प्रतीत हो रहा
02:29था
02:31महर्शी और्व ने सगर को धर्मयुध के नियमों का स्मरण कराते हुए केवल अधर्मियों का सहार करने का निर्देश दिया
02:39अयोध्या को दुष्टों के चंगुल से मुक्त कराने और धर्म का राज्य स्थापित करने के लिए सगर तपोवन से प्रस्थान
02:47कर गए
02:48वन की सीमाओं को पार कर सगर की विशाल चतुरंगिनी सेना के कदमों से उड़ने वाली धूल ने सूर्य के
02:55प्रकाश को भी धुंधला कर दिया
02:58पयोध्या की बाहरी चौकियों पर तैनात है है सैनिकों ने जब दूर से आते रथों के विशाल बेड़े को देखा
03:05तो उनके भीतर भय का संचार हो गया
03:09रथ पर खड़े होकर सगर ने अपनी सेना को संबोधित किया और उनके ओजस्वी वचनों ने सैनिकों के हृद्यों में
03:16वीरता की नई जवाला प्रजवलित कर दी
03:20अयोध्या के राजदर्बार में जब सगर के आक्रमन का समाचार पहुँचा तो विलासी है है और उनके विदेशी मित्रभय और
03:28आश्चर्य से काम उठे
03:31अपनी शक्ती के मद में चूर है है नरेश ने क्रोध से गरचते हुए अपने सेनाप्तियों को सगर की सेना
03:38को कुचल देने का क्रूर आदेश दिया
03:40दोनों सेनाओं की अग्रिन पंक्तियों के आपस में तक्राते ही रणभूमी शस्त्रों की जंकार और योध्धाओं के सिहनाद से गुझूठी
03:50बरबर शक और यवन घुडस्वारों ने अपनी तीवर गती से सगर के रथ को घेरने का प्रयास किया लेकिन उनका
03:58यह प्रयास निश्पल साबित हुआ
04:01सगर ने अपने दिव्यधनुष की प्रत्यंचा को कान तक खीच कर ऐसे बान छोड़े जो आकाश में बिजली की तरहे
04:08चमकते हुए शत्रों पर तूट पड़े
04:11पवित्र सर्यू नदी के तटपर दोनों पक्षों के बीच एक अत्यंत विनाशकारी और रक्त पात से भरा युद्ध छिड़ गया
04:20महर्शी और्व के तपोबल और युद्ध नीती से प्रशिक्षित सगर के युद्धाओं ने शत्रों की व्यूह रचना को तिनके की
04:28तरहे बिखेर दिया
04:30कमबोज और पारद राजाओं ने अपने विशाल और मदमस्त युद्ध हाथियों की सेना को आगे बढ़ा कर सगर की सेना
04:37को कुचलना चाहा
04:39सगर ने तुरंट अपनी सेना को अर्धचंद्राकार व्यूह में परिवर्तित कर शत्रों के हाथियों के आक्रमन को पूरी तरहे विफल
04:47कर दिया
04:49है है सेना के एक पराक्रमी और विशालकाय सेनापती ने सगर को सीधे द्वंध वयुद्ध की चुनोती दी और अपनी
04:57गदा लहराते हुए आगे बढ़ा
05:00सगर के एक ही तीक्षनबाण ने उस अहंकारी सेनापती के मस्तक को धड़ से अलग कर दिया जिससे शत्रू सेना
05:07में हाहाकार मच गया
05:10अपने सेनापती का विनाश देख भयभीत होकर ताल जंग और पल्लव सैनिक युद्धक्षेत्र छोड़कर अयोध्या के मुख्य दुर्ग की और
05:19भागने लगे
05:20विजय की घोशना करते हुए सगर के सैनिकों ने भागते हुए शत्रूओं का पीछा किया और शंखों के उद्गोश से
05:28दसों दिशाएं गूँज उठीएं
05:31जैसे ही सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ा युद्ध भूमी पर पस्री लालिमा सगर के न्यायपूर्ण प्रतिशोध और विजय की गवाह
05:39बनी
05:40पराजय को अत्यंत निकट देखकर शक और यवन योध्धा अपने प्राणों की भीख मांगने के लिए अपने बचे हुए नायकों
05:48की ओर देखने लगे
05:50रत पर अडिक खड़े सगर ने दूर क्षितिच पर चमकते हुए अयोध्या के राजप्रासाद के शिखरों को देखा और अपनी
05:58माता के अपमान का स्मरण किया
06:01अयोध्या के विशाल द्वारों के ठीक बाहर सगर की विजी सेना ने अपने शिविर स्थापित किये जहां से सामराज्य की
06:09मुक्ती का अंतिम युद्ध लड़ा जाना था
06:12अयोध्या के द्वारों पर सूर्य की पहली किरण पड़ते ही महाराज सगर ने अपनी गर्जना से सेना में नया उत्साह
06:20भर दिया, जिसका उद्देश केवल खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनह प्राप्त करना था
06:26युद्ध के भयंकर आरंभ में सगर की सेना ने एक अटूट ज्वार की तरह अयोध्या के द्वारों पर आक्रमण कर
06:33दिया, जिससे भीतर के शत्रु सैनिकों में घबराहट फैल गई
06:38महाबली सगर स्वयं अगनी के समान भयंकर रूप में युद्ध में उत्रे, उनके स्वर्णिन धनुष से निकलेबान शत्रु के हृदय
06:46को भेदते हुए विजय का मार्ग प्रशस्त करते गए
06:50अनेकों दिनों के भीशन संग्राम के पश्चात, अयोध्या के द्वारों को तोड़ कर सगर की सेना ने नगरी में प्रवेश
06:57किया और विदेशी शास्कों के अत्याचारों का अंत कर दिया
07:02अपने पूर्वजों के अपमानित सिनहासन के सामने खड़े होकर सगर ने अपनी माता के कश्टों और अपने वन्ष की खोई
07:10हुई गरिमा को याद किया
07:12राजसी वैदी की रीतिरिवाजों के अनुसार सगर का राज्या भिशेक हुआ और उन्होंने अपने सामराज्य की रक्षा करने तथा शत्रों
07:21को समूल नश्ट करने की शपत ली
07:24राज्या भिशेक के तुरंत बाद सगर ने अपने पिता के हत्यारों है है वन्शियों के विरुद्ध एक विशाल और विध्वनसक
07:32अभियान की घोशना की
07:35अपने किले के भीतर है है के राजाओं ने सगर की बढ़ती शक्ती और उसके प्रतिशोध की ज्वाला पर गेहन
07:42विचार विमर्ष किया
07:43उनके चहरे पर चिंता की रेखाए स्पष्ट थी
07:47सगर की सेना ने है है सामराज्य की सीमाओं पर प्रचंड वेग से हमला किया
07:52हर बाधा को ध्वस्त करते हुए एक के बाद एक किले पर विजय प्राप्त की
07:58सगर के नेत्रित्व में उनकी सेना ने हैहियों पर निर्दई विजय प्राप्त की
08:03युद्ध के मैदान को शत्रों के लहू से रंग दिया और उनके साहस को चूर-चूर कर दिया
08:10उनकी विजयों की धूम चारों दिशाओं में फैल गई और एक के बाद एक राज्य ने सगर की बढ़ती हुई
08:17शक्ती के सामने समर्पन कर दिया
08:20सगर के विजय अभियान की खबर शत्रु राज्यों में बिजली की तरह फैली जिससे भय और दहशत का माहौल पैदा
08:28हो गया और उनकी रातों की नेंद हराम हो गई
08:32मुख्य है है राजा अपनी बढ़ती हार को देखकर सगर के विनाशकारी क्रोध को रोकने के लिए एक अंतिम और
08:40हताशापूर्ण रणनीती बनाने पर विवश हुआ
08:43दो महान शक्तियों का टकराव हुआ जब सगर की सेना ने हैहियों के अंतिम गड को घेर लिया और प्रित्वी
08:51भीशन युद्ध से काप उठी
08:53सगर की रणनीतिक कौशल और उसकी सेना की अदमय शक्ती के आगे है है वन्ष का गौर्वपूर्ण इतिहास धूल में
09:01मिल गया और उनकी हार निश्चित हो गई
09:05अपनी माता के अपमान और पिता के वद का प्रतिशोध लेने के लिए सगर ने उन सभी को दंडित किया
09:12जिन्होंने अयोध्या का अपमान किया था
09:15जब सगर का क्रोध समस्त शत्रु जाती को भस्न करने पर तुला था, तब तेजस्वी और वरिशी शांती और न्याय
09:23के दूट बनकर उनके समक्ष प्रकट हुए
09:26और वरिशी ने सगर को समझाया कि प्रतिशोध की अगनी अनन्थ होती है और उसे दया और धर्म से शांत
09:33किया जाना चाहिए
09:36रिशी के गहन वचनों से प्रभावित होकर सगर ने अपने शत्रुओं को पूर्ण विनाश से बक्ष दिया परन्तु उन्हें अपनी
09:44पहचान और शक्ती का परित्याग करने का आदेश दिया
09:48इस प्रकार सगर ने अपनी खोई हुई गरिमा को पुनह प्राप्त किया और एक विशाल सामराज्य की स्थापना की जिसकी
09:56शक्ती और न्याय की गाथा युगों तक गाई जाने वाली थी
10:01महर्शी और्व की दिव्यवानी को स्मरण करते हुए महाराज सगर ने अपने मन में सुलक्ती प्रतिशोध की तीवर अगनी को
10:09शांत किया और परम शांती का मार्ग चुना
10:13सगर के आदेश पर बंदी बनाये गए शक यवन और कमबोज राजाओं के गरवीले सरदारों को बेडियों में जकड कर
10:20राजसभा के सम्मुख प्रस्तुत किया गया
10:24सिनहासन के समीब खड़े महर्शी और वने राजा सगर को शत्रूओं के प्रान लेने के बजाए उनके अहंकार को सदा
10:31के लिए समाप्त करने की युक्ती सुझाई
10:35धर्म की मर्यादा को स्थापित करने के लिए सगर ने आदेश दिया कि बंदी यवन सेनाप्तियों के सिर पूरी तरह
10:42से मुंदवा दिये जाए ताकि उनका घमंड धूल में मिल जाए
10:47सगर की न्याय प्रियता के अनुसार पराजित शकों के सिर केवल आधे मुंदवा दिये गए जो इतिहास में उनकी पराजय
10:55और जीवनदान के शाश्वत प्रतीक बने
10:58कमबोज कबीले के योध्धाओं की लंबी और सम्मानित दाढ़ी को पूरी तरह काट दिया गया जिससे उनकी सैने पहचान और
11:06अहंकार सदा के लिए समाप्त हो गए
11:10इस अनोखे दंड से लजजित किंतु प्रांदान के लिए आभारी होकर शत्रू ने महाराज सगर के चर्णों में अपने अस्त्र
11:18डाल दिये और शान्ती की शपत ली
11:21रिशी और्व ने अपने पवित्र कमंडलू से अभिमंतरित जल छिड़क कर उन सभी पराजितों के पापों का क्षालन किया और
11:29उन्हें धर्म के अनुकूल जीवन जीने का वर्दान दिया
11:33अपनी विजय और शमाशीलता का पर्चम लहराते हुए महाराज सगर अपनी सेना के साथ अयोध्या नगरी की ओर वापस प्रस्थान
11:42कर गए
11:43अयोध्या के नागरिकों ने अपने प्रिय राजा का स्वागत करने के लिए संपूर्ण नगर को स्वर्ण दीपों, तोर्नों और सुगंधित
11:51फूलों की मालाओं से सजा दिया
11:54राजमहल के मुख्य यग्य मंडप में महर्शी और्व ने वैदिक मंत्रो चार के बीच सगर के मस्तक पर गंगाजल अर्पित
12:02कर उनका राज्याभिशेक संपन किया
12:05अयोध्या के सूर्यवंशी सिनहासन पर पुनह विराजमान होकर चक्रवर्ती समराठ सगर ने अपने न्यायपूर्ण शासन की घोशना की
12:15महाराज सगर ने प्रजा के सम्मुख यह प्रतिज्याली की उनके राज्य में कभी भी अधर्म, अन्याय और निर्बलों पर अत्याचार
12:23को सहें नहीं किया जाएगा
12:26सगर के कुशल और धर्मनिष्ट शासन के अंतरगत, राज्य की सूखी नदिया पुनह जल से भर गई और अन्य के
12:33विशाल भंडार समरिध हो उठे
12:37सामराज्य की स्थिर्ता और अपनी प्रभुसत्ता को और सुद्रिड करने के लिए सगर ने महर्शी और्व की अनुमती से महा
12:45अश्वमेध यग्य का संकल्प लिया
12:48यग्य के पवित्र अश्व जो की दिव्य आभूश्णों और स्वर्ण पत्रों से सुसजित था को दिगविजय यात्रा के लिए स्वतंत्र
12:56छोड़ दिया गया
12:58यग्य के सफल शुभारंभ के पश्चात महाराज सगर ने नमरतापूर्वक महर्शी और्व के चर्णों में मस्तक जुकाकर उनका आशिर्वाद प्राप्त
13:07किया
13:08महर्शी और्वने राजा को अखंड कीर्टी का वर्दान दिया और भविश्य वानी की की उनका वंश भविश्य में प्रित्वी लोग
13:16के उध्धार का कारण बनेगा
13:19महर्शी के दिव्य वचनों से अभिभूत होकर सगर ने अपने महल के जरोखे से शांत भाव से अपनी समरिद्ध और
13:27भयमुक्त प्रजा को निहारा
13:30स्वर्गलोक में देवराज, इंद्र और अन्य देवताओं ने मंदाकिनी के पुश्पों की वर्षा कर महाराज सगर के धर्म और न्याय
13:37की इस अध्भुत विजय की सराहना की
13:41महाराज सगर के हृदय में अब विजय का हर्ष शान्थ हो चुका था और उनके मन में राष्ट्र की सुरक्षा
13:47तथा पराजित शत्रूओं के भविश्य को लेकर गेहन चिंतन व्याप्थ हो गया था
13:52मानोवे नेती के विशाल चित्रपट पर अगले प्रिष्ट को लिखने की तयारी कर रहे हूँ
13:59उन्होंने समझा की करूर प्रतिशोध केवल नए द्वेश को जन्द देता है जबकि धर्म और न्याय का मार्गी चिरस्थाई शान्ती
14:07की ओर ले जाता है जैसा की एक प्रज्यावान शासक का कर्तव्य होता है
14:13अपने गुरु महर्शी और्व की शिक्षाओं को समरण करते हुए सगर ने निर्ने लिया कि इस महत्वपूवन प्रश्ण पर वे
14:21तपस्वी रिशी से ही परामर्श लेंगे जिनकी वानी में वेदों का सार और ब्रहमांड का ज्यान समाहित था
14:29महर्शी और्व के तपोवन में पहुँचकर सगर ने विन्यपूर्वक उन्हें प्रणाम किया
14:34जैसे एक शिश्य अपने परम ज्यानी गुरु के समक्ष अपना मस्तक जुकाता है अपनी सारी चिंताएं व्यक्त करने को उद्यत
14:43सगर ने विस्तार से अपनी दुविधा बताई की कैसे है है और विदेशी आक्रमनकारियों ने उनकी प्रजा को सताया था
14:51और अब जब की वे पराजित हैं उनके प्रती किस प्रकार का न्याय उचित होगा जो धर्म और राज्य दोनों
14:58के लिए श्रिष्ठ हो
15:00महर्शी और वने राजा के वचनों को धैर्य पूर्वक सुना उनकी आखें गेहन अंतरग्रिष्टी से चमक रही थी जैसे वे
15:08समय और घटनाओं की गहराई में जहांक कर उचित उत्तर खोज रहे हो
15:14रिशी ने कहा कि शत्रूओं का विनाश करके केवल प्रतिशोध की अगनी शांत होती है परन्तु उनकी पहचान मिटाकर उन्हें
15:22अपमानित करना अधिक प्रभावी दंड है जो उनके अहंकार को चूर-चूर कर देगा और भविश्य में विद्रोह की संभावना
15:30को कम करे�
15:32महर्शी ने सुझाव दिया की शात यवन, कमबोज, पारद और पल्लवों को मारना नहीं चाहिए अपितु उनके विशिष्ट पहचान चेहनों
15:41को बदल कर उन्हें समाज से बहिश्कृत कर देना चाहिए जिससे वे जीवित रहते हुए भी अपनी पराजय का स्मरण
15:48करें
16:01के लिए मिटा देगा राजधानी लोटकर सगर ने तुरंट अपने सेनाप्तियों को आदेश दिया कि सभी पराजित शत्रु राजाओं और
16:10सेनाप्तियों को बंदी बना कर उनके समक्ष प्रस्तुत किया जाएं जैसे एक शिकारी अपने जाल में फंसे शिकार को देखता
16:18ह
16:20कुछ ही क्षणों में शाक, यवन, कमबोज, पारद और पल्लव जैसे विभिन जातियों के पराजित प्रमुखों को लोहे की जंजीरों
16:28में जकड कर सगर के राजगरबार में लाया गया, उनके चहरे पर भय और निराशा की गहरी चाप थी
16:35सगर ने गंभीर स्वर में उन्हें संबोधित किया, उनकी आखों में प्रतिशोध की नहीं, बलकि एक उच्छ कोटी के नियाय
16:43और गुरु के प्रति सम्मान की चमक थी, जैसे वे एक महान उपदेशक हो
16:49उन्होंने घोशना की की गुरु और्व के सम्मान में उन्हें मृत्यु दंड नहीं दिया जाएगा, अपितु उन्हें एक ऐसा अपमानजनक
16:57दंड मिलेगा, जो उनकी पहचान को सदैव के लिए बदल देगा, और उन्हें पराजय का निरंतर स्मरण कराएगा
17:05शाक योध्धाओं को सर्वप्रथम आगे लाया गया, और उनके गौरवशाली सिरों को पूर्ण रूप से मुंडवा दिया गया, यह उनके
17:14पारंपरिक लंबे बालों का अपमान था जो उनकी पहचान का प्रतीक थे
17:19इसके बाद यवन योध्धाओं की बारी आई, जिनकी घनी दाढ़ी उनकी मरदानगी का प्रतीक थी, उन्हें आधी मुंडवा दी गई,
17:28जिससे उनकी पहचान हमेशा के लिए अधूरी और हास्यास्पद बन गई
17:34कमबोजों को भी एक विशेश प्रकार के चिनह से चहनित किया गया, जो उनके पराजित होने का स्पष्ट संकेत था,
17:41उनकी गौरवशाली वेशभूशा अब पहचान हीन हो गई
17:46पारद और पल्लव योध्धाओं को भी उनकी जातियों के अनुसार विशिष्ट केश सज्जाया पहचान चहनों से अपमानित किया गया, जिससे
17:54वे अपने समाज में फिर कभी सम्मान पूर्वक सिर उठा कर नहीं चल सकते थे
18:00ये सभी शत्रू अब अपनी पहचान और सम्मान से वन्चित अपने राज्यों से बाहर निकाल दिये गए, उन्हें एक निराश्रित
18:09जीवन जीने के लिए मजबूर किया गया, जहां वे अपनी हार का प्रतीक बन गए
18:15इस अपमानजनक गंड ने न केवल उनके अहंकार को तोड़ा, बलकि भविश्य में किसी भी विदेशी शक्ती को अयोध्या की
18:23और आख उठाने से पहले हजार बार सोचने पर मजबूर कर दिया, सगर की बुद्धिमत्ता का यह एक और प्रमान
18:30था
18:32अयोध्या में एक बार फिर शांती और व्यवस्था स्थापित हुई, और महाराज सगर का नाम धर्म और न्याय के ऐसे
18:39अदवितिय उदाहरन के रूप में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हो गया, जिसने रक्तपात के बिनाभी शत्रों को स्थाई रूप से
18:47पराजित कि
18:49अयोध्या की विजय पताकाए आकाश में लहरा रही थी, जब महाराज सगर अपने विजी रत पर सवार होकर गौरव और
18:57प्रताप के साथ अपनी पैत्रिक भूमी में पुनह प्रवेश किया
19:02नगरवासियों ने अपने प्रिय समराट का फूलों और जैकारों से स्वागत किया, उनकी आखों में वर्षों के वनवास और संधर्ष
19:10के बाद लोटे शान्तिदाता के लिए असीम श्रद्धा और प्रेम झलक रहा था
19:16भव्य द्वारपालों द्वारा खोले गए राज महल के स्वन जडिक द्वारों से होते हुए, सगर अपने पैत्रिक सिनहासन की ओर
19:23बढ़े, जहां उनके पूर्वजों की आत्माए मानों उनका स्वागत कर रही थी
19:30राजपुरोहितों ने वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ सगर को सिनहासन पर आरूड किया, जहां उन्होंने अपने पूर्वजों की विरासत
19:38को पुनह स्थापित करने का संकल्प लिया
19:42अपने राज्या भिशेक के बाद सगर ने अपनी प्रजा को संबोधित करते हुए धर्म, न्याय और प्रजा कल्यान के सिध्धानतों
19:50पर आधारित एक सुद्रिड शासन का वादा किया, जिसकी गूंच पूरे राज्य में फैल गई
19:56सगर ने तुरंत राज्य के पुनर निर्मान और जीनोध्धार के कारियों को गती दी, जिससे युद्ध से जरजर हुई अयोध्या
20:04को नया जीवन मिलना शुरू हुआ
20:07ध्वस्त सडकों का जीनोध्धार किया गया, जलसरोतों को स्वच किया गया, और सार्वजनिक भवनों को कुनह भव्यता प्रदान की गई,
20:16जो सगर के दूरगर्शिता का प्रमार था
20:20खेतों में हल फिर से चलने लगे, और किसानों के चहरों पर समरिधी की आशा चमक उठी, जिससे भूमी एक
20:27बार फिर अनपूर्णा बनने लगी
20:30बाजारों में चहल पहल लोट आई, व्यापारी अपने प्रतिष्ठान खोल कर नए सिरे से व्यापार करने लगे, और आर्थिक चक्र
20:38तेजी से घूमने लगा
20:41महाराज सगर ने प्रतिदिन खुले दर्बार में बैठ कर प्रजा की शिकायतों और समस्याओं को धैर्य पूर्वक सुना, जिससे हर
20:49नागरिक को न्याय की आशा मिली
20:52उनके न्यायपूर्ण निर्णय जो धर्म और नीती पर आधारित थे, ने दूर दूर तक उनकी ख्याती फैलाई और लोग उन्हें
21:00धर्मराज की उपाधी से पुकारने लगे
21:04उन्होंने धर्म ग्रंथों के गहन अध्ययन के पश्चात, ऐसे नवीन नियमों और कानूनों की स्थापना की, जो समाज में व्यवस्था
21:12और नैतिक मूलियों को सुद्रिड करें
21:15शिक्षा और कला को भी सगर ने भरपूर संरक्षन प्रदान किया, जिससे राज्ज में ज्ञान और सौंदर्य का एक नया
21:23युग प्रारंभ हुआ
21:25रिशियों और आश्रमों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई, जिससे वैदिक ज्ञान और आध्यात्मिक साधनाओं का निर्बाध प्रवाह जारी रहा
21:34अपने राजसी कर्तवियों के अतिरिक्त सगर प्रातहकाल ध्यान और संध्याकाल में आत्मचिंतन में लीन रहते थे, जिससे उन्हें अपने निर्णयों
21:44में स्पष्टता मिलती थी
21:47प्रत्येक संध्या, वे अपने मंत्रियों और विद्वानों के साथ राज्य के महत्वपून विश्यों पर गेहन चर्चा करते थे, ताकि कोई
21:55भी निर्णय अविचारित न रहे
21:57इस प्रकार सगर के नियाइपून और धर्म प्रायन शासन में अयोध्या पुनह गौरवशाली और सम्रिध्धो उठी जहां हर नागरिक सुखी
22:07और सुरक्षित महसूस करता था
22:10उनकी ख्याती इतनी बढ़ गई की दूरगराज के राज्यों के शासक भी उनसे मार्गदर्शन और सहायता लेने के लिए अयोध्या
22:18आने लगे
22:20सगर ने अपने जीवन के इस पड़ाव पर अपने पूर्वजों के संधर्ष और अपनी प्रतिग्याओं को याद करते हुए भविश्य
22:28की चुनोतियों के लिए स्वयन को तयार किया
22:32और इस प्रकार महाराज सगर ने अयोध्या में धर्म और न्याय का एक ऐसा युग स्थापित किया जिसे युगो युगो
22:39तक एक आदर्श शासन के रूप में याद किया जाने लगा
22:44महाराज सगर के न्यायपूर्ण शासन में अयोध्या सम्रिध्धी और शांती की पराकाश्ठा पर थी, किन्तु राजसिनहासन के उत्तराधिकारी का प्रश्न
22:53अब भी उनकी चिंताओं का मूल था
22:57असंख्य युद्धो और त्याद के बाद प्राप्ठ हुए इस सामराज्य को एक योग्य वारिस की आवश्शक्ता थी, जो इसकी गौरवशाली
23:05परंपरा को आगे बढ़ा सके
23:08अपने मंत्रियों और राजपुरोहितों के साथ गेहन विचार विमर्ष के पश्चात सगर ने विवाह कर वंश्वृध्धी करने का निर्णय लिया
23:17उनकी ख्याती और पराक्रम से प्रेरित होकर अनेक राजज्यों से राजकुमारियों के विवाह प्रस्ताव अयोध्या आने लगे जो इस निर्णय
23:27को और भी महत्वपूर्ण बनाते गए
23:30इन ही प्रस्तावों में से विदर्ब देश की राजकुमारी सुम्नी का नाम सबसे पहले सामने आया जिनकी प्रतिष्ठा उनकी विनमर्ता
23:38और सदगुनों के लिए थी
23:41सुम्नी की सुन्दर्ता केवल बाहरी नहीं थी बलकि उनका हृदैदया, करुणा और धर्म प्रायंता से उत्प्रोत था जो उन्हें अध्वितिय
23:50बनाता था
23:52महाराज सगर ने स्वयं विदर्भ की यात्रा की और सुम्नी के गुनों से प्रभावित होकर उन्हें अपनी प्रथम रानी के
24:00रूप में स्विकार करने का प्रस्ताव रखा
24:03अयोध्या में एक भव्य समारोह में सुम्नी ने महारानी का पद्भार संभाला और राजपरिवार में सम्मान के साथ उनका स्वागत
24:12किया गया
24:13इसके उपरांत विदिशा के राजा की पुत्री केशनी भी अपने अप्रतिम सौंदर्य और तीक्षन बुद्धी के लिए जानी जाती थी
24:22जिनकी चर्चा राज़गरबारों में अक्सर होती थी
24:26केशनी का स्वभाव सुमनी से भिन्न था वह अधिक मुखर, साहसी और अपने विचारों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने
24:34वाली थी
24:36महाराज सगर ने केशनी के विलक्षन गुनों को भी पहचाना और उन्हें अपनी दूसरी महारानी के रूप में स्विकार करने
24:44का प्रस्ताव भेजा
24:46इस प्रकार अयोध्या में एक बार फिर उत्सव का माहौल चा गया, जब केशिनी ने महारानी के रूप में अपना
24:53स्थान ग्रहन किया
24:55दोनों रानियों के आगमन से राज महल में एक नई रौनका गई और प्रजा अब वन्ष वृध्धी की शुभ घड़ी
25:03की प्रतीक्षा करने लगी
25:05वर्षों बीट गए, किन्तु किसी भी रानी को गर्भधारन नहीं हुआ, जिससे महाराज सगर और पूरी अयोध्या में चिन्ता की
25:14एक गहरी छाया मंडराने लगी
25:17वन्ष के सतत प्रवाह के लिए संतान का अभाव सगर के मन में एक अथाँ पीड़ा बन चुका था, जो
25:23उन्हें रात दिन विचलित किये रखता था
25:27अपनी प्रजा और पूर्वजों के प्रती कर्तवे को समझते हुए, सगर ने अपनी दोनों पत्नियों के साथ संतान प्राप्ती हेतु
25:35घोर तपस्या और अनुष्ठान का निश्चय किया
25:39उनकी श्रद्धा और तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं देव रिशी और अपने तेज से आलोकित उन्हें दर्शन देने के लिए
25:47प्रकट हुए
25:49और व्रिशी ने सगर और उनकी पत्नियों को आशिरवाद देते हुए कहा कि सुमनी को साथ हजार वीर पुत्र प्राप्त
25:56होंगे और केशिनी को एक ही पुत्र असमंजस मिलेगा
26:01रिशी के वचनों के पश्चात सुमनी का गर्भ ठहरा और कुछ ही समय में उन्होंने साथ हजार तेजस्वी पुत्रों को
26:09जन्न दिया जिससे अयोध्या में हर्शोलास चा गया
26:13इसके उपरांथ महारानी केशिनी ने भी एक पुत्र को जन्न दिया जिसका नाम असमंजस रखा गया किन्तु उसका आरमभिक स्वभाव
26:22कुछ अप्रिय और विचित्र था
26:25बालक असमंजस का मन विचित्र और अस्थिर था वह अकसर क्रीडास रोवर में खेलते हुए बच्चों को परेशान करता और
26:33उनके खिलोने छीन लेता था जिससे उनके चेहरों पर भय और निराशा चा जाती थी
26:40रानी केशिनी और महाराज सगर ने पुत्र के इस अप्रत्याशित व्यवहार को देख पहले चिंता की फिर उसके हृदय में
26:48करुणा और सहानु भूती जगाने का अस्फल प्रयास किया जिससे उनके मन में गहरा दुख उत्पन हुआ
26:55जैसे जैसे अस्मंजस बड़ा होता गया उसकी शरारतें और भी घातक होती गई अब वह केवल बच्चों को ही नहीं
27:03बलकि बेजुबान पशुओं को भी यातना देने लगा
27:07उसने विशेश रूप से अयोध्या के निर्दोश बच्चों को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया
27:13उन्हें गहरे जलाशों में धकेल कर आनंद महसूस करता था जो नगर के लिए एक भयानक चिंता का विशय बन
27:21गया
27:22अयोध्या के नागरिकों का धैर्य अब तूट चुका था और उन्होंने अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए महाराज सगर के
27:30राजदर्बार में जाकर न्याय की गुहार लगाई जिससे दर्बार में एक गंभीर माहौल बन गया
27:37राजा सगर अपने पुत्र के कृत्य से गहरे दुख और कर्तव्यनिष्ठा के द्वंधों में फंसे यह सोचकर विचलित थे कि
27:45एक पिता के प्रेम और एक न्यायप्रिय राजा के दायत्व के बीच कैसे संतुलन स्थापित किया जाए
27:51इस कठिन परिस्थिती में महाराज ने अपने अनुभवी मंत्रियों और प्रज्यावान रिशियों को बुला कर उनसे परामर्ष किया ताकि वे
28:00धर्म और न्याय के मार्ग पर उचित निर्नय ले सकें
28:05गेहन विचार विमर्ष के बाद भारी मन से महाराज सगर ने न्याय के मार्ग का अनुसर्ण करते हुए अपने पुत्र
28:13असमंजस को अयोध्या की सीमा से निश्कासित करने का कठोर निर्नय लिया
28:18राज सैनिकों ने बिना किसी देरी के असमंजस को नगर की पश्चिमी सीमा की ओर निश्कासित कर दिया, जहां से
28:26उसे दूर अज्यात मार्ग पर अकेले ही चलना पड़ा, उसके पीछे अयोध्या की भव्यता छूट गई
28:33असमंजस के निश्कासन के बाद अयोध्या नगरी में शांती और सुरक्षा की एक नई लहर दोड़ गई, नागरिकों ने राहत
28:41की सांस ली और अपने प्रिय राजा की न्याय प्रियता की प्रशंसा की
28:47महाराज सगर ने अपने राजसी कर्तवियों को और भी अधिक निश्ठा से निभाना शुरू किया, उनका मन अपने महान पूर्वजों
28:55की गाथाओं और अपनी वन्श प्रमपरा को आगे बढ़ाने के गहन चिंतन में लीन था
29:01इस बीच रानी सुमनी के साथ हजार पुत्र जो अब युवा हो चुके थे, पराक्रमी योध्धा और धर्म प्रायन राजकुमारों
29:10के रूप में विक्सित हुए, उनकी वीर्ता और निश्ठा ने अयोध्या के मान को और बढ़ाया
29:16अपनी संतानों की शक्ती और अपने राज्यकी समरिध्धी को देखकर महाराज सगर की महत्वा कांख्षाए बढ़ने लगी, उन्होंने एक ऐसे
29:25सामराज्यकी कलपना की जो तीनों लोकों में अपनी प्रभुता स्थापित कर सके
29:31उन्होंने अपने प्रमुख मंत्रियों और पुरोहितों के साथ गेहन विचार विमर्ष किया कि कैसे उनकी बढ़ती हुई शक्ती और विशाल
29:40सेना का उप्योग देवताओं सहित सभी पर अपनी सर्वोच्छता स्थापित करने के लिए किया जाए
29:45उन्ही चर्चाओं के दौरान एक अनुभवी राजपुरोहित ने महाराज को अश्वमेध यग्य के अनुष्ठान का सुझाव दिया यह एक ऐसा
29:55महायग्य था जो चक्रवर्ती समराट की सार्वभावमिक संप्रभुता को स्थापित करता था
30:02अश्वमेध यग्य की बात सुनते ही सगर की आखों में एक नई चमका गई उन्होंने इस यग्य को अपनी महत्वाकांख्शाओं
30:10की चरम अभिव्यत्ती और अपनी सर्वोच्छता की अंतिन घोशना के रूप में देखा
30:17महाराज सगर ने तुरंत यग्य की तैयारियों के लिए आदेश जारी किये जिसमें कुशल शिल्पकारों और वैदिक रिशियों को यग्यशाला
30:25के निर्मान और सभी अनुष्ठानों की व्यवस्था के लिए बुलाया गया
30:30विशाल अश्वमेध यग्य के लिए एक भव्य और अलंकरित यग्य मंडप का निर्मान शुरू हुआ जिसे सोने और बहुमूल्य रत्नों
30:39से सजाया जाना था जिसकी भव्यता सभी को मंत्रमुग्ध कर देगी
30:45राज्यभर में ढोलनगाडो और शंकनाद के साथ अश्वमेध यग्य की घोशना की गई जिसमें सभी राज्यों को महाराज सगर की
30:53बढ़ती हुई शक्ती और सार्वभौमिक सामराज्य की स्थापना के संदेश भेजे गए
30:59पूरे अयोध्या राज्य में एक उत्सव का माहौल छा गया लोग गर्व और उत्साह से भर गए जबकी अश्वमेध के
31:07लिए चुने गए श्वेट अश्व को दिव्य अलंकर्णों से सजाकर पवित्रता के साथ तयार किया गया
31:14यग्य के पवित्र अगनी को प्रजवलित किया गया और महाराज सगर ने वेदोक्त मंत्रों के उच्चारण के साथ अश्वमेध यग्य
31:22का शुभारंभ किया जिसकी दिव्य लौ अयोध्या के गौरव का प्रतीक बन गई
31:28यग्य के नियमों का पालन करते हुए दिव्य अलंकर्णों से सुसजजित श्वेत अश्व को स्वतंत्र रूप से प्रित्वी पर विचर्ण
31:36करने के लिए छोड़ा गया जिसके पीछे सगर के शक्तिशाली पुत्रों और वीर सैनिकों का एक दल उसकी रक्षा हे
31:43तुचला
31:45स्वर्गलोक में देवराज इंद्र ने सगर के अश्वमेध यग्य की बढ़ती हुई शक्ति और प्रित्वी पर उसके सामराज्य के विस्तार
31:53को देखा जिससे उनके मन में गहरा भय और चिंता उत्पन्न हो गई
31:58इंद्र के मन में यह आशंका घर कर गई कि यदि सगर का यह यग्य सफलता पूर्वक संपन्न हो गया
32:05तो वह स्वर्ग पर भी अधिकार प्राप्त कर सकता है जिससे उनकी सथ्ता को गंभीर खत्रा उत्पन्न हो जाएगा
32:13अपनी व्यगरता को कम करने के लिए इंद्र ने अपनी देवसभा में अन्य देवताओं और देवर्शी नारत से सलाह ली
32:21जहां उन्होंने सगर की बढ़ती शक्ती पर अपनी चिंता व्यक्त की
32:26गेहन विचार विमर्ष के बाद इंद्र ने सगर के यग्य को भंग करने और उसकी शक्ती को कम करने के
32:33लिए एक कपटपूर्ण योजना बनाने का निर्णय लिया, जिससे वे स्वयं भी स्वर्ग की रक्षा कर सकें
32:40अपने शड्यंत्र को अंजाम देने के लिए इंद्र ने अपनी मायावी शक्तियों का आहवान किया और एक अद्रिश्य तीवर गती
32:48वाली इकाई को अश्व का हरन करने का आदेश दिया
32:53प्रित्वी पर अश्वमेध यग्य के अश्व की रक्षा कर रहे सगर के पुत्र और सैनिक अपनी लंबी यात्रा से ठककर
33:00एक धनेवन में विश्राम कर रहे थे, अपनी जिम्मेदारियों से क्षणिक रूप से बेखबर
33:06जैसे ही राद की गहरी छाया जंगल को अपने आगोश में ले रही थी, अद्रिश मायावी शक्ती चुपचाप और तेजी
33:14से अश्व के करीब पहुँची, जिसकी उपस्थिती का कोई आभास भी नहीं हुआ
33:20एक क्षण में मायावी शक्ती ने श्वेत अश्व पर अपना अधिकार जमा लिया और बिना कोई निशान छोड़े, उसे आकाश
33:28की ओर तीवर गती से उड़ा कर ले गई, जैसे कोई अद्रिश हाथ उसे खीच रहा हो
33:35सुबह होने पर जब सैनिक नेन से जागे तो उन्हें अश्वमेद का अश्व गायब मिला, जिससे उनके चहरे पर भय
33:43और चिंता की गहरी लकीरे छा गई
33:46अश्व का हरणकर, इंद्र उसे लेकर तेजी से आकाश में उड़ते हुए स्वर्गलोग की ओर जा रहे थे, उनके चहरे
33:54पर एक कुटिल मुस्कान और विजय का भाव था
33:58पृत्वी पर लोटते हुए, इंद्र ने अश्व को छिपाने के लिए महर्शी कपिल के शांत और पवित्र आश्रम को चुना,
34:05जो गंगासागर के तट पर स्थित था
34:08कपिल मुनी अपने आश्रम में गेहन ध्यान में लीन थे, उनकी आखे बंध थी और उनका मन ब्रहमांडी उर्जा से
34:16जुड़ा हुआ था, वे आसपास घटित होने वाली घटनाओं से पूर्णता अनभिग्य थे
34:22इंद्र ने अत्यंत चालाकी से अश्व को कपिल मुनी के आश्रम के पास छोड़ दिया, जिससे यह प्रतीत हो की
34:29मुनी ही उसके अफ़रन करता है, और सगर के पुत्रों को उनके क्रोध का सामना करना पड़े
34:36अपने कपटपूर्ण कार्य को सफलता पूर्वक अनजाम देने के बाद, इंद्र ने विजय का अनुभव किया और संतुष्टी के साथ
34:44स्वर्गलोक लोट गए, अपने सिनहासन पर पुन्म सुरक्षित महसूस करते हुए
34:50सगर के पुत्रों ने अश्व की तलाश में गेहन वन, दुर्गम परवत और गहरी घाटियों की खाक्छानी हर संभावित स्थान
34:58पर उसे ढूंडते हुए उनकी आशाक्षीन होती जा रही थी
35:03कई दिनों की अथक खोज के बाद भी, जब अश्व का कोई निशान नहीं मिला, तो सगर के पुत्रों और
35:10सैनिकों के मन में निराशा और क्रोध भर गया
35:14अपनी असफलता से तूटकर उन्होंने अयोध्या लोटकर महाराज सगर को यह दुर्भाग्यपूर्ण समाचार देने का निर्नैलिया की यग्य का अश्व
35:23रहस्यमय तरीके से गायब हो गया है
35:27जब यह खबर महाराज सगर के दर्बार में पहुँची तो पूरे राज्य में एक गहरा सन्नाट आचा गया और यग्य
35:34के बाधित होने से अयोध्या का गौरव खत्रे में पड़ गया
35:39महाराज सगर की आखों में क्रोध की ज्वाला धधक उठी जब उन्होंने यग्य के अश्व के अद्रिश्य होने का समाचार
35:47सुना जिसने उनके संकल्प को चुनौती दी
35:50उन्होंने अपने मंत्रियों और सभास्दों की ओर देखा, जिनकी आखों में भय और निराशा स्पष्ट जलक रही थी, मानो स्वयंकाल
35:59का प्रकोप मंदरा रहा हो
36:02सगर ने गर्जना करते हुए कहा कि अश्वमेध यग्य का पूर्ण होना अयोध्या के गौरव और सामराज्य की स्थिर्टा के
36:10लिए अत्यंत आवश्चक है और इसे किसी भी कीमत पर पूरा किया जाएगा
36:16उन्होंने शपतली की जब तक यग्य का अश्व वापस नहीं मिल जाता, तब तक न तो वह स्वयं विश्राम करेंगे
36:23और नहीं अयोध्या की प्रजा को शान्ती मिलेगी
36:27फिर उन्होंने अपने साथ हजार बलशाली पुत्रों को आदेश दिया कि वे पृत्वी के कोने-कोने में पाताल तक यग्य
36:35के अश्व को खोज निकालें
36:38सगर के पुत्रों ने अपने पिता की आग्या को शिरोधार्य किया और अश्व को खोजने के लिए अपनी कमर कसली,
36:45उनके चहरे पर अदमे साहस और ग्रिड़ता जहलक रही थी
36:50वे सभी एक जुठ होकर एक ही संकल्प के साथ पृत्वी के हर कोने और स्वर्ग पाताल की गहराईयों तक
36:57अश्व को ढूंध निकालने के लिए निकल पड़े
37:01अयोध्या के विशाल द्वार से निकल कर वे दिशाओं में फैल गए जहां भी अश्व के पच्चेन मिल सकते थे,
37:08हर पत्ती और हर शिला को खंगालते हुए
37:12वे दुर्गम पहाडों, घने जंगलों और विशाल मरुस्थलों को पार करते हुए आगे बढ़े, हर बाधा को चीरते हुए अपनी
37:20खोज जारी रखी
37:22जब अश्व कहीं नहीं मिला, तो उन्होंने क्रोध और हताशा में आकर धर्ती को खोदना शुरू कर दिया, रास्ते में
37:30आने वाले परवतों और व्रिक्षों को भी ध्वस्थ करते गए
37:34उनकी अथक और विनाशकारी खोज ने प्रित्वी की सतह को तहसन हस कर दिया, जहां भी वे गए, वहां बड़े
37:41-बड़े गड़े और दरारे छोड़ गए
37:44प्रित्वी पर रहने वाले साधारण जीव, मनुश्य और वनस्पती उनके इस निर्मम कार्य से भैभीत होकर त्राहत्राही कर उठे जो
37:53प्राकृतिक संतुलन को बिगाड रहा था
37:57स्वर्गलोक में देवतागन, चिंतित होकर इस अभूतपूर्व विनाश को देख रहे थे, क्योंकि सगर के पुत्रों का क्रोध प्रित्वी के
38:05संतुलन को खत्रे में डाल रहा था
38:08देवताओं में अग्रणी देवराज इंद्र अपनी स्वर्ण सिनहासन पर विराजमान चुपचाप इस विनाश को देखते रहे, उनके मन में एक
38:17रहस्यमें मुस्कान छिपी थी
38:20बिना रुके वे पाताल लोक की गहराईयों तक पहुँचने के लिए प्रित्वी को लगातार खोदते रहे, उनके मन में केवल
38:28अश्व को खोजने की तीवर धुन सवार थी
38:32अंतह अंधकार्मय पाताल लोक में, जहां प्रित्वी की जड़े गहरी समाई थी, उनके द्वारा खोदे गए अंगिनत गढ़्धे और सुरंगे
38:45प्रित्वी के गर्भ में सर्प की भाती रेंगते हुए एक भूल भुलिया का निर्मान कर चुके थे
38:51प्रित्वी देवी स्वयं अपनी गहराईयों में किये गए इस भयानत घाव से कराह, उठीन, उनके हर कमपन में दर्द और
38:59क्रोध का स्वर गूंज रहा था
39:02अंतह उस प्रकाश के स्रोत तक पहुँच कर उन्होंने यग्य के अश्व को एक परम ज्यानी तेजस्वी रिशी के समीक
39:09शान्त मुद्रा में खड़े देखा
39:12अश्व उनके सामने शांत खड़ा था, जबकि रिशी की उपस्थिती से निकलने वाली अलौकिक उर्जाने वातावर्ण को एक अजीब सी
39:21शांती और एक गहन रहस्य से भर दिया था